भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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भाषाटीकासमेत । ( ९७ ) अनिष्टाप्तौ च न द्वेष्टीष्टप्राप्तौ न च तुष्यति ॥ क्षेत्रतज्ज्ञौ च यो वेत्ति स मे प्रियतमो भवेत् १९ जो अनिष्टकी प्राप्तिमें द्वेष और इष्टकी प्राप्तिमें हर्ष नहीं करता है क्षेत्र और क्षेत्रज्ञको जो जानता है, वही मेरा प्यारा है॥१९॥ वरेण्य उवाच । किं क्षेत्रं कश्च तद्वेत्ति किं तज्ज्ञानं गजानन ॥ एतदाचक्ष्व मह्यं त्वं पृच्छते करुणाम्बुधे ॥२०॥ वरेण्य बोले भगवन् ! क्षेत्र क्या है और उसका जानने- वाला कौन है, उसका ज्ञान क्या है, हे करुणासागर मुझ प्रश्न करनेवालेसे यह सब आप वर्णन कीजिये ॥ २० ॥ श्रीगजानन उवाच ॥ पञ्च भूतानि तन्मात्राः पञ्च कर्मेन्द्रियाणि च ॥ अहंकारो मनो बुद्धिः पञ्चज्ञानेन्द्रियाणि च२१॥ श्रीगणेशजी बोले पांच भूत और उनकी तन्मात्रा, पंच कर्में- न्द्रिय, अहंकार, मन, बुद्धि और पांच ज्ञानेंद्रिय ॥ २१ ॥ इच्छाव्यक्तं धृतिद्वेषौ सुखदुःखे तथैव च ॥ चेतनासहितश्चायं समूहः क्षेत्रमुच्यते ॥ २२ ॥