भारतकोश
गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

गणेश गीता (गणेश पुराण क्रीड़ाखण्ड - राजा वरेण्य-गजानन संवाद सटीक)

Ganesha Gita from Ganesha Purana with Hindi Commentary

भगवान् गणेश / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished130 पृष्ठ

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( ९८ ) गणेशगीता अ० ९. इच्छा, व्यक्त, धैर्य, द्वेष, सुख, दुःख और चेतना सहित यह समूह, सब क्षेत्र कहाता है ॥ २२ ॥ तज्ज्ञं त्वं विद्धि मां भूप सर्वान्तर्यामिणं विभुम्॥ अयं समूहोऽहं चापि यज्ज्ञानविषयौ नृप ॥२३॥ हे राजन् ! उसका, जाननेवाला सर्वान्तर्यामी तुम मुझको ( क्षेत्रज्ञ ) जानो, मैं और यह समूह यह दोनों ज्ञेय अर्थात् ज्ञानके विषय हैं ॥ २३ ॥ आर्जवं गुरुशुश्रूषाविरक्तिश्चेन्द्रियार्थतः ॥ शौचं क्षान्तिरदंभश्च जन्मादिदोषवीक्षणम्॥२४॥ सरलता, गुरुशुश्रूषा, इन्द्रियोंका विषयोंसे वैराग्य, पवि- त्रता, सहनशीलता, पाखण्डका त्याग, जन्ममरणादि दोषोंमें दृष्टि ॥ २४ ॥ समदृष्टिर्दृढा भक्तिरेकान्तित्वं शमो दमः ॥ एतैर्यच्च युतं ज्ञानं तज्ज्ञानं विद्धि बाहुज ॥२५॥ समदृष्टिता, दृढभक्ति, एकान्तता, शम, दम, हे राजन् ! इनके सहित जो ज्ञान है, उसीको ज्ञान कहते हैं ॥ २५ ॥ तज्ज्ञानविषयं राजन्ब्रवीमि त्वं शृणुष्व मे ॥ यज्ज्ञात्वेति च निर्वाणं मुक्त्वा संसृतिसागरम् २६

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