भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 656 में से

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पृष्ठ 104

१०२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दीप्तिसे उनका मुखकमल सुशोभित हो रहा था ॥ २७ ॥ तदनन्तर इन्द्रने उस (अहल्या)-से कहा कि तुम मुझे शचीपति इन्द्र जानो, तुम्हारे रूप-सौन्दर्यके दर्शनसे मैं व्याकुल हो गया था ॥ २८ ॥ मुझे कहीं शान्ति नहीं प्राप्त हो रही थी, इसीलिये मेरे द्वारा ऐसा किया गया। अतः तुम भी मुझ त्रैलोक्यके ईश्वरको आदरपूर्वक स्वीकार कर लो ॥ २९ ॥ उस (इन्द्र)-के इस प्रकारके वचन सुनकर वह मुनिपत्नी अहल्या क्रोधित हो उठी और मुखसे मानो ज्वालाका वमन करती हुई-सी देवराज इन्द्रसे बोली- रे शतक्रतु (सौ यज्ञोंका कर्ता) ! रे मन्द [-बुद्धि] ! मूढ़ ! मेरे पतिके आनेपर तेरे इस शरीरकी क्या दशा होगी, यह मैं नहीं जानती ॥ ३०-३१ ॥ अरे दुष्ट ! तुझ पापीने मेरा पातिव्रत भंग कर दिया, अब मैं [मुनिश्रेष्ठ] गौतमकी वाणीसे निकले शापसे किस अवस्थाको प्राप्त होऊँगी ? ॥ ३२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'अहल्याधर्षण' नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥ इकतीसवाँ अध्याय गौतममुनिद्वारा अहल्या और इन्द्रको शाप रूक्मांगद बोले—हे महामुने ! गौतम [मुनि]-के आनेपर क्या घटना घटित हुई, उसे आप सम्पूर्ण रूपसे मुझे बताइये; इस विषयमें जाननेकी मेरे मनमें महान् इच्छा है ॥ १ ॥ नारदजी बोले-[हे राजा रूक्मांगद !] नित्यकर्म समाप्त करके गौतमजी अपने आश्रममें गये। उन्होंने अपनी पत्नी अहल्याको आवाज देकर कहा कि मुझे पादोदक (चरणोंके प्रक्षालनार्थ जल) दो ॥ २ ॥ पूर्वकी भाँति आज तुम मेरे सम्मुख क्यों नहीं आयी ? आसन भी नहीं लायी और मधुर वाणीमें वार्तालाप भी क्यों नहीं कर रही हो ? ॥ ३ ॥ उनके इस प्रकारके वचन सुनकर एक मुहूर्तके बाद वह बाहर निकली। उस समय वह अपना मुख नीचेकी ओर किये हुए थी और लताकी भाँति काँप रही थी ॥ ४ ॥ भूमिपर साष्टांग गिरकर उसने अपना मस्तक उन मुनिके चरणोंमें रख दिया और शापके भयसे व्याकुल होकर वह धीरे-धीरे मुनिसे बोली- ॥ ५ ॥ आप जब उषाकालमें स्नानके लिये और नित्यकर्मकी विधिको सम्पादन करनेके लिये गये थे, तब आपका रूप धारण करके देवताओंका राजा दुष्ट इन्द्र मुझसे [आकर] बोला-मैंने एक सुन्दरी स्त्री देखी, जो श्रेष्ठ अप्सराओंसे भी अधिक सुन्दर है; जिससे मेरा मन जप, नित्यकर्म और देवपूजनमें स्थिर नहीं हो रहा है ॥ ६-७ ॥ हे शोभने ! इसलिये मैं वापस लौट आया हूँ। तुम मुझे रतिदान दो। तब 'ऐसा प्रस्ताव करनेवाले आप ही हैं'- इस भ्रान्तिसे मैंने जैसा उसने कहा था, वैसा ही किया ॥ ८ ॥ तत्पश्चात् दिव्य गन्धका आघ्राणकर मुझे शंका हुई तो [मैंने उससे कहा-] रे दुष्टात्मा ! तू कौन है ? बता, नहीं तो भस्म हो जायगा ॥ ९ ॥ तब शापके भयसे वह बल दैत्यका वध करनेवाला इन्द्र प्रकट हुआ। हे मुनिश्रेष्ठ ! ठीक उसी समय मैंने आपका वचन सुना ॥ १० ॥ परंतु लज्जाके कारण मैं शीघ्र आ न सकी, मेरे अपराधको क्षमा करें; क्योंकि अपने अपराधका स्वयं निवेदन करनेमें दोष नहीं होता, दूसरेके द्वारा निवेदन किये जानेपर ही दोष होता है ॥ ११ ॥ मन्त्र, आयु, घर-परिवारके सदस्योंके दोष, धन-सम्पत्ति, रतिक्रिया, औषधि, मान-अपमान और दानका प्रकटीकरण नहीं करना चाहिये ॥ १२ ॥ यह सुनकर वे मुनि कोपसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले हो गये। उन्होंने अपनी पत्नीको शाप दिया- दुष्ट आचरणवाली ! तुम शिला हो जाओ ॥ १३ ॥ अतिकामुके ! क्योंकि तुम्हारा मन परपुरुषमें निमग्न था, इसलिये तुझे मेरी चेष्टाओं, मेरे स्वरूप और मेरे