श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 103, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ० ३० ] * इन्द्रका अहल्याके साथ छल करना * १०१ रूपके सामने सावित्री, शची (इन्द्रपत्नी), लक्ष्मी, गिरिराजनन्दिनी पार्वती, मेनका, रम्भा, उर्वशी और तिलोत्तमा भी लज्जित हो जाती; उसने अनसूया और अरुन्धतीको भी ईर्ष्यालु बना दिया है। सूर्यपत्नी छाया और संज्ञा तथा कश्यपकी पत्नी अदिति एवं नागपत्नियोंमें भी कोई उसकी तुलना करनेवाली नहीं है। [तबसे] मुझे न गान रुचिकर लग रहा है, न पूजन करना और न भोजन ही। न मुझे अपना ब्रह्मचारी रहना अच्छा लग रहा है और न मैं कभी नींद ही ले पा रहा हूँ, इसीलिये मैं शीघ्रतापूर्वक तुम्हारी इस सुन्दर अमरावतीपुरीको देखने चला आया। लेकिन इसे देखकर मुझे ऐसा लगता है कि उस देवी अहल्याके बिना यह तुच्छ है ॥ ४-८ १/२ ॥ नारदजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! इन्द्रसे ऐसा कहकर मैं अन्तर्धान हो गया ॥ ९ ॥ मुनिश्रेष्ठ भगवान् नारदके अन्तर्धान हो जानेपर [मन-ही-मन उनकी बातका स्मरण करते हुए] जम्भ दैत्यका भेदन करनेवाले इन्द्र स्वयं मीनकेतु कामदेव [- के बाणों]-से बँधकर मूर्च्छाको प्राप्त हो गये ॥ १० ॥ 'मैं गौतममुनिकी भार्या अहल्याको कब देखूँगा, कब उसे प्राप्तकर इस कामाग्निसे मुक्त होऊँगा'—ऐसा वे चिन्तन करने लगे ॥ ११ ॥ उसके बिना मैं अपना जीवन नहीं देखता—ऐसा संकल्पकर जम्भासुरका वध करनेवाले इन्द्रने गौतमका रूप धारण कर लिया ॥ १२ ॥ मार्गमें इस प्रकार चिन्तन करते हुए वे इन्द्र मुनिके आश्रमपर आये और गौतमके स्नानार्थ चले जानेपर उन्होंने अहल्याको देखा ॥ १३ ॥ तब उन्होंने कुटीके अन्दर प्रवेशकर [अहल्यासे] कहा—'हे प्रिये! सुन्दर शय्या तैयार करो।' तब उसने कहा कि आप जप छोड़कर घर कैसे आ गये? आप दिनमें संगकी इच्छा क्यों कर रहे हैं, जो कि अत्यन्त निन्दित है? ॥ १४ १/२ ॥ गौतम [-रूपधारी इन्द्र] बोले—जब मैं स्नानके लिये गया हुआ था, उसी समय एक श्रेष्ठ अप्सरा वहाँ स्नानके लिये आयी, वह मेरी आँखोंके सामने ही नग्न हो गयी। वह अत्यन्त सुन्दर अंगोंवाली थी। उसकी देहयष्टि अत्यन्त सुन्दर थी ॥ १५-१६ ॥ हे देवि! मेरा मन कामपीड़ित होनेके कारण जपमें नहीं लगा, इसलिये मैं आश्रम वापस आ गया। हे प्रिये! इस समय तुम मुझे रतिदान दो, नहीं तो तुम मुझे इस कामरूपी अग्निमें जलकर मरा हुआ देखोगी अथवा मैं तुम्हें शाप देकर संन्यासी हो जाऊँगा या [संगके प्रति] अपने मनका अत्यन्त निग्रह ही कर लूँगा ॥ १७-१८ ॥ अहल्या बोली—हे ब्रह्मर्षे! आप वेदाध्ययन और देवपूजाका त्यागकर संगके लिये क्यों प्रार्थना कर रहे हैं? यह आपके लिये उचित नहीं है, तथापि मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगी; क्योंकि पतिकी सेवा करनेके अतिरिक्त स्त्रीका कोई अन्य धर्म नहीं है ॥ १९ १/२ ॥ नारद बोले—स्वर, आकृति और स्वभावसे अहल्याने इन्द्रको अपना पति (गौतम) ही समझा था। तब वज्र धारण करनेवाले इन्द्र अहल्याके साथ शय्यापर गये। उन्होंने बिना किसी प्रकारकी शंकाके अहल्याके साथ नानाविध शृंगार चेष्टाएँ कीं ॥ २०-२१ ॥ इस प्रकार जम्भासुरहन्ता इन्द्रने [यद्यपि] गौतमके रूपमें उसके साथ क्रीडा की, फिर भी दिव्य गन्धोंका आघ्राणकर वह आश्चर्यचकित और अत्यन्त शंकित हो गयी। वह मनमें तर्क-वितर्क करने लगी कि यह कपटरूपधारी कौन है? क्या चन्द्रमाकी ही भाँति मुझे भी बहुत-बड़ा कलंक तो नहीं लग गया? ॥ २२-२३ ॥ इस दुष्टके संगमसे कहीं मेरे दोनों कुल तो नष्ट नहीं हो गये? मैं संसारमें यह कलंकसे काला मुख कैसे दिखलाऊँगी? ॥ २४ ॥ मेरे प्रिय पति [गौतम] मुनि मेरी क्या गति करेंगे? तब उसने क्रोधपूर्वक उस दुष्ट [कपटरूपधारी इन्द्र]-से प्रश्न किया—'रे कपटरूपधारी! तूने मेरे पतिका रूप धारणकर मुझे विश्वासमें लिया! बता तू कौन है? अन्यथा मैं तुझे शाप दे दूँगी' ऐसा कहे जानेपर शापसे डरकर इन्द्रने अपना वास्तविक रूप प्रकट कर दिया ॥ २५-२६ ॥ वे दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत तथा मुकुट और बाजूबन्द धारण किये हुए थे। कुण्डलोंकी अद्भुत