भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 102, कुल 656 में से

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१०० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ग्रस्त हो गया। हे मुने! मेरे उद्धारका उपाय बताइये ॥ ८ ॥ | प्रदान करनेवाले प्रभुका सम्यक् रूपसे अर्चनकर विप्रोंको मेरे वियोगसे [मेरे पिता] राजा भीम भी दुःखरूपी | दान दो। इससे तुम शीघ्र ही पवित्र हो जाओगे और जैसे समुद्रमें डूबे होंगे। उन (रुक्मांगद)-के इस प्रकारके | सर्प जीर्ण त्वचाका त्यागकर सुन्दर रूपवाला हो जाता है, वचन सुनकर सम्पूर्ण विश्वकी जानकारी रखनेवाले | वैसे ही तुम भी सुन्दर रूपवान् हो जाओगे ॥ १६-१७ ॥ नारदजीने करुणायुक्त होकर कुष्ठके नाशके लिये उपाय | ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] नारदद्वारा कहे गये बतलाया ॥ ९ १/२ ॥ | इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे नृपश्रेष्ठ रुक्मांगद नारदजी बोले-मार्गमें आते हुए मैंने एक उत्तम | [कुछ समयके लिये मानो] आनन्दसागरमें निमग्न हो आश्चर्यमयी घटना देखी, [जो इस प्रकार है-] ॥ १० ॥ | गये और कुछ भी नहीं बोले ॥ १८ ॥ विदर्भ देशमें कदम्बपुर नामसे विख्यात एक नगर | [तत्पश्चात्] रुक्मांगद बोले- हे निष्पाप मुने ! है, वहाँके एक मन्दिरमें मैंने भगवान् विनायककी | पूर्वकालमें उस क्षेत्रमें किसने मंगलमयी सिद्धि प्राप्त की मंगलमयी मूर्ति देखी है ॥ ११ ॥ | थी और मणियों एवं रत्नोंसे निर्मित उस मंगलमयी वैनायकी चिन्तामणि नामसे विख्यात वह मूर्ति सभीकी | मूर्तिकी स्थापना किसने की थी? हे मुने! इस विषयमें सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाली है। उसके सम्मुख | जाननेके लिये मेरे मनमें बहुत कौतूहल है। आप-जैसे गणेशजीके नामपर एक महान् कुण्ड है ॥ १२ ॥ | सत्पुरुषोंकी बुद्धि तो दूसरोंका उपकार करनेमें ही लगी हे राजन् ! वृद्धावस्थाके कारण जर्जर शरीरवाला | रहती है, अन्यथा विभिन्न लोकोंमें आपके भ्रमण करते कोई महाकुष्ठी शूद्र तीर्थयात्राके प्रसंगसे कदम्बपुर | रहनेका कोई कारण नहीं दीखता। हे द्विज ! बादल सम्पूर्ण आया, जहाँ सत्पुरुषोंके द्वारा प्रतिष्ठापित एक परम | लोकोंमें वर्षा करते हैं, शेषजी पृथ्वीको धारण करते हैं, रमणीय गणपतिक्षेत्र है। [वहाँ स्थित] गणेशकुण्डमें | सूर्य भी [लोगोंका] उपकार करनेके लिये ही दिन-रात स्नान करके उसने दिव्य देह प्राप्त कर ली और विनायक | भ्रमण करते रहते हैं। आप समस्त प्राणियोंके प्रति समभाव (गणेशजी)-के स्वरूपवाले गणोंके द्वारा लाये गये श्रेष्ठ | रखते हैं। मैं मूढ़ आप सर्वज्ञके समक्ष क्या बोल सकता विमानमें आरूढ़ होकर [गणेशजीके] उस उत्तम धामको | हूँ? हे दयानिधे ! हे देवर्षे ! फिर भी अपने संशयकी चला गया, जहाँ जाकर न कोई दुःखी होता है, न पुनः | निवृत्तिके लिये मैं आपसे पूछता हूँ ॥ १९-२४ ॥ उसका पतन होता है ॥ १३-१५ ॥ | नारदजी बोले-लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले हे हे राजेन्द्र! यह सब मैंने देखा है, अतः सम्प्रति तुम | राजन् ! आपने उचित प्रश्न किया है, मैं तुम्हारे [विनययुक्त] वहाँ जाकर स्नान करो। स्नान करके अभिलषित पदार्थोंको | वचनोंसे सन्तुष्ट हूँ, अतः सब कुछ बतलाता हूँ ॥ २५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'नारदागमन' नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २९ ॥ तीसवाँ अध्याय इन्द्रका अहल्याके साथ छल करना नारदजी बोले- [हे राजन् !] किसी समय मैं | सन्तोषके लिये कोई आश्चर्यजनक बात बतलाइये ॥ २ ॥ इन्द्रसे मिलने अमरावती गया हुआ था। उन्होंने मेरा | नारदजी बोले- मृत्युलोकमें मैंने गौतममुनिका विधिपूर्वक सम्यक् प्रकारसे पूजनकर और अत्यन्त विनम्र | महान् आश्रम देखा; जो अनेक वृक्षों, लता-जालों और होकर कहा- ॥ १ ॥ | विभिन्न प्रकारके पक्षियोंके समूहोंसे युक्त था ॥ ३ ॥ इन्द्र बोले- हे मुने ! आप सम्पूर्ण लोकोंमें भ्रमण | वहाँ मैंने अहल्यासहित गौतममुनिका दर्शन किया, करते रहते हैं, सब कुछ आपको ज्ञात भी है, अतः मेरे | उस अहल्याका रूप देखकर मैं विह्वल हो गया, जिसके