श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 101, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०२९ ] * देवर्षि नारदका रुक्मांगदको कुष्ठसे मुक्तिहेतु गणेशकुण्डमें स्नानकी सलाह देना * ९९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 है। भले ही समुद्र सूख जाय, पर मेरा मन कभी भी | आप सज्जनोंकी रक्षाके लिये अवतार लेते हैं, परंतु विचलित नहीं हो सकता ॥ १४-१५ १/२ ॥ | आपने इस अपने रूपपर गर्व करनेवाली, कुलटा और रुक्मांगदसे इस प्रकार निरादृत होनेपर मुकुन्दाने | दुष्ट स्त्रीका नाश नहीं किया ॥ २२ ॥ क्रोधित होकर उन्हें शाप दे दिया कि जैसे मैंने कष्ट | स्वर्णकी कान्तिसे स्पर्धा करनेवाला मेरा वह सुन्दर प्राप्त किया, वैसे तुम भी कुष्ठग्रस्त होकर कष्ट प्राप्त | शरीर मेरे किस दुष्कर्मसे अथवा कैसे इस अवस्थाको करो; क्योंकि तुम्हारा वज्रसे भी कठोर हृदय द्रवित नहीं | प्राप्त हो गया ? ॥ २३ ॥ हुआ ॥ १६-१७ ॥ | हे नाथ ! हे गजानन ! पूर्वकालमें जैसे मैं आपकी तब इस प्रकार बोलती हुई उस मुकुन्दाकी राजा | भक्ति करता था, वैसे ही मैं अब भी यथाविधि करता रुक्मांगदने बार-बार भर्त्सना की और अत्यन्त दुखित | रहूँगा, मैं आपको छोड़कर दूसरे किसीकी शरणमें नहीं होकर वे उस आश्रमसे शीघ्रतापूर्वक निकल गये ॥ १८ ॥ | जाऊँगा। मैं अपने मुख या इस शरीरको प्रजाजनोंको तदनन्तर उन्होंने अपने शरीरको देखा तो वह | नहीं दिखलाऊँगा, प्रायोपवेशन (अनशन) करके इस कुष्ठरोगसे युक्त, कान्तिहीन, अत्यन्त कुत्सित और | शरीरको सुखा डालूँगा ॥ २४-२५ ॥ बगुलेके शरीरकी भाँति श्वेत हो गया था ॥ १९ ॥ | इस प्रकारका निश्चय करके वे राजा रुक्मांगद बरगदके तब चिन्तारूपी समुद्रमें मग्न राजा रुक्मांगदने गजानन | वृक्षके नीचे जाकर बैठ गये। उधर उनके सेवकगण इधर- गणेशजीसे कहा-[हे देव!] मैंने आपका क्या अपराध | उधर दौड़ते रहे, पर राजाको देख नहीं पाये ॥ २६ ॥ किया है ? मैं यहाँ कैसे आ ही गया ? मेरी उस दुष्टा | रात्रि हो जानेपर वे लोग अपने-अपने घरको चले मुनिपत्नी मुकुन्दासे भेंट ही क्यों हुई? हे सिद्धिपते ! निश्चय | गये। [उस समय] राजा और उसके सेवकोंकी स्थिति ही आपने दुष्टोंको बहुत बढ़ा दिया है ॥ २०-२१ ॥ | चकवा और चकवी-जैसी हो गयी थी ॥ २७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'प्रायोपवेशन' नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥ उनतीसवाँ अध्याय देवर्षि नारदका राजा रुक्मांगदको कुष्ठसे मुक्तिहेतु गणेशकुण्डमें स्नानकी सलाह देना [ भृगु ] मुनि बोले- [हे राजा सोमकान्त !] उस | उनकी पत्नी (मुकुन्दा) अत्यन्त भ्रष्ट आचरणवाली वटवृक्षके नीचे [प्रायोपवेशनके उद्देश्यसे] बैठे हुए राजा | थी। उस कामपीड़िताने मेरा चुम्बन किया। वह कामप्रभावसे रुक्मांगदने किसी दिन मुनिश्रेष्ठ देवर्षि नारदको दूरसे | आक्रान्त थी, इसलिये मुनिके स्नानार्थ चले जानेपर उसने [आते] देखा ॥ १ ॥ | मनमें दुष्ट भाव रखते हुए कहा कि 'मुझे स्वीकार उन्होंने उन्हें नमस्कारकर क्षणभर विश्राम करनेकी | करो।' भगवान्की कृपासे जितेन्द्रिय रहते हुए मैंने उसे प्रार्थना की। तब वे करुणानिधान नारदजी आकाशमार्गसे | तिरस्कृत कर दिया ॥ ५-६ ॥ नीचे उतर आये ॥ २ ॥ | इससे अत्यन्त दुखी हुई उस निष्ठुर चित्तवालीने तब [राजाने] यथाशक्ति पूजनकर उन मुनिसे | मुझे शाप दे दिया कि 'हे महादुष्ट ! क्योंकि तुम मुझ आदरपूर्वक पूछा- [हे मुनिश्रेष्ठ !] मैं राजा भीमका महाबली | सकामाका त्याग कर रहे हो, इसलिये कुष्ठी हो पुत्र रुक्मांगद हूँ। आखेटके लिये विचरण करते हुए मैं | जाओ' ॥ ७ ॥ वाचकनविमुनिके आश्रममें जा पहुँचा। हे निष्पाप ! तृषित | उसके इस प्रकारके दुर्वचनको सुनकर मैं उस होनेके कारण मैंने वहाँ जलके लिये याचना की ॥ ३-४ ॥ | आश्रमसे बाहर निकल गया। तदनन्तर मैं श्वेत कुष्ठसे