भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 656 में से

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९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 विघ्नविनायक गणेशजीकी महान् भक्ति की। वह अपने | गवयों (हिरन जातिका जंगली पशु) और मृगोंका वध पिताद्वारा प्राप्त [गणेशजीके] एकाक्षर मन्त्रका नित्य | किया ॥ ३० ॥ जप करता था ॥ २९ ॥ | तत्पश्चात् अत्यन्त थकित होनेपर उसने किसी एक दिन युवराज रुक्मांगदने वनमें प्रवेश किया | मुनिका आश्रम देखा; जो वृक्षों, लताजालों और वैरत्याग और आखेटके व्याजसे विचरण करते हुए उसने अनेक | किये हुए पशुओंसे समन्वित था ॥ ३१॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'रुक्मांगदके अभिषेकका वर्णन' नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥

अट्ठाईसवाँ अध्याय रुक्मांगदका कुष्ठरोगसे ग्रस्त होना ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] तत्पश्चात् रुक्मांगदने | मेरा मन इस प्रकारके गर्हित कार्योंमें कभी नहीं लग [वहाँ उस आश्रममें] मंगलमय ऋषि वाचकनवी और | सकता। तुझ अत्यन्त दुष्टाद्वारा दिये गये जलका पान स्नेहयुक्त मधुरवाणी बोलनेवाली उनकी पत्नी मुकुन्दाका | करनेकी भी मेरी इच्छा नहीं है। 'अरे अमंगलकारिणि! दर्शन किया ॥ १ ॥ | यह ऋषिका आश्रम है'- इसलिये मैं यहाँ चला आया, अत्यन्त थकित राजा रुक्मांगदने उन दोनोंको | परंतु अब मैं यहाँसे चला जाऊँगा'। तब जानेके लिये नमस्कार किया और उन मुनिके स्नानहेतु चले जानेपर | उद्यत रुक्मांगदका हाथ पकड़कर कामातुरा मुकुन्दाने उन नृपश्रेष्ठने याचना की कि हे माता मुकुन्दा ! मुझे | कहा - ॥ ८-९ ॥ उत्तम और शीतल जल दो, बिना जलके मेरे प्राण | मुकुन्दा बोली-जो दूसरेकी स्त्रीको बलपूर्वक यमलोकको चले जायँगे ॥ २-३ ॥ | चरित्रभ्रष्ट करनेकी इच्छा करता है, वह ही नरकमें जाता तब [रुक्मांगदमें अनुरक्त] उस मुकुन्दाने इस | है; न कि स्वयं आनेवालीके साथ रमण करनेवाला ॥ १० ॥ वचनको सुनकर कहा-कामदेवसे भी अधिक सुन्दर | सत्ययुग और त्रेतायुगमें ब्रह्माजीने स्त्रियोंको स्वतन्त्रता तुम्हारे सदृश कोई पुरुष मैंने देवताओं, नागों, यक्षों, | प्रदान की थी। यदि तुम मेरे कहनेके अनुसार नहीं करोगे गन्धर्वों और मनुष्योंमें भी नहीं देखा। तुम सर्वाङ्गसुन्दर | तो भस्म हो जाओगे अथवा मैं तुम्हें राज्यसे भ्रष्टकर हो, अतः मेरा हृदय तुम्हारे अधरामृतका पान करनेके | जंगल-जंगल भटकनेवाला बना दूँगी ॥ १११/२ ॥ लिये तुमपर अत्यन्त आसक्त हो गया है, अतः उसे मुझे | मुनि बोले-ऐसा कहकर उस कामपीड़िता मुकुन्दाने प्रदान करो ॥ ४-५१/२ ॥ | दौड़कर राजा रुक्मांगदका दृढ़तापूर्वक आलिंगन कर [भृगु] मुनि बोले- [हे राजा सोमकान्त!] | लिया और हठपूर्वक उनके मुखका चुम्बन किया। तब थके हुए राजा रुक्मांगद उसके कुत्सित प्रस्तावको | रुक्मांगदने उसे बलपूर्वक दूर फेंक दिया ॥ १२-१३ ॥ सुनकर अत्यन्त दुखी हो उठे ॥ ६ ॥ | [उस समय] वह पृथिवीपर गिरकर उसी प्रकार उन्होंने तिलोत्तमासे भी उत्तम रूप-सौन्दर्यवाली | मूर्च्छित हो गयी, जिस प्रकार आँधीसे केलेका पेड़ गिर उस मुकुन्दासे जितेन्द्रियतापूर्वक कहा-पतिके रहते हुए | जाता है। तदनन्तर जब वह उठी तो परस्त्रीके प्रति विरक्त भी इस प्रकारकी निर्लज्जतापूर्ण बातको तुम छोड़ दो, | बुद्धिवाले राजा रुक्मांगदने उससे कहा-हे महाभाग्यवती मेरा मन परस्त्रीगमन-जैसे निन्दित कर्ममें नहीं लगता ॥ ७ ॥ | मुनिपत्नी! अरे अविवेकिनि ! जिसका मन परपुरुषमें लग विघ्नविनायक भगवान् गणेशजीकी भक्तिके प्रभावसे | जाता है, वह निश्चय ही नरकका भोग करनेवाली होती

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