भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 656 में से

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पृष्ठ 99

उ०ख०-अ० २७ ] * राजा भीमकी गणेशोपासना और गणेशजीकी कृपासे उसे पुत्रकी प्राप्ति * ९७ जानेपर वे राजा भीम उन्हें प्रणाम करके अपनी पत्नीके साथ लौट आये और अपने नगरको देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। उनके दोनों मन्त्री सेना तथा नगरवासियोंके साथ उनका स्वागत करनेके लिये आये ॥ ७-८॥ [उस समय] वहाँ आये हुए उन नागरिकोंमेंसे कुछने उनका आलिंगन किया, कुछने उन्हें दूरसे और कुछने निकट जाकर उन्हें नमस्कार किया। तब सबके साथ राजाने ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत नगरमें प्रवेश किया ॥ ९॥ [उस समय उस] राजमार्गपर जलका छिड़काव हुआ था और वह सुगन्धिद्रव्योंसे सुगन्धित तथा अनेक प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे अनुनादित था। लोग आपसमें कह रहे थे कि 'यह पुरी आज वैसे ही सुशोभित हो रही है, जैसे कोई नारी पतिको प्राप्त करके शोभित होती है अथवा जैसे कोई अन्धा व्यक्ति सुन्दर नेत्र प्राप्त करके शोभित होता है'-इस प्रकारके वचन सुनते हुए पालकीमें बैठे, सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत तथा लोगोंद्वारा जिनकी स्तुति हो रही थी-ऐसे राजा भीम और उनकी चारुहासिनी रानी-दोनोंनें प्रसन्न मनसे अनेक प्रकारकी समृद्धियोंसे परिपूर्ण और रमणीय नगरमें प्रवेश किया ॥ १०-१२॥ तदनन्तर उन दोनों (राजा और रानी)-ने सभी लोगोंको वस्त्र, आभूषण, मोती और पान देकर विदा किया और उन सबके चले जानेपर वे दोनों अपने भवनमें गये ॥ १३ ॥ तदनन्तर शुभ दिनमें राजा भीम राजा दक्षद्वारा बनवाये गये [गणेशजीके] मन्दिरमें गये, जिसे पूर्वकालमें बुद्धिमान् राजा दक्षने कौण्डिन्यपुरमें बनवाया था॥ १४॥ वहाँ राजा भीम विघ्नविनायक भगवान् गणेशका नित्य अर्चन करने लगे। वे उपवास करते हुए उनके मन्त्रका नित्य जप किया करते थे॥ १५॥ वे राजा भीम अनन्य भक्तिपूर्वक भोजन, शयन, यात्रा, वार्ता और साँस लेनेमें भी उन गणेशजीका ही नित्य मानसिक चिन्तन करते रहते थे ॥ १६ ॥ वे नरेश जल, स्थल, आकाश, मार्ग, स्वर्ग, देवताओं, मनुष्यों, वृक्षों, भक्ष्य और पेय पदार्थोंमें भी श्रेष्ठातिश्रेष्ठ गणेशजीका ही दर्शन करते थे ॥ १७ ॥ वे जिस-जिसको देखते, उसे प्रणाम करते और दृढ़तापूर्वक आलिंगन करते। नगरमें सभी लोग उन्हें पिशाच (विक्षिप्त) मानने लगे ॥ १८॥ तदनन्तर विनायक गणेशजीने उनके पास जाकर और राजा भीमका हाथ पकड़कर उनसे कहा-हे राजन् ! तुम [जीवन्]-मुक्त हो, तुम क्या चाहते हो, उसे बताओ ? ॥ १९॥ राजाने उनसे कहा- [हे प्रभो!] मैं आपके चरणकमलोंके अतिरिक्त कुछ नहीं जानता। तब विनायक गणेशजीने कहा-मेरी कृपासे तुम्हें सुन्दर, गुणवान् और स्वर्णसदृश शरीरवाले पुत्रकी प्राप्ति होगी। तुम अपने घर जाओ और देवताओं तथा ब्राह्मणोंकी पूजामें लगे रहो ॥ २०-२१॥ तत्पश्चात् राजाने राजमहलमें जाकर जैसा गणेशजीने कहा था, वैसा ही किया। 'गणेशजी प्रसन्न हों'-इस भावनासे उन्होंने सम्पूर्ण मनोयोगसे देवताओं और ब्राह्मणोंका पूजन एवं तर्पण किया, इससे अल्पकालमें ही उन्हें शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्रकी प्राप्ति हुई ॥ २२-२३॥ पुत्रजन्मके अवसरपर राजा भीमने अनेक प्रकारके दान दिये और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके कथनानुसार उसका 'रुक्मांगद'-यह नामकरण किया ॥ २४॥ वह बालक (रुक्मांगद) शुक्ल पक्षके चन्द्रमाकी भाँति नित्य वर्धमान हुआ। राजा भीमने शिक्षाप्राप्तिके लिये उसे गुरुको समर्पित कर दिया ॥ २५ ॥ सर्वविद्यानिधान गुरु कपिलने उसे जो भी विद्या प्रदान की, उसने उसे श्रवणमात्रसे ग्रहण कर लिया ॥ २६॥ इस प्रकार वह [रुक्मांगद] भी दूसरे गणेशजीकी ही भाँति विद्यानिधि हो गया। वह रुक्मांगद बलवान् और सभी शास्त्रोंका ज्ञाता था ॥ २७॥ गुणोंकी राशि उस राजकुमार रुक्मांगदका राजा भीमने पट्टाभिषेक किया और [उस अवसरपर] श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दासियाँ, रत्न और धन प्रदान किये ॥ २८॥ उस रुक्मांगदने अपने पिता भीमसे भी बढ़कर