श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 98, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
और कहाँ यह राज्य! हे मुनिश्रेष्ठ! मैं तो आपको ही विघ्नविनायक गणेश जानता हूँ॥ १९॥ हे ब्रह्मन्! आप मेरे मस्तकपर पुनः अपना करकमल रख दीजिये। हे मुने! जिससे मैं चिरकालके लिये सम्पूर्ण कामनाओंका पात्र हो जाऊँ ॥ २०॥ विश्वामित्रजी बोले— राजा दक्षके इस प्रकारके वचन सुनकर मुद्गलमुनिने उससे कहा कि तुम्हें कभी भी शत्रुओंसे भय नहीं होगा। तुम जो-जो कामनाएँ करोगे, वे सब पूर्ण होंगी॥ २११/२॥ तदनन्तर उस राजा दक्षने उन [ब्राह्मणश्रेष्ठ] मुनि मुद्गलको अनेक ग्राम, वस्त्र, रत्न, धन आदिका तथा अन्य ब्राह्मणोंको गोधन और वस्त्रोंका दान किया। तब वे ब्राह्मण राजाको आशीर्वादोंसे अभिनन्दितकर अपने- अपने घरको चले गये ॥ २२-२३ ॥ उस (राजा)-ने दोनों मन्त्रियों तथा परिवारीजनोंको भी अनेक ग्राम दिये। उस कुण्डिननगरमें गणेशजीका एक छोटा और प्राचीन मन्दिर था, उसने उसके स्थानपर विशाल मन्दिर बनवाया। तदनन्तर सभाका विसर्जनकर उसने अपने राजभवनमें प्रवेश किया ॥ २४-२५ ॥ जनसमुदायमें हो रही वार्ताको सुनकर [उसके पिता राजा] वल्लभ भी वहाँ आये। राजा वीरसेनने अपनी सौभाग्यकांक्षिणी कन्याका शुभ विवाह स्वप्नमें प्राप्त गणेशजीके आदेशानुसार तीनों लोकोंमें विश्रुत कीर्तिवाले महान् राजा दक्षके साथ कर दिया॥ २६-२७॥ उससे राजा दक्षको बृहद्भानु नामसे प्रसिद्ध पुत्रकी प्राप्ति हुई। उसका पुत्र खड्गधर हुआ। उस खड्गधरका पुत्र सुलभ हुआ। उस सुलभका पुत्र पद्माकर हुआ। उसका पुत्र दीप्तवपु हुआ। उस दीप्तवपुका पुत्र चित्रसेन हुआ और उस चित्रसेनके पुत्र तुम हो ॥ २८-२९ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यास !] तब विश्वामित्रजीके मुखसे अपनी वंश-परम्परा सुनकर उस नरश्रेष्ठ राजा भीमने उन द्विजश्रेष्ठ मुनिको प्रार्थनापूर्वक सन्तुष्टकर पूछा ॥ ३०१/२ ॥ राजा भीमने कहा— हे महामुने ! विघ्नविनायक गणेशजी मुझपर कब प्रसन्न होंगे? कब मैं उन देवाधिदेव गणेशजीका दर्शनकर कृतकृत्य होऊँगा ? हे विभो ! उस उपायको बताइये, जिससे वे मुझपर अनुग्रह करें ॥ ३१-३२॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'परम्पराका वर्णन' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥
सत्ताईसवाँ अध्याय राजा भीमकी गणेशोपासना और गणेशजीकी कृपासे उसे रुक्मांगद नामक पुत्रकी प्राप्ति
व्यासजी बोले— हे पितामह ! बुद्धिमान् और कृपावान् विश्वामित्रमुनिने [राजा] भीमको [गणेशजीके दर्शनका] कौन-सा उपाय बतलाया था, उसे आप मुझसे कहें। जैसे अमृतका पान करनेसे मृत्युका भय दूर हो जाता है, वैसे ही इस कथारूपी अमृतका पान करके मेरे मनसे मोहका समूह निकल गया है ॥ १-२ ॥ ब्रह्माजी बोले— हे पराशरपुत्र मुनिश्रेष्ठ व्यास ! उन्होंने राजा भीमसे जो उपाय कहा था, उसे तुम श्रवण करो। मुनि (विश्वामित्र)-ने भीमके प्रति एकाक्षर मन्त्रका कथन किया था, मैं उसे तुमसे कहता हूँ, सुनो। धर्मके सुन्दर स्वरूपके ज्ञाता और प्रसन्न मनवाले विश्वामित्रने उससे कहा — ॥ ३-४ ॥ विश्वामित्रजी बोले— [हे राजा भीम !] तुम इस [एकाक्षर महामन्त्र]-से सर्वव्यापक भगवान् गणनायक गणेशजीका आराधन करो। तुम दक्षद्वारा बनवाये गये देवालयमें इस मन्त्रका अनुष्ठान करो। भगवान् विघ्नविनायक गणेशजी तुम्हारे ऊपर प्रसन्न होकर तुम्हारी सभी कामनाओंको पूर्ण करेंगे। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष तथा अन्य अपेक्षाओंको भी प्रदान करेंगे। हे भीम ! अथवा तुम अपने नगरको जाओ, किसी भी प्रकारकी चिन्ता न करो ॥ ५-६१/२॥ ब्रह्माजी बोले— उन विश्वामित्रद्वारा ऐसा कहे