भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 656 में से

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पृष्ठ 97

उ०ख०-अ०२६ ] * दक्षको राज्यकी प्राप्ति और उनकी वंश-परम्पराका वर्णन * ९५ छब्बीसवाँ अध्याय दक्षको राज्यकी प्राप्ति और उनकी वंश-परम्पराका वर्णन विश्वामित्रजी बोले- [हे राजा भीम !] एक दिन जब शुभ ग्रहोंकी युति थी, [उस समय] शुभ लग्न, शुभ दिन और शुभ फल प्रदान करनेवाले योगमें नगरमें अनेक प्रकारके जनसमुदायोंके एकत्रित होनेपर राजा चन्द्रसेनकी रानी सुलभाने यह प्रार्थना करते हुए कि 'इस जनसमुदायमेंसे जिसे तुम्हारा अभिमत हो, उसे राजा बनाओ' रत्नमयी माला उस गजराजकी सूँडमें थमा दी ॥ १ ॥ रानीकी आज्ञा स्वीकारकर धातुओंसे सम्यक् प्रकारसे रंजित तथा ब्राह्मणों, बन्दीजनों एवं चारणगणोंसे प्रशंसित और अनेक प्रकारके वाद्योंका वादन करनेवालोंसे घिरा हुआ वह गजेन्द्र राजभटों और राज्यार्थी पुरुषोंके मध्य भ्रमण करने लगा। तदनन्तर सभाके चारों ओर उपस्थित सभी लोगोंको सूँघता हुआ नगरसे बाहर चला गया ॥ २ ॥ उस नगरकी स्त्रियाँ अपने पुत्रों और पतियोंको सुसज्जितकर अपने आगे करके खड़ी थीं, बहुत-से मनुष्य और श्रेणियोंके प्रमुख लोग भी वहाँ उपस्थित थे-वे सभी उस गहन नामवाले गजराजके नगरसे बाहर चले जानेपर अनमने होकर अपने-अपने घरको चले गये ॥ ३ ॥ वह हाथी वहाँ गया, जहाँ कमलापुत्र दक्ष गजानन गणेशजीका सम्यक् रूपसे पूजन कर रहा था। उसे देखते ही उसने वह माला [पृथ्वीपर] लोगोंके और स्वर्गमें देवताओंके देखते-देखते पहना दी ॥ ४ ॥ हे राजन्! तब कौण्डिन्यनगरके निवासियों, [दिवंगत] राजा चन्द्रसेन और दोनों मन्त्रियोंके अभिमतको जानकर लोगोंने दक्षको अनेक वस्त्र, मालाएँ एवं आभूषण प्रदान किये ॥ ५ ॥ उस समय देवलोकमें और पृथ्वीपर अनेक प्रकारके वाद्यसमूह बजने लगे। देववृन्द प्रसन्नतापूर्वक मांगलिक पुष्पोंकी वर्षा करने लगे ॥ ६ ॥ समाजमें जिसका जैसा स्थान और क्रम था, लोग उस प्रकार बैठ गये और दोनों मन्त्रियोंसहित उन सबने राजा दक्षको नमन किया ॥ ७ ॥ राजा दक्षने उपस्थित जनसमुदायको वस्त्र और ताम्बूल प्रदान किया। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंका पूजनकर [उन्हें] अनेक प्रकारके दान दे करके अपनी माताका भी वस्त्रों और अलंकारों आदिसे पूजन किया तथा उनसे भी विधिपूर्वक ब्राह्मणोंको दान दिलवाया ॥ ८-९ ॥ उन्हें पालकीपर बैठाकर स्वयं राजा दक्ष हाथीपर आरूढ़ हुआ और ध्वजों-पताकाओंसे समन्वित, अलंकृत एवं जल छिड़के हुए मार्गसे नगरको चला। उस समय राजाके दोनों मन्त्री घोड़ेपर सवार होकर उसके आगे- आगे चल रहे थे। बन्दीजन और नगरवासी उसकी स्तुति कर रहे थे, अप्सराएँ उसके आगे नृत्य कर रही थीं, गानविद्यामें प्रवीण गन्धर्व दौड़ते हुए उसके आगे चल रहे थे। उस समय 'जय' शब्द, 'नमः' शब्द और वाद्योंकी ध्वनि स्वर्गलोकतक पहुँच गयी ॥ १०-१२ ॥ राजद्वारपर पहुँचकर कुछ लोग उस (राजा दक्ष)- को प्रणामकर अपने घर चले गये, तदनन्तर उसके साथ इतने राजा उसकी सभामें प्रविष्ट हुए, जिनकी गणना नहीं हो सकती थी ॥ १३ ॥ उस महाबुद्धिमान् राजा दक्षने मुद्गलमुनिको लानेके लिये मन्त्री सुमन्तुके साथ छत्र, ध्वज, चामरसहित पालकी भेजी ॥ १४ ॥ मुद्गलमुनिको आते देखकर [राजा दक्षने] अपने आसनसे उठकर और आगे बढ़कर मुकुटसहित उनके चरणोंमें सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और उन्हें अपने आसनपर बैठाया तथा उनकी आज्ञासे स्वयं दूसरे आसनपर बैठा एवं राजसमुदायके साथ उन मुनि मुद्गलका पूजन किया ॥ १५-१७ ॥ महाबुद्धिमान् राजा दक्षने उन ब्राह्मण (मुद्गल मुनि)-को गौ भी प्रदान की और उनसे कहा-हे महामुने ! हे मुद्गल ! आज आपकी इस महान् महिमाका संसारको ज्ञान हो गया। मुझे शारीरिक सुन्दरता और राज्यकी प्राप्ति आपकी ही कृपासे हुई है ॥ १८ ॥ हे महामुने ! कहाँ मेरे पूर्व शरीरकी वह अवस्था

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