श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
छब्बीसवाँ अध्याय
उ०ख०-अ०२६ ] * दक्षको राज्यकी प्राप्ति और उनकी वंश-परम्पराका वर्णन * ९५ छब्बीसवाँ अध्याय दक्षको राज्यकी प्राप्ति और उनकी वंश-परम्पराका वर्णन विश्वामित्रजी बोले- [हे राजा भीम !] एक दिन जब शुभ ग्रहोंकी युति थी, [उस समय] शुभ लग्न, शुभ दिन और शुभ फल प्रदान करनेवाले योगमें नगरमें अनेक प्रकारके जनसमुदायोंके एकत्रित होनेपर राजा चन्द्रसेनकी रानी सुलभाने यह प्रार्थना करते हुए कि 'इस जनसमुदायमेंसे जिसे तुम्हारा अभिमत हो, उसे राजा बनाओ' रत्नमयी माला उस गजराजकी सूँडमें थमा दी ॥ १ ॥ रानीकी आज्ञा स्वीकारकर धातुओंसे सम्यक् प्रकारसे रंजित तथा ब्राह्मणों, बन्दीजनों एवं चारणगणोंसे प्रशंसित और अनेक प्रकारके वाद्योंका वादन करनेवालोंसे घिरा हुआ वह गजेन्द्र राजभटों और राज्यार्थी पुरुषोंके मध्य भ्रमण करने लगा। तदनन्तर सभाके चारों ओर उपस्थित सभी लोगोंको सूँघता हुआ नगरसे बाहर चला गया ॥ २ ॥ उस नगरकी स्त्रियाँ अपने पुत्रों और पतियोंको सुसज्जितकर अपने आगे करके खड़ी थीं, बहुत-से मनुष्य और श्रेणियोंके प्रमुख लोग भी वहाँ उपस्थित थे-वे सभी उस गहन नामवाले गजराजके नगरसे बाहर चले जानेपर अनमने होकर अपने-अपने घरको चले गये ॥ ३ ॥ वह हाथी वहाँ गया, जहाँ कमलापुत्र दक्ष गजानन गणेशजीका सम्यक् रूपसे पूजन कर रहा था। उसे देखते ही उसने वह माला [पृथ्वीपर] लोगोंके और स्वर्गमें देवताओंके देखते-देखते पहना दी ॥ ४ ॥ हे राजन्! तब कौण्डिन्यनगरके निवासियों, [दिवंगत] राजा चन्द्रसेन और दोनों मन्त्रियोंके अभिमतको जानकर लोगोंने दक्षको अनेक वस्त्र, मालाएँ एवं आभूषण प्रदान किये ॥ ५ ॥ उस समय देवलोकमें और पृथ्वीपर अनेक प्रकारके वाद्यसमूह बजने लगे। देववृन्द प्रसन्नतापूर्वक मांगलिक पुष्पोंकी वर्षा करने लगे ॥ ६ ॥ समाजमें जिसका जैसा स्थान और क्रम था, लोग उस प्रकार बैठ गये और दोनों मन्त्रियोंसहित उन सबने राजा दक्षको नमन किया ॥ ७ ॥ राजा दक्षने उपस्थित जनसमुदायको वस्त्र और ताम्बूल प्रदान किया। तत्पश्चात् ब्राह्मणोंका पूजनकर [उन्हें] अनेक प्रकारके दान दे करके अपनी माताका भी वस्त्रों और अलंकारों आदिसे पूजन किया तथा उनसे भी विधिपूर्वक ब्राह्मणोंको दान दिलवाया ॥ ८-९ ॥ उन्हें पालकीपर बैठाकर स्वयं राजा दक्ष हाथीपर आरूढ़ हुआ और ध्वजों-पताकाओंसे समन्वित, अलंकृत एवं जल छिड़के हुए मार्गसे नगरको चला। उस समय राजाके दोनों मन्त्री घोड़ेपर सवार होकर उसके आगे- आगे चल रहे थे। बन्दीजन और नगरवासी उसकी स्तुति कर रहे थे, अप्सराएँ उसके आगे नृत्य कर रही थीं, गानविद्यामें प्रवीण गन्धर्व दौड़ते हुए उसके आगे चल रहे थे। उस समय 'जय' शब्द, 'नमः' शब्द और वाद्योंकी ध्वनि स्वर्गलोकतक पहुँच गयी ॥ १०-१२ ॥ राजद्वारपर पहुँचकर कुछ लोग उस (राजा दक्ष)- को प्रणामकर अपने घर चले गये, तदनन्तर उसके साथ इतने राजा उसकी सभामें प्रविष्ट हुए, जिनकी गणना नहीं हो सकती थी ॥ १३ ॥ उस महाबुद्धिमान् राजा दक्षने मुद्गलमुनिको लानेके लिये मन्त्री सुमन्तुके साथ छत्र, ध्वज, चामरसहित पालकी भेजी ॥ १४ ॥ मुद्गलमुनिको आते देखकर [राजा दक्षने] अपने आसनसे उठकर और आगे बढ़कर मुकुटसहित उनके चरणोंमें सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और उन्हें अपने आसनपर बैठाया तथा उनकी आज्ञासे स्वयं दूसरे आसनपर बैठा एवं राजसमुदायके साथ उन मुनि मुद्गलका पूजन किया ॥ १५-१७ ॥ महाबुद्धिमान् राजा दक्षने उन ब्राह्मण (मुद्गल मुनि)-को गौ भी प्रदान की और उनसे कहा-हे महामुने ! हे मुद्गल ! आज आपकी इस महान् महिमाका संसारको ज्ञान हो गया। मुझे शारीरिक सुन्दरता और राज्यकी प्राप्ति आपकी ही कृपासे हुई है ॥ १८ ॥ हे महामुने ! कहाँ मेरे पूर्व शरीरकी वह अवस्था
९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
और कहाँ यह राज्य! हे मुनिश्रेष्ठ! मैं तो आपको ही विघ्नविनायक गणेश जानता हूँ॥ १९॥ हे ब्रह्मन्! आप मेरे मस्तकपर पुनः अपना करकमल रख दीजिये। हे मुने! जिससे मैं चिरकालके लिये सम्पूर्ण कामनाओंका पात्र हो जाऊँ ॥ २०॥ विश्वामित्रजी बोले— राजा दक्षके इस प्रकारके वचन सुनकर मुद्गलमुनिने उससे कहा कि तुम्हें कभी भी शत्रुओंसे भय नहीं होगा। तुम जो-जो कामनाएँ करोगे, वे सब पूर्ण होंगी॥ २११/२॥ तदनन्तर उस राजा दक्षने उन [ब्राह्मणश्रेष्ठ] मुनि मुद्गलको अनेक ग्राम, वस्त्र, रत्न, धन आदिका तथा अन्य ब्राह्मणोंको गोधन और वस्त्रोंका दान किया। तब वे ब्राह्मण राजाको आशीर्वादोंसे अभिनन्दितकर अपने- अपने घरको चले गये ॥ २२-२३ ॥ उस (राजा)-ने दोनों मन्त्रियों तथा परिवारीजनोंको भी अनेक ग्राम दिये। उस कुण्डिननगरमें गणेशजीका एक छोटा और प्राचीन मन्दिर था, उसने उसके स्थानपर विशाल मन्दिर बनवाया। तदनन्तर सभाका विसर्जनकर उसने अपने राजभवनमें प्रवेश किया ॥ २४-२५ ॥ जनसमुदायमें हो रही वार्ताको सुनकर [उसके पिता राजा] वल्लभ भी वहाँ आये। राजा वीरसेनने अपनी सौभाग्यकांक्षिणी कन्याका शुभ विवाह स्वप्नमें प्राप्त गणेशजीके आदेशानुसार तीनों लोकोंमें विश्रुत कीर्तिवाले महान् राजा दक्षके साथ कर दिया॥ २६-२७॥ उससे राजा दक्षको बृहद्भानु नामसे प्रसिद्ध पुत्रकी प्राप्ति हुई। उसका पुत्र खड्गधर हुआ। उस खड्गधरका पुत्र सुलभ हुआ। उस सुलभका पुत्र पद्माकर हुआ। उसका पुत्र दीप्तवपु हुआ। उस दीप्तवपुका पुत्र चित्रसेन हुआ और उस चित्रसेनके पुत्र तुम हो ॥ २८-२९ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यास !] तब विश्वामित्रजीके मुखसे अपनी वंश-परम्परा सुनकर उस नरश्रेष्ठ राजा भीमने उन द्विजश्रेष्ठ मुनिको प्रार्थनापूर्वक सन्तुष्टकर पूछा ॥ ३०१/२ ॥ राजा भीमने कहा— हे महामुने ! विघ्नविनायक गणेशजी मुझपर कब प्रसन्न होंगे? कब मैं उन देवाधिदेव गणेशजीका दर्शनकर कृतकृत्य होऊँगा ? हे विभो ! उस उपायको बताइये, जिससे वे मुझपर अनुग्रह करें ॥ ३१-३२॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'परम्पराका वर्णन' नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥
सत्ताईसवाँ अध्याय राजा भीमकी गणेशोपासना और गणेशजीकी कृपासे उसे रुक्मांगद नामक पुत्रकी प्राप्ति
व्यासजी बोले— हे पितामह ! बुद्धिमान् और कृपावान् विश्वामित्रमुनिने [राजा] भीमको [गणेशजीके दर्शनका] कौन-सा उपाय बतलाया था, उसे आप मुझसे कहें। जैसे अमृतका पान करनेसे मृत्युका भय दूर हो जाता है, वैसे ही इस कथारूपी अमृतका पान करके मेरे मनसे मोहका समूह निकल गया है ॥ १-२ ॥ ब्रह्माजी बोले— हे पराशरपुत्र मुनिश्रेष्ठ व्यास ! उन्होंने राजा भीमसे जो उपाय कहा था, उसे तुम श्रवण करो। मुनि (विश्वामित्र)-ने भीमके प्रति एकाक्षर मन्त्रका कथन किया था, मैं उसे तुमसे कहता हूँ, सुनो। धर्मके सुन्दर स्वरूपके ज्ञाता और प्रसन्न मनवाले विश्वामित्रने उससे कहा — ॥ ३-४ ॥ विश्वामित्रजी बोले— [हे राजा भीम !] तुम इस [एकाक्षर महामन्त्र]-से सर्वव्यापक भगवान् गणनायक गणेशजीका आराधन करो। तुम दक्षद्वारा बनवाये गये देवालयमें इस मन्त्रका अनुष्ठान करो। भगवान् विघ्नविनायक गणेशजी तुम्हारे ऊपर प्रसन्न होकर तुम्हारी सभी कामनाओंको पूर्ण करेंगे। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष तथा अन्य अपेक्षाओंको भी प्रदान करेंगे। हे भीम ! अथवा तुम अपने नगरको जाओ, किसी भी प्रकारकी चिन्ता न करो ॥ ५-६१/२॥ ब्रह्माजी बोले— उन विश्वामित्रद्वारा ऐसा कहे
उ०ख०-अ० २७ ] * राजा भीमकी गणेशोपासना और गणेशजीकी कृपासे उसे पुत्रकी प्राप्ति * ९७ जानेपर वे राजा भीम उन्हें प्रणाम करके अपनी पत्नीके साथ लौट आये और अपने नगरको देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। उनके दोनों मन्त्री सेना तथा नगरवासियोंके साथ उनका स्वागत करनेके लिये आये ॥ ७-८॥ [उस समय] वहाँ आये हुए उन नागरिकोंमेंसे कुछने उनका आलिंगन किया, कुछने उन्हें दूरसे और कुछने निकट जाकर उन्हें नमस्कार किया। तब सबके साथ राजाने ध्वजा-पताकाओंसे अलंकृत नगरमें प्रवेश किया ॥ ९॥ [उस समय उस] राजमार्गपर जलका छिड़काव हुआ था और वह सुगन्धिद्रव्योंसे सुगन्धित तथा अनेक प्रकारके वाद्योंकी ध्वनिसे अनुनादित था। लोग आपसमें कह रहे थे कि 'यह पुरी आज वैसे ही सुशोभित हो रही है, जैसे कोई नारी पतिको प्राप्त करके शोभित होती है अथवा जैसे कोई अन्धा व्यक्ति सुन्दर नेत्र प्राप्त करके शोभित होता है'-इस प्रकारके वचन सुनते हुए पालकीमें बैठे, सुन्दर वस्त्राभूषणोंसे अलंकृत तथा लोगोंद्वारा जिनकी स्तुति हो रही थी-ऐसे राजा भीम और उनकी चारुहासिनी रानी-दोनोंनें प्रसन्न मनसे अनेक प्रकारकी समृद्धियोंसे परिपूर्ण और रमणीय नगरमें प्रवेश किया ॥ १०-१२॥ तदनन्तर उन दोनों (राजा और रानी)-ने सभी लोगोंको वस्त्र, आभूषण, मोती और पान देकर विदा किया और उन सबके चले जानेपर वे दोनों अपने भवनमें गये ॥ १३ ॥ तदनन्तर शुभ दिनमें राजा भीम राजा दक्षद्वारा बनवाये गये [गणेशजीके] मन्दिरमें गये, जिसे पूर्वकालमें बुद्धिमान् राजा दक्षने कौण्डिन्यपुरमें बनवाया था॥ १४॥ वहाँ राजा भीम विघ्नविनायक भगवान् गणेशका नित्य अर्चन करने लगे। वे उपवास करते हुए उनके मन्त्रका नित्य जप किया करते थे॥ १५॥ वे राजा भीम अनन्य भक्तिपूर्वक भोजन, शयन, यात्रा, वार्ता और साँस लेनेमें भी उन गणेशजीका ही नित्य मानसिक चिन्तन करते रहते थे ॥ १६ ॥ वे नरेश जल, स्थल, आकाश, मार्ग, स्वर्ग, देवताओं, मनुष्यों, वृक्षों, भक्ष्य और पेय पदार्थोंमें भी श्रेष्ठातिश्रेष्ठ गणेशजीका ही दर्शन करते थे ॥ १७ ॥ वे जिस-जिसको देखते, उसे प्रणाम करते और दृढ़तापूर्वक आलिंगन करते। नगरमें सभी लोग उन्हें पिशाच (विक्षिप्त) मानने लगे ॥ १८॥ तदनन्तर विनायक गणेशजीने उनके पास जाकर और राजा भीमका हाथ पकड़कर उनसे कहा-हे राजन् ! तुम [जीवन्]-मुक्त हो, तुम क्या चाहते हो, उसे बताओ ? ॥ १९॥ राजाने उनसे कहा- [हे प्रभो!] मैं आपके चरणकमलोंके अतिरिक्त कुछ नहीं जानता। तब विनायक गणेशजीने कहा-मेरी कृपासे तुम्हें सुन्दर, गुणवान् और स्वर्णसदृश शरीरवाले पुत्रकी प्राप्ति होगी। तुम अपने घर जाओ और देवताओं तथा ब्राह्मणोंकी पूजामें लगे रहो ॥ २०-२१॥ तत्पश्चात् राजाने राजमहलमें जाकर जैसा गणेशजीने कहा था, वैसा ही किया। 'गणेशजी प्रसन्न हों'-इस भावनासे उन्होंने सम्पूर्ण मनोयोगसे देवताओं और ब्राह्मणोंका पूजन एवं तर्पण किया, इससे अल्पकालमें ही उन्हें शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्रकी प्राप्ति हुई ॥ २२-२३॥ पुत्रजन्मके अवसरपर राजा भीमने अनेक प्रकारके दान दिये और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंके कथनानुसार उसका 'रुक्मांगद'-यह नामकरण किया ॥ २४॥ वह बालक (रुक्मांगद) शुक्ल पक्षके चन्द्रमाकी भाँति नित्य वर्धमान हुआ। राजा भीमने शिक्षाप्राप्तिके लिये उसे गुरुको समर्पित कर दिया ॥ २५ ॥ सर्वविद्यानिधान गुरु कपिलने उसे जो भी विद्या प्रदान की, उसने उसे श्रवणमात्रसे ग्रहण कर लिया ॥ २६॥ इस प्रकार वह [रुक्मांगद] भी दूसरे गणेशजीकी ही भाँति विद्यानिधि हो गया। वह रुक्मांगद बलवान् और सभी शास्त्रोंका ज्ञाता था ॥ २७॥ गुणोंकी राशि उस राजकुमार रुक्मांगदका राजा भीमने पट्टाभिषेक किया और [उस अवसरपर] श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको दासियाँ, रत्न और धन प्रदान किये ॥ २८॥ उस रुक्मांगदने अपने पिता भीमसे भी बढ़कर
९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 विघ्नविनायक गणेशजीकी महान् भक्ति की। वह अपने | गवयों (हिरन जातिका जंगली पशु) और मृगोंका वध पिताद्वारा प्राप्त [गणेशजीके] एकाक्षर मन्त्रका नित्य | किया ॥ ३० ॥ जप करता था ॥ २९ ॥ | तत्पश्चात् अत्यन्त थकित होनेपर उसने किसी एक दिन युवराज रुक्मांगदने वनमें प्रवेश किया | मुनिका आश्रम देखा; जो वृक्षों, लताजालों और वैरत्याग और आखेटके व्याजसे विचरण करते हुए उसने अनेक | किये हुए पशुओंसे समन्वित था ॥ ३१॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'रुक्मांगदके अभिषेकका वर्णन' नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥
अट्ठाईसवाँ अध्याय रुक्मांगदका कुष्ठरोगसे ग्रस्त होना ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] तत्पश्चात् रुक्मांगदने | मेरा मन इस प्रकारके गर्हित कार्योंमें कभी नहीं लग [वहाँ उस आश्रममें] मंगलमय ऋषि वाचकनवी और | सकता। तुझ अत्यन्त दुष्टाद्वारा दिये गये जलका पान स्नेहयुक्त मधुरवाणी बोलनेवाली उनकी पत्नी मुकुन्दाका | करनेकी भी मेरी इच्छा नहीं है। 'अरे अमंगलकारिणि! दर्शन किया ॥ १ ॥ | यह ऋषिका आश्रम है'- इसलिये मैं यहाँ चला आया, अत्यन्त थकित राजा रुक्मांगदने उन दोनोंको | परंतु अब मैं यहाँसे चला जाऊँगा'। तब जानेके लिये नमस्कार किया और उन मुनिके स्नानहेतु चले जानेपर | उद्यत रुक्मांगदका हाथ पकड़कर कामातुरा मुकुन्दाने उन नृपश्रेष्ठने याचना की कि हे माता मुकुन्दा ! मुझे | कहा - ॥ ८-९ ॥ उत्तम और शीतल जल दो, बिना जलके मेरे प्राण | मुकुन्दा बोली-जो दूसरेकी स्त्रीको बलपूर्वक यमलोकको चले जायँगे ॥ २-३ ॥ | चरित्रभ्रष्ट करनेकी इच्छा करता है, वह ही नरकमें जाता तब [रुक्मांगदमें अनुरक्त] उस मुकुन्दाने इस | है; न कि स्वयं आनेवालीके साथ रमण करनेवाला ॥ १० ॥ वचनको सुनकर कहा-कामदेवसे भी अधिक सुन्दर | सत्ययुग और त्रेतायुगमें ब्रह्माजीने स्त्रियोंको स्वतन्त्रता तुम्हारे सदृश कोई पुरुष मैंने देवताओं, नागों, यक्षों, | प्रदान की थी। यदि तुम मेरे कहनेके अनुसार नहीं करोगे गन्धर्वों और मनुष्योंमें भी नहीं देखा। तुम सर्वाङ्गसुन्दर | तो भस्म हो जाओगे अथवा मैं तुम्हें राज्यसे भ्रष्टकर हो, अतः मेरा हृदय तुम्हारे अधरामृतका पान करनेके | जंगल-जंगल भटकनेवाला बना दूँगी ॥ १११/२ ॥ लिये तुमपर अत्यन्त आसक्त हो गया है, अतः उसे मुझे | मुनि बोले-ऐसा कहकर उस कामपीड़िता मुकुन्दाने प्रदान करो ॥ ४-५१/२ ॥ | दौड़कर राजा रुक्मांगदका दृढ़तापूर्वक आलिंगन कर [भृगु] मुनि बोले- [हे राजा सोमकान्त!] | लिया और हठपूर्वक उनके मुखका चुम्बन किया। तब थके हुए राजा रुक्मांगद उसके कुत्सित प्रस्तावको | रुक्मांगदने उसे बलपूर्वक दूर फेंक दिया ॥ १२-१३ ॥ सुनकर अत्यन्त दुखी हो उठे ॥ ६ ॥ | [उस समय] वह पृथिवीपर गिरकर उसी प्रकार उन्होंने तिलोत्तमासे भी उत्तम रूप-सौन्दर्यवाली | मूर्च्छित हो गयी, जिस प्रकार आँधीसे केलेका पेड़ गिर उस मुकुन्दासे जितेन्द्रियतापूर्वक कहा-पतिके रहते हुए | जाता है। तदनन्तर जब वह उठी तो परस्त्रीके प्रति विरक्त भी इस प्रकारकी निर्लज्जतापूर्ण बातको तुम छोड़ दो, | बुद्धिवाले राजा रुक्मांगदने उससे कहा-हे महाभाग्यवती मेरा मन परस्त्रीगमन-जैसे निन्दित कर्ममें नहीं लगता ॥ ७ ॥ | मुनिपत्नी! अरे अविवेकिनि ! जिसका मन परपुरुषमें लग विघ्नविनायक भगवान् गणेशजीकी भक्तिके प्रभावसे | जाता है, वह निश्चय ही नरकका भोग करनेवाली होती
उ०ख०-अ०२९ ] * देवर्षि नारदका रुक्मांगदको कुष्ठसे मुक्तिहेतु गणेशकुण्डमें स्नानकी सलाह देना * ९९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 है। भले ही समुद्र सूख जाय, पर मेरा मन कभी भी | आप सज्जनोंकी रक्षाके लिये अवतार लेते हैं, परंतु विचलित नहीं हो सकता ॥ १४-१५ १/२ ॥ | आपने इस अपने रूपपर गर्व करनेवाली, कुलटा और रुक्मांगदसे इस प्रकार निरादृत होनेपर मुकुन्दाने | दुष्ट स्त्रीका नाश नहीं किया ॥ २२ ॥ क्रोधित होकर उन्हें शाप दे दिया कि जैसे मैंने कष्ट | स्वर्णकी कान्तिसे स्पर्धा करनेवाला मेरा वह सुन्दर प्राप्त किया, वैसे तुम भी कुष्ठग्रस्त होकर कष्ट प्राप्त | शरीर मेरे किस दुष्कर्मसे अथवा कैसे इस अवस्थाको करो; क्योंकि तुम्हारा वज्रसे भी कठोर हृदय द्रवित नहीं | प्राप्त हो गया ? ॥ २३ ॥ हुआ ॥ १६-१७ ॥ | हे नाथ ! हे गजानन ! पूर्वकालमें जैसे मैं आपकी तब इस प्रकार बोलती हुई उस मुकुन्दाकी राजा | भक्ति करता था, वैसे ही मैं अब भी यथाविधि करता रुक्मांगदने बार-बार भर्त्सना की और अत्यन्त दुखित | रहूँगा, मैं आपको छोड़कर दूसरे किसीकी शरणमें नहीं होकर वे उस आश्रमसे शीघ्रतापूर्वक निकल गये ॥ १८ ॥ | जाऊँगा। मैं अपने मुख या इस शरीरको प्रजाजनोंको तदनन्तर उन्होंने अपने शरीरको देखा तो वह | नहीं दिखलाऊँगा, प्रायोपवेशन (अनशन) करके इस कुष्ठरोगसे युक्त, कान्तिहीन, अत्यन्त कुत्सित और | शरीरको सुखा डालूँगा ॥ २४-२५ ॥ बगुलेके शरीरकी भाँति श्वेत हो गया था ॥ १९ ॥ | इस प्रकारका निश्चय करके वे राजा रुक्मांगद बरगदके तब चिन्तारूपी समुद्रमें मग्न राजा रुक्मांगदने गजानन | वृक्षके नीचे जाकर बैठ गये। उधर उनके सेवकगण इधर- गणेशजीसे कहा-[हे देव!] मैंने आपका क्या अपराध | उधर दौड़ते रहे, पर राजाको देख नहीं पाये ॥ २६ ॥ किया है ? मैं यहाँ कैसे आ ही गया ? मेरी उस दुष्टा | रात्रि हो जानेपर वे लोग अपने-अपने घरको चले मुनिपत्नी मुकुन्दासे भेंट ही क्यों हुई? हे सिद्धिपते ! निश्चय | गये। [उस समय] राजा और उसके सेवकोंकी स्थिति ही आपने दुष्टोंको बहुत बढ़ा दिया है ॥ २०-२१ ॥ | चकवा और चकवी-जैसी हो गयी थी ॥ २७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'प्रायोपवेशन' नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥ उनतीसवाँ अध्याय देवर्षि नारदका राजा रुक्मांगदको कुष्ठसे मुक्तिहेतु गणेशकुण्डमें स्नानकी सलाह देना [ भृगु ] मुनि बोले- [हे राजा सोमकान्त !] उस | उनकी पत्नी (मुकुन्दा) अत्यन्त भ्रष्ट आचरणवाली वटवृक्षके नीचे [प्रायोपवेशनके उद्देश्यसे] बैठे हुए राजा | थी। उस कामपीड़िताने मेरा चुम्बन किया। वह कामप्रभावसे रुक्मांगदने किसी दिन मुनिश्रेष्ठ देवर्षि नारदको दूरसे | आक्रान्त थी, इसलिये मुनिके स्नानार्थ चले जानेपर उसने [आते] देखा ॥ १ ॥ | मनमें दुष्ट भाव रखते हुए कहा कि 'मुझे स्वीकार उन्होंने उन्हें नमस्कारकर क्षणभर विश्राम करनेकी | करो।' भगवान्की कृपासे जितेन्द्रिय रहते हुए मैंने उसे प्रार्थना की। तब वे करुणानिधान नारदजी आकाशमार्गसे | तिरस्कृत कर दिया ॥ ५-६ ॥ नीचे उतर आये ॥ २ ॥ | इससे अत्यन्त दुखी हुई उस निष्ठुर चित्तवालीने तब [राजाने] यथाशक्ति पूजनकर उन मुनिसे | मुझे शाप दे दिया कि 'हे महादुष्ट ! क्योंकि तुम मुझ आदरपूर्वक पूछा- [हे मुनिश्रेष्ठ !] मैं राजा भीमका महाबली | सकामाका त्याग कर रहे हो, इसलिये कुष्ठी हो पुत्र रुक्मांगद हूँ। आखेटके लिये विचरण करते हुए मैं | जाओ' ॥ ७ ॥ वाचकनविमुनिके आश्रममें जा पहुँचा। हे निष्पाप ! तृषित | उसके इस प्रकारके दुर्वचनको सुनकर मैं उस होनेके कारण मैंने वहाँ जलके लिये याचना की ॥ ३-४ ॥ | आश्रमसे बाहर निकल गया। तदनन्तर मैं श्वेत कुष्ठसे
१०० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ग्रस्त हो गया। हे मुने! मेरे उद्धारका उपाय बताइये ॥ ८ ॥ | प्रदान करनेवाले प्रभुका सम्यक् रूपसे अर्चनकर विप्रोंको मेरे वियोगसे [मेरे पिता] राजा भीम भी दुःखरूपी | दान दो। इससे तुम शीघ्र ही पवित्र हो जाओगे और जैसे समुद्रमें डूबे होंगे। उन (रुक्मांगद)-के इस प्रकारके | सर्प जीर्ण त्वचाका त्यागकर सुन्दर रूपवाला हो जाता है, वचन सुनकर सम्पूर्ण विश्वकी जानकारी रखनेवाले | वैसे ही तुम भी सुन्दर रूपवान् हो जाओगे ॥ १६-१७ ॥ नारदजीने करुणायुक्त होकर कुष्ठके नाशके लिये उपाय | ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] नारदद्वारा कहे गये बतलाया ॥ ९ १/२ ॥ | इस प्रकारके वचनोंको सुनकर वे नृपश्रेष्ठ रुक्मांगद नारदजी बोले-मार्गमें आते हुए मैंने एक उत्तम | [कुछ समयके लिये मानो] आनन्दसागरमें निमग्न हो आश्चर्यमयी घटना देखी, [जो इस प्रकार है-] ॥ १० ॥ | गये और कुछ भी नहीं बोले ॥ १८ ॥ विदर्भ देशमें कदम्बपुर नामसे विख्यात एक नगर | [तत्पश्चात्] रुक्मांगद बोले- हे निष्पाप मुने ! है, वहाँके एक मन्दिरमें मैंने भगवान् विनायककी | पूर्वकालमें उस क्षेत्रमें किसने मंगलमयी सिद्धि प्राप्त की मंगलमयी मूर्ति देखी है ॥ ११ ॥ | थी और मणियों एवं रत्नोंसे निर्मित उस मंगलमयी वैनायकी चिन्तामणि नामसे विख्यात वह मूर्ति सभीकी | मूर्तिकी स्थापना किसने की थी? हे मुने! इस विषयमें सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाली है। उसके सम्मुख | जाननेके लिये मेरे मनमें बहुत कौतूहल है। आप-जैसे गणेशजीके नामपर एक महान् कुण्ड है ॥ १२ ॥ | सत्पुरुषोंकी बुद्धि तो दूसरोंका उपकार करनेमें ही लगी हे राजन् ! वृद्धावस्थाके कारण जर्जर शरीरवाला | रहती है, अन्यथा विभिन्न लोकोंमें आपके भ्रमण करते कोई महाकुष्ठी शूद्र तीर्थयात्राके प्रसंगसे कदम्बपुर | रहनेका कोई कारण नहीं दीखता। हे द्विज ! बादल सम्पूर्ण आया, जहाँ सत्पुरुषोंके द्वारा प्रतिष्ठापित एक परम | लोकोंमें वर्षा करते हैं, शेषजी पृथ्वीको धारण करते हैं, रमणीय गणपतिक्षेत्र है। [वहाँ स्थित] गणेशकुण्डमें | सूर्य भी [लोगोंका] उपकार करनेके लिये ही दिन-रात स्नान करके उसने दिव्य देह प्राप्त कर ली और विनायक | भ्रमण करते रहते हैं। आप समस्त प्राणियोंके प्रति समभाव (गणेशजी)-के स्वरूपवाले गणोंके द्वारा लाये गये श्रेष्ठ | रखते हैं। मैं मूढ़ आप सर्वज्ञके समक्ष क्या बोल सकता विमानमें आरूढ़ होकर [गणेशजीके] उस उत्तम धामको | हूँ? हे दयानिधे ! हे देवर्षे ! फिर भी अपने संशयकी चला गया, जहाँ जाकर न कोई दुःखी होता है, न पुनः | निवृत्तिके लिये मैं आपसे पूछता हूँ ॥ १९-२४ ॥ उसका पतन होता है ॥ १३-१५ ॥ | नारदजी बोले-लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले हे हे राजेन्द्र! यह सब मैंने देखा है, अतः सम्प्रति तुम | राजन् ! आपने उचित प्रश्न किया है, मैं तुम्हारे [विनययुक्त] वहाँ जाकर स्नान करो। स्नान करके अभिलषित पदार्थोंको | वचनोंसे सन्तुष्ट हूँ, अतः सब कुछ बतलाता हूँ ॥ २५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'नारदागमन' नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २९ ॥ तीसवाँ अध्याय इन्द्रका अहल्याके साथ छल करना नारदजी बोले- [हे राजन् !] किसी समय मैं | सन्तोषके लिये कोई आश्चर्यजनक बात बतलाइये ॥ २ ॥ इन्द्रसे मिलने अमरावती गया हुआ था। उन्होंने मेरा | नारदजी बोले- मृत्युलोकमें मैंने गौतममुनिका विधिपूर्वक सम्यक् प्रकारसे पूजनकर और अत्यन्त विनम्र | महान् आश्रम देखा; जो अनेक वृक्षों, लता-जालों और होकर कहा- ॥ १ ॥ | विभिन्न प्रकारके पक्षियोंके समूहोंसे युक्त था ॥ ३ ॥ इन्द्र बोले- हे मुने ! आप सम्पूर्ण लोकोंमें भ्रमण | वहाँ मैंने अहल्यासहित गौतममुनिका दर्शन किया, करते रहते हैं, सब कुछ आपको ज्ञात भी है, अतः मेरे | उस अहल्याका रूप देखकर मैं विह्वल हो गया, जिसके
उ०ख०-अ० ३० ] * इन्द्रका अहल्याके साथ छल करना * १०१ रूपके सामने सावित्री, शची (इन्द्रपत्नी), लक्ष्मी, गिरिराजनन्दिनी पार्वती, मेनका, रम्भा, उर्वशी और तिलोत्तमा भी लज्जित हो जाती; उसने अनसूया और अरुन्धतीको भी ईर्ष्यालु बना दिया है। सूर्यपत्नी छाया और संज्ञा तथा कश्यपकी पत्नी अदिति एवं नागपत्नियोंमें भी कोई उसकी तुलना करनेवाली नहीं है। [तबसे] मुझे न गान रुचिकर लग रहा है, न पूजन करना और न भोजन ही। न मुझे अपना ब्रह्मचारी रहना अच्छा लग रहा है और न मैं कभी नींद ही ले पा रहा हूँ, इसीलिये मैं शीघ्रतापूर्वक तुम्हारी इस सुन्दर अमरावतीपुरीको देखने चला आया। लेकिन इसे देखकर मुझे ऐसा लगता है कि उस देवी अहल्याके बिना यह तुच्छ है ॥ ४-८ १/२ ॥ नारदजी बोले—हे नृपश्रेष्ठ! इन्द्रसे ऐसा कहकर मैं अन्तर्धान हो गया ॥ ९ ॥ मुनिश्रेष्ठ भगवान् नारदके अन्तर्धान हो जानेपर [मन-ही-मन उनकी बातका स्मरण करते हुए] जम्भ दैत्यका भेदन करनेवाले इन्द्र स्वयं मीनकेतु कामदेव [- के बाणों]-से बँधकर मूर्च्छाको प्राप्त हो गये ॥ १० ॥ 'मैं गौतममुनिकी भार्या अहल्याको कब देखूँगा, कब उसे प्राप्तकर इस कामाग्निसे मुक्त होऊँगा'—ऐसा वे चिन्तन करने लगे ॥ ११ ॥ उसके बिना मैं अपना जीवन नहीं देखता—ऐसा संकल्पकर जम्भासुरका वध करनेवाले इन्द्रने गौतमका रूप धारण कर लिया ॥ १२ ॥ मार्गमें इस प्रकार चिन्तन करते हुए वे इन्द्र मुनिके आश्रमपर आये और गौतमके स्नानार्थ चले जानेपर उन्होंने अहल्याको देखा ॥ १३ ॥ तब उन्होंने कुटीके अन्दर प्रवेशकर [अहल्यासे] कहा—'हे प्रिये! सुन्दर शय्या तैयार करो।' तब उसने कहा कि आप जप छोड़कर घर कैसे आ गये? आप दिनमें संगकी इच्छा क्यों कर रहे हैं, जो कि अत्यन्त निन्दित है? ॥ १४ १/२ ॥ गौतम [-रूपधारी इन्द्र] बोले—जब मैं स्नानके लिये गया हुआ था, उसी समय एक श्रेष्ठ अप्सरा वहाँ स्नानके लिये आयी, वह मेरी आँखोंके सामने ही नग्न हो गयी। वह अत्यन्त सुन्दर अंगोंवाली थी। उसकी देहयष्टि अत्यन्त सुन्दर थी ॥ १५-१६ ॥ हे देवि! मेरा मन कामपीड़ित होनेके कारण जपमें नहीं लगा, इसलिये मैं आश्रम वापस आ गया। हे प्रिये! इस समय तुम मुझे रतिदान दो, नहीं तो तुम मुझे इस कामरूपी अग्निमें जलकर मरा हुआ देखोगी अथवा मैं तुम्हें शाप देकर संन्यासी हो जाऊँगा या [संगके प्रति] अपने मनका अत्यन्त निग्रह ही कर लूँगा ॥ १७-१८ ॥ अहल्या बोली—हे ब्रह्मर्षे! आप वेदाध्ययन और देवपूजाका त्यागकर संगके लिये क्यों प्रार्थना कर रहे हैं? यह आपके लिये उचित नहीं है, तथापि मैं आपकी आज्ञाका पालन करूँगी; क्योंकि पतिकी सेवा करनेके अतिरिक्त स्त्रीका कोई अन्य धर्म नहीं है ॥ १९ १/२ ॥ नारद बोले—स्वर, आकृति और स्वभावसे अहल्याने इन्द्रको अपना पति (गौतम) ही समझा था। तब वज्र धारण करनेवाले इन्द्र अहल्याके साथ शय्यापर गये। उन्होंने बिना किसी प्रकारकी शंकाके अहल्याके साथ नानाविध शृंगार चेष्टाएँ कीं ॥ २०-२१ ॥ इस प्रकार जम्भासुरहन्ता इन्द्रने [यद्यपि] गौतमके रूपमें उसके साथ क्रीडा की, फिर भी दिव्य गन्धोंका आघ्राणकर वह आश्चर्यचकित और अत्यन्त शंकित हो गयी। वह मनमें तर्क-वितर्क करने लगी कि यह कपटरूपधारी कौन है? क्या चन्द्रमाकी ही भाँति मुझे भी बहुत-बड़ा कलंक तो नहीं लग गया? ॥ २२-२३ ॥ इस दुष्टके संगमसे कहीं मेरे दोनों कुल तो नष्ट नहीं हो गये? मैं संसारमें यह कलंकसे काला मुख कैसे दिखलाऊँगी? ॥ २४ ॥ मेरे प्रिय पति [गौतम] मुनि मेरी क्या गति करेंगे? तब उसने क्रोधपूर्वक उस दुष्ट [कपटरूपधारी इन्द्र]-से प्रश्न किया—'रे कपटरूपधारी! तूने मेरे पतिका रूप धारणकर मुझे विश्वासमें लिया! बता तू कौन है? अन्यथा मैं तुझे शाप दे दूँगी' ऐसा कहे जानेपर शापसे डरकर इन्द्रने अपना वास्तविक रूप प्रकट कर दिया ॥ २५-२६ ॥ वे दिव्य आभूषणोंसे अलंकृत तथा मुकुट और बाजूबन्द धारण किये हुए थे। कुण्डलोंकी अद्भुत
१०२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 दीप्तिसे उनका मुखकमल सुशोभित हो रहा था ॥ २७ ॥ तदनन्तर इन्द्रने उस (अहल्या)-से कहा कि तुम मुझे शचीपति इन्द्र जानो, तुम्हारे रूप-सौन्दर्यके दर्शनसे मैं व्याकुल हो गया था ॥ २८ ॥ मुझे कहीं शान्ति नहीं प्राप्त हो रही थी, इसीलिये मेरे द्वारा ऐसा किया गया। अतः तुम भी मुझ त्रैलोक्यके ईश्वरको आदरपूर्वक स्वीकार कर लो ॥ २९ ॥ उस (इन्द्र)-के इस प्रकारके वचन सुनकर वह मुनिपत्नी अहल्या क्रोधित हो उठी और मुखसे मानो ज्वालाका वमन करती हुई-सी देवराज इन्द्रसे बोली- रे शतक्रतु (सौ यज्ञोंका कर्ता) ! रे मन्द [-बुद्धि] ! मूढ़ ! मेरे पतिके आनेपर तेरे इस शरीरकी क्या दशा होगी, यह मैं नहीं जानती ॥ ३०-३१ ॥ अरे दुष्ट ! तुझ पापीने मेरा पातिव्रत भंग कर दिया, अब मैं [मुनिश्रेष्ठ] गौतमकी वाणीसे निकले शापसे किस अवस्थाको प्राप्त होऊँगी ? ॥ ३२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'अहल्याधर्षण' नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥ इकतीसवाँ अध्याय गौतममुनिद्वारा अहल्या और इन्द्रको शाप रूक्मांगद बोले—हे महामुने ! गौतम [मुनि]-के आनेपर क्या घटना घटित हुई, उसे आप सम्पूर्ण रूपसे मुझे बताइये; इस विषयमें जाननेकी मेरे मनमें महान् इच्छा है ॥ १ ॥ नारदजी बोले-[हे राजा रूक्मांगद !] नित्यकर्म समाप्त करके गौतमजी अपने आश्रममें गये। उन्होंने अपनी पत्नी अहल्याको आवाज देकर कहा कि मुझे पादोदक (चरणोंके प्रक्षालनार्थ जल) दो ॥ २ ॥ पूर्वकी भाँति आज तुम मेरे सम्मुख क्यों नहीं आयी ? आसन भी नहीं लायी और मधुर वाणीमें वार्तालाप भी क्यों नहीं कर रही हो ? ॥ ३ ॥ उनके इस प्रकारके वचन सुनकर एक मुहूर्तके बाद वह बाहर निकली। उस समय वह अपना मुख नीचेकी ओर किये हुए थी और लताकी भाँति काँप रही थी ॥ ४ ॥ भूमिपर साष्टांग गिरकर उसने अपना मस्तक उन मुनिके चरणोंमें रख दिया और शापके भयसे व्याकुल होकर वह धीरे-धीरे मुनिसे बोली- ॥ ५ ॥ आप जब उषाकालमें स्नानके लिये और नित्यकर्मकी विधिको सम्पादन करनेके लिये गये थे, तब आपका रूप धारण करके देवताओंका राजा दुष्ट इन्द्र मुझसे [आकर] बोला-मैंने एक सुन्दरी स्त्री देखी, जो श्रेष्ठ अप्सराओंसे भी अधिक सुन्दर है; जिससे मेरा मन जप, नित्यकर्म और देवपूजनमें स्थिर नहीं हो रहा है ॥ ६-७ ॥ हे शोभने ! इसलिये मैं वापस लौट आया हूँ। तुम मुझे रतिदान दो। तब 'ऐसा प्रस्ताव करनेवाले आप ही हैं'- इस भ्रान्तिसे मैंने जैसा उसने कहा था, वैसा ही किया ॥ ८ ॥ तत्पश्चात् दिव्य गन्धका आघ्राणकर मुझे शंका हुई तो [मैंने उससे कहा-] रे दुष्टात्मा ! तू कौन है ? बता, नहीं तो भस्म हो जायगा ॥ ९ ॥ तब शापके भयसे वह बल दैत्यका वध करनेवाला इन्द्र प्रकट हुआ। हे मुनिश्रेष्ठ ! ठीक उसी समय मैंने आपका वचन सुना ॥ १० ॥ परंतु लज्जाके कारण मैं शीघ्र आ न सकी, मेरे अपराधको क्षमा करें; क्योंकि अपने अपराधका स्वयं निवेदन करनेमें दोष नहीं होता, दूसरेके द्वारा निवेदन किये जानेपर ही दोष होता है ॥ ११ ॥ मन्त्र, आयु, घर-परिवारके सदस्योंके दोष, धन-सम्पत्ति, रतिक्रिया, औषधि, मान-अपमान और दानका प्रकटीकरण नहीं करना चाहिये ॥ १२ ॥ यह सुनकर वे मुनि कोपसे व्याकुल इन्द्रियोंवाले हो गये। उन्होंने अपनी पत्नीको शाप दिया- दुष्ट आचरणवाली ! तुम शिला हो जाओ ॥ १३ ॥ अतिकामुके ! क्योंकि तुम्हारा मन परपुरुषमें निमग्न था, इसलिये तुझे मेरी चेष्टाओं, मेरे स्वरूप और मेरे
उ०ख०-अ०३२] * देवताओंकी गौतममुनिसे इन्द्रके शापोद्धारहेतु प्रार्थना * १०३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
स्वभाव तथा उसके स्वरूप, स्वभाव एवं उसकी चेष्टाओंमें | जब इन्द्रने अपने शरीरकी ओर देखा तो उसमें स्त्रीयोनिके अन्तर नहीं ज्ञात हुआ। जब राजा दशरथके पुत्र श्रीराम वन- | सहस्र चिह्न हो गये थे। तब बल और वृत्र नामक असुरोंका वध वनमें भ्रमण करते हुए यहाँ आयेंगे, तब तुम उनके चरणस्पर्शसे | करनेवाले इन्द्र दुःखके सागरमें निमग्न हो गये ॥ २२ १/२ ॥ पुनः अपने स्वरूपको प्राप्त कर लोगी ॥ १४-१५ ॥ | इन्द्र बोले—मैं वृद्धजनोंद्वारा अनेक बार धर्मोपदेशोंसे नारदजी बोले—तब वह उन तपोनिधिके वचनोंके | शिक्षित किया गया था, परंतु मैंने उन वृद्धजनोंके प्रभावसे शिला हो गयी और अहल्याको प्राप्त शापको | वचनोंपर आदरपूर्वक विचार नहीं किया। अपनी बुद्धिद्वारा सुनकर इन्द्र उसी प्रकार काँपने लगे, जैसे प्रचण्ड वायुके | किया हुआ निर्णय हितकर और दूसरेकी प्रेरणासे किया वेगसे हिमालयपर्वत। वे अपने मनमें तर्क-वितर्क करने | गया कार्य विनाशका हेतु होता है ॥ २३-२४ ॥ लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये ? ॥ १६-१७ ॥ | गुरुद्वारा दी गयी बुद्धि श्रेष्ठ होती है, जबकि स्त्रीमें यदि मैं समुद्रके मध्यमें, कुएँमें या तालाबमें अथवा | आसक्त बुद्धि क्षयकारिणी होती है। नारदका वचन कमलमें भी छिप जाऊँ तो भी ये [गौतम] मुनि मुझे | मानकर मैंने उस अनिन्दिता [मुनिपत्नी अहल्या]-से जान जायँगे ॥ १८ ॥ | कैसे दुष्कर्म कर लिया ! ॥ २५ ॥ अतः वज्र धारण करनेवाले उन इन्द्रने बिडालका | [इस गर्हित कर्मके कारण] देवताओंका राजा होते रूप धारण किया और वहाँसे चले गये। तदनन्तर जब | हुए भी मैं संसारमें अपना मुख कैसे दिखलाऊँगा? वह गौतमने घरमें, द्वारपर और आश्रममें उन्हें कहीं नहीं देखा | मेरी दिव्य देह आज कहाँ चली गयी? [इस सहस्र तो सोचने लगे कि वह दानवोंका शत्रु इन्द्र कहाँ चला | भगयुक्त अपने शरीरके विषयमें] मैं अपनी पत्नीसे क्या गया, जिसने मेरी भार्याको विदूषित किया है? तब | कहूँगा ? ॥ २६ ॥ उन्होंने ध्यान किया तो क्षणमात्रमें उन मुनिश्रेष्ठने सब | मुझे धिक्कार है! और उस कामदेवको धिक्कार कुछ जान लिया ॥ १९-२० ॥ | है, जिसके कारण मैं इस निन्दित अवस्थाको प्राप्त हुआ [तदनन्तर उन्होंने कहा—] रे दुष्ट! चूँकि तू | हूँ। प्राणियोंको अपने द्वारा किये गये शुभ अथवा अशुभ देवेन्द्र है, इसलिये तुझे भस्म नहीं करूँगा, परंतु हे | कर्मका फल भोगना ही पड़ता है ॥ २७ ॥ शचीपति ! मैं तुझे शाप देता हूँ कि तेरा शरीर स्त्रीयोनिके | मैं अपने इस पापका तिर्यक् योनिमें जाकर भोग एक हजार चिह्नोंसे युक्त हो जाय ॥ २१ ॥ | करूँगा। मैं इन्द्रगोप (वीरबहूटी) नामक कीटका रूप मुनिद्वारा रोषपूर्वक कहे गये इन वचनोंको सुनकर | धारणकर कमलिनीकी कलीमें स्थित हो जाता हूँ ॥ २८ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शक्रशापवर्णन' नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥ ——— ࿕ ———
बत्तीसवाँ अध्याय देवताओंकी गौतममुनिसे इन्द्रके शापोद्धारहेतु प्रार्थना और गौतममुनिका उन्हें षडक्षर मन्त्रका उपदेश देना
नारदजी बोले-[हे राजा रुक्मांगद !] इन्द्र जब | शारीरिक विरूपताकी बात बतायी ॥ २ ॥ कमलिनी [-की कली]-में चले गये, तब मैं उनके | [मैंने उनसे कहा कि] हे देवताओ! इन्द्रने लोकको गया। वहाँ मैंने बृहस्पति आदि प्रमुख देवताओंको | अहल्याका सतीत्व हरण किया, जिसके कारण गौतमके [चिन्तातुर] बैठे देखा ॥ १ ॥ | शापसे इन्द्रके शरीरमें सहस्र भग हो गये और वह मैंने उन सबको अहल्या और इन्द्रके समागम, उन | अहल्या शिला हो गयी ॥ ३ ॥ दोनोंको शापकी प्राप्ति और उसके कारण उनकी | ब्रह्माजी बोले-[हे व्यास!] नारदजीका कथन
१०४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
सुनकर वे सभी देवता शोकमग्न हो गये। वे अत्यन्त दुखित होकर रुदन करने लगे और हड़बड़ीमें जोर- जोरसे साँस लेने एवं छोड़ने लगे ॥ ४ ॥ देवताओंने कहा- [हे नारदजी !] जिन्होंने सौ यज्ञोंका सम्पादन किया, जिन्होंने दानवोंको परास्त किया, जिन्होंने त्रैलोक्यका पालन किया और सौभाग्यशाली ऐन्द्रपदका भोग किया, बहुत-से देवताओं और ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मणोंका पूजन किया, दूसरोंके लिये अत्यन्त दुर्लभ अनेक प्रकारके भोगोंका भोग किया-वे देव [-राज] इन्द्र कहाँ रह रहे होंगे? वे भोजन और शयन कैसे कर रहे होंगे? आज हम उनके या अपने [हितके] लिये किसकी शरणमें जायें ? ॥ ५-७॥ कौन हम सबका, ऐन्द्रपदका और शचीका पालन करेगा ? मुनिश्रेष्ठ गौतम कैसे प्रसन्न हो सकेंगे ? ॥ ८ ॥ वे गौतममुनि अपनी भार्यासे वियुक्त हैं और रोषपूर्वक उस इन्द्रके अपराधका स्मरण करते हैं। गौतममुनिको प्रसन्न करनेका अन्य कोई उपाय हमें दिखायी भी नहीं देता है ॥ ९ ॥ हे नारदजी ! इसलिये हम लोग गौतममुनिको सान्त्वना देनेके लिये जायँगे। इस प्रकार वे देवता नारदजीके साथ गौतममुनिके आश्रमपर गये ॥ १० ॥ [वहाँ] गौतममुनिके पास जाकर उनके शरणागत होकर हाथ जोड़ करके अनेक प्रकारसे प्रार्थनाकर [देवता] उन्हें प्रसन्न करने लगे ॥ ११ ॥ देवता बोले- हे मुने! आपका प्रभाव कह सकनेकी शक्ति हममें नहीं है। भला, सुमेरु और हिमालयकी गरिमा कौन कह सकता है ? ॥ १२ ॥ वर्षाकी बूँदों, पृथ्वीके धूलिकणों, गंगाजीकी बालुकाके कणों, समुद्रके जलकणों और भगवान् विष्णुके गुणोंकी गणना कौन मूढ़बुद्धि कर सकता है ? ॥ १३ ॥ पूर्वकालमें [अकालके समय] आपने प्रातः- काल बीज बोकर मध्याह्नमें फसल तैयार कर ली थी और [दुर्भिक्षपीड़ित] श्रेष्ठ ऋषियोंकी रक्षा की थी ॥ १४ ॥ वालखिल्य मुनियोंने यज्ञ करके दूसरे इन्द्रकी रचना कर दी थी, पर बादमें ब्रह्माजीकी प्रार्थनापर उसे पक्षियोंका इन्द्र बना दिया था ॥ १५ ॥ एक [अगस्त्यमुनि]-ने जलनिधि (समुद्र)-को चुल्लूमें भरकर पी लिया था, बुद्धिमान् गाधिपुत्र विश्वामित्रके द्वारा तो दूसरी सृष्टिका ही निर्माण प्रारम्भ कर दिया गया था ॥ १६ ॥ महात्मा च्यवनके द्वारा इन्द्रकी भुजाका स्तम्भन कर दिया गया था। इसलिये सभी प्राणियोंको आप- जैसे मुनियोंकी सब प्रकारसे सेवा और उन्हें नमन करना चाहिये; क्योंकि लोकोपकारमें रत और दीनोंपर अनुग्रह करनेवाले आप-जैसे ऋषि-मुनियोंका दर्शन, सम्भाषण, पूजन और स्पर्श पापोंका नाश करनेवाला होता है। हम लोग इन्द्रपर आपके अनुग्रहके निमित्त आपकी शरणमें आये हैं, आप ही कृपा करनेमें समर्थ हैं ॥ १७-१८१/२॥ गौतमजी बोले- आप लोगों (देवताओं)-का दर्शन चर्म चक्षुवाले [हम-जैसे मनुष्यों]-को नहीं होता, मेरे किसी पुण्यका उदय हुआ है, जिससे आपका दर्शन हो सका है, यह मनुष्योंकी मनोकामनाओंको पूर्ण करनेवाला है। आप सबके दर्शनमात्रसे मेरा जन्म, मेरा आश्रम, मेरी तपस्या, मेरा दान, मेरी देह और आत्मा तथा मेरे द्वारा किये गये व्रत- सभी सार्थक हो गये। इस समय आप सब मुझसे किस विषयमें प्रार्थना कर रहे हैं, उसे मेरे समक्ष निरूपित करें, यदि मेरे करनेयोग्य होगा तो आप सब देवताओंके स्मरणके प्रभावसे मैं उसे अवश्य करूँगा ॥ १९-२११/२॥ मुनि (नारदजी) बोले- [हे राजा रुक्मांगद!] मुनि गौतमके इस प्रकारके वचन सुनकर वे देवता इस प्रकार हर्षित हो गये, जैसे [पूर्ण] चन्द्रमाके उदय होनेपर समुद्र हर्षको प्राप्त करता है अथवा जैसे बालककी [तोतली] वाणी सुनकर माता-पिता मुदित होते हैं।* तब उन सबने महामुनि गौतमसे प्रार्थना की ॥ २२-२३१/२॥
- जौं बालक कह तोतरि बाता। सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता ॥ (रा०च०मा० १।८।९)
उ०ख०-अ०३३ ] * गणेशजीके षडक्षरमन्त्रके प्रभावसे इन्द्रको सहस्र नेत्रोंकी प्राप्ति * १०५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
**देवता बोले—**ईश्वरका अपराध करनेके कारण कामदेव भस्मत्वको प्राप्त हो गया था अर्थात् भस्म हो गया था, परंतु अपराधी होते हुए भी इन्द्रको आपने प्राणहीन नहीं किया। हे मुने! अब वह पुनः अपना स्थान जैसे पा जाय, वैसा ही आप करें। हम सबके वचनोंको मानकर आप उसके अपराधोंको क्षमा कर दें। आपके द्वारा ऐसी कृपा करनेपर हम सबकी भी इच्छा पूर्ण हो जायगी॥ २४—२६॥ **नारदजी बोले—**देवसमुदायके वचनोंको सुनकर उन गौतममुनिने सभी देवगणोंसे हँसते हुए प्रत्युत्तरमें इस प्रकार कहा—॥ २७॥ **गौतमजी बोले—**उस पतित, पापी, कपटी, मूर्ख, दुष्ट और विवेकहीनका तो नाम भी नहीं लेना चाहिये॥ २८॥ हे देवताओ! जिसे अपने दुष्कृतका पछतावा न हो, उसके उद्धारका तो कोई उपाय ही नहीं होता, फिर भी आप सबके वचनका मान रखनेके लिये उसका हित करूँगा॥ २९॥ क्योंकि जब आप लोग रुष्ट हो जायँगे तो शाप मुझपर पड़ जायगा, जिसपर बहुत-से प्राणी अनुग्रह करते हैं, वह पवित्र हो जाता है॥ ३०॥ अतः मैं आप लोगोंको एक मन्त्र बतलाता हूँ, आप लोग उस मन्त्रका उस इन्द्रको उपदेश कर देना। यह महासिद्धिप्रद षडक्षरमन्त्र उन देवाधिदेव विनायक गणेशजीका है, जो ब्रह्मारूपसे सर्वकर्ता, शिवरूपसे सर्वहर्ता, विष्णुरूपसे सबके पालनकर्ता और कृपाके निधान हैं। इस मन्त्रका उपदेश करनेपर वह दिव्य देहसे सम्पन्न हो जायगा। उसके शरीरमें बने स्त्रीयोनिके चिह्न नेत्र हो जायँगे। वह इन्द्र अपना राज्य पा जायगा—यह मैं आप लोगोंसे सत्य कह रहा हूँ॥ ३१—३३ १/२॥ [नारदजी बोले—हे राजन्!] देवताओंसे इस प्रकार कहकर वे गौतममुनि मौन हो गये॥ ३४॥ तदनन्तर उन देवगणोंने गौतममुनिका प्रसन्नतापूर्वक पूजनकर उन्हें नमस्कार किया और उनकी प्रदक्षिणा की। फिर उनकी आज्ञा प्राप्तकर मुनिकी प्रशंसा करते हुए वे वहाँ गये, जहाँ बलासुर और वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्र थे। उस समय उन देवताओंकी यह मान्यता थी कि गौतममुनिसे बढ़कर ज्ञानवान् और सात्त्विक दूसरा कोई नहीं है॥ ३५-३६॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'मन्त्रकथन' नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ३२॥ ——————————————
तैंतीसवाँ अध्याय गणेशजीके षडक्षरमन्त्रके प्रभावसे इन्द्रको सहस्र नेत्रोंकी प्राप्ति
नारदजी बोले— [हे राजा रुक्मांगद!] वृत्रासुरका वध करनेवाले इन्द्रसे देवता बोले—हे सौ यज्ञोंके कर्ता इन्द्र! बाहर आओ। हम लोग देवर्षि नारदके सहित वहाँ (गौतममुनिके आश्रमपर) गये थे और वहाँ जाकर गौतममुनिको प्रसन्नकर यहाँ आये हैं। उन्होंने तुम्हारी निष्कृतिका उपाय बताया है और तुम्हें वरदान भी दिया है॥ १-२॥ सन्तजन कोई दोष उत्पन्न हो जानेपर स्वयं ही जनसमुदायमें उसका ख्यापन कर देते हैं और सम्यक् रूपसे उसका प्रायश्चित्तकर उसके प्रभावको निरर्थक कर देते हैं॥ ३॥ छिपानेसे दोषकी वृद्धि होती है और प्रकट कर देनेसे उसका नाश हो जाता है। इसलिये हे देवेन्द्र! तुम भी बाहर आकर उसे कह दो॥ ४॥ तुम अपने दोषपूर्ण कृत्यको देवर्षि नारदजीसे कह दो और गौतममुनिद्वारा कथित उपाय करो। भगवान् विनायक गणेशजीके षडक्षर मन्त्रको तुम ग्रहण करो॥ ५॥ गिरिराजनन्दिनी पार्वती और महेशके विवाहमें ब्रह्माने [पार्वतीके] अँगूठेका दर्शन कर लिया था, जिससे उनके तेजका पतन हो गया और तब उन्होंने लज्जित होकर सिर झुका लिया॥ ६॥ इसे जानकर महेश्वरने उपायपूर्वक उन्हें दोषरहित
१०६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 कर दिया। हे राजन्! तब देवर्षियोंद्वारा कही गयी इस वाणीको सुनकर तथा वहाँ आये हुए सभी देवताओंकी बातोंको भी आदरपूर्वक सुनकर इन्द्र कमलिनीकोशसे बाहर आ गये ॥ ७-८ ॥ उस समय उनका शरीर पीप और रक्तसे लिप्त, मलिन तथा सड़े हुए मांसकी गन्धसे युक्त था। उन देवराजको इस प्रकार देखकर [भी] देवताओंने उन्हें नमस्कार किया ॥ ९ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! अपने नासिका-छिद्रोंको वस्त्रके अग्रभागसे ढककर बृहस्पतिजीने सम्यक् रूपसे स्नान और तदनन्तर आचमन किये इन्द्रको गणेशजीके षडक्षर महामन्त्रका उपदेश किया। उन (बृहस्पतिजी)- के द्वारा मन्त्रोपदेश करते ही इन्द्र दिव्य देहवाले हो गये ॥ १०-११ ॥ [उस समय] वे सहस्र नेत्रोंसे युक्त और शोभासम्पन्न होकर दूसरे सूर्यकी भाँति प्रतीत हो रहे थे। तब वाद्योंकी ध्वनि, देवताओंद्वारा की गयी जय- जयकारकी ध्वनि और गन्धर्वोंके गायनकी ध्वनिसे दसों दिशाएँ अनुनादित हो उठीं। सभी देवताओंने हर्षित होकर पुष्पोंकी वर्षा की। नारद आदि सभी मुनियोंने उन इन्द्रको आशीर्वाद प्रदान किये। [कुछ] देवताओंने प्रसन्नतापूर्वक उनका आलिंगन किया और अन्य देवोंने उनकी स्तुति की ॥ १२-१४ ॥ कुछ देवताओंने प्रसन्न मनसे उनसे कहा कि हम आपके संरक्षणमें सनाथ हो गये। आपके बिना हमारी शोभा वैसे ही नहीं होती थी, जैसे चन्द्रमाके बिना आकाशकी शोभा नहीं होती ॥ १५ ॥ जैसे अपने माता-पिताके बिना बालक सर्वथा सुखका अनुभव नहीं कर पाते, वैसे ही हम सबको भी आपके बिना शान्ति नहीं प्राप्त हो सकती ॥ १६ ॥ [नारद] मुनि बोले-[हे राजन्!] देवताओंके इस प्रकारके वचन सुनकर शतक्रतु इन्द्र हर्षित हो गये और उन्होंने प्रसन्न मनसे देवताओंसे यथार्थ बात कही ॥ १७ ॥ इन्द्र बोले-देवर्षि नारदके कथनसे विमोहित होकर मैंने जो अत्यन्त गर्हित कर्म किया, उसका असहनीय फल मुझे प्राप्त हो गया। मैं आप सब श्रेष्ठ देवगणों तथा परमप्रभावशाली समस्त ऋषियोंको नमस्कार करता हूँ, आप सबने आज मेरा उस पापके गहन पंकसे उद्धार कर दिया। आप सभी मेरा उद्धार करनेवाले हैं, मैं आप सबकी शरणमें हूँ, आप सबको मेरी रक्षा करनी चाहिये ॥ १८-१९ ॥ आप सबने उन गौतममुनिको प्रसन्न करनेका कैसे प्रयत्न किया और उन्होंने कैसे मेरे हितार्थ उस परम मन्त्रका कथन किया, आप सब उसे बतलायें ॥ २० ॥ देवताओंने कहा-हे देवेन्द्र! हम लोग नारद मुनि और देवगुरु बृहस्पतिजीको आगेकर उन गौतम मुनिके पास गये और उन्हें सम्यक् रूपसे साष्टांग प्रणाम करके सुधामयी मनोहर वाणीसे उन्हें प्रसन्न किया और तब हमारे द्वारा याचना किये जानेपर उन्होंने हमें अपना मन्त्र (स्वयंद्वारा जप किया जानेवाला मन्त्र) बतलाया, जिसके उपदेशसे आप सहस्र नेत्रवाले होकर सबके लिये सुखप्रद हो गये। अब आप अपनी अमरावतीपुरीको जायें और लोकों तथा देवताओंका पालन करें ॥ २१-२२ ॥ इन्द्र बोले-हे श्रेष्ठ देवताओ और ऋषियो! मैं गणेशजीका कृपा-प्रसाद प्राप्त किये बिना अपनी पुरीको नहीं जाऊँगा। आप सबने साधुवादका कार्य किया है, अब आप लोग प्रसन्नतापूर्वक खुशी मनाते हुए अपने-अपने दिव्य धामको जायें। आप सबने मेरे लिये बहुत श्रम किया। मैं लज्जाके कारण छिपा हुआ था, मेरी बहुत दुर्गति हो रही थी, आपने उससे मुझे बाहर निकाला। आप सबने उन उग्र तेजवाले गौतममुनिको मेरे हितार्थ प्रसन्न किया। आप सबकी कृपासे ही मुझे बहुत-से (सहस्र) नेत्रोंकी प्राप्ति हुई है ॥ २३-२४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'षडक्षरमन्त्रके प्रभावका वर्णन' नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥
चौंतीसवाँ अध्याय
उ०ख०-अ० ३४ ] * इन्द्रद्वारा चिन्तामणितीर्थमें चिन्तामणि विनायककी स्थापना * १०७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 चौंतीसवाँ अध्याय इन्द्रद्वारा चिन्तामणितीर्थमें चिन्तामणि विनायककी स्थापना
नारदजी बोले—हे नरेन्द्र! वे जम्भासुरके शत्रु इन्द्र कदम्बवृक्षके नीचे एक श्रेष्ठ आसनमें स्थित होकर, मनका नियन्त्रण करके तथा नासिकाके अग्रभागमें दृष्टिको जमाकर षडक्षर मन्त्रका जप करने लगे ॥ १ ॥ मरुद्गणोंके स्वामी उन इन्द्रके [तपस्यामें रत होकर] वायुका भक्षण करते हुए सहस्र वर्ष व्यतीत हो गये। उनके शरीरदेशपर वल्मीकों (दीमककी बाँबियों)- के समूह बन गये, परंतु वे पर्वतकी भाँति स्थिर रहे ॥ २ ॥ तदनन्तर जो सर्वत्र गमनशील, सर्वविद्, उग्र तेजवाले, अपने तेजसे अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाके तेजका तथा सबके नेत्रोंका आच्छादन करनेवाले, चार भुजाओंवाले, रत्नजटित किरीट और माला धारण करनेवाले, सुन्दर बाजूबन्द धारण करनेवाले, कुण्डलोंसे सुशोभित कपोलोंवाले हैं, जो मोतियोंकी माला, नूपुर और मूल्यवान् कटिसूत्र धारण किये हुए हैं; जो कमलके समान नेत्रवाले, महान् कमलनालके सदृश विशाल सूँड़वाले, कमलके फूलोंकी माला धारण करनेवाले हैं—ऐसे सिन्दूरविलेपित विग्रहवाले अखिलदेवमूर्ति भगवान् गणेश प्रसन्न होकर इन्द्रके समक्ष प्रकट हुए ॥ ३–५ ॥ उन्हें देखकर इन्द्र भयभीत हो गये कि 'यह क्या है?', 'यह कौन आ गया?', 'मात्र अस्थि और प्राण- अवशेष मैं कैसे जीवित बचूँगा ?' ॥ ६ ॥ 'न जाने किसने इस महान् विघ्नको बनाया है और आज मेरे सम्मुख उपस्थित कर दिया है?' [इसे देखकर] मेरे शरीरसे पसीना निकल रहा है और शरीर पीपलके पत्तेकी तरह काँप रहा है ॥ ७ ॥ इन्द्रकी इस प्रकारकी व्याकुलताको सर्वज्ञ भगवान् गणेश जान गये और उन विघ्नविनायकने मधुर वाणीमें महेन्द्रसे कहा— ॥ ८ ॥ विनायक बोले—हे देवेन्द्र! भय न करो। हे देवराज! तुम मुझे कैसे नहीं जानते! जो निर्गुण, निर्विकार, चिदानन्द, सनातन, कारणातीत, अव्यक्त, जगत्के कारण-का-कारण है; जिस परमात्माका तुम निश्चल होकर इस मन्त्रसे [जप करते हुए] सदा ध्यान करते हो, जिसके [दर्शनके] लिये तुम चिरकालतक श्रान्त रहे हो, वही मैं तुम्हारे समक्ष प्रकट हुआ हूँ, तुम्हारी इस तपस्यासे प्रसन्न होकर मैं तुम्हें वर देनेके लिये यहाँ आया हूँ ॥ ९–११ ॥ हे अनघ! अनन्त ब्रह्माण्डोंका सृजन, पालन और संहार मेरे द्वारा ही होता है—ऐसा तुम जानो और तुम जो चाहते हो, वह वर मुझसे माँग लो ॥ १२ ॥ नारदजी बोले—उन गणेशजीके मनोहर वचनोंको सुनकर बलासुरहन्ता इन्द्रने विशाल विग्रहवाले देवाधिदेव भगवान् विनायकको पहचान लिया ॥ १३ ॥ तब उन शचीपति इन्द्रने शीघ्र ही उठकर परम भक्तिपूर्वक उन्हें नमस्कार किया और उन प्रत्यक्ष ब्रह्मस्वरूप गणेशजीसे कहा— ॥ १४ ॥ इन्द्र बोले—हे महाबाहो! सृजन, पालन और संहार करनेवाले आपके गुणोंको दिक्पालोंसहित ब्रह्मादि देवता भी नहीं जानते हैं। सौ [अश्वमेध]-यज्ञोंके सम्पादनसे समुद्भूत पुण्यके फलस्वरूप जो मुझे इन्द्रपद दिया गया है, वह भी कृत्रिम ही है; [क्योंकि सबके वास्तविक स्वामी तो आप ही हैं।] उसमें भी प्रायः अनेक विघ्न होते ही रहते हैं ॥ १५-१६ ॥ हे गजानन! मुझे आपकी महिमा कैसे ज्ञात हो सकती है? हे महेश्वर! जिसपर आपकी पूर्ण कृपा होगी, उसे ही आपकी महिमाका ज्ञान होगा। हे विघ्नकारण! उसीके पास आपके गुणों एवं रूपोंके वर्णनकी शक्ति होगी ॥ १७-१८ ॥ आप स्वयं निराधार होते हुए भी अखिल विश्वके आधार हैं। आप नित्य ज्ञानरूप, अजर और अमर हैं। आप नित्य आनन्दस्वरूप, पूर्णब्रह्म, मायापति, क्षर, अक्षर, परमात्मा, विश्वरूप और अखिलेश्वर हैं। उग्र तपस्याके द्वारा आपके स्वरूपका ज्ञान प्राप्तकर सनकादि
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१०८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
मुनि परम शान्तिको प्राप्त हो गये ॥ १९-२० ॥ हे परमेश्वर! षडक्षरमन्त्रके प्रभावसे मुझे आपके दर्शन प्राप्त हुए। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने कृपा करके मुझे इस मन्त्रका उपदेश दिया था ॥ २१ ॥ उस समय ब्रह्माजीने मुझसे कहा था कि जब तुम इस मन्त्रका विस्मरण कर दोगे, तभी तुम अपने पदसे च्युत हो जाओगे और दुर्दशाको प्राप्त हो जाओगे ॥ २२ ॥ तब (विस्मृत हुए मन्त्रवाले) मुझ अत्यन्त लोलुपने दुर्भाग्यके वशीभूत होकर उन मुनिपत्नी अहल्याका सतीत्व नष्ट किया, इसलिये मैं दुर्गतिंको प्राप्त हो गया ॥ २३ ॥ हे देवेश! पुनः बृहस्पतिजीके द्वारा उपदिष्ट उस मन्त्रके जपके प्रभावसे मैं इस समय सहस्र नेत्रोंवाला होकर आपके स्वरूपका दर्शन कर रहा हूँ ॥ २४ ॥ मैं एक अन्य वरकी याचना करता हूँ; क्योंकि आप चिन्तित अर्थको देनेवाले (मनोकामना पूर्ण करनेवाले) हैं, इसलिये यह कदम्बनगर 'चिन्तामणिपुर' - इस नामसे प्रसिद्ध हो जाय ॥ २५ ॥ हे विघ्नराज ! इस समय अनुष्ठानके फलरूपमें मैंने आपके चरणकमलोंका दर्शन कर लिया। अब मैं जो वर माँग रहा हूँ, उसे मुझे दीजिये। हे देव! जिससे आपका कभी विस्मरण न हो; हे देव! वैसा करो। हे विभो! आपके चरणकमलोंमें मेरा मन सदैव रमण करता रहे ॥ २६-२७ ॥ हे गजानन ! आजसे इस लोकमें यह [विशाल] सरोवर 'चिन्तामणितीर्थ' के रूपमें प्रसिद्ध हो जाय ॥ २८ ॥ हे जगद्गुरु ! इस सरोवरमें स्नान करने, यहाँ दान देनेसे मनुष्योंको आपकी कृपासे धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष-सम्बन्धी सिद्धियाँ प्राप्त हों ॥ २९ ॥ मुनि बोले- इन्द्रके वचनोंको सुनकर जगत्पति विघ्नेश्वर गणेशजी मेघसदृश गम्भीर और मधुर स्वरमें बोले- ॥ ३० ॥ [विघ्न ] विनायक श्रीगणेशजी बोले - हे विभो! जिन-जिन वरदानोंके लिये तुमने प्रार्थना की, वे सब तो तुम्हें प्राप्त होंगे ही, एक अन्य वरदान भी मैं तुम्हें देता हूँ कि तुम अपने इन्द्रपदपर सदैव स्थिर रहो ॥ ३१ ॥ हे देवेन्द्र ! तुम्हें मेरी निरन्तर अविस्मृति रहे अर्थात् तुम मेरा स्मरण कभी न भूलो। हे वासव ! जब तुमपर कोई संकट आये तो मुझे स्मरण कर लेना ॥ ३२ ॥ मैं सदैव प्रकट होकर तुम्हारे सारे कार्योंको सम्पादित कर दूँगा। यह (कदम्बपुर) पृथ्वीपर चिन्तामणिपुर नामसे प्रसिद्ध होगा और मैं चिन्तामणि विनायकके रूपमें इच्छित मनोकामनाओंको प्रदान करूँगा ॥ ३३-३४ १/२ ॥ नारदजी बोले- तब इस प्रकार वर प्राप्त करके इन्द्रने स्वर्गस्थित गंगाजीके जलका आनयन किया और उसके द्वारा उन सर्वव्यापक महाभाग गणेशजीका उनके परिवार (पत्नियों- सिद्धि-बुद्धि और पुत्रों - क्षेम-लाभ)- सहित अभिषेक एवं पूजन किया ॥ ३५-३६ ॥ देवराज इन्द्रद्वारा पूजित होकर वे प्रभु गणेशजी वहीं अन्तर्धान हो गये। तब शतक्रतु इन्द्रने भी स्फटिकसे निर्मित सर्वांगसुन्दर मंगलमयी दिव्य वैनायकी मूर्तिकी वहाँ आदरपूर्वक स्थापना की और सुवर्ण तथा रत्नोंसे जटिल विशाल मन्दिर बनवाया ॥ ३७-३८ ॥ उनकी प्रदक्षिणा और नमस्कार करके शतक्रतु इन्द्र अपने स्थानको चले गये। तबसे इस पृथ्वीपर वह महान् सरोवर चिन्तामणि [तीर्थ]-के नामसे प्रसिद्ध हुआ ॥ ३९ ॥ आज भी पवित्र जलवाली गंगाजी शतक्रतु इन्द्रके आदेशसे उस मूर्तिको नित्य अभिषेक करके सदा अपने धामको चली जाती हैं ॥ ४० ॥ [नारदजी कहते हैं- हे राजन् !] इस प्रकार मैंने तुमसे अद्भुत दर्शनवाले इस क्षेत्रकी महिमा कह दी। [यह क्षेत्र] सभी दोषोंका हरण करनेवाला, ऐश्वर्यसम्पन्न, सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाला और मंगलमय है ॥ ४१ ॥ हे पृथ्वीपति ! तुम वहाँ जाकर विधिपूर्वक स्नान करो, इससे तुम सभी दोषोंसे मुक्त हो जाओगे, इसमें संशय नहीं है ॥ ४२ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] तदनन्तर मुनि नारद उन राजा रुक्मांगदको आशीर्वादोंसे अभिनन्दितकर और आदरपूर्वक उनसे विदा लेकर शीघ्र ही चल दिये ॥ ४३ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'चिन्तामणितीर्थवर्णन' नामक चौंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३४ ॥ Kalyana Visheshank 2021_Section_5_1_Back
पैंतीसवाँ अध्याय
उ०ख०-अ०३५] * चिन्तामणिक्षेत्रस्थ गणेशतीर्थमें स्नानसे राजा रुक्मांगदको दिव्य देहकी प्राप्ति * १०९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पैंतीसवाँ अध्याय चिन्तामणिक्षेत्रस्थ गणेशतीर्थमें स्नानसे राजा रुक्मांगदको दिव्य देहकी प्राप्ति तथा उनका माता-पितासहित विनायकलोकको जाना व्यासजी बोले—[हे ब्रह्मन्!] देवर्षि नारदके चले जानेपर उन राजा रुक्मांगदने तब क्या किया? आप मुझसे इस मनोरम कथाको कहिये॥ १॥ ब्रह्माजी बोले—हे पुत्र! जब इस प्रकारका अत्यन्त महान् उपदेशकर नारद नामवाले मुनि चले गये, तभी हर्षयुक्त राजा रुक्मांगदने अपनी उस चतुरंगिणी सेनाको देखा॥ २॥ उस सेनाने भी विकृत रूपमें उन राजाको देखा, जो पूर्वकालमें स्वर्णसदृश कान्तिवाले और रूपमें रतिपति कामदेवके समान थे। वे अब इस प्रकारके रूपवाले कैसे हो गये—ऐसा संशय करते हुए उन लोगों [सैनिकों]- ने राजासे इस विषयमें प्रश्न किया—॥ ३॥ सैनिकोंने कहा—हे राजेन्द्र! आपके दर्शनको अत्यन्त उत्सुक हम लोग भूखे-प्यासे पहाड़ों, जंगलों और नदियोंमें भटकते-भटकते यहाँतक आ गये॥ ४॥ स्थान-स्थानपर देखते-खोजते हुए हमने आपके चरणकमलोंको प्राप्त कर लिया, परंतु आपको इस अवस्थामें देखकर आपके दुःखसे हम लोग और अधिक दुखी हो गये हैं। हे नृपश्रेष्ठ! ऐसा किस कारणसे हो गया है, वह आप हमसे कहिये॥ ५१/२॥ राजा बोले—मैं तुम लोगोंसे आगे चला आया था। उस समय मैं भूख और प्याससे पीड़ित था। शीघ्र ही मैंने अपने सामने वाचकनविमुनिका आश्रमरूपी गृह देखा। वहाँ जाकर मैंने उनकी सुमुखी पत्नीको देखा॥ ६-७॥ उस सुन्दरीका नाम मुकुन्दा था। मैंने उससे जलकी याचना की। परंतु वह दुष्टा और स्वेच्छाचारिणी थी, उसने मुझसे अकल्याणकारी वचन कहे॥ ८॥ [उसने मुझसे कहा कि] तुम मेरे साथ रतिक्रीड़ा करो, अन्यथा मैं तुम्हें शाप दे दूँगी, परंतु मैंने शुद्ध- अन्तःकरणसे उसे बलपूर्वक निवारित कर दिया॥ ९॥ उसके पति जब स्नान करने चले गये थे, तभी उस दुष्टाने [अपने प्रस्तावमें असफल होकर] मुझे क्रोधित होकर शाप दे दिया। तब मैं दुखी होकर एक वृक्षके नीचे बैठ गया॥ १०॥ [उस समय] पूर्वजन्मके पुण्योंके प्रभावसे मुझे नारदमुनिके दर्शन हुए। उन्होंने मुझसे अरिष्टोंका नाश करनेवाली उत्तम विधि कही—चिन्तामणिक्षेत्रके अन्तर्गत गणेशतीर्थ स्थित है। नारदजीने विस्तारपूर्वक उसकी महिमाका वर्णन किया॥ ११-१२॥ उन दिव्यदृष्टिसम्पन्न मुनिने मुझे वहाँ स्नान करनेके लिये सम्यक् रूपसे कहा था, अतः मैं अपने दोषका निवारण करनेके लिये वहाँ स्नान करने जाऊँगा॥ १३॥ यदि इच्छा हो तो तुम लोग भी मेरे साथ स्नान करनेके लिये वहाँ चलो। वहाँ स्नानकर यथाशक्ति दान देकर और [भगवान् चिन्तामणि]-विनायकका सम्यक् प्रकारसे पूजन करके गणेशतीर्थ एवं भगवान् गणेशके प्रभावसे पवित्र होकर हम सब अपने नगरको जायँगे॥ १४१/२॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यास!] राजाका इस प्रकारका निश्चय जानकर वे सब भी उनके साथ चल दिये॥ १५॥ हे मुनीश्वर! गणेशतीर्थका दर्शनकर वे राजा रुक्मांगद पूर्वकी भाँति तपाये हुए सोनेके समान स्वर्णिम आभावाले दिव्य शरीरसे सुशोभित हो गये॥ १६॥ तब राजा रुक्मांगदने मान लिया कि नारदजीद्वारा कही गयी बात अमृतके समान [हितकारी] थी। तदनन्तर राजाने वहाँ स्नान करके परम प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणोंको अनेक प्रकारके दान दिये। [विघ्न] विनायक गणेशजीका पूजन करके उन्होंने ब्राह्मणों और सेवकोंसहित एक तेजोरशिका दर्शन किया, जो कि सूर्यसदृश प्रकाशमान विमान था। वह विनायकगणों, अप्सराओं और किन्नरोंसे युक्त था॥ १७–१९॥ राजाने उन्हें नमस्कारकर पूछा कि आप लोग कौन Kalyana Visheshank 2021_Section_5_2_Front
११० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 हैं? कहाँसे आये हैं? आप किसके दूत हैं? यहाँ आनेका आपका क्या प्रयोजन है?—यह सब आप आदरपूर्वक कहिये॥ २०॥ ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यास!] राजाद्वारा मधुर वाणीमें कही गयी बातोंको सुनकर विमानसे आये गणेशजीके दूतोंने कहा—हे नृपश्रेष्ठ! आप धन्य हो; जो आपने सर्वभावसे प्रभु चिन्तामणि [विनायक]-का ध्यान किया, सम्यक् प्रकारसे तीर्थयात्रा की, विधि-विधानपूर्वक दान दिया और चिन्तामणि गणेशजीका पूजन किया। अब आप कृतकृत्य हैं। चिन्तन की हुई कामनाओंको प्रदान करनेके कारण ही ये चिन्तामणि विनायक कहे जाते हैं॥ २१-२३॥ उत्तम व्रतोंका पालन करनेवाले हे नृपश्रेष्ठ! हम सब भी आपके दर्शनसे कृतकृत्य हो गये, हम आपकी भक्तिकी महिमाको नहीं जान सकते ॥ २४ ॥ आपने शरीर, वाणी और बुद्धिसे तथा जीवन समर्पित करके भी सर्वब्रह्माण्डनायक भगवान् [विघ्न] विनायक गणेशजीका आराधन किया है। हे राजन्! हम सब उन्हींके दूत हैं और उन्हींके द्वारा प्रेषित हैं। उन्होंने अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक हम सबसे कहा है कि मेरे भक्त रुक्मांगदको शीघ्र जाकर विमानसे मेरे पास ले आओ— यह सुनकर हम सब यहाँ आये हैं। हे देव! अब आप इस आकाशचारी विमानपर आरूढ़ हों और हमारे साथ [भगवान्] विनायक (गणेशजी)-के पास शीघ्रातिशीघ्र चलें॥ २५-२७१/२॥ ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी!] उन दूतोंका इस प्रकारका वचन सुनकर राजा रुक्मांगदने कहा—हे दूतो! कहाँ मैं मन्दमति और कहाँ वे अखण्डित विग्रहवाले (पूर्ण ब्रह्म), प्रमेयों और तर्कोंसे परे, चैतन्य स्वरूपवाले, सर्वव्यापक, अविनाशी। जो सृजन-पालन और लयके कारणभूत और स्वयं कारणोंसे परे हैं, उन्होंने मुझे कैसे इतना आदर दिया—मैं नहीं जानता कि यह इस तीर्थमें [विहित] स्नानका फल है या कि मेरा पूर्वजन्मोंका उत्तम पुण्य फलित हुआ है, जिसके कारण मुझे आप लोगोंका दर्शन प्राप्त हुआ है और जिसके परिणामस्वरूप आगे [भी] अत्यन्त शुभकारी फल प्राप्त होगा॥ २८-३१॥ आप लोग मुझसे [अधिक] धन्य हैं, जिन्हें सर्वव्यापक [परमात्मा] गणेशजी दिन-रात प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं—ऐसा कहकर राजाने उनके कमलवत् चरणोंमें नमस्कारकर उनकी पूजा की॥ ३२॥ तदनन्तर राजा रुक्मांगदने उन दूतोंसे प्रार्थना की कि मेरे पिता नृपश्रेष्ठ भीम, जो कि ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी एवं भयंकर पराक्रमवाले हैं, उनके बिना मैं कैसे आऊँ? मेरी माता चारुहासिनीने भी देवाधिदेव भगवान् विनायककी आराधना की थी। जन्मसे ही उसने अन्य किसी देवताको अपना इष्टदेव नहीं माना था, [अतः उनको छोड़कर मैं कैसे आ सकता हूँ?] ॥ ३३-३४१/२॥ दूत बोला—यदि ऐसी बात है, तो आप उन दोनोंके उद्देश्यसे भी इस तीर्थमें स्नान कीजिये और उसका फल अपने माता-पिताको प्रदान कीजिये। तब हम लोग उन दोनोंको भी इस श्रेष्ठ विमानमें बैठाकर ले चलेंगे॥ ३५-३६॥ ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यास!] उस दूतका इस प्रकारका वचन सुनकर राजा रुक्मांगदने [माता-पिताकी] कुशकी प्रतिकृति बनाकर 'तुम कुश हो, कुशपुत्र हो, पूर्वकालमें ब्रह्माजीने तुम्हारा निर्माण किया था; तुम्हारे स्नान कर लेनेसे उसका स्नान हो जायगा, जिसके लिये यह ग्रन्थिबन्धन किया गया है'—इस मन्त्रका सम्यक् प्रकारसे उच्चारणकर राजाने क्रमसे [माता-पितासहित] सभी ग्रामोंके सभी लोगोंके लिये चिन्तामणिक्षेत्रके अन्तर्गत स्थित गणेशतीर्थमें स्नान-विधि सम्पन्न कर दी॥ ३७-३९॥ तदनन्तर राजा रुक्मांगद दूतके कथनानुसार सेनासहित उस श्रेष्ठ विमानमें आरूढ़ होकर कौण्डिन्यपुरमें आये। उस विमानमें होनेवाली वाद्यध्वनि, वेदध्वनि, गन्धर्वों और अप्सराओंके गान एवं नृत्यकी ध्वनिसे गगनमण्डल और दशों दिशाएँ अनुनादित हो गयीं॥ ४०-४१॥ राजा रुक्मांगदने विनायक (गणेश)-तीर्थमें स्नानका पुण्यफल अपने माता-पिता और समस्त लोगोंको प्रदान Kalyana Visheshank 2021_Section_5_2_Back
उ०ख०-अ०३६ ] गृत्समदमुनिके जन्मकी कथा १११
उ०ख०-अ०३६ ] * गृत्समदमुनिके जन्मकी कथा * १११ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 कर दिया ॥ ४२ ॥ कुशनिर्मित प्रतिकृतिके स्नानजन्य पुण्यफलको [अन्य लोगोंके निमित्त] देनेमात्रसे विनायक (गणेशजी)-की आज्ञासे वहाँ अन्य बहुत-से विमान आ गये ॥ ४३ ॥ उनमें-से प्रत्येक आकाशगामी विमानमें वे एक- एक करके बैठ गये। इस प्रकार [राजा] रुक्मांगद, [उनके पिता] भीम और उनकी माता चारुहासिनी तथा अन्य सभी लोग वहाँ पहुँच गये, जहाँ भगवान् विनायक थे। इस प्रकार उस नगरके बालकसे लेकर वृद्धतक तथा ब्राह्मणसे चाण्डालतक— सभी गणेशतीर्थके स्नानजनित पुण्यफलके प्रभावसे सद्गतिको प्राप्त हो गये ॥ ४४-४५ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे मुने! इस प्रकार मैंने वह सब कुछ कह दिया, जो कुछ तुम्हारे द्वारा पूछा गया था। चिन्तामणिक्षेत्र* के अन्तर्गत स्थित गणेशतीर्थसे सम्बन्धित इस माहात्म्यको जो मनुष्य भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह भी उस गतिको प्राप्त कर लेता है, जो उस तीर्थमें स्नानसे प्राप्त होती है ॥ ४६-४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'कादम्बपुरवर्णन' नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥ छत्तीसवाँ अध्याय गृत्समदमुनिके जन्मकी कथा व्यासजी बोले- हे कमलासन ब्रह्माजी! मैंने गणेशतीर्थके माहात्म्य, रुक्मांगद और कौण्डिन्यपुरवासियोंके चरितके विषयमें श्रवण किया, तथापि हे ब्रह्मन् ! आप मुकुन्दाके मनोहर चरितको मुझसे कहिये ॥ १ १/२ ॥ ब्रह्माजी बोले- हे पुत्र ! राजा रुक्मांगदके चले जानेपर वह मुकुन्दा कामनारूपी अग्निमें उसी प्रकार जल उठी, जैसे ग्रीष्मकालमें दावाग्निसे महान् वनस्थली जल उठती है। मुकुन्दाको न शीतल वायुवाले वनमें, न लता- पुष्पमय कुंजमें, न चन्द्रमाकी चाँदनीमें और न चन्दनके आलेपनमें—कहीं शान्ति नहीं मिल रही थी। उसे हास्य, गीत, नृत्य और वस्त्राभूषणादि भी रुचिकर नहीं लग रहे थे ॥ २-४ ॥ हे मुनीश्वर ! उस कामविह्वला मुकुन्दाको अन्न और जल भी रुचिकर नहीं लगता था। भूख-प्यास और श्रमजनित थकानसे उसे क्षणभरमें नींद आ गयी ॥ ५ ॥ हे सुत ! उस एकान्त वनमें सोयी हुई मुकुन्दाको रुक्मांगदके विरहमें विह्वल जानकर देवराज इन्द्र रुक्मांगदका रूप धारणकर वहाँ आये। उन्हें देखकर मुकुन्दाको अत्यन्त हर्ष हुआ। इन्द्रने उस पुत्रार्थिनी नारीको अपने हृदयसे लगा लिया और अपने अनुग्रहसे मानो कृतकृत्य- सा करते हुए उसके साथ नानाविध शृंगारचेष्टाएँ कीं। उस पारस्परिक संयोगके फलस्वरूप मुकुन्दाने गर्भ धारण किया। तदुपरान्त मुकुन्दाको आश्वस्तकर इन्द्र अन्तर्धान हो गये और मुकुन्दा भी सलज्ज भावसे अपने आश्रमको चली आयी ॥ ६-१० ॥ मुकुन्दाने नवम मासमें, शुभ वेलामें शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न पुत्रको जन्म दिया, जो मनोहर, सर्वांगसुन्दर और रूपमें कामदेवसे भी बढ़कर था। उसके धरणीपर गिरते ही महान् शब्द हुआ, जिससे दसों दिशाएँ, आकाश, पृथ्वी और रसातल भी अनुनादित हो गये ॥ ११-१२ ॥ पक्षिगण उड़-उड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें भ्रमण करने लगे। वाचक्नवि भी अपना नित्यकर्म छोड़कर वहाँ चले आये। मुकुन्दाके चरितका ज्ञान उन्हें कभी नहीं हो पाया। उन्होंने अत्यन्त हर्षपूर्वक [शिशुके] जातकर्मादि संस्कार किये ॥ १३-१४ ॥ उन्होंने [इस अवसरपर] ब्राह्मणोंको यथाशक्ति और यथायोग्य दान दिया। दस दिन बीत जानेपर उन मुनिने [शिशुका] नामकरण-संस्कार किया ॥ १५ ॥
- चिन्तामणिक्षेत्र महाराष्ट्र प्रान्तके कदम्बपुर, जिला- यवतमालमें स्थित है। मन्दिरके सामने ही 'चौमुखी गजानन' की मूर्ति है। इसकी विशेषता यह है कि एक ही पत्थरमें चारों ओर चार गणेश मूर्तियाँ खुदी हुई हैं। सामनेके गर्भगृहमें मुख्य चिन्तामणि-गणेशकी मूर्ति है। 'कलम्ब' नामसे इक्कीस गणपतिक्षेत्रमें इसकी गणना है।
११२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- ज्योतिषशास्त्रमें पारंगत द्विजोंसे अनुज्ञा लेकर उन्होंने [उस शिशुका] गृत्समद - यह नाम रखा। तदनन्तर पाँचवें वर्षमें उसका व्रतबन्ध-संस्कार किया ॥ १६ ॥ उन्होंने उस बटुकके चार वेदव्रत संस्कार सम्पन्न किये। तेजसे सम्पन्न होनेके कारण वह एक बार बोलनेपर ही वेदमन्त्रोंको ग्रहण कर लेता था ॥ १७ ॥ इस प्रकार वह वेदशास्त्रका निधान और अपने कर्ममें भी कुशल हो गया। किसी समय शुभ मुहूर्तमें उसके पिता वाचक्नवीने उसे ऋग्वेदके महान् मन्त्र 'गणानां त्वा० २' का उपदेश दिया और कहा कि यह वैदिक महामन्त्र सम्पूर्ण सिद्धियोंको देनेवाला है ॥ १८-१९ ॥ यह आगमोंमें कहे गये सम्पूर्ण मन्त्रोंमें श्रेष्ठ है। भगवान् गजानन गणेशजीका ध्यान करके तुम स्थिर चित्तसे इस मन्त्रका जप करो ॥ २० ॥ इससे तुम परम सिद्धिको प्राप्त कर लोगे और तुम्हारा यश संसारमें फैल जायगा। तब विप्र गृत्समद पिताके मुखसे मन्त्र प्राप्तकर अनुष्ठानपरायण होकर जप और ध्यानमें लग गये। इस प्रकार उन मुनिश्रेष्ठका बहुत समय व्यतीत हो गया ॥ २१-२२ ॥ उस समय मगध देशमें जो राजा थे, उनका भी नाम मगध ही था। वे सुन्दर रूपवाले, महान् स्वाभिमानी, दानवीर, शत्रुनाशक, अनेक प्रकारके अलंकारोंसे विभूषित, महामूल्यवान् आसनपर स्थित, न्यायी, धैर्यवान्, दूसरे इन्द्रके समान, चतुरंगिणी सेनासे समन्वित, ज्ञानी और विद्वानोंका सम्मान करनेवाले थे। उनके दो मन्त्री थे, जो ज्ञाननिधान और गुणोंमें बृहस्पतिसे भी बढ़कर थे ॥ २३-२५ ॥ उन (राजा मगध)- की पत्नीका नाम अम्बिका था, जो मनोहर रूपवाली अत्यन्त गुणवती, पतिव्रता, महान् सौभाग्यशालिनी और शाप देने तथा अनुग्रह करनेमें सक्षम थी ॥ २६ ॥ [एक बार] उन राजाके यहाँ पितृश्राद्धमें राजाद्वारा आमन्त्रित वेदोंमें पारंगत वसिष्ठ, अत्रि आदि बहुत-से महर्षि आये थे ॥ २७ ॥ तपस्वी और पवित्र अन्तःकरणवाले गृत्समदको भी वहाँ बुलाया गया था। वहाँ किसी शास्त्रसम्बन्धी प्रसंगमें गृत्समदने गर्वपूर्ण बात कही ॥ २८ ॥ तब उन मुनियोंके बीचमें ही अत्रिजी इस प्रकार कहने लगे कि 'तुम्हें धिक्कार है ! धिक्कार है ! तुम इस बातपर विचार करो, चूँकि तुम तपस्वी हो, इसीलिये मान्य हो। तुम मुनि नहीं हो; क्योंकि तुम्हारा जन्म राजकुमार रुक्मांगदसे हुआ है। तुम हम सबके समक्ष पूजा पानेके योग्य नहीं हो, अतः अपने आश्रमको चले जाओ' ॥ २९-३० ॥ अत्रिके इस प्रकारके वचन सुनकर वे गृत्समद क्रोधसे अग्निके समान प्रदीप्त हो उठे। [उस समय] ऐसा लगता था, मानो वे त्रिलोकीको भस्म कर डालेंगे और उन मुनियोंको खा जायँगे ॥ ३१ ॥ उनको देखकर अन्य बहुत-से मुनि तो इस प्रकार पलायन कर गये, जैसे सिंहको देखकर हरिण भाग जाते हैं। उन्होंने वहाँ सभामें बैठे हुए वसिष्ठ आदि मुनियोंसे कहा- ॥ ३२ ॥ गृत्समद बोले- हे मुनीश्वरो ! यदि मैं रुक्मांगदका पुत्र न सिद्ध हुआ तो मैं अपनी शापाग्निसे तुम सबको भस्मावशेष कर दूँगा ॥ ३३ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं- [हे व्यास !] उन सभी मुनियोंसे इस प्रकार कहकर वे अपनी माँके पास पहुँचे। गृत्समदने उससे पूछा- अरी दुष्टे! अत्यन्त कामाचारिणी मुकुन्दा! बता, मेरा पिता कौन है? अन्यथा तू भस्म हो जायगी। तब उनके इस प्रकारके वचन सुनकर मुकुन्दा अत्यन्त व्याकुल होकर उसी प्रकार काँपने लगी, जैसे आँधीके वेगसे पुष्पयुक्त कदलीवृक्ष ! वह असती हाथ जोड़कर अत्यन्त दीन वाणीमें बोली- ॥ ३४-३६ ॥ मुकुन्दा बोली- आखेटमें आसक्त चित्तवाले नृपश्रेष्ठ रुक्मांगद अपने साथवालोंसे बिछुड़कर यहाँ आ गये थे। १-चार वेदव्रत हैं- १. महानाम्नी व्रत, २. महाव्रत, ३. उपनिषद् व्रत तथा ४. गोदान। प्रथमं स्यान्महानाम्नी द्वितीयं स्यान्महाव्रतम् । तृतीयं स्यादुपनिषद् गोदानाख्यं ततः परम् ॥ (संस्कारमयूखमें आश्वलायनका वचन) २- गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् । ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ॥ (ऋक्० २।२३।१)
उ०ख०-अ०३७ ] * गृत्समदमुनिकी गणेशाराधना और वरप्राप्ति * ११३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
१९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
उनकी मुखमुद्रा प्रसन्न और क्रीडामयी थी, उनके मस्तकपर चन्द्रमा शोभा दे रहा था, उन्होंने कमल- पुष्पोंकी विशाल माला धारण कर रखी थी, कमल- नालसे समन्वित उनकी सूँड़ थी और उन जगत्के कारणरूप [भगवान् गणेश]-को उनके प्रेमी भक्तजन नमस्कार कर रहे थे ॥ ११ ॥ वे सिंहपर सवार थे, उनके दस भुजाएँ थीं तथा उन्होंने सर्पका यज्ञोपवीत धारण कर रखा था। उनका श्रीविग्रह कुंकुम, अगुरु, कस्तूरी और सुन्दर [सुगन्धित] चन्दनसे आलेपित था ॥ १२ ॥ हे मुने! करोड़ों सूर्योंसे अधिक प्रकाशमान वे श्रीमान् सिद्धि और बुद्धिके साथ थे। यद्यपि उनका स्वरूप वाणीसे परे है, तथापि वे लीला करनेके लिये [उन गृत्समदमुनिके समक्ष] साकार रूपमें प्रकट हुए ॥ १३ ॥ उनके तेजसे उन महात्मा मुनिका तेज वैसे ही मन्द हो गया, जैसे सूर्यके तेजसे नक्षत्रों और चन्द्रमाका तेज मन्द पड़ जाता है ॥ १४ ॥ [उन्हें देखकर] गृत्समदने अपनी आँखें मूँद लीं और वे अत्यन्त भयाकुल होकर काँपने लगे। वे मूर्च्छित होकर धरतीपर गिर पड़े और उन्हें ध्यानादि मांगलिक कार्योंका विस्मरण हो गया ॥ १५ ॥ पुनः चेतन होनेपर वे मुनि अनामय गजानन गणेशजीका ध्यान करके मन-ही-मन यह सोचकर व्याकुल हो गये कि इस विघ्नका कारण क्या है? मेरे समक्ष क्षोभ उत्पन्न करनेवाला सहसा यह क्या उपस्थित हो गया है ? आजतक मैंने जो तप किया था, वह कैसे व्यर्थ चला गया ? ॥ १६-१७ ॥ [तदनन्तर वे मन-ही-मन गणेशजीका ध्यानकर कहने लगे—] हे देवेश! हे सर्वात्मन्! इस भयानक विघ्नसे मेरी रक्षा करो। आप जगदीश्वरको छोड़कर मैं अन्य किसकी शरणमें जाऊँ ? ॥ १८ ॥ हे देव! मुझे सदैव महान् दुःख प्राप्त होता रहा है। 'तुम हमारी पंक्तिमें बैठकर पूजा पानेयोग्य नहीं हो'— अत्रिकी यह बात मेरे मनको सदैव जलाया करती है ॥ १९ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] गृत्समदके इस प्रकारके वचन सुनकर उन विघ्नविनायक गणेशजीने कहा— ॥ १९१/२ ॥ गणेशजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ ! तुमपर अनुग्रह करनेके लिये उपस्थित हुए मुझे गणोंका स्वामी गणेश जानो। चिरकालतक नियममें स्थित रहनेवाले सनकादि [मुनियों]-के लिये भी मैं अप्राप्य हूँ। भयका त्याग करके तुम्हारी जो मनोकामना हो, वह मुझसे कहो। एक अँगुठेपर खड़े रहकर तुम्हारे द्वारा की गयी निरन्तर तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ ॥ २०–२११/२॥ ब्रह्माजी कहते हैं—देवाधिदेव गणेशजीके ऐसे सुन्दर वचन सुनकर मुनि गृत्समदने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। उनका हृदय आनन्दसे भर गया, आँखोंसे आँसू बहाते हुए वे हर्षपूर्वक नृत्य करने लगे और उन वरदाता विनायकसे परम प्रेमपूर्वक बोले— ॥ २२–२३१/२ ॥ गृत्समद बोले—आज मेरा जन्म, तप और नियम सब सफल हो गये, जो मुझे चिदानन्दघन, अखण्ड आनन्दरूप, वेद-शास्त्रोंसे भी अगोचर, निराकार ब्रह्मका साक्षात् दर्शन हो गया। हे विभो ! अब मैं किस वस्तुके लिये प्रार्थना करूँ ? फिर भी आपने आज्ञा दी है तो हे गजानन ! मैं आपसे एक प्रार्थना करता हूँ—हे महाभाग ! चौरासी लाख योनियोंमें मनुष्ययोनि श्रेष्ठ कही गयी है। मनुष्योंमें वर्ण-धर्मका पालन करनेवाले श्रेष्ठतर कहे गये हैं। उनमें भी ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं। उन ब्राह्मणोंमें भी ज्ञानी श्रेष्ठ हैं। उन ज्ञानियोंमें भी अनुष्ठानपरायण और उनमें भी ब्रह्मवेत्ता श्रेष्ठ हैं। इसलिये हे जगदीश्वर ! आप मुझे ब्रह्मज्ञान (वेदज्ञान) और अनुष्ठानसम्बन्धी ज्ञान प्रदान करें। साथ ही अपनी सतत स्मृति और अपनी सुदृढ़ भक्ति प्रदान करें ॥ २४–२९ ॥ हे गजानन ! आपके सभी भक्तोंमें मुझे श्रेष्ठता प्राप्त हो। हे कल्याणकर ! मैं एक अन्य वरकी भी याचना करता हूँ, उसे मुझे प्रदान करें ॥ ३० ॥ मैं आपकी भक्तिका एकमात्र निवास बन जाऊँ, मुझमें त्रैलोक्यको आकर्षित करनेकी क्षमता हो, मैं तीनों लोकोंमें विख्यात और देवताओं एवं मनुष्योंसे नमस्कृत हो जाऊँ। हे विघ्नराज ! हे अखिलार्थकृत् ! हे सुरेश्वर ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो यह पुष्पक वन [आपके] नामसे प्रख्यात हो जाय ॥ ३१-३२ ॥