श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 116, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१९४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
उनकी मुखमुद्रा प्रसन्न और क्रीडामयी थी, उनके मस्तकपर चन्द्रमा शोभा दे रहा था, उन्होंने कमल- पुष्पोंकी विशाल माला धारण कर रखी थी, कमल- नालसे समन्वित उनकी सूँड़ थी और उन जगत्के कारणरूप [भगवान् गणेश]-को उनके प्रेमी भक्तजन नमस्कार कर रहे थे ॥ ११ ॥ वे सिंहपर सवार थे, उनके दस भुजाएँ थीं तथा उन्होंने सर्पका यज्ञोपवीत धारण कर रखा था। उनका श्रीविग्रह कुंकुम, अगुरु, कस्तूरी और सुन्दर [सुगन्धित] चन्दनसे आलेपित था ॥ १२ ॥ हे मुने! करोड़ों सूर्योंसे अधिक प्रकाशमान वे श्रीमान् सिद्धि और बुद्धिके साथ थे। यद्यपि उनका स्वरूप वाणीसे परे है, तथापि वे लीला करनेके लिये [उन गृत्समदमुनिके समक्ष] साकार रूपमें प्रकट हुए ॥ १३ ॥ उनके तेजसे उन महात्मा मुनिका तेज वैसे ही मन्द हो गया, जैसे सूर्यके तेजसे नक्षत्रों और चन्द्रमाका तेज मन्द पड़ जाता है ॥ १४ ॥ [उन्हें देखकर] गृत्समदने अपनी आँखें मूँद लीं और वे अत्यन्त भयाकुल होकर काँपने लगे। वे मूर्च्छित होकर धरतीपर गिर पड़े और उन्हें ध्यानादि मांगलिक कार्योंका विस्मरण हो गया ॥ १५ ॥ पुनः चेतन होनेपर वे मुनि अनामय गजानन गणेशजीका ध्यान करके मन-ही-मन यह सोचकर व्याकुल हो गये कि इस विघ्नका कारण क्या है? मेरे समक्ष क्षोभ उत्पन्न करनेवाला सहसा यह क्या उपस्थित हो गया है ? आजतक मैंने जो तप किया था, वह कैसे व्यर्थ चला गया ? ॥ १६-१७ ॥ [तदनन्तर वे मन-ही-मन गणेशजीका ध्यानकर कहने लगे—] हे देवेश! हे सर्वात्मन्! इस भयानक विघ्नसे मेरी रक्षा करो। आप जगदीश्वरको छोड़कर मैं अन्य किसकी शरणमें जाऊँ ? ॥ १८ ॥ हे देव! मुझे सदैव महान् दुःख प्राप्त होता रहा है। 'तुम हमारी पंक्तिमें बैठकर पूजा पानेयोग्य नहीं हो'— अत्रिकी यह बात मेरे मनको सदैव जलाया करती है ॥ १९ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] गृत्समदके इस प्रकारके वचन सुनकर उन विघ्नविनायक गणेशजीने कहा— ॥ १९१/२ ॥ गणेशजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ ! तुमपर अनुग्रह करनेके लिये उपस्थित हुए मुझे गणोंका स्वामी गणेश जानो। चिरकालतक नियममें स्थित रहनेवाले सनकादि [मुनियों]-के लिये भी मैं अप्राप्य हूँ। भयका त्याग करके तुम्हारी जो मनोकामना हो, वह मुझसे कहो। एक अँगुठेपर खड़े रहकर तुम्हारे द्वारा की गयी निरन्तर तपस्यासे मैं बहुत प्रसन्न हुआ हूँ ॥ २०–२११/२॥ ब्रह्माजी कहते हैं—देवाधिदेव गणेशजीके ऐसे सुन्दर वचन सुनकर मुनि गृत्समदने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। उनका हृदय आनन्दसे भर गया, आँखोंसे आँसू बहाते हुए वे हर्षपूर्वक नृत्य करने लगे और उन वरदाता विनायकसे परम प्रेमपूर्वक बोले— ॥ २२–२३१/२ ॥ गृत्समद बोले—आज मेरा जन्म, तप और नियम सब सफल हो गये, जो मुझे चिदानन्दघन, अखण्ड आनन्दरूप, वेद-शास्त्रोंसे भी अगोचर, निराकार ब्रह्मका साक्षात् दर्शन हो गया। हे विभो ! अब मैं किस वस्तुके लिये प्रार्थना करूँ ? फिर भी आपने आज्ञा दी है तो हे गजानन ! मैं आपसे एक प्रार्थना करता हूँ—हे महाभाग ! चौरासी लाख योनियोंमें मनुष्ययोनि श्रेष्ठ कही गयी है। मनुष्योंमें वर्ण-धर्मका पालन करनेवाले श्रेष्ठतर कहे गये हैं। उनमें भी ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं। उन ब्राह्मणोंमें भी ज्ञानी श्रेष्ठ हैं। उन ज्ञानियोंमें भी अनुष्ठानपरायण और उनमें भी ब्रह्मवेत्ता श्रेष्ठ हैं। इसलिये हे जगदीश्वर ! आप मुझे ब्रह्मज्ञान (वेदज्ञान) और अनुष्ठानसम्बन्धी ज्ञान प्रदान करें। साथ ही अपनी सतत स्मृति और अपनी सुदृढ़ भक्ति प्रदान करें ॥ २४–२९ ॥ हे गजानन ! आपके सभी भक्तोंमें मुझे श्रेष्ठता प्राप्त हो। हे कल्याणकर ! मैं एक अन्य वरकी भी याचना करता हूँ, उसे मुझे प्रदान करें ॥ ३० ॥ मैं आपकी भक्तिका एकमात्र निवास बन जाऊँ, मुझमें त्रैलोक्यको आकर्षित करनेकी क्षमता हो, मैं तीनों लोकोंमें विख्यात और देवताओं एवं मनुष्योंसे नमस्कृत हो जाऊँ। हे विघ्नराज ! हे अखिलार्थकृत् ! हे सुरेश्वर ! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो यह पुष्पक वन [आपके] नामसे प्रख्यात हो जाय ॥ ३१-३२ ॥