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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 117, कुल 656 में से

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पृष्ठ 117

उ०ख०-अ०३८ ] * गृत्समदकी छींकसे एक बालकका जन्म * १९५

आप यहाँ स्थित होकर भक्तोंकी कामनाओंको | अजेय होगा ॥ ४०-४१॥ नित्य पूरा करें। हे गजानन! यह पुष्पकपुर सभी | वह मेरा भक्त होगा, उसके प्राण मुझमें स्थित होंगे, दिशाओंमें विशेष रूपसे 'गणेशपुर'—इस नामसे प्रसिद्ध | उसकी मुझमें निष्ठा होगी और वह मेरे ही परायण हो जाय ॥ ३३१/२ ॥ | होगा। हे विप्र ! यह नगर सत्ययुगमें 'पुष्पकपुर' नामसे, ब्रह्माजी कहते हैं—मुनि गृत्समदकी इस बातको | त्रेतायुगमें 'मणिपुर' नामसे, द्वापरयुगमें 'भानकपुर' नामसे सुनकर गजानन गणेशजीने कहा - ॥ ३४ ॥ | और कलियुगमें 'भद्रकपुर' नामसे संसारमें विख्यात गणेशजी बोले- हे महाबाहो ! तुम्हें साधुवाद | होगा। यहाँ स्नान और दान करनेसे मनुष्य सभी है। हे मुनिश्रेष्ठ! मेरे प्रसन्न होनेपर भक्तोंको तीनों | कामनाओंको प्राप्त करेगा ॥ ४२-४३१/२ ॥ लोकोंमें कुछ भी दुर्लभ नहीं है ॥ ३५ ॥ | ब्रह्माजी कहते हैं— [हे व्यासजी !] गृत्समदको हे विप्र ! तुम्हारे द्वारा जो भी प्रार्थना की गयी है, | इस प्रकारसे वर देकर सर्वव्यापक गणेशजी वहीं वह सब कुछ पूरी होगी। विप्रत्व दुर्लभतर है, प्रसन्न | अन्तर्धान हो गये। उनके अन्तर्हित हो जानेपर मुनिने वहाँ होकर यह मैंने तुम्हें प्रदान कर दिया ॥ ३६ ॥ | गणेशजीकी मूर्तिकी स्थापना की तथा उनका सुन्दर हे मुने ! क्योंकि तुमने 'गणानां त्वा०' इस वैदिक | मन्दिर बनवाया ॥ ४४-४५ ॥ मन्त्रका जप किया है, अतः तुम्हीं इसके ऋषि होगे ॥ ३७॥ | उन्होंने उस मूर्तिकी 'वरदविनायक' इस नामसे तुम ब्रह्मादि त्रिदेवों और [इन्द्रादि] देवताओं तथा | स्थापना की। गणेशजीकी कृपासे वहाँ सिद्धियोंका वसिष्ठादि मुनियोंमें भी परम श्रेष्ठताको प्राप्त करके | शाश्वत अवस्थान हुआ ॥ ४६ ॥ सर्वत्र ख्याति प्राप्त करोगे। जो लोग सभी कार्योंके | यहाँ सभीकी कामनाएँ पुष्ट होती हैं, इसलिये इस आरम्भमें पहले तुम्हारा और उसके बाद मेरा स्मरण | क्षेत्रको पुष्पकक्षेत्र कहा जाता है। मुनि गृत्समदने उस करेंगे, उनको कार्योंमें सिद्धि प्राप्त होगी ॥ ३८-३९ ॥ | मूर्तिका भक्तिभावपूर्वक पूजन किया ॥ ४७ ॥ [मन्त्रके] देवता, ऋषि और छन्दके ज्ञानके बिना | हे मुनीन्द्र ! श्रीविघ्नराज गणेशजीद्वारा वरदान प्रदान किये गये [जपादि] कर्म निष्फल होते हैं। तुम्हारा पुत्र | करनेका वर्णन करनेवाली इस कथाका जो श्रवण करता बलवान् और सभी देवताओंके लिये अत्यन्त भयंकर | है, वह समस्त कामनाओंकी प्राप्ति करता है और उसे होगा। वह तीनों लोकोंमें महान् ख्याति अर्जित करेगा। | संसार-सागरसे पार करनेवाली दृढ़ गणेशभक्तिकी प्राप्ति भगवान् रुद्रके अतिरिक्त वह सम्पूर्ण देवताओंके लिये | होती है ॥ ४८ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'वरदाख्यान' नामक सैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३७ ॥

अड़तीसवाँ अध्याय गृत्समदकी छींकसे एक बालकका जन्म, उसके द्वारा गणेशाराधन, गणेशजीका प्रसन्न होकर त्रैलोक्य-विजयका वरदान और तीन पुर प्रदान करना

व्यासजी बोले- हे सुरेश्वर ! हे कमलजन्मा | भी श्रेष्ठ गृत्समदको आदरपूर्वक सम्मानित किया और ब्रह्माजी ! उसके बाद गृत्समदने क्या किया-वह सब | उन्हें नमस्कार किया ॥ २ ॥ मुझ श्रद्धालुको प्रयत्नपूर्वक बतलाइये ॥ १ ॥ | गणेशजीके वरदानके प्रभावसे [उन मुनियोंने] यज्ञ- ब्रह्माजी बोले- हे ब्रह्मन् ! तदनन्तर (गणेशजीसे | कर्ममें उनका वरण किया तथा समस्त अनुष्ठानात्मक कर्मोंके वरदान प्राप्त करनेपर) सभी मुनिगणोंने श्रेष्ठ मुनियोंमें | प्रारम्भमें गणेश-पूजनसे पहले उनका स्मरण किया ॥ ३ ॥