श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 118, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१९६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- इस प्रकार वे मुनि गृत्समद विख्यात हो गये। वे गणनायक गणेशजीके मन्त्रका सुस्थिर मनसे जप करते हुए उनमें परम भक्ति करने लगे ॥ ४ ॥ हे व्यासजी ! किसी समय उन मुनिने बहुत जोरसे छींका, जिससे सभी दिशाएँ, पृथ्वी और गिरि-कन्दराएँ अनुनादित हो उठीं ॥ ५ ॥ जब उन मुनिने अपने सामने देखा तो उन्हें एक भयंकर बालक दिखायी दिया, जो महान् नाद कर रहा था; उसका वर्ण जपाकुसुमके सदृश रक्तवर्णका था ॥ ६ ॥ वह बालक तेजका पुंजीभूत स्वरूप था और दृष्टिपथको चुराये-सा ले रहा था। वे मुनि उस बालकको देखकर भयसे विह्वल होकर काँपने लगे ॥ ७ ॥ वे मन-ही-मन तर्क-वितर्क करने लगे कि यह कौन-सा विघ्न आ गया? न जाने गणोंके स्वामी गणेशजीने मुझे यह अद्भुत पुत्र तो नहीं दे दिया ॥ ८ ॥ जब उन्होंने पुनः देखा तो वह बालक उन्हें सुन्दर मुख और सुन्दर नेत्रोंवाला दिखायी दिया। उसने सुवर्ण- निर्मित सुन्दर बाजूबन्द, सुन्दर मुकुट और सुन्दर नूपुर धारण कर रखे थे। उस पुत्रका कटिप्रदेश सुन्दर करधनीसे सुशोभित हो रहा था। तब मुनिने उससे पूछा कि तुम कौन हो? किसके पुत्र हो और क्या करना चाहते हो? हे तेजके निधान बालक ! बताओ, तुम्हारे माता-पिता कौन हैं और तुम्हारा निवास-स्थान कहाँ है?॥ ९-१०१/२॥ ब्रह्माजी कहते हैं- [हे व्यास !] उन मुनिके इस प्रकारके वचन सुनकर बालकने कहा- ॥ ११ ॥ बालक बोला- आप भूत, भविष्य और वर्तमानका ज्ञान रखनेवाले होकर भी मुझसे क्यों पूछ रहे हैं? फिर भी मैं आपके आज्ञानुसार बताता हूँ कि आपकी छींकसे मेरा जन्म हुआ है॥ १२ ॥ हे मुने ! आप ही मेरे पिता और माता हैं, मेरे ऊपर कृपा करें। हे पिता ! आप मेरा कुछ दिनतक पालन करें। तब मैं त्रैलोक्यपर आक्रमण करनेमें सक्षम हो जाऊँगा और देवराज इन्द्रको भी अपना वशवर्ती कर लूँगा। मेरी बातपर सन्देह न करें, मेरे पौरुषको आप देख लीजियेगा ॥ १३-१४ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यास !] उस बालकका इस प्रकारका वचन सुनकर भय और हर्षसे युक्त मुनि गृत्समदने स्नेह-सिक्त वाणीमें कहा- ॥ १५ ॥ यदि यह जन्म लेते ही त्रैलोक्यका अतिक्रमण करनेमें सक्षम है तो मैं अपने इस पुत्रको अपना मन्त्र [जिसका मैं जप करता हूँ] प्रदान करूँगा, जिससे जगत्के स्वामी विनायकदेव प्रसन्न होकर इसकी मनोकामनाको पूर्ण करेंगे और मेरी भी कीर्तिका विस्तार होगा ॥ १६-१७ ॥ मन-ही-मन ऐसा विचार करके उन्होंने अपने मन्त्र 'गणानां त्वा०' का उसे उपदेश दिया और कहा कि इसका आदरपूर्वक अनुष्ठान करो ॥ १८ ॥ मनको गजानन गणेशजीमें स्थापित करके इस वैदिक मन्त्रका जप करो। हे पुत्र ! जब वे सन्तुष्ट हो जायँगें, तो तुम्हें सभी कामनाओंको प्रदान करेंगे ॥ १९ ॥ इस प्रकार उस महामन्त्रको प्राप्तकर वह तपस्या करनेके लिये वनको चला गया और वहाँ इन्द्रियोंपर विजय प्राप्तकर निराहार रहते हुए एक अँगूठेपर खड़े होकर स्थिर मनसे भगवान् गजाननका ध्यान करते हुए पन्द्रह हजार वर्षोंतक उस मन्त्रका जप करता रहा। इससे उसके मुखसे दिशाओंको जलानेवाली अग्नि निकलने लगी। उससे देवताओं और पातालमें रहनेवाले दैत्योंको भय हो गया ॥ २०-२२ ॥ तदनन्तर उसके उस तपसे प्रसन्न होकर गजानन गणेशजी दिशाओंको अन्धकाररहित और सूर्यमण्डलको आच्छादित-सा करते हुए आविर्भूत हो गये ॥ २३ ॥ वे अपनी सुन्दर सूँड़को घुमा रहे थे। सुन्दर दाँतसे युक्त उनके मुखकी मुद्रा प्रसन्नतापूर्ण थी। उनके चिंघाड़की ध्वनि सुनकर विह्वल-से होते हुए उस बालकने नेत्र खोले तो अपने समक्ष भगवान् गणेशको देखा, जो चार भुजाओंसे युक्त, विशाल शरीरवाले और अनेक आभूषणोंसे विभूषित थे ॥ २४-२५ ॥