भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 119, कुल 656 में से

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उ०ख०-अ०३८ ] * गृत्समदकी छींकसे एक बालकका जन्म * ११७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उनके हाथ परशु, कमल, माला और मोदकसे | और ईश (शिव) भी नहीं जानते हैं। यदि आप मुझे सुशोभित हो रहे थे। तब उस बालकने उनके तेजसे | वरदान देना चाहते हैं, तो मुझे तीनों लोकोंका अतिक्रमण पराभूत होकर धैर्य धारण करके उन प्रभुको हाथ जोड़कर | कर सकनेकी विशेष शक्ति प्रदान करें। हे विभो ! देवता, नमस्कार किया और उनकी प्रार्थना की ॥ २६१/२॥ | दानव, गन्धर्व, मनुष्य, सर्प, राक्षस, मुनि, किन्नर और चारण बालकने कहा—हे देव ! मुझ शरणागत भक्तको | सदा मेरे वशवर्ती हों। जिन-जिन कामनाओंका मैं मानसिक क्यो धर्षित कर रहे हैं? हे देव! आप सौम्य स्वरूप | चिन्तन करूँ, वे सब सदा सिद्ध हों ॥ ३६-३८ ॥ धारण करें और मेरी सम्पूर्ण मनोकामनाओंको प्रदान | इन्द्रादि लोकपाल सदा मेरी सेवा करें। [आप] करें ॥ २७१/२॥ | इहलोकमें अनेक प्रकारके भोग और अन्तमें मुझे मोक्ष ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] उसके इस | प्रदान करें ॥ ३९ ॥ प्रकारके वचनको सुनकर उन्होंने अपने तेजको समेट | आपसे एक अन्य वरकी भी मैं याचना करता हूँ, लिया और परम प्रसन्नतापूर्वक बोले—हे बालक ! | इस पुरमें, जहाँ मैंने उग्र तपस्या की थी, वह आपकी सावधान हो जाओ। जिसका तुम दिन-रात ध्यान करते | आज्ञासे 'गणेशपुर' इस नामसे विख्यात हो जाय और हो, वही मैं इस समय तुम्हें वर देनेके लिये आया | लोगोंको मनोवांछित फल देनेवाला हो ॥ ४०१/२॥ हूँ॥ २८-२९ ॥ | गणेशजी बोले—तुम तीनों लोकोंका अतिक्रमण मेरे इस स्वयंप्रकाशरूप जगन्मय परम रूपको | करोगे। तुम्हें सबसे अभय होगा। सभी तुम्हारे सदा ब्रह्मा, रुद्र आदि भी नहीं जानते तो मनुष्य इसे कैसे जान | वशवर्ती होंगे। मैं तुम्हें लोहे, सोने और चाँदीके तीन पुर सकते हैं ॥ ३०॥ | देता हूँ ॥ ४१-४२ ॥ देवता, मुनि, राजर्षि, असुर, सिद्ध, गन्धर्व, नाग | ये तीनों पुर तुम्हारी इच्छाके अनुसार गति करनेवाले और दानव भी मेरे इस स्वरूपको नहीं जान पाते ॥ ३१ ॥ | और भगवान् शंकरके अतिरिक्त सभी देवताओंके लिये वही मैं तुम्हारे तपरूपी बन्धनमें बँधकर यहाँ वर | अभेद्य होंगे। संसारमें 'त्रिपुर' नामसे तुम्हारी प्रसिद्धि देनेके लिये आया हूँ। तुम्हारे मनमें जो-जो अभिलाषा | होगी ॥ ४३ ॥ हो, वे वर मुझसे माँग लो ॥ ३२ ॥ | जब भगवान् शिव एक ही बाणसे तुम्हारे तीनों तब उस बालकने कहा—आपके दर्शनसे मैं धन्य | पुरोंको भेद देंगे, तभी तुम्हें मोक्षकी प्राप्ति हो जायगी— हो गया हूँ, मुझसे अधिक मेरे पिता धन्य हैं; मेरा जन्म | इस विषयमें किसी प्रकारका विचार करनेकी आवश्यकता लेना और तप करना सार्थक हो गया है ॥ ३३ ॥ | नहीं है। मेरी कृपासे तुम्हें अन्य सभी वांछित प्राप्त हे सुरेश्वर ! बालभाव होनेके कारण मैं स्तुति करना | होंगे ॥ ४४ ॥ नहीं जानता हूँ, जबकि आप सम्पूर्ण जगत्के कर्ता, | ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] इस प्रकार पालक और संहारक हैं ॥ ३४॥ | उसको वरदान देकर वे सर्वव्यापक देव गणेश वहीं आपके ही प्रकाशसे सूर्य, अग्नि और चन्द्रमा | अन्तर्धान हो गये। उनके वियोगसे त्रिपुरासुर विषाद- प्रकाशित होते हैं। हे महामते ! आप अपनी महिमासे | ग्रस्त हो गया। साथ ही उसे मनोवांछित वरोंकी प्राप्तिसे स्थावर-जंगमरूप जगत्को चैतन्य प्रदान करते हैं ॥ ३५ ॥ | अत्यन्त हर्ष भी हुआ। तब वह बलपूर्वक त्रैलोक्य- हे गजानन ! आपकी महान् महिमाको ब्रह्मा, विष्णु | विजयमें संलग्न हो गया ॥ ४५-४६॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'वरप्रदान' नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥