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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

उ०ख०-अ०३८ ] * गृत्समदकी छींकसे एक बालकका जन्म * ११७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उनके हाथ परशु, कमल, माला और मोदकसे | और ईश (शिव) भी नहीं जानते हैं। यदि आप मुझे सुशोभित हो रहे थे। तब उस बालकने उनके तेजसे | वरदान देना चाहते हैं, तो मुझे तीनों लोकोंका अतिक्रमण पराभूत होकर धैर्य धारण करके उन प्रभुको हाथ जोड़कर | कर सकनेकी विशेष शक्ति प्रदान करें। हे विभो ! देवता, नमस्कार किया और उनकी प्रार्थना की ॥ २६१/२॥ | दानव, गन्धर्व, मनुष्य, सर्प, राक्षस, मुनि, किन्नर और चारण बालकने कहा—हे देव ! मुझ शरणागत भक्तको | सदा मेरे वशवर्ती हों। जिन-जिन कामनाओंका मैं मानसिक क्यो धर्षित कर रहे हैं? हे देव! आप सौम्य स्वरूप | चिन्तन करूँ, वे सब सदा सिद्ध हों ॥ ३६-३८ ॥ धारण करें और मेरी सम्पूर्ण मनोकामनाओंको प्रदान | इन्द्रादि लोकपाल सदा मेरी सेवा करें। [आप] करें ॥ २७१/२॥ | इहलोकमें अनेक प्रकारके भोग और अन्तमें मुझे मोक्ष ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] उसके इस | प्रदान करें ॥ ३९ ॥ प्रकारके वचनको सुनकर उन्होंने अपने तेजको समेट | आपसे एक अन्य वरकी भी मैं याचना करता हूँ, लिया और परम प्रसन्नतापूर्वक बोले—हे बालक ! | इस पुरमें, जहाँ मैंने उग्र तपस्या की थी, वह आपकी सावधान हो जाओ। जिसका तुम दिन-रात ध्यान करते | आज्ञासे 'गणेशपुर' इस नामसे विख्यात हो जाय और हो, वही मैं इस समय तुम्हें वर देनेके लिये आया | लोगोंको मनोवांछित फल देनेवाला हो ॥ ४०१/२॥ हूँ॥ २८-२९ ॥ | गणेशजी बोले—तुम तीनों लोकोंका अतिक्रमण मेरे इस स्वयंप्रकाशरूप जगन्मय परम रूपको | करोगे। तुम्हें सबसे अभय होगा। सभी तुम्हारे सदा ब्रह्मा, रुद्र आदि भी नहीं जानते तो मनुष्य इसे कैसे जान | वशवर्ती होंगे। मैं तुम्हें लोहे, सोने और चाँदीके तीन पुर सकते हैं ॥ ३०॥ | देता हूँ ॥ ४१-४२ ॥ देवता, मुनि, राजर्षि, असुर, सिद्ध, गन्धर्व, नाग | ये तीनों पुर तुम्हारी इच्छाके अनुसार गति करनेवाले और दानव भी मेरे इस स्वरूपको नहीं जान पाते ॥ ३१ ॥ | और भगवान् शंकरके अतिरिक्त सभी देवताओंके लिये वही मैं तुम्हारे तपरूपी बन्धनमें बँधकर यहाँ वर | अभेद्य होंगे। संसारमें 'त्रिपुर' नामसे तुम्हारी प्रसिद्धि देनेके लिये आया हूँ। तुम्हारे मनमें जो-जो अभिलाषा | होगी ॥ ४३ ॥ हो, वे वर मुझसे माँग लो ॥ ३२ ॥ | जब भगवान् शिव एक ही बाणसे तुम्हारे तीनों तब उस बालकने कहा—आपके दर्शनसे मैं धन्य | पुरोंको भेद देंगे, तभी तुम्हें मोक्षकी प्राप्ति हो जायगी— हो गया हूँ, मुझसे अधिक मेरे पिता धन्य हैं; मेरा जन्म | इस विषयमें किसी प्रकारका विचार करनेकी आवश्यकता लेना और तप करना सार्थक हो गया है ॥ ३३ ॥ | नहीं है। मेरी कृपासे तुम्हें अन्य सभी वांछित प्राप्त हे सुरेश्वर ! बालभाव होनेके कारण मैं स्तुति करना | होंगे ॥ ४४ ॥ नहीं जानता हूँ, जबकि आप सम्पूर्ण जगत्के कर्ता, | ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] इस प्रकार पालक और संहारक हैं ॥ ३४॥ | उसको वरदान देकर वे सर्वव्यापक देव गणेश वहीं आपके ही प्रकाशसे सूर्य, अग्नि और चन्द्रमा | अन्तर्धान हो गये। उनके वियोगसे त्रिपुरासुर विषाद- प्रकाशित होते हैं। हे महामते ! आप अपनी महिमासे | ग्रस्त हो गया। साथ ही उसे मनोवांछित वरोंकी प्राप्तिसे स्थावर-जंगमरूप जगत्को चैतन्य प्रदान करते हैं ॥ ३५ ॥ | अत्यन्त हर्ष भी हुआ। तब वह बलपूर्वक त्रैलोक्य- हे गजानन ! आपकी महान् महिमाको ब्रह्मा, विष्णु | विजयमें संलग्न हो गया ॥ ४५-४६॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'वरप्रदान' नामक अड़तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३८ ॥

उनतालीसवाँ अध्याय

Here is the complete transcription of the text from the image, preserving the original Hindi and Sanskrit terms, layout, and line structure:

१९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उनतालीसवाँ अध्याय त्रिपुरासुरका इन्द्रपर आक्रमणकर अमरावतीपुरीपर अधिकार कर लेना व्यासजी बोले- हे ब्रह्मन्! गणेशजीसे वरदान प्राप्त करनेके बाद वरप्राप्तिके अहंकारसे भरे त्रिपुरासुरने क्या किया? उसे आप बिना कुछ शेष रखे बताइये, उस विषयमें मुझे कौतूहल हो रहा है ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास!] तदनन्तर उस त्रिपुरासुरने काश्मीर देशमें उत्पन्न होनेवाले पत्थरसे एक गजानन गणेशजीकी मूर्तिक निर्माण कराया और मन्त्रविद् ब्राह्मणोंद्वारा उसकी विधिवत् स्थापना करायी ॥ २ ॥ उसने गणेशपुरके मध्यमें एक महान् और सुन्दर मन्दिरका निर्माण करवाया, जो स्वर्णनिर्मित और दिव्य मणि-मुक्ताओंसे विभूषित था ॥ ३ ॥ उसने षोडशोपचारोंसे उन प्रभुका पूजन किया और असंख्य बार नमस्कार, स्तुतियाँ और क्षमा-प्रार्थना करके उन देवाधिदेवकी आज्ञा लेकर वहाँसे बाहर आया और ब्राह्मणोंको यथायोग्य अनेक दान दिये ॥ ४-५ ॥ तबसे बंगालमें स्थित त्रिपुरका वह स्थान गणेशपुर नामसे विख्यात और सबको सब प्रकारकी सिद्धियाँ देनेवाला हो गया। तदनन्तर वह त्रिपुर दैत्य गणेशजीके वरदानसे मदोन्मत्त होकर मनुष्योंका पालन और देवताओंका अतिक्रमण करनेमें संलग्न हो गया ॥ ६-७ ॥ उसके पास दसों दिशाओंसे बलवान्‌से बलवान् पैदल, अश्वारोही, गजारोही और रथारोही सैनिक सेवाके लिये आ गये। जो राजा उसके अनुकूल थे, वे सेवक हो गये और जो असमर्थ होते हुए भी उसके प्रतिकूल थे, वे मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ ८-९ ॥ इस प्रकार भूमण्डलका अतिक्रमणकर उसने अमरावतीके लिये प्रस्थान किया। तब युद्ध-विद्यामें निष्णात अनेक देवगणोंसे घिरे हुए इन्द्रने भी कवचबद्ध हो तथा ऐरावतपर समारूढ़ हो युद्धके लिये प्रस्थान किया। उधर उस महाबली दैत्य त्रिपुरासुरने भी अपनी चतुरंगिणी- सेनाको तीन भागोंमें विभाजित किया ॥ १०-११ ॥ उसने महान् दैत्य भीमकायको एक भागका और वज्रदंष्ट्र नामक दानवको दूसरे भागका अधिपति बनाया। तदनन्तर उसने धनुर्युद्ध, गदायुद्ध, शस्त्रयुद्ध, अस्त्रयुद्ध और मल्लयुद्धमें निपुण दैत्यश्रेष्ठ भीमकायसे कहा- 'तुम मनुष्यलोकके अधिपति बनो' ॥ १२-१३ ॥ [इसके बाद] महाबली त्रिपुरासुरने वज्रदंष्ट्रसे कहा- 'तुम इस एक तिहाई सेनाको लेकर रसातलको जाओ और मेरी आज्ञासे शेषनाग आदि सभी प्रमुख नागोंको वशमें करो। मैं एक तिहाई सेना लेकर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंपर आक्रमण करूँगा' ॥ १४-१५ ॥ [तत्पश्चात्] भीमकाय और वज्रदंष्ट्रने आज्ञानुसार प्रस्थान किया और स्वयं त्रिपुरासुर चतुरंगिणी सेनासहित नन्दनवनमें जा पहुँचा ॥ १६ ॥ वहाँ उन योद्धाओंने [देव] सैनिकोंके रोकनेपर भी दिव्य वृक्षोंको तोड़ डाला। वहाँ स्थित होकर उस दैत्यराज त्रिपुरासुरने अपने दूतोंको यह कहकर भेजा कि तुम लोग इन्द्रको शीघ्र मेरे सामने ले आओ, मैं उसे देखना चाहता हूँ, अथवा उससे मेरा आदेश कहो कि तुम अभी मृत्युलोक (पृथ्वी)-को चले जाओ, वहाँ मैं तुम्हारा पालन करता रहूँगा, तुम शान्तिपूर्वक अमरावती मुझे दे दो और यदि तुम्हारी बुद्धिमें युद्ध करनेकी बात आ रही हो, तो शीघ्र ही मेरे पास आ जाओ ॥ १७-१९ ॥ उन दूतोंने इन्द्रके पास जाकर त्रिपुरासुरकी सारी चेष्टाओंका वर्णन किया। उनके वचनोंको सुनकर इन्द्रकी स्थिति वज्रसे आहत पर्वत-जैसी हो गयी ॥ २० ॥ जैसे वायुके वेगसे वृक्ष काँपने लगता है, वैसे ही पर्वतशत्रु इन्द्र काँपने लगे। 'यह क्या हो गया'-ऐसा विचार करते हुए वे चिन्तासे व्याकुल हो गये ॥ २१ ॥ वे क्रोधाग्निसे प्रज्वलित-से हो उठे थे, उनकी आँखें लाल हो गयीं। ऐसा लगता था कि वे सम्पूर्ण लोकोंको भस्म कर देंगे और समुद्रोंको सुखा डालेंगे ॥ २२ ॥ उन्होंने दूतोंसे कहा-'जाओ और युद्धके लिये शीघ्र आओ।' उनके उस वचनको सुनकर वे सब दूत जैसे आये थे, वैसे ही वापस लौट गये ॥ २३ ॥ [उस समय] देवताओंके शत्रुओंका हनन करनेवाले

उ०ख०-अ० ३९] * त्रिपुरासुरका इन्द्रपर आक्रमणकर अमरावतीपुरीपर अधिकार कर लेना * ११९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 साक्षात् इन्द्रने ऐरावतपर आरूढ़ होकर गर्जना की, उनके | करनेवाले योद्धा तथा बहुत-से पैदल सैनिक [उस [उस] महान् नादसे त्रिभुवन क्षुब्ध हो उठा ॥ २४ ॥ | युद्धभूमिमें] बिना शय्याके ही सो गये थे; उनमेंसे कुछके [अन्य] देवताओंने भी हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र धारण | पैर कट गये थे तथा दूसरे बहुत-से दैत्य उसी प्रकार दसों कर लिये और वे [युद्धके लिये] सुसज्जित हो गये। कुछ | दिशाओंमें पलायन कर गये, जैसे अचानक सिंहको [देवताओं]-ने हाथमें भिन्दिपाल, तो कुछने हाथमें शक्ति | देखकर जीवित रहनेकी इच्छा करनेवाले मृग भाग जाते और ऋष्टि [नामक शस्त्र] धारण कर रखे थे ॥ २५ ॥ | हैं ॥ ३४-३५ ॥ कुछने हाथोंमें मुद्गर और तलवार धारण कर रखी | तब देवशत्रु त्रिपुरासुरने उस भागती हुई अपनी थी तो अन्य [देवताओं]-ने धनुष-बाण धारण कर रखे | सेनाको रोका और स्वयं वह क्रोधाग्निकी महान् ज्वालामें थे। कुछके हाथोंमें गदा और खेट थे, तो कुछ दण्डपाणि | जलता हुआ तथा दूसरे मेघकी भाँति गर्जन करता हुआ अर्थात् हाथमें दण्ड लिये हुए थे ॥ २६ ॥ | इन्द्रके समीप आया। उस समय वह पृथ्वी और [तदनन्तर] ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्त्यन कराकर वज्रधारी | आकाशका भक्षण करता हुआ-सा प्रतीत हो रहा था। इन्द्र इस प्रकार देवताओंके साथ [अमरावतीपुरीसे] | उसने अपने खड्गसे वज्रधर इन्द्रके हाथपर तीव्र प्रहार बाहर आये। उस समय अनेक प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि | किया ॥ ३६-३७॥ हो रही थी ॥ २७ ॥ | [उस प्रहारसे] इन्द्रके हाथसे वज्र गिर पड़ा—यह त्रिपुरासुरने भी दूतकी बातसे उनके युद्ध-उद्यमको | एक अद्भुत घटना घटित हुई! वज्रको लेकर उस दैत्यने जानकर अपनी शक्तिशाली और हर्षसे भरी हुई चतुरंगिणी | उसीसे ऐरावत हाथीपर प्रहार किया ॥ ३८ ॥ सेनाको युद्धके लिये सुसज्जित किया। [तत्पश्चात्] | उस प्रहारसे [व्यथित होकर] ऐरावत पलायन कर अश्वारूढ़ होकर उसने असंख्य सैनिकोंवाली सेनाके | गया। तदनन्तर इन्द्रने घूँसेसे उस दैत्यश्रेष्ठ [त्रिपुरासुर]- साथ [युद्धके लिये] प्रस्थान किया। इस प्रकार वीर | पर प्रहार किया ॥ ३९ ॥ योद्धाओंसे सुसज्जित दोनों सेनाओंने एक-दूसरेको | उससे वह क्षणभरके लिये भूमिपर गिर पड़ा, देखा ॥ २८-२९ ॥ | तत्पश्चात् पुनः वेगपूर्वक उठकर उसने मुक्केसे प्रहारकर [उस समय] हाथियोंके चिंघाड़ने, घोड़ोंके हिनहिनाने, | इन्द्रको पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ४० ॥ योद्धाओंके युद्धनाद, रथोंके चलनेकी ध्वनि और अनेक | तत्पश्चात् उठकर इन्द्रने क्रोधपूर्ण वाणीमें दैत्य प्रकारके वाद्योंके घोषसे वहाँ महान् कोलाहल हो गया। | त्रिपुरसे कहा—हे असुरेश्वर! अब तुम मल्लयुद्धके लिये तब त्रिपुरासुरके द्वारा हुंकारमात्रसे प्रेरित किये उसके वीर | तैयार हो जाओ ॥ ४१ ॥ योद्धा देवताओंके साथ युद्ध करने लगे और इस प्रकार | तब उस बलगर्वित त्रिपुरासुरने आश्चर्यचकित महान् संग्राम प्रारम्भ हो गया ॥ ३०-३१ ॥ | होकर कहा—हे देवेश्वर! अपने प्राणोंके प्रति क्यों निर्दय इस युद्धमें सैनिकोंको अपने-परायेका ज्ञान न रहा | हो रहे हो? ॥ ४२ ॥ और वे परस्पर एक-दूसरेको मारने लगे। इस प्रकार उस | कृमि, कीट और पतंगोंको भी अपने प्राण अत्यन्त भयंकर युद्धमें बहुत-से दानव मारे गये ॥ ३२॥ | प्रिय होते हैं, हे देवराज! धरतीपर जाओ, वहाँ मैंने तुम्हें दैत्योंके शस्त्राघातसे अत्यन्त पीड़ित होकर बहुत- | सुन्दर स्थान दे रखा है ॥ ४३ ॥ से देवता भी उस युद्धभूमिमें गिर गये। वहाँ वे | ब्रह्माजी बोले—[हे व्यास!] उसके इस प्रकारके [रक्तरंजित] सैनिक पुष्पित पलाश वृक्षोंकी भाँति सुशोभित | वचन सुनकर बलासुर और वृत्रासुरका वध करनेवाले हो रहे थे ॥ ३३॥ | इन्द्रने कहा—रे अधम शत्रु! यदि मैं तुझे जीवित ऊँट, हाथी, रथ और घोड़ोंपर आरूढ़ होकर युद्ध | छोड़ूँगा, तब तेरी आज्ञाके वशमें होकर पृथ्वीपर जाऊँगा।

१२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

रे दुष्ट! तू ही आज भग्न सिरवाला होकर पृथ्वीपर | हिमालयपर्वतकी गुफाओंमें चले गये ॥ ५१ ॥ जायगा ॥ ४४-४५ ॥ | वे देव (इन्द्र) कहाँ गिरे हैं? उन विभुको हम कैसे जब देवेन्द्र ऐसा कह रहे थे, तभी उस दुष्ट | देखें ? - ऐसा चिन्तन करते और भ्रमण करते हुए उन्होंने दैत्यराजने मुष्टिकासे उनके हृदयदेशमें प्रहार किया, तब | उनको देख लिया ॥ ५२ ॥ उन दोनोंमें युद्ध होने लगा। एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा | तब उस देवसमूहने नीचेको मुख किये आते हुए रखनेवाले उन दोनोंका वह युद्ध चाणूर और कृष्णके | उन इन्द्रको प्रणाम किया। कुछ अन्य देवताओंने उनका युद्धकी भाँति था। वे दोनों परस्पर छाती-से-छाती और | आलिंगन किया। कुछ अन्य देवताओंने उनका पूजन हाथ-से-हाथपर प्रहार कर रहे थे ॥ ४६-४७ ॥ | किया और कुछने उनपर व्यजन डुलाये तथा कुछने वे दोनों घुटनों-से-घुटनोंमें, जाँघों-से-जाँघोंमें, | भक्तिपूर्वक उनके पैर दबाये ॥ ५३-५४ ॥ मस्तक-से-मस्तकमें, कुहनी-से-कुहनीमें, पीठ-से-पीठमें, | [ तदनन्तर ] वे सभी देवता गुप्त रूपसे वहीं रहने पैरों-से-पैरोंमें प्रहार कर रहे थे। तभी उस दैत्य त्रिपुरने | लगे। [उधर] वह दैत्य (त्रिपुरासुर) ऐरावतपर आरूढ़ इन्द्रके दोनों पैरोंको पकड़कर और उन्हें बार-बार घुमाकर | होकर अमरावतीपुरीको चला गया ॥ ५५ ॥ इतनी दूर फेंक दिया कि किसीको उनके विषयमें कोई | उसने देवताओंसे द्वेष रखनेवाले दैत्योंको सम्मानपूर्वक जानकारी ही न रही और स्वयं चार दाँतोंवाले गजराज | देवताओंके पद बाँट दिये और स्वयं इन्द्रासनको हस्तगत ऐरावतपर आरूढ़ हो गया ॥ ४८-५० ॥ | कर लिया अर्थात् इन्द्र बन बैठा। किन्नरगणोंसे सेवित [वह] तदनन्तर सभी देवगण उस दैत्य त्रिपुरासुरके | त्रिपुरासुर दिव्य वाद्योंकी ध्वनि और गन्धर्वोंके गानका श्रवण सन्त्रासरूपी अग्निसे पीड़ित होकर, इन्द्रको खोजते हुए | करते हुए अप्सराओंके साथ रमण करने लगा ॥ ५६-५७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'इन्द्रपराजयवर्णन' नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३९ ॥ चालीसवाँ अध्याय ब्रह्मा, विष्णु और शिवका त्रिपुरासुरके भयसे अपने-अपने लोकोंसे पलायन, देवताओंद्वारा गणेशाराधन, गणेशजीका प्रकट होना, देवताओंद्वारा संकष्टनाशनस्तोत्रसे उनका स्तवन ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] देवलोकपर | आलिंगन कर लिया ॥ ४ ॥ अधिकार करके वह दैत्य ब्रह्मलोकको गया। ब्रह्माजीने | तत्पश्चात् वह महान् असुर युद्धोत्सुक होकर उस दैत्यके पराक्रमको देवताओंके मुखसे पहले ही | कैलासपर्वतपर चढ़ गया। उस दैत्यके इस पुरुषार्थसे सुन रखा था, अतः वे [विष्णुके] नाभिकमलमें छिप | महादेवजी प्रसन्न हो गये ॥ ५ ॥ गये और विष्णु [वैकुण्ठलोकको छोड़कर] क्षीरसागरमें | अपने भक्तोंको सुख प्रदान करनेवाले [वे उसे] वर चले गये ॥ १ १/२ ॥ | देनेके लिये [अपने भवनसे] बाहर आये और दैत्य उस दैत्य (त्रिपुरासुर)-के दो मानस पुत्र थे- | त्रिपुरको देखा तथा उससे 'वर माँगो' - ऐसा कहा ॥ ६ ॥ प्रचण्ड और चण्ड। उसने स्वयं प्रचण्डको ब्रह्मलोकमें | उसने कहा कि यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो अधिनायकके रूपमें स्थापित किया और उसके बाद | [यह] कैलासपर्वत मुझे दे दीजिये, जबतक मेरी इच्छा चण्डको वैकुण्ठमें वहाँका स्वामी बनाया ॥ २-३ ॥ | हो, मैं यहाँ रहूँ और आप आज ही मन्दारपर्वतके तदनन्तर वह कैलास गया और उसे अपनी | शिखरपर चले जाइये ॥ ७ ॥ भुजाओंसे चलायमान कर दिया, जिससे भयभीत होकर | तब भगवान् शंकरने भी उस अत्यन्त अल्पजीवीको गिरिराजनन्दिनी पार्वतीने भगवान् शंकरका दृढ़तापूर्वक | कैलासपर्वत दे दिया और वे स्वयं गिरिशायी [महादेव]

उ०ख०-अ०४०] * ब्रह्मा, विष्णु और शिवका त्रिपुरासुरके भयसे अपने-अपने लोकोंसे पलायन * १२१ गणोंसे घिरे हुए मन्दराचलको चले गये। कैलासशिखरपर आरूढ़ होकर अर्थात् कैलासपर्वतका स्वामित्व प्राप्तकर त्रिपुरासुर अत्यन्त हर्षित हुआ। इस प्रकार देवताओंको वशमें करके वह पुनः रसातलको आया ॥ ८-९ ॥ बलवान् भीमकायने भी पृथ्वीपर जाकर बलपूर्वक राजाओं और ऋषियोंको अपने वशमें कर लिया और उन सबको बाँध लिया। [उसने] देवताओंको तृप्ति प्रदान करनेवाले सभी अग्निकुण्डों, आश्रमों तथा विशेष रूपसे तीर्थोंको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया ॥ १०-११ ॥ उसने तपस्वियोंको पीड़ित किया और उन्हें कारागारमें डाल दिया। सब प्रकारसे अभिमानसे भरा हुआ वह (दैत्य भीमकाय) देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वषट्कार, वेदाध्ययन करनेवालों और सदाचारियोंनोंसे सदा द्वेष रखता था ॥ १२१/२ ॥ [उधर] वज्रदंष्ट्रने भी सातों पातालों*को अपने वशमें कर लिया। उसने शेष, वासुकि और तक्षक प्रभृति सभी नागों तथा विषहीन और विषैले सर्पोंको अपने वशमें कर लिया। वज्रदंष्ट्रने [वहाँसे प्राप्त] श्रेष्ठ रत्नोंका स्वयं भी भोग किया और [उन्हें] त्रिपुरासुरके लिये भी प्रेषित किया ॥ १३-१४ ॥ वह सदा मदोन्मत्त होकर अत्यन्त हर्ष और कौतूहलपूर्वक नागलोककी नारियोंसे रमण करता था। [इस प्रकार] वह अनेक प्रकारके भोगोंका भोगकर विविध रत्नोंको लेकर त्रिपुरासुरके पास आया ॥ १५ ॥ 'पातालको वशमें कर लिया है' यह बात बतानेपर उसने [त्रिपुरासुरसे] पहलेकी भी अपेक्षा अधिक सम्मान, बहुमूल्य वस्त्र, बहुत-से ग्राम और सेवक प्राप्त किये ॥ १६ ॥ इस प्रकार त्रैलोक्यको अपने वशमें करके वह दैत्य [त्रिपुरासुर] अत्यन्त आनन्दित हुआ और उधर सभी देवता गुफाओंमें रहते हुए नित्य चिन्तित रहते थे कि इस दैत्यका वध कैसे, किस समय और किसके द्वारा होगा? हम लोग यह भी नहीं जानते कि इसने कहाँसे यह वरदान प्राप्त कर लिया है ॥ १७-१८ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ (व्यासजी) ! [जब] देवता लोग इस प्रकारसे व्याकुल थे तो [उसी समय] अपनी इच्छासे त्रिलोकीमें विचरण करनेवाले नारदजी वहाँ आये ॥ १९ ॥ [वे] उन दीन दशावाले देवोंको देखकर आकाश- मार्गसे नीचे उतर आये। नारदजीको सहसा आया देखकर वे सब आदरपूर्वक उठकर खड़े हो गये ॥ २० ॥ अवस्थाके अनुसार उनमेंसे कुछने उनका आलिंगन किया, कुछने नमस्कार किया और कुछने उनका पूजन किया; तत्पश्चात् विश्रामके अनन्तर [उन्होंने उनसे] त्रिपुरके वरदान आदिके विषयमें पूछा ॥ २१ ॥ देवता बोले-त्रिपुरासुरने स्थावर-जंगमात्मक सम्पूर्ण प्राणियोंसहित त्रैलोक्यको अधीन कर लिया है। उसने हमारे स्थान छीन लिये हैं; ब्रह्मा, विष्णु और शंकरको भी उसने जीत लिया है ॥ २२ ॥ हे [मुने]! अब हम किसकी शरणमें जायँ? उसका वध कैसे हो ? इस त्रिपुरको किसने वरदान दिया है-यह हमें बतलाइये ॥ २३ ॥ नारदजी बोले- [हे देवताओ!] दैत्य त्रिपुरासुरद्वारा किये गये महान् प्रयासको मैं संक्षेपमें कहता हूँ, उसने दिव्य सहस्र वर्षोंतक परम तप किया था ॥ २४ ॥ उसने देवाधिदेव भगवान् गणेशको [अपनी तपस्यासे] प्रसन्न किया। उन्होंने उसे सबके लिये दुर्धर्ष और भयंकर वर प्रदान किये ॥ २५ ॥ [उन्होंने उसे] एकमात्र परमात्मा शंकरके अतिरिक्त देवताओं, ऋषियों, पितरों, भूतों, यक्षों, राक्षसों, पिशाचों और नागोंसे अभय होनेका वर प्रदान किया है ॥ २६ ॥ अतः [आप लोग] आदरपूर्वक देवताओंके स्वामी गजानन गणेशजीको प्रसन्न करें; सभी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले विघ्नेश्वरकी आप सभी लोग आराधना करें ॥ २७ ॥ देवता बोले-हे मुनिश्रेष्ठ! उन बुद्धिमान् देवाधिदेवका आराधन कैसे करना चाहिये, कृपया इसे हम सबसे कहिये ॥ २८ ॥ नारदजी बोले-मैं आप सबके प्रति [गणेशजीके] एकाक्षर मन्त्रका कथन करता हूँ, आप सब मेरे द्वारा प्रदत्त उस मन्त्रका स्थिर मनसे भक्तिपूर्वक तबतक अनुष्ठान करें, जबतक कि वे देव गणनायक प्रत्यक्ष प्रकट होकर दर्शन न दे दें ॥ २९-३० ॥ वे ही आप सबसे उसके वधका उपाय कहेंगे,

  • अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल-ये पृथ्वीके नीचे स्थित सात लोक हैं; जिनकी सप्तपाताल संज्ञा है।

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का संपूर्ण पाठ्य (Text) दिया गया है:


शीर्षक (Header): १२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-


बायाँ स्तम्भ (Left Column)

[इस विषयमें] मैं कोई अन्य उपाय नहीं देखता हूँ। इसलिये मेरे वचनका पालन करो ॥ ३१ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी!] नारदमुनिने ऐसा कहकर और उन सबको उस (एकाक्षर) मन्त्रका उपदेश देकर वीणापर [भगवन्नामका] गान करते हुए तत्क्षण वहाँसे प्रस्थान कर दिया ॥ ३२ ॥ तदनन्तर वे सभी श्रेष्ठ देवता गणेशजीके ध्यानमें संलग्न हो गये। उनमेंसे कुछ एक पैरपर, कुछ पद्मासनमें और कुछ वीरासनमें स्थित थे; कुछने अपने नेत्र बन्द कर रखे थे। वे सब श्वासपर नियन्त्रण करके निराहार रहते हुए मुनिद्वारा उपदिष्ट मन्त्रका जप करने लगे ॥ ३३-३४ ॥ तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर करुणासागर गजानन गणेशजी देवताओंके दीर्घकालसे चल रहे अनुष्ठानको

(मध्य में चित्र)

देखकर उनके समक्ष प्रकट हुए। उन वरदायक [गणेशजी]- के [सिरपर] स्वर्ण मुकुट और [कानोंमें] सुन्दर कुण्डल सुशोभित हो रहे थे ॥ ३५-३६ ॥ उन्होंने अपने हाथमें दाँत धारण कर रखा था, उनके शरीरपर श्रेष्ठ बाजूबन्द और कटिसूत्र शोभायमान हो रहे थे। उन्होंने अपनी भुजाओंमें पाश, अंकुश, परशु और कमल धारण कर रखे थे ॥ ३७ ॥ उनका [मस्तक] रक्तचन्दन, कस्तूरी, सिन्दूर और


दायाँ स्तम्भ (Right Column)

चन्द्रमासे विभूषित था। उनके श्रीविग्रहका तेज विद्युत्के समान और उनकी कान्ति करोड़ों सूर्योंकी प्रभाके समान थी ॥ ३८ ॥ सहसा अनामय देव विनायकको [अपने समक्ष] देखकर सभी देवता उनके तेजसे पराभूत हो गये। उनमेंसे कुछ भयभीत हो गये, कुछ देवता सहसा उन गजाननको प्रणाम करने लगे, कुछ अन्य देवताओंने हर्षसे गद्गद वाणीमें उनका पूजन किया ॥ ३९-४० ॥ संकटसे रक्षा करनेवाले और कृपा करनेके लिये उत्सुक उन सुन्दर मुखवाले भगवान् गणेशका कुछ देवताओंने अपने संकटके विनाशहेतु स्तवन* भी किया ॥ ४१ ॥ **देवता बोले—**हे परमार्थरूप! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप अखिल [सृष्टि]-के कारणरूप हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप सम्पूर्ण प्राणियोंको [इस भवसागरसे] तारनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप [सम्पूर्ण प्राणियोंकी] सभी इन्द्रियोंमें भी निवास करते हैं, आपको नमस्कार है ॥ ४२ ॥ आप सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे देवेश! आप भूत-सृष्टिके कर्ता हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप [सम्पूर्ण प्राणियोंकी] बुद्धिके प्रबोधरूप हैं, संसारकी उत्पत्ति और लय करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४३ ॥ हे अखिलेश! आप विश्वका भरण-पोषण करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप कारणोंके भी कारण हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप वेदके विद्वानोंके लिये भी अदृश्य हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप सबको वर प्रदान करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४४ ॥ हे वाणीसे अनिर्वचनीय [परमात्मन्]! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप विघ्नोंका निवारण करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप अभक्तके मनोरथका नाश करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे भक्तके मनोरथको जाननेवाले!

उ०ख०-अ०४०] * ब्रह्मा, विष्णु और शिवका त्रिपुरासुरके भयसे अपने-अपने लोकोंसे पलायन * १२३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

इकतालीसवाँ अध्याय

१२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 इकतालीसवाँ अध्याय श्रीगणेशजीका कलाधर विप्रके रूपमें त्रिपुरासुरके पास आना और उसे स्वर्ण, रजत एवं लौहसे निर्मित तीन पुर प्रदान करना

व्यासजी बोले—हे चतुर्मुख ब्रह्माजी ! [सृजन, पालन और संहार आदि] सम्पूर्ण कार्योंको सम्पन्न करनेवाले वरदायक भगवान् गणेशजीने क्या किया—यह मुझ जिज्ञासुको बतलाइये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी !] तदनन्तर गजानन गणेशजी ब्राह्मणका रूप धारणकर त्रिपुरासुरके पास गये। वहाँ उन ब्राह्मणश्रेष्ठने उसे महामूल्यवान् आसनपर विराजमान देखा ॥ २ ॥ उसने उठकर उन्हें नमस्कार करके अपने आसनपर बैठाया और सम्यक् रूपसे उनका पूजनकर पूछा कि 'हे द्विज ! आपका आगमन कहाँसे हुआ है ? ॥ ३ ॥ हे द्विज ! आपने किस विद्याका ज्ञान प्राप्त किया है ? आपका नाम क्या है ? आपके आनेका प्रयोजन क्या है ?—यह सब मुझ जिज्ञासुको बताइये, मैं शक्तिभर आपके कार्यको पूर्ण करूँगा' ॥ ४ ॥ द्विजरूपधारी गणेशजी बोले—हे दैत्य [राज] ! हम सर्वज्ञ और सब कुछ जाननेवाले हैं; परहितकी कामनासे इच्छानुसार लोकोंमें भ्रमण करते रहते हैं और जहाँ सायंकाल हो जाता है, वहीं रुक जाते हैं ॥ ५ ॥ मैं तीनों लोकोंमें 'कलाधर' नामसे प्रसिद्ध हूँ और आपके वैभवको देखनेकी इच्छासे आपके भवनमें आया हूँ। सम्प्रति आपकी सम्पूर्ण सम्पदाको देखकर हम तृप्त हो गये। इस प्रकारकी सम्पत्ति तो कैलास, वैकुण्ठ और ब्रह्मलोकमें भी नहीं है। इन्द्रलोकमें भी ऐसी सम्पत्ति नहीं है, जैसी आपके पास दिखायी देती है ॥ ६—७१/२ ॥ दैत्य (त्रिपुरासुर) बोला—हे द्विज ! आपका नाम ही कलाधर है या आप उसे जानते भी हैं ? ॥ ८ ॥ सम्पूर्ण लोकोंकी सम्पदाओंमें आप जो इस सम्पदाकी प्रशंसा कर रहे हैं तो यदि आप जानते हों तो मुझे उनमें जो सर्वश्रेष्ठ हो, उसे दिखायें ॥ ९ ॥ हे द्विज ! उसे देखकर मैं आपको आपका वांछित [अवश्य] प्रदान करूँगा, भले ही वह मेरा प्रिय प्राण ही क्यों न हो। हे मुने ! मुझे स्मरण नहीं है कि मैंने परिहासमें भी कभी असत्य बोला हो ॥ १० ॥ कलाधर बोले—हे देवशत्रु ! दूसरोंकी सम्पदाको देखकर तुम्हारा क्या प्रयोजन सिद्ध होगा ? तुम्हारी विनम्रतासे मैं प्रसन्न हूँ और अपनी कलासे तुम्हें एक बाणपर स्थित स्वर्ण, रजत और लौहनिर्मित तीन पुर प्रदान करता हूँ। हे दैत्य ! तुम दीर्घकालतक वहाँ रहकर सुखपूर्वक रमण करो ॥ ११-१२ ॥ ये तीनों पुर देवताओं, गन्धर्वों, मनुष्यों और सर्पोंद्वारा अभेद्य, मनोवांछित पदार्थोंको देनेवाले, इच्छानुसार गमन करनेवाले, इच्छित भोगोंको प्रदान करनेवाले और मंगलमय हैं ॥ १३ ॥ हे दैत्य ! कुछ काल बीत जानेपर जब भगवान् शिव एक ही बाणसे उनका भेदन कर देंगे, तभी उनका नाश होगा ॥ १४ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] ऐसा कहकर [उन द्विजरूपधारी गणेशजीने] धनुष लेकर और उसपर बाणका संयोजनकर तीन पुरोंका निर्माण किया, जो तीन लोकोंके सदृश थे। वे [तीनों.पुर] विशेष रूपसे चित्रित भवनों, मनोरम दीर्घिकाओं (जलाशयों) और उद्यानोंसे युक्त थे; वहाँ अनेक प्रकारके पक्षिसमूह कलरव करते थे। वे तीनों पुर सभी प्रकारके भोगोंको प्रदान करनेवाले और आकाशमार्गसे गमन करनेवाले थे ॥ १५-१६ ॥ [गणेशजीकी] मायासे मोहित वह दैत्य त्रिपुरासुर वहाँ (उन पुरोंके मध्यमें) स्थित होकर अत्यन्त हर्षित हुआ। उस दैत्यने मेघसदृश गर्जन किया, जिससे तीनों लोक काँपने लगे। त्रैलोक्यको क्षुभित करके उसने 'मुझसे श्रेष्ठ कोई नहीं है'—इस प्रकार गर्व और दर्पसे युक्त होकर उन ब्राह्मण-देवता (द्विजरूपधारी गणेशजी)— से इस प्रकार कहा— ॥ १७-१८ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! आप दुर्लभ-से-दुर्लभ पदार्थ माँगिये, वह मैं आपको दूँगा। यह सुनकर उन द्विज (कलाधर)—

उ०ख०-अ०४२ ] * भगवान् शंकर और त्रिपुरासुरका युद्ध * १२५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ने उस दैत्य (त्रिपुरासुर)-से किसी वस्तुकी स्पृहा न होते हुए भी कहा— ॥ १९ ॥ द्विजरूपधारी गणेशजी बोले—मैं कैलासपर्वतपर गया था, वहाँ मैंने शिवजीद्वारा सम्यक् रूपसे पूजित उत्तम गणेशमूर्तिका दर्शन किया, जो समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली थी। हे असुरेश्वर! यदि आपमें शक्ति है, तो उसे लाकर मुझे दीजिये; क्योंकि तीनों लोकोंमें विचरण करते हुए मैंने वैसी मूर्ति कहीं नहीं देखी ॥ २०-२१॥ अतः हे दैत्यश्रेष्ठ! उसमें मेरा मन आसक्त हो गया है, हे असुरेश्वर! उसे प्राप्तकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा। मैं चराचरसहित तीनों लोकोंमें आपकी कीर्तिका विस्तार करूँगा कि 'त्रिपुरासुरसे श्रेष्ठ कोई दाता नहीं है, जो वांछित वस्तुको प्रदान करता है' ॥ २२-२३॥ दैत्य [त्रिपुरासुर] बोला—हे द्विजश्रेष्ठ ! मैं शंकरको अपना किंकर (सेवक) मानता हूँ, अन्य देवताओंकी तो मैं कोई गणना ही नहीं करता। मैं उस मूर्तिको लाकर आपको प्रदान करूँगा ॥ २४॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी!] ऐसा कहकर [उस दैत्यने] उन [द्विजश्रेष्ठ] कलाधरका आदरपूर्वक पूजन किया। उसने उन्हें दस ग्राम, गौएँ, वस्त्र, आभूषण, मोती, मूँगे तथा अन्य बहुत-से रत्न एवं रंकु मृगके रोमसे बने हुए कम्बल और अनेक प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित सैकड़ों दास-दासियाँ प्रदान किये। उस असुरने श्रेष्ठ अश्वोंसे युक्त एवं चाँदीसे निर्मित बहुत-से रथ भी उन्हें प्रदान किये, जो रथकी रक्षा करनेवाले कवच और सोनेके धुरोंसे युक्त थे ॥ २५-२७ ॥ उस (त्रिपुरासुर)-के द्वारा आग्रहपूर्वक दी गयी सम्पूर्ण दान-सामग्रियों आदिको ग्रहणकर वे [द्विजश्रेष्ठ] कलाधर अपने आश्रमको प्रस्थान कर गये। [उन्हें देखकर] उनकी पत्नी और सम्पूर्ण आश्रमवासी हर्षित हो गये ॥ २८ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी!] इस प्रकार इस सम्पूर्ण वृत्तान्तको नारदजीने देवताओंसे कहा। वे देवता भी उचित समयकी प्रतीक्षा करते हुए दिन व्यतीत करने लगे ॥ २९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'नारदागमन' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४१॥ बयालीसवाँ अध्याय भगवान् शंकर और त्रिपुरासुरका युद्ध व्यासजी बोले—[हे ब्रह्मन् !] उन [द्विजश्रेष्ठ] कलाधरके चले जानेके बाद उस दैत्य (त्रिपुरासुर)-ने क्या किया? उस मंगलमयी चिन्तामणि [गणेशजीकी] मूर्तिको उसने कैसे लाकर उन कलाधरको प्रदान किया? हे चतुरानन ब्रह्माजी! यह सब मुझसे विस्तारपूर्वक कहिये; क्योंकि गजानन गणेशजीकी लीलाओंको संक्षेपमें सुनकर मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ ॥ १-२ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ ! उन [द्विजश्रेष्ठ कलाधर]-के चले जानेके बाद उस दैत्य त्रिपुरासुरने जो कुछ किया, वह सब मैं कहूँगा; हे मुने! उसे सावधान होकर श्रवण करो ॥ ३ ॥ [तदनन्तर] उसने मन्दराचलपर स्थित शिवके पास दो दूतोंको भेजा। उसने उन्हें यह सिखाया कि शिवके पास जाकर आदरपूर्वक मेरी बात उनसे कहो कि तुम्हारे भवनमें जो सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थोंको प्रदान करनेवाली चिन्तामणि-निर्मित मंगलमयी [गणेश] मूर्ति है, हे पार्वतीपते! उसे शान्तिपूर्वक दैत्यराज (त्रिपुरासुर)-को दे दीजिये ॥ ४-५॥ पाताल, स्वर्गलोक या मर्त्यलोकमें जो भी अद्भुत वस्तुएँ हैं, उन सबको वह दैत्य [राज] बलपूर्वक अपने घरमें लाया है, अतः हे देव ! उसे आप शीघ्र लाइये, उसे लेकर हम दोनों शीघ्र ही महाबली दैत्य त्रिपुरासुरके पास जायँ। यदि आप उसे शान्तिपूर्वक नहीं देंगे, तब वह पराक्रमी दैत्य उस मूर्तिको आपसे बलपूर्वक ले लेगा, तब आपको दुःखकी प्राप्ति होगी-उस दैत्यके इस प्रकारके वचन सुनकर वे दोनों दूत शिवके पास गये ॥ ६–८॥

१२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

उ०ख०-अ०४३] * त्रिपुरासुरके साथ युद्धमें भगवान् शंकरकी पराजय * १२७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 धूलके शान्त हो जानेपर वीर योद्धा [शत्रुपक्ष]- | भाँति बह रहे थे। वह वीरोंके मनमें सन्तोष उत्पन्न के दूसरे योद्धाओंसे युद्ध करने लगे। उनमेंसे कुछ | करनेवाली और गृध्रों एवं शृगालोंके लिये प्रसन्नताका भालोंसे, कुछ खड्गोंसे, कुछ पत्थरपर घिसकर तेज | कारण थी ॥ ३२ ॥ किये गये बाणोंसे, कुछ ऋष्टि (दुधारी तलवार)-से, | उस नदीको देखकर गिरिशायी बलवान् भगवान् कुछ मुष्टिकासे, कुछ परशुसे, तो कुछ तोमरोंसे युद्ध कर | शंकर दैत्य त्रिपुरासुरके निकट गये, [तब] वह दैत्य भी रहे थे॥ २९ १/२ ॥ | त्रिपुरमें आरूढ़ होकर सेनाके साथ उनके सामने वहाँ मारे गये वीरों, घोड़ों और पैदल सैनिकोंके | आया ॥ ३३ ॥ रक्तसे एक रक्तकी नदी उत्पन्न हो गयी, जिसमें | तब दोनों नायकोंको युद्धोद्यत देखकर भगवान् शैवालकी भाँति केश प्रवाहित हो रहे थे। [उस नदीमें] | शंकर और त्रिपुरासुरके सैनिक बिना व्याकुल हुए परस्पर ढालें कछुओंकी भाँति, तलवारें मत्स्योंकी तरह और | द्वन्द्व-युद्ध करने लगे ॥ ३४ ॥ [योद्धाओंके कटे] सिर कमलसदृश प्रतीत हो रहे | उस समय वे अनेक प्रकारके आयुधों, दिव्य थे ॥ ३०-३१ ॥ | अस्त्र-शस्त्रों और वृक्षोंसे प्रहार कर रहे थे। उन भयंकरसे भी भयंकर प्रतीत होनेवाली उस नदीमें | योद्धाओंके नामों और युद्धविषयक चेष्टाओंको मैं छत्र आवर्त (भँवर)-की भाँति और कबन्ध वृक्षकी | [आगे] संक्षेपमें कहूँगा ॥ ३५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'युद्धका वर्णन' नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४२ ॥ तैंतालीसवाँ अध्याय त्रिपुरासुरके साथ युद्धमें भगवान् शंकरकी पराजय ब्रह्माजी बोले-[हे व्यासजी!] उस द्वन्द्व-युद्धमें | गजारोहियोंके साथ, अश्वारोही अपने सदृश अश्वारोहियोंके गिरिशायी भगवान् शंकर असुर सेनानायक त्रिपुरासुरसे, | साथ और पैदल सैनिक पैदल सैनिकोंके साथ युद्ध करने षडानन भगवान् स्कन्द प्रचण्डसे और नन्दी चण्डसे युद्ध | लगे। उस भयंकर संग्राममें अनेक प्रकारके वाद्योंके घोष, करने लगे ॥ १ ॥ | हाथियोंकी चिंघाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, वीरोंके बलवान् पुष्पदन्त भी भीमकायसे तथा भुशुण्डी | सिंहनाद और रथोंके धुरोंके घर्षणसे उत्पन्न ध्वनिसे [वह विषके सदृश प्राणहारी कालकूटसे युद्ध करने लगे ॥ २ ॥ | रणभूमि] अत्यन्त कोलाहलयुक्त हो गयी थी ॥ ६-७ ॥ वज्रदंष्ट्र और वीरभद्र-दोनों महान् बलशाली | उस युद्धमें कुछ वीर शस्त्रोंका त्याग करके विविध [परस्पर] युद्ध करने लगे। वहाँ [उस संग्राममें] | प्रकारसे मल्लयुद्ध करने लगे। वे अपने अंगोंसे दूसरेके बलवान् इन्द्रने भी दैत्य (त्रिपुरासुर)-के अमात्यसे युद्ध | अंगोंपर प्रहार कर रहे थे ॥ ८ ॥ किया। दैत्यपुत्र बलिके साथ रणदुर्मद [इन्द्रपुत्र] जयन्तने | तभी प्रचण्डने धनुषको कानतक खींचकर पत्थरपर और [दैत्यगुरु] शुक्राचार्यके साथ अस्त्रोंके ज्ञाता देवताओंके | घिसकर तेज किये गये नौ दृढ़ बाणोंसे षडानन आचार्य बृहस्पतिने युद्ध किया ॥ ३-४ ॥ | कार्तिकेयजीपर प्रहार किया ॥ ९ ॥ इस प्रकार देवताओं और दैत्योंके अनेक जोड़ोंमें | तब भगवान् कार्तिकेयने उन्हें अपनेतक पहुँचनेके युद्ध हुआ, जिसका वर्णन करनेमें मैं सैकड़ों वर्षोंमें भी | पहले ही झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे काटकर पाँच समर्थ नहीं हूँ ॥ ५ ॥ | बाणोंसे उसपर प्रहार किया। इससे भ्रान्तचित्त प्रचण्ड उस युद्धमें रथी रथियोंके साथ, गजारोही | मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ा ॥ १० १/२ ॥

१२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[उधर] नन्दीने भी चण्डपर पाँच तीक्ष्ण बाणोंसे प्रहार किया, वह भी मूर्च्छित होकर सहसा धरतीपर गिर पड़ा। भीमकायने पुष्पदन्तपर दस बाणोंसे प्रहार किया, परंतु पुष्पदन्तने अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उन्हें समरभूमिमें काट डाला और उसपर तीन बाणोंसे प्रहार किया, जिससे उसने भी भूतलका आश्रय ले लिया अर्थात् पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ११-१३ ॥ भुशुण्डीने पाँच बाणोंसे कालकूटको गिरा दिया। महाबली वीरभद्रने भी उस समरभूमिमें क्रोधित होकर वज्रदंष्ट्रपर चार तीक्ष्ण बाणोंका प्रहार किया, उन बाणोंका निवारण करके उसने वीरभद्रपर तीन बाणोंका प्रहार किया ॥ १४-१५ ॥ उन आते हुए बाणोंको वीरभद्रने शीघ्र ही तीन बाणोंसे काट डाला और वेगपूर्वक चलाये गये तीन बाणोंसे वज्रदंष्ट्रको गिरा दिया ॥ १६ ॥ इन्द्रने भी वज्रके प्रहारसे दैत्य त्रिपुरासुरके अमात्यको गिरा दिया। अनेक वीरोंका पतन हो जानेपर इन्द्रपुत्र जयन्तको मारनेकी इच्छासे तीक्ष्ण तलवार उठाये दैत्यपुत्र बलि उसके निकट आया। उसे इस प्रकार आते देखकर एक पंखयुक्त बाणसे [जयन्तने उसके] खड्गको काट डाला ॥ १७-१८ ॥ पुनः जयन्तने शीघ्र ही दैत्यपुत्र बलिपर तीन बाणोंसे प्रहार किया। उससे आहत होकर वह रक्तका वमन करते हुए मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ॥ १९ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण सेनाके नष्ट-भ्रष्ट हो जानेपर देवसमूहद्वारा पीड़ित होकर चारों ओर पलायन कर रहे दैत्योंको देखकर कुछ विजयी प्रमथगण उनके पीछे दौड़ पड़े। इस प्रकार देवताओंकी विजय होने और अपनी सेनाके पलायन कर जानेपर भी त्रिपुरमें अधिष्ठित असुर त्रिपुरासुर स्वयं ही ईश्वर [भगवान् शंकर]-से युद्ध करनेके लिये आया। पहले उन दोनोंने शस्त्र-युद्ध किया और तत्पश्चात् अस्त्रोंसे युद्ध किया ॥ २०-२२ ॥ उस दैत्य त्रिपुरासुरने वरुणास्त्र छोड़ा, जिससे भयंकरसे-भी-भयंकर वर्षा होने लगी। उस समय अत्यधिक कुहासा छा जानेके कारण कुछ भी ज्ञात नहीं हो रहा था ॥ २३ ॥ उस कोलाहलपूर्ण, भयंकर और अत्यन्त कठिनाईसे जीते जा सकनेवाले युद्धमें कभी-कभी बिजलीकी चमकसे ही अपने-परायेका ज्ञान हो पाता था ॥ २४ ॥ वर्षा और आँधीसे पीड़ित उस अपनी सम्पूर्ण सेनाको उपलवृष्टिके भयसे दसों दिशाओंमें भागते देखकर गिरिशायी भगवान् शंकरने तुरंत वायव्यास्त्र छोड़ा। [उससे उत्पन्न] महान् वायुसे विशाल बादल खण्ड-खण्ड होकर आकाशमें बिखर गये ॥ २५-२६ ॥ दैत्योंकी सम्पूर्ण सेना वायुवेगसे घूमने लगी। पक्षियोंके पंखोंसे युक्त वीरोंकी पगड़ियाँ दूर-दूरतक उड़ गयीं। कुछ रथ, अश्व और हाथीसवार सैनिक गिरकर चूर-चूर हो गये, उन्मूलित वृक्षों और लताओंने सैनिकोंको आच्छादित कर लिया ॥ २७-२८ ॥ तब दैत्य त्रिपुरासुरने पर्वतास्त्रसे उस वायुका निवारण किया और अपने तूणीरसे एक बाण लेकर उसे आग्नेयास्त्रसे अभिमन्त्रितकर धनुषको कानतक खींचकर शिवकी सेनापर छोड़ दिया। उससे सहसा सब कुछ भस्म कर डालनेवाली अंगारोंकी वर्षा होने लगी ॥ २९-३० ॥ उस समय ज्वालामालाओंसे पीड़ित सम्पूर्ण शिवसेना उसे प्रलयकाल ही मानने लगी। उन देदीप्यमान ज्वालाओंसे एक महाभयंकर पुरुषका प्राकट्य हुआ, जिसका सिर नभतलको स्पर्श कर रहा था। उसका मुख भयंकर दाढ़ोंसे युक्त था। वह भूखसे पीड़ित और उच्च स्वरमें चिल्ला रहा था ॥ ३१-३२ ॥ वह अपनी सौ योजन विस्तृत जिह्वाको लपलपा रहा था और अपनी नासिकासे छोड़ी गयी वायुके वेगसे युद्धभूमिमें हाथियोंको घुमाते हुए उस सेनाका उसी प्रकार भक्षण करने लगा, जैसे पक्षिराज गरुड़ सर्पोंका भक्षण करते हैं ॥ ३३ १/२ ॥ तब उस पुरुषसे अत्यन्त पीड़ित भगवान् शंकरकी सेना भागने लगी और शिवके पीछे छिपकर 'रक्षा करो, रक्षा करो'-ऐसा कहने लगी ॥ ३४ १/२ ॥ तब गिरिजापति शिवने उस सेनाको 'भय मत करो'-ऐसा कहकर अभयदान दिया और पर्जन्यास्त्रका

उ०ख०-अ०४४] * नारदजीके निर्देशसे भगवान् शंकरका तप करके गणेशजीको प्रसन्न करना * १२९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 प्रक्षेपण करके उस अग्निका निवारण कर दिया और एक | पार्वती निर्भयतापूर्वक रहने लगीं। तदनन्तर वह दैत्य बाणके प्रहारसे उस घोर पुरुषको गिरा दिया ॥ ३५-३६ ॥ | (त्रिपुरासुर) भी उन्हें पकड़ ले जानेकी इच्छासे तदनन्तर वह पुरुष [पुनः] उठकर शिवजीके | हिमालयपर्वतपर आया, परंतु हे मुनिश्रेष्ठ ! उसने कहीं सैनिकोंका भक्षण करने लगा, तब वे प्रमथगण भयसे | गिरिराजनन्दिनी पार्वतीको नहीं देखा ॥ ४१-४२१/२ ॥ विह्वल होकर भागने लगे ॥ ३७॥ | वहाँ भ्रमण करते हुए उसने चिन्तामणि गणेशकी वे लुढ़कते, गिरते, हाँफते हुए काँपने लगे थे और | एक मंगलमयी मूर्ति देखी, जो सहस्रों सूर्योंके सदृश शिवजी भी निःसहाय होकर गुफामें चले गये ॥ ३८ ॥ | प्रकाशमान और अनेक प्रकारके अलंकारोंसे शोभायमान षडानन स्कन्द आदि वीरोंने भी उन्हींका अनुसरण | थी। उस त्रैलोक्यसुन्दरी मूर्तिको शीघ्र ग्रहणकर वह किया। तब दैत्य त्रिपुरासुरने [मनमें] यह विचारकर कि | अपने स्थानको चला आया। उस समय वह स्तुतिपाठ पर्वतपर गिरिराजनन्दिनी पार्वती अकेली हैं, वह रणभूमि | करनेवाले वन्दीजनोंसे घिरा हुआ था और अनेक छोड़कर उनके अपहरणकी इच्छासे मन्दराचलपर गया। | प्रकारके वाद्य बज रहे थे ॥ ४३-४४१/२॥ तब दूरसे ही उसे आते देखकर गिरिराजनन्दिनी पार्वती काँपने | तदनन्तर वह सर्वत्र विजयी और बलवान् दैत्य लगीं और अपने पिताके पास जाकर बोलीं कि क्या वह | पातालमें गया। वहाँ जाते ही वह चिन्तामणिगणेशकी दैत्य मुझे हरण करके ले ही जायगा ? ॥ ३९-४०१/२ ॥ | मूर्ति उसके हाथसे अन्तर्धान हो गयी। वह एक अद्भुत- पार्वतीके उस वचनको सुनकर [पिता हिमालयने] | सी घटना घटित हुई। उस घटनाको ही अपशकुन मानकर उन्हें ले जाकर एक अत्यन्त दुर्गम गृहमें रख दिया, जो | वह पुनः अपने नगरमें वापस लौट गया और अत्यन्त स्वयं उनके अतिरिक्त सबके लिये अज्ञात था। वहाँ वे | खिन्नचित्त होकर घोर चिन्तामें पड़ गया ॥ ४५-४७॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शंकरजीकी पराजयका वर्णन' नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४३ ॥ चौवालीसवाँ अध्याय नारदजीके निर्देशसे भगवान् शंकरका तप करके गणेशजीको प्रसन्न करना व्यासजी बोले—[हे ब्रह्मन्!] तब त्रिपुरासुरसे | उन्हें देखकर भगवान् शिव वैसे ही हर्षित हो उठे, पराजित शम्भुने क्या किया? कैसे उस जयशाली दैत्य | जैसे कोई मुमूर्षु व्यक्ति अमृतको प्राप्त करके हर्षित हो त्रिपुरासुरपर उन्होंने विजय प्राप्त की? ॥ १ ॥ | उठता है। उन्होंने उन्हें आसनपर विराजमानकर उनका ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] तब भूतलको | विधिवत् पूजन किया ॥ ५ ॥ स्वाहा और स्वधासे विहीन (देवकार्य और पितृकार्यसे | चिन्तासे अत्यन्त आतुर उन शिवने उनका आलिंगन विहीन) समझकर भगवान् शम्भु मनमें बार-बार चिन्ता | करके देवताओंके हित और दैत्यके वधकी इच्छासे उनसे करने लगे कि देवगण कब कष्टसे मुक्त होंगे और अपने | कहा—॥ ६ ॥ स्थानको प्राप्त कर सकेंगे अथवा किस उपायसे इस | शिवजी बोले—[हे मुनिवर !] दैत्य त्रिपुरासुरने दुर्जय [दैत्य]-की पराजय होगी? ॥ २-३ ॥ | सम्पूर्ण देवताओंको बलपूर्वक पराजितकर उनकी दुर्दशा उनके इस प्रकार चिन्तातुर होनेपर संयोगसे [उसी | कर दी है। उसके साथ संग्राममें सभी देवताओंको समय] मुनिश्रेष्ठ नारदजी भगवान् शंकर और सभी | विफलमनोरथ होकर भागना पड़ा ॥ ७ ॥ देवताओंको देखनेके लिये आये ॥ ४ ॥ | हे ब्रह्मन् ! वे देवता दसों दिशाओंमें भाग गये हैं।

अस्त्रोंसे [टकराकर] सहस्रों खण्ड हो गये हैं॥८॥

१३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-


[बायाँ स्तम्भ]

मैं नहीं जानता कि कौन कहाँ है। मेरे भी अस्त्र उसके अस्त्रोंसे [टकराकर] सहस्रों खण्ड हो गये हैं॥८॥ ब्रह्माजी कहते हैं- [हे व्यासजी!] मुनिश्रेष्ठ नारदजीने शिवजीके वचन सुनकर तीनों लोकोंके ईश्वर शिवके पराभवको परम आश्चर्यका विषय मानते हुए उनसे कहा- ॥९॥ नारदजी बोले- हे प्रभो! आप सब कुछ जाननेवाले, सम्पूर्ण विद्याओंके स्वामी, सबके स्वामी, सब कुछ करनेवाले, सबके रक्षक, सबका संहार करनेवाले, सबका नियमन करनेवाले, कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ, अणिमादि सिद्धियोंसे युक्त तथा षड् ऐश्वर्यों*के साथ विलास करनेवाले हैं। हे देव! आप समस्त वक्ताओंमें श्रेष्ठ हैं; मैं गायनमें आसक्त होकर त्रिलोकीमें निरन्तर भ्रमण करनेवाला मुनि आपके समक्ष क्या कह सकता हूँ? फिर भी आपके वचनोंका मान रखनेके लिये विचार करके कुछ कहता हूँ॥१०-१२१/२॥ ब्रह्माजी कहते हैं- [हे व्यासजी!] इस प्रकार कहकर और क्षणभर ध्यान करके मुनि [नारदजी]-ने शिवजीसे पुनः कहा- ॥ १३॥ नारदजी बोले- हे वह्निनेत्र (जिनके नेत्रमें अग्निका निवास है)! हे पिनाकधृक् (पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले)! आपने युद्धके लिये जब प्रस्थान करनेकी कामना की थी, उस समय आपने गणोंके अधिपति गणेशजीका अर्चन नहीं किया था, इसीलिये आप पराभवको प्राप्त हुए। इस समय पहले आप विघ्नोंका निवारण करनेवाले विघ्नेश्वरका अर्चन कीजिये, उन्हें आदरपूर्वक प्रसन्न करके, उनसे वर प्राप्तकर युद्धके लिये प्रस्थान कीजिये। आप उस दैत्यको पराजित करेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ १४-१५१/२॥ उस [दैत्य]-ने भी पूर्वकालमें महान् तपस्याके


[दायाँ स्तम्भ]

द्वारा उन देव [भगवान् गणेश]-की आराधना की थी। उस तपके फलस्वरूप उन अखिल विघ्नसमूहोंके हर्ता गणेशजीने उसे वर दिया था कि महेश्वरसे अतिरिक्त और किसीसे भी तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी॥ १६-१७॥ इसलिये हे गिरिशायी शिव! आप उसके इच्छानुसार गमन करनेवाले त्रिपुर (स्वर्ण, रजत और लौहनिर्मित तीन विमानों)-को एक बाणसे विदीर्ण कर दीजिये- यही आपकी विजयका उपाय कहा गया है॥ १८॥ ब्रह्माजी बोले- गजमुख गणेशजीद्वारा कही गयी वाणीको स्मरणकर और मुनिश्रेष्ठ नारदजीद्वारा [कहे गये] उपायका श्रवणकर गिरिशायी भगवान् शंकर अत्यन्त हर्षित हुए और उन्होंने पुनः उनसे कहा- ॥ १९॥ शिवजी बोले- हे ब्रह्मन्! आपने सत्य कहा है। हे मुने! आपकी बातसे मुझे पूर्वकालमें [गणेशजीद्वारा] उपदिष्ट दो मन्त्रोंका स्मरण हो आया है। उनमेंसे एक षडक्षर और दूसरा एकाक्षर मन्त्र है। वे दोनों [मन्त्र] संकटका हरण करनेवाले हैं। युद्धमें विशेष रूपसे संलग्न चित्तवाला होनेके कारण न तो मैं उन दोनों मन्त्रोंका जप कर सका, न सम्यक् रूपसे स्मरण ही कर सका॥ २०-२१॥ सम्पूर्ण विघ्नोंका हरण करनेवाले, सबके कारणस्वरूप, सृजन-पालन और संहार करनेवाले गजानन भगवान् विनायकका मैंने स्मरण भी नहीं किया था॥ २२॥ [नारद] मुनि बोले- हे महादेव! उन महान् देव गजानन गणेशजीको आप प्रसन्न कीजिये॥ २२१/२॥ ब्रह्माजी कहते हैं- [हे व्यासजी!] तब नारदजीको विदाकर भगवान् शिव तपस्या करनेके लिये चले गये॥ २३॥ उन्होंने दण्डकारण्यदेशमें पद्मासनपर स्थित होकर बलपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके [गणेशजीके] ध्यानमें


[पाद-टिप्पणी / Footnote]

* सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः। अनन्तशक्तिश्च महेश्वरस्य यन्मानसैश्वर्यमवैति वेदः॥ (शिवपुराण, विद्येश्वरसंहिता १८। १२) अर्थात् सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादिबोध, स्वतन्त्रता, नित्य अलुप्त शक्ति आदिसे संयुक्त होना और अपने भीतर अनन्त शक्तियोंको धारण करना-महेश्वरके इन छः प्रकारके मानसिक ऐश्वर्योंको केवल वेद जानता है।

उ०ख०-अ०४५ ] * शिवकृत गणपतिस्तुति * १३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ - उपरि भाग] तत्पर होकर [गणेशमन्त्रका] जप किया ॥ २४ ॥ [इस प्रकार] उन भगवान् शंकरने सौ वर्षोंतक उग्र तप किया, तब उनके मुखकमलसे एक श्रेष्ठ पुरुष आविर्भूत हुआ ॥ २५ ॥ उसके पाँच मुख, दस भुजाएँ, मस्तकपर चन्द्रमा, गलेमें मुण्डोंकी माला, सर्पोंके आभूषण, [सिरपर] मुकुट और [हाथोंमें] बाजूबन्द शोभित हो रहे थे। उसकी [श्रीविग्रहकी] प्रभा चन्द्रमाके समान थी ॥ २६ ॥ उसकी कान्ति अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाकी कान्तिको तिरस्कृत कर रही थी। उसने [अपनी दसों भुजाओंमें] दस आयुध धारण कर रखे थे। उसकी कान्तिसे धर्षित उन भगवान् शिवने उस उग्र स्वरूपवाले [श्रेष्ठ पुरुष]- को अपने सम्मुख स्थित देखा ॥ २७ ॥ उस दूसरे पंचमुख शिवके समान पंचमुख विनायकको देखकर भगवान् शिवने विचार किया कि क्या मैं ही दो शरीरवाला हो गया हूँ ! ॥ २८ ॥ अथवा क्या मेरा ही रूप धारण करके यह त्रिपुरासुर आ गया है? क्या तैंतीस करोड़ देवताओंमें कोई दूसरा भी पाँच मुखवाला है? ॥ २९ ॥

[दायाँ स्तम्भ - उपरि भाग] अथवा मैंने यह कोई दीर्घकालिक स्वप्न देख लिया है या सम्पूर्ण विघ्नोंका हरण करनेवाले जिन [इष्ट-] देवका मैं रात-दिन ध्यान करता हूँ, वे गजानन ही मुझे वर देनेके लिये आ गये हैं ! ॥ ३०१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] उन [शिव]- के इस प्रकारके वचन सुनकर गजानन गणेशजीने कहा— हे देव ! आप अपने अन्तःकरणमें जिसका ध्यान करते हैं, मैं वही विघ्नहर्ता विभु हूँ। मेरे स्वरूपको देवता, ऋषि और चार मुखोंवाले ब्रह्माजी भी नहीं जानते हैं ॥ ३१-३२ ॥ उपनिषदोंसहित वेद भी मेरे स्वरूपको नहीं जानते तो षट्शास्त्रियों (षड्दर्शन¹के जाननेवालों)-की तो बात ही क्या ? मैं ही अखिल भुवनोंका सृजन, रक्षण और संहार करनेवाला हूँ ॥ ३३ ॥ ब्रह्मासे लेकर त्रिगुण (सत्त्व, रज, तम)-से युक्त सम्पूर्ण स्थावर-जंगमात्मक प्राणियोंका मैं ही स्वामी हूँ। तुम्हारी इस तपस्यासे सन्तुष्ट होकर मैं तुम्हें वर देनेके लिये यहाँ आया हूँ। हे महादेव ! आप जितने वरदान चाहते हों, उन्हें मुझसे माँग लें, मैं आपपर सन्तुष्ट हूँ, अतः वे सभी वर प्रदान करूँगा, इसमें सन्देह न करो ॥ ३४ ॥

[मध्य भाग] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'तपोवर्णन' नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४४ ॥ पैंतालीसवाँ अध्याय शिवकृत गणपतिस्तुति

[बायाँ स्तम्भ - निचला भाग] [व्यास] मुनि बोले—[हे ब्रह्मन् !] तब प्रसन्न हुए विघ्नहर्ता देवाधिदेव विघ्नेश्वरके भगवान् शंकरको वर देनेके लिये उत्सुक होनेपर उन सदाशिवने क्या-क्या वर माँगे थे? ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] गणेशजीके वचनको सुनकर उन वर प्रदान करनेवाले अपने ही सदृश स्वरूपवाले (पंचमुखस्वरूपवाले) गजाननकी वन्दना करके शिवजीने ये वाक्य कहे— ॥ २ ॥

[दायाँ स्तम्भ - निचला भाग] शिवजी बोले—हे देव ! [आपका दर्शनकर] आज मेरे दसों नेत्र धन्य हो गये, आज आपका पूजनकर मेरी [दसों] भुजाएँ धन्य हो गयीं। आपको नमन करनेसे [मेरे] पाँचों सिर धन्य हो गये और आपकी स्तुति करनेसे मेरे पाँचों मुख धन्य हो गये ॥ ३ ॥ पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश (पंच महाभूत); गन्ध, रस, स्पर्श, रूप और शब्द (पंचतन्मात्राएँ); मन एवं इन्द्रियाँ², दिशाएँ, गणनात्मक काल (समय),

[पाद-टिप्पणी] १. 'दृश्यते अनेन इति दर्शनम्' अर्थात् 'दर्शन' शब्दका तात्पर्य है कि जिस शास्त्र या चिन्तनप्रक्रियाद्वारा किसी वस्तुके तात्त्विक-स्वरूपको जाना जाय। दर्शन छः हैं—१. मीमांसा, २. वेदान्त, ३. न्याय, ४. वैशेषिक, ५. सांख्य और ६. योग। २. इन्द्रियाँ दो प्रकारकी होती हैं—१. ज्ञानेन्द्रियाँ और २. कर्मेन्द्रियाँ। ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं—१. श्रोत्र, २. त्वक्, ३. चक्षु, ४. रसना और घ्राण। कर्मेन्द्रियाँ भी पाँच हैं—१. वाक्, २. पाणि, ३. पाद, ४. पायु और उपस्थ। इस प्रकार कुल दस इन्द्रियाँ हैं।

१३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गन्धर्व, यक्ष, पितर, मनुष्य, देवर्षि, सभी देवगण, ब्रह्मा, | सभीके सम्पूर्ण कार्योंमें, चाहे वे वैदिक हों या लौकिक, इन्द्र, रुद्र१, वसुगण२, साध्यगण३—सम्पूर्ण स्थावर- | शुभ हों या अशुभ—सबमें आप ही प्रयत्नपूर्वक सर्वप्रथम जंगम प्राणी आपसे ही उत्पन्न हुए हैं॥ ४-५॥ | अर्चनीय हैं। हे देव! चूँकि आप यक्षों, विद्याधरों और हे अनन्यबुद्धे! आप रजोगुणका आश्रय लेकर इस | सर्पोंसहित सभी लोगोंके मंगल (हित, कल्याण, क्षेम)- विश्वका सृजन करते हैं, सत्त्वगुणका आश्रय लेकर | के अधिपति हैं और [विशेषरूपसे] अपने भक्तोंका इसकी रक्षा करते हैं और तमोगुणका आश्रय लेकर | मंगल करनेवाले हैं, इसीलिये आप मंगलमूर्ति [कहे इसका संहार करते हैं। हे गणेश! आप शाश्वत, निष्काम | जाते] हैं॥ १०—१११/२॥ और सम्पूर्ण कर्मोंके साक्षी हैं॥ ६॥ | हे ईश! पूर्वकालमें दैत्यश्रेष्ठ [त्रिपुरासुर]-के साथ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी!] तदनन्तर मैंने | युद्धमें आपका अर्चन, आपका स्मरण और आपका शिवजीकी आज्ञासे उन भगवान् गणेशसे जो कुछ कहा | वन्दन न करनेके कारण मैं पराभवको प्राप्त हुआ, था और जो उनका नाम रखा; हे महामते! उसे सुनिये। | इसलिये मैं आपके चरणोंकी शरणमें आया हूँ। हे [मैंने गणेशजीसे कहा—] मातृकाओं४में जो प्रथम बीज | सर्वशक्तिमान्! आप मेरे अपराधको क्षमा करें और अक्षर 'ॐ' है, जो कि श्रुतिका मूल है, वही आपका | सम्पूर्ण युद्धोंके समय मुझे जय प्रदान करें॥ १२-१३॥ नाम है; क्योंकि आप गणोंके ईश हैं, इसलिये आपका | हे देव! जो आपका सर्वथा भजन नहीं करते, वे 'गणेश' नाम हो। गणाधिपतिके द्वारा 'ओम्'—इस | मूर्ख और दरिद्र होंगे। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक आपका प्रकार कहे जानेपर भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये और | भजन करते हैं, वे सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाली उन्होंने ये वरदान प्रदान किये—॥ ७—८१/२॥ | सिद्धि प्राप्त करेंगे॥ १४॥ शिवजी बोले—हे ईश! जो [अपने] सम्पूर्ण | ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी!] यह सुनकर कार्यों [-के आरम्भ]-में आपका स्मरण करता है, उसे | अखिलवाक्यार्थविशारद गणेशजीने शिवजीसे कहा कि कार्यसिद्धिमें अविघ्नताकी प्राप्ति होती है॥ ९॥ | हे उमेश! आप जब-जब मेरा स्मरण करेंगे, तब-तब मैं बिना आपकी स्मृतिके कृमि-कीटोंको भी अपनी | [शीघ्र ही] आपके पास आ जाऊँगा॥ १५॥ मनोकामनाकी सिद्धि नहीं प्राप्त होती। शैव, आपके भक्त | हे महेश्वर! आप मेरे नामके बीजमन्त्र५से एक बाणको (गणेश-उपासक), वैष्णव, शाक्त और सूर्योपासक— | अभिमन्त्रित करके उससे उस दैत्य त्रिपुरासुरसहित उसके १. रुद्र एकादश हैं— हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः। वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा॥ मृगव्याधश्च शर्वश्च कपाली च विशांपते। एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः॥ (हरिवंशपुराण १।३।५१-५२) हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली—ये ग्यारह रुद्र कहलाते हैं। २. वसु आठ हैं— धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः॥ (महा० आदि० ६६।१८) धर, ध्रुव, सोम, अहः, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—इन आठोंको वसु कहते हैं। इनमें अनल (अग्नि) वसुओंके राजा, देवताओंको हवि पहुँचानेवाले और भगवान्के मुख माने जाते हैं। ३. साध्यदेवता बारह हैं— मनोऽनुमन्ता प्राणश्च नरो यानश्च वीर्यवान्॥ चित्तिर्हयो नयश्चैव हंसो नारायणस्तथा। प्रभवोऽथ विभुश्चैव साध्या द्वादश जज्ञिरे॥ (वायुपुराण ६६।१५-१६) मन, अनुमन्ता, प्राण, नर, यान, चित्ति, हय, नय, हंस, नारायण, प्रभव और विभु—ये बारह साध्यदेवता हैं। ४. 'अ' से 'क्ष' तक कुल ५२ मातृकाएँ हैं। 'ॐ' = अ+उ+म्' होने से 'ॐ' को प्रथम बीजाक्षर कहा गया है। ओंकारमाद्यं प्रवदन्ति संतो वाचः श्रुतीनामपि यं गृणन्ति। गजाननं देवगणान्ताङ्घ्रिं भजेऽहमर्धेन्दुकृतावंतसम्॥ ५. गणेशजीका बीजमन्त्र 'गं' है।

उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १३३ तीनों पुरोंको मेरे प्रतापसे गिराकर भस्मसात् कर दें ॥ १६ ॥ प्रकारके दान देकर वरदाता देव गणेशजीका भलीभाँति तदनन्तर भक्तिसे परितुष्ट चित्तवाले गणाधिपति पूजन करके उन्हें पुनः नमस्कार किया ॥ २० ॥ गणेशजीने उन विनम्र शिवजीको सम्यग् रूपसे अपने तब [देवताओं, मुनियों, सिद्धों और ब्राह्मणों-] सहस्र नाम बतलाये, जो सभी लोगोंके लिये विजय प्रदान सभीने कहा कि यह मणिपूर* [गणपति-क्षेत्रके रूपमें] करनेवाले और मनोकामना पूर्ण करनेवाले हैं ॥ १७ ॥ सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात हो। भगवान् गणेश तथा अन्य और उन्होंने यह भी कहा कि [हे शिव!] युद्धके सबके द्वारा 'तथास्तु' कहे जानेके उपरान्त वे देवगण समय आप इसका पाठ करें, इससे आप शीघ्र ही और गणाधिपति गणेशजी अन्तर्धान हो गये ॥ २१ ॥ दैत्योंका वध कर देंगे। तीनों सन्ध्याओंमें इसका जप मुनिगणों और देवताओंसहित गणेशजीके अन्तर्धान करनेसे मनुष्योंकी सभी कामनाएँ और सम्पूर्ण अभीष्ट हो जानेपर अपने गणोंसे घिरे हुए शिवजी भी अपने कार्य सिद्ध हो जाते हैं ॥ १८ ॥ निवास-स्थलको चले आये; जो गन्धर्वों, यक्षगणों और गजानन गणेशजीके वचन सुनकर शिवजीने उनका देवांगनाओंसे घिरा हुआ था। वहाँ उन्होंने परम प्रसन्नतापूर्वक सम्यक् रूपसे पूजन किया और अत्यन्त हर्षित हुए। गिरिराजनन्दिनी पार्वतीसे अपना सारा वृत्तान्त कहा। उन्होंने महागणेशकी [मूर्तिकी] स्थापना की और शीघ्र शिवजीके मुखसे निकली उस अमृतमयी वाणीको सुनकर ही उनके सुदृढ़ एवं उच्च प्रासाद (मन्दिर)-का निर्माण पत्नियोंसहित सभी देवेश्वर, मुनिगण, मुनिपत्नियों और करा दिया ॥ १९ ॥ योगीश्वर प्रसन्न हो गये, उन्होंने त्रिपुरासुरको मरा हुआ तदनन्तर शिवजीने देवताओं, मुनियों और सिद्धगणोंको और भगवान् शिवके अनुग्रहसे अपने अधिकारोंको पुनः भलीभाँति तृप्त करके और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको विविध प्राप्त हुआ मान लिया ॥ २२-२३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शिवको वरदान' नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥ छियालीसवाँ अध्याय श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र व्यासजीने पूछा—सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेमें विघ्नशान्तिका उपाय पूछा। भगवान् शिवद्वारा की गयी तत्पर रहनेवाले पितामह ! गणेशजीने भगवान् शिवके उस पूजासे संतुष्ट होकर महागणपतिने स्वयं उनसे अपने प्रति अपने सहस्र नामोंका उपदेश किस प्रकार किया, इस सहस्रनामका वर्णन किया। यह समस्त विघ्नोंका यह मुझे बताइये ॥ १ ॥ एकमात्र हरण करनेवाला तथा सम्पूर्ण मनोवांछित ब्रह्माजीने कहा—ब्रह्मन् ! कहते हैं, पूर्वकालमें फलोंको देनेवाला है ॥ ३-५ ॥ त्रिपुरारि महादेवजीने जब त्रिपुरविजयके लिये उद्योग विनियोग किया, उस समय पहले गणेशजीकी अर्चना न करनेके अस्य श्रीमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य महागणपति- कारण वे विघ्नोंसे घिर गये ॥ २ ॥ ऋषिः। अनुष्टुप् छन्दः। महागणपतिर्देवता। गं बीजम्। हुं तदनन्तर विघ्नका क्या कारण है, यह मन-ही-मन शक्तिः। स्वाहा कीलकम्। चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धयर्थे जपादौ निश्चय करके शिवजीने भक्तिभावसे महागणपतिकी विनियोगः। विधिपूर्वक पूजा की और उन अपराजित देवने उनसे इस 'श्रीमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्र-मन्त्र' के 'महा- *महाराष्ट्रके पूना जिलेमें पूनासे ३१ मीलकी दूरीपर स्थित 'राजणगाँव' को मणिपूरक्षेत्र कहा जाता है। यह अष्ट गणपति-क्षेत्रोंमेंसे एक है। यहाँके श्रीविग्रहको 'महागणपति' कहते हैं। ये अष्ट विनायकोंमेंसे एक हैं। मन्दिरके तहखानेमें रखी मूर्ति 'महोत्कट' कहलाती है, उसके दस सूँड़ और बीस भुजाएँ हैं। कहा जाता है कि मुस्लिम आक्रांताओंसे रक्षाके लिये इसे छिपाकर रखा गया था।

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१३४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गणपति' ऋषि हैं, 'अनुष्टुप्' छन्द है, 'महागणपति' देवता | अग्रभागमें माणिक्य-निर्मित कलश ले रखा है, जिसके हैं, 'गं' बीज है, 'हुं' शक्ति है एवं 'स्वाहा' कीलक है। मुखभागसे रत्नोंकी वर्षा हो रही है और जिसके द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चार पुरुषार्थोंकी सिद्धिके वे अपने धनार्थी साधक भक्तोंको तृप्त कर रहे हैं। लिये जप आदिमें इसका विनियोग होता है। कपोलोंपर झरते हुए मदसे वे विह्वल हैं। उनके मस्तकपर ऋष्यादिन्यास मणिमय मुकुट शोभा देता है तथा वे सम्पूर्ण आभूषणोंसे ॐ महागणापतये ऋषये नमः, शिरसि। अनुष्टुप्छन्दसे विभूषित हैं। ऐसे महागणपतिकामैं ध्यान करता हूँ। नमः, मुखे। महागणपतिदेवतायै नमः, हृदि। गं बीजाय नमः, इस तरह ध्यान करके 'ॐ गणेश्वरः' इत्यादिसे गुह्ये। हुं शक्तये नमः, पादयोः। स्वाहा कीलकाय नमः, नाभौ। आरम्भ होनेवाले 'श्रीमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्र' का -इन छः वाक्योंको पृथक्-पृथक् पढ़कर क्रमशः पाठ करना चाहिये- मस्तक, मुख, हृदय, गुदाभाग, दोनों चरण तथा नाभिका ध्यान स्पर्श दाहिने हाथसे करे। ॐ सच्चिदानन्दस्वरूप, १. गणेश्वरः-आकाशादि ध्यान प्रपंचके समूहको 'गण' कहते हैं, वह गण उनका हस्तीन्द्राननमिन्दुचूड़मरुणच्छायं त्रिनेत्रं रसा- स्वरूप है और वे उस गणके ईश्वर हैं, इसलिये जिन्हें दाश्लिष्टं प्रियया सपद्मकरया स्वाङ्कस्थया संततम्। 'गणेश्वर' कहा गया, वे श्रीगणेश; २. गणक्रीडः*- बीजापूरगदाधनुस्त्रिशिखयुक्चक्राब्जपाशोत्पल- गणक्रीड-नामक गुरुस्वरूप; अथवा आकाशादि गणके व्रीह्यग्रस्वविषाणरत्नकलशान् हस्तैर्वहन्तं भजे॥ भीतर प्रवेश करके क्रीड़ा करनेके कारण 'गणक्रीड' जिनका गजराजके समान मुख है; जिनके मस्तकपर नामसे प्रसिद्ध; ३. गणनायः-गणोंके नाथ एवं जिनका चन्द्रमाका मुकुट है; जिनकी अंगकान्ति अरुण है; जो गणन-गुणोंकी गणना करना मंगलमय है, वे भगवान् तीन नेत्रोंसे सुशोभित हैं; जिन्हें हाथमें कमल धारण गणपति; ४. गणाधिपः-आदित्यादि गणदेवताओंके करनेवाली अंकगत प्रिया (सिद्धलक्ष्मी)-का परिरंभग अधिपति; ५. एकदंष्ट्रः-भूमिका उद्धार अथवा जगत्का सदा प्राप्त है तथा जो अपने दस हाथोंमें क्रमशः बीजापुर नाश करनेके निमित्त जिनकी एक ही दंष्ट्रा (दाढ़) है, (बिजौरा नीबू या अनार), गदा, धनुष, त्रिशूल, चक्र, वे भगवान् गणेश; ६. वक्रतुण्डः-वक्र-टेढ़े तुण्ड- कमल, पाश, उत्पल, धानकी बाल तथा अपना ही टूटा शुण्ड-दण्डसे युक्त; ७. गजवक्त्रः-गज अर्थात् हाथीके दाँत धारण करते हैं एवं शुण्डमें रत्नमय कलश लिये हुए समान मुखवाले; ८. महोदरः-अनन्तकोटि ब्रह्माण्डको हैं; उन गणपतिकामैं भजन (ध्यान) करता हूँ। अपने भीतर रखनेके कारण महान् उदरवाले ॥ ६ ॥ गण्डपालीगलद्दानपूरलालसमानसान् । ९. लम्बोदरः-ब्रह्माण्डके आलम्बनरूप उदरवाले; द्विरेफान् कर्णतालाभ्यां वारयन्तं मुहुर्मुहुः ॥ १०. धूम्रवर्णः-धूम्रके समान वर्णवाले; अथवा वायुका कराग्रधृतमाणिक्यकुम्भवक्त्रविनिर्गतैः । बीज धूम्रवर्णका है, तत्स्वरूप होनेके कारण गणेशजी भी रत्नवर्षैः प्रीणयन्तं साधकान् मदविह्वलम् । 'धूम्रवर्ण' कहे गये हैं; ११. विकटः-कट अर्थात् माणिक्यमुकुटोपेतं सर्वाभरणभूषितम् ॥ आवरणसे रहित विभुस्वरूप; १२. विघ्ननायकः- गणेशजीके गण्डस्थलसे मदकी धारा बह रही है। अभक्तसमुदायके प्रति विघ्नोंका नयन करनेवाले; या उसका आस्वादन करनेके लिये भ्रमरोंकी भीड़ टूटी विघ्नोंके अधिपति; अथवा प्राणियोंका विहनन एवं नयन पड़ती है। उन भ्रमरोंको वे अपने ताड़पत्रके समान करनेवाले; १३. सुमुखः-मुखका अर्थ है-आरम्भ; कानोंद्वारा बारम्बार हटाते हैं। उन्होंने अपने शुण्डदण्डके जिनसे सम्पूर्ण आरम्भ सुन्दर या शोभन होते हैं, वे; * गणेशके शिष्य गणक्रीड हैं, जो विकटके गुरु हैं, विकटके शिष्य विघ्ननायक हैं। ये तीनों गुरु एवं गणेशरूप कहे गये हैं (खद्योतभाष्य)।

उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १३५


अथवा सुन्दर मुखवाले; १४. दुर्मुखः — जिनके मुखका स्पर्श करना दुष्कर है; अथवा अग्नि और सूर्यके रूपमें जिनकी ओर देखना अत्यन्त कठिन है, वे; १५. बुद्धः — नित्य बुद्धस्वरूप अविद्यावृत्तिके नाशक; अथवा बुद्धावतारस्वरूप; १६. विघ्नराजः — विघ्नोंके साथ विराजमान; अथवा विघ्नोंके राजा; किंवा जो विघ्न-भक्ताधीन तथा राजा हैं, वे भगवान् गणेश; १७. गजाननः — गजों-हाथियोंको अनुप्राणित — प्राणशक्तिसे सम्पन्न करनेवाले ॥ ७ ॥

१८. भीमः — दुष्टोंके लिये भयदायक होनेसे 'भीम' नामसे प्रसिद्ध; १९. प्रमोदः — अभीष्ट वस्तुके लाभसे होनेवाले सुखका नाम है — 'प्रमोद', तत्स्वरूप; २०. आमोदः — प्रमोदसे पहले अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिके निश्चयसे जो सुख होता है, उसे 'आमोद' कहते हैं, ऐसे आमोदस्वरूप; २१. सुरानन्दः — देवताओंके लिये आनन्दप्रद; २२. मदोत्कटः — गण्डस्थलसे झरनेवाले मदके कारण उत्कट; अथवा मदसे आवरणका उत्क्रमण करनेवाले; २३. हेरम्बः — 'हे' का अर्थ है — शंकर तथा 'रम्ब' का अर्थ है — शब्द। शैवागमके प्रवर्तक होनेसे 'हेरम्ब' नामवाले; अथवा उद्यम-शौर्यसे युक्त होनेके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध; २४. शम्बरः — 'शम्' अर्थात् सुख है वर — श्रेष्ठ जिनमें, वे; २५. शम्भुः — जिनसे 'शम्' अर्थात् कल्याणका उद्भव होता है, वे; २६. लम्बकर्णः — भक्तजन जहाँ-कहीं भी गणेशजीका आवाहन या स्तवन आदि करते हैं, वहीं वे जैसे दूर न हों, इस तरह सुन लेते हैं। इसलिये लम्बे-सुदूरतक सुननेवाले कान हैं जिनके, वे; २७. महाबलः — जिनके अनुग्रहसे बलासुर महान् हो गया, वे; अथवा महान् बलशाली ॥ ८ ॥

२८. नन्दनः — समृद्धिके हेतुभूत; २९. अलम्पटः — पर्याप्त पट-वस्त्रोंसे समृद्ध; अथवा पट ही जिनका अलंकार है, वे; ३०. अभीरुः — भयशून्य; अथवा भीरु स्वभाववाली स्त्रीसे रहित; ३१. मेघनादः — मेघगर्जनाके समान नाद या सिंहनाद करनेवाले; अथवा मेघोंके नाशक; ३२. गणञ्जयः — शत्रु-समूहोंपर अनायास विजय पानेवाले; ३३. विनायकः — 'वि' अर्थात् पक्षिरूप जीव-समुदायके नेता या नायक; ३४. विरूपाक्षः — विरूप-विकट दीखनेवाले अग्नि, सूर्य तथा चन्द्ररूप नेत्रोंसे युक्त; ३५. धीरशूरः — धैर्य और शौर्यसे सम्पन्न; ३६. वरप्रदः — अपने भक्तजनोंको उत्तम एवं मनोवांछित वर प्रदान करनेवाले ॥ ९ ॥

३७. महागणापतिः — गुल्म आदि सेना-भेदोंको 'गण' कहते हैं; वे जिनकी अधीनतामें महान्-बहु-संख्यक हैं, वे; अथवा महागर्णोंके अधिपति; ३८. बुद्धिप्रियः — निश्चयात्मिका बुद्धि जिनको प्रिय है, वे; अर्थात् संशयनिवारक; ३९. क्षिप्रप्रसादनः — भक्तोंद्वारा ध्यान किये जानेपर उनके ऊपर शीघ्र प्रसन्न होनेवाले; ४०. रुद्रप्रियः — ग्यारहों रुद्रोंके प्रिय; ४१. गणाध्यक्षः — छत्तीस तत्त्वरूप गणसमुदायके पालक; ४२. उमापुत्रः — पार्वतीके पुत्र (उमाका पुन्नामक नरकलोकसे उद्धार करनेवाले); ४३. अघनाशनः — लम्बोदर या महोदर होनेपर भी स्वल्पमात्र नैवेद्यसे तृप्त होनेवाले (अघन — स्वल्प है अशन — भोजन जिनका, वे); अथवा अघके फलस्वरूप दुःखोंका नाश करनेवाले ॥ १० ॥

४४. कुमारगुरुः — सनत्कुमारस्वरूप होते हुए विद्याका उपदेश करनेके कारण गुरु; अथवा कुमार कार्तिकेयसे भी पहले उत्पन्न होनेके कारण उनके ज्येष्ठ भ्राता; ४५. ईशानपुत्रः — भगवान् शंकरके आत्मज; ४६. मूषकवाहनः — मूषक (चूहे)-को वाहन बनानेके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध; ४७. सिद्धिप्रियः — अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ जिन्हें प्रिय हैं, वे; ४८. सिद्धिपतिः — अणिमा आदि आठ सिद्धियोंके पालक; ४९. सिद्धः — गोरक्षनाथ आदि सिद्धस्वरूप; ५०. सिद्धिविनायकः — भक्तोंतक सिद्धिका नयन करनेवाले (भक्तोंको सिद्धि प्राप्त करानेवाले) ॥ ११ ॥

५१. अविघ्नः — अविभाव; अर्थात् पशुताका हनन (हरण) करनेवाले; अथवा विघ्नोंसे रहित; ५२. तुम्बुरुः — तुम्ब (अलाबू या लौकी)-के द्वारा जो रव करता है, वह 'तुम्बुरु' है। तुम्बुरु नाम है — वीणाका। वीणापर गणपतिका यशोगान होनेसे वे 'तुम्बुरु' नामसे प्रसिद्ध हैं; ५३. सिंहवाहनः — मोर और मूषककी भाँति सिंहको भी

१३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] वाहन बनानेवाले; अथवा सिंहवाहिनी देवीसे अभिन्न होनेके कारण सिंहवाहन; ५४. मोहिनीप्रियः—मोहिनीपति शिवसे अभिन्न; ५५. कटंकटः—'कट' का अर्थ है— आवरण या अज्ञान; गणेशजी ज्ञान प्रदान करके उस अज्ञानको भी ढक देते या मिटा देते हैं। इसलिये 'कटंकट' नामसे प्रसिद्ध हैं; ५६. राजपुत्रः—राजा वरेण्यके यहाँ पुत्रवत् आचरण करनेवाले; अथवा राजा— चन्द्रमाको पुत्रवत् माननेवाले; ५७. शालकः—'श' 'परोक्ष' अर्थमें है और 'अलक' शब्द 'केश' या अंशका वाचक है। जिनका एक अंश भी प्रत्यक्ष नहीं है, जो अतीन्द्रिय हैं, वे 'शालक' हैं; अथवा शालित- शोभित होते हैं, इसलिये 'शालक' हैं; ५८. सम्मितः— सर्वव्यापी होते हुए भी अंगुष्ठमात्रसे मित; ५९. अमितः— अणु, स्थूल, ह्रस्व और दीर्घ—चारों प्रकारके प्रमाणोंसे मित न होनेवाले ॥ १२ ॥ ६०. कूष्माण्डसामसम्भूतः—'कूष्माण्डैर्जुहु- यात्।'—इस कूष्माण्ड-होमविधिमें जो प्रसिद्ध मन्त्र या साम हैं, वे गणेशजीकी विभूति हैं। अतएव वे उक्त नामसे प्रसिद्ध हैं; ६१. दुर्जयः—बलवान् दैत्य जिन्हें मनसे भी जीत नहीं सकते, ऐसे; ६२. धूर्जयः— जगच्चक्रकी धुरीको अनायास वहन करनेवाले; ६३. जयः—जयस्वरूप; अथवा जय—महाभारत आदि इतिहास-पुराण जिनके रूप हैं, वे; ६४. भूपतिः— पृथ्वीके पालक, अथवा भूपति-नामसे प्रसिद्ध अग्निभ्राता; ६५. भुवनपतिः—समस्त भुवनोंके स्वामी; अथवा उक्त नामवाले अग्निभ्राता; ६६. भूतानाम्पतिः—समस्त भूतोंके पालक अथवा भूतपतिनामक अग्निभ्राता; ६७. अव्ययः— अविनाशी ॥ १३ ॥ ६८. विश्वकर्ता—संसारके स्रष्टा; ६९. विश्व- मुखः—जिनसे विश्वका मुख—आरम्भ हुआ है, वे; अथवा विश्व जिनके मुखमें है; या जो मुखकी भाँति विश्वकी वृत्तिके हेतु हैं, वे गणेश; ७०. विश्वरूपः— सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंच जिनका ही रूप है, वे; अथवा त्वष्टा-प्रजापतिके पुत्र देवपुरोहित विश्वरूपसे अभिन्न; ७१. निधिः—आकाश आदि सम्पूर्ण जगत्समूह जिनमें

[दायाँ स्तम्भ] पूर्ण रूपसे आहित या धृत है, वे; अथवा महापद्म आदि नव निधिस্বরূপ; ७२. घृणिः—सूर्यस्वरूप; ७३. कविः— सृष्टिरूप काव्यके कर्ता; ७४. कवीनामृषभः—कवियोंमें श्रेष्ठ; ७५. ब्रह्मण्यः—ब्राह्मण, वेद, तप तथा ब्रह्माके प्रति सद्भाव रखनेवाले; ७६. ब्रह्मणस्पतिः—ब्रह्म अर्थात् वाणीके अधिपति ॥ १४ ॥ ७७. ज्येष्ठराजः—'ज्येष्ठ'-संज्ञक साममें राजमान; ७८. निधिपतिः—नव निधियोंके परिपालक; ७९. निधिप्रियपतिप्रियः—निधियोंको प्रिय माननेवाले जो कुबेर आदि राजा हैं, उनके द्वारा भी उपास्य; ८०. हिरण्मयपुरान्तःस्थः—हिरण्यपुर-दहराकाशके मध्यमें विराजमान; (चिन्मय ब्रह्मके निवासस्थान अन्तर्हृदयमें विद्यमान); ८१. सूर्यमण्डलमध्यगः—सूर्यमण्डलके भीतर स्थित ॥ १५ ॥ ८२. कराहतिध्वस्तसिन्धुसलिलः—जिन्होंने अपने शुण्डदण्डके आघातसे समुद्रके जलको विध्वस्त (निष्कासित) कर दिया था, वे; ८३. पूषदन्तभित्— वीरभद्ररूपसे दक्ष-यज्ञमें पूषाके दाँतको तोड़नेवाले; ८४. उमाङ्ककेलिकुतुकी—उमाके अंकमें बैठकर बालोचित क्रीड़ा करनेका कौतूहल रखनेवाले; ८५. मुक्तिदः— कारागारकी बेड़ीसे छुड़ानेवाले तथा मोक्षदाता; ८६. कुलपालनः—वंशके तथा कौलतन्त्रके भी पालक ॥ १६ ॥ ८७. किरीटी—मस्तकपर मुकुट धारण करनेवाले; अथवा अर्जुनस्वरूप; ८८. कुण्डली—कानोंमें कुण्डल पहननेवाले; अथवा शेषनागरूपधारी; ८९. हारी—मुक्ता आदि मणियोंकी माला धारण करनेवाले; अथवा अत्यन्त मनोहर; ९०. वनमाली—कन्धेसे लेकर पैरोंतक लटकनेवाली 'वनमाला' धारण करनेवाले; ९१. मनोमयः—अपने संकल्पद्वारा निर्मित एक शरीर धारण करनेवाले; ९२. वैमुख्यहतदैत्यश्रीः—जिनके विमुख हो जानेके कारण दैत्योंकी लक्ष्मी नष्ट हो गयी, वे; ९३. पादाहतिजितक्षितिः—अपने पैरोंके आघातसे पृथ्वीको नीचे झुका देनेवाले ॥ १७ ॥ ९४. सद्योजातस्वर्णमुञ्जमेखली—तत्काल तैयार की गयी स्वर्णमय मुंजकी मेखलासे मण्डित; ९५.