भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 124, कुल 656 में से

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पृष्ठ 124

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शीर्षक (Header): १२२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-


बायाँ स्तम्भ (Left Column)

[इस विषयमें] मैं कोई अन्य उपाय नहीं देखता हूँ। इसलिये मेरे वचनका पालन करो ॥ ३१ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी!] नारदमुनिने ऐसा कहकर और उन सबको उस (एकाक्षर) मन्त्रका उपदेश देकर वीणापर [भगवन्नामका] गान करते हुए तत्क्षण वहाँसे प्रस्थान कर दिया ॥ ३२ ॥ तदनन्तर वे सभी श्रेष्ठ देवता गणेशजीके ध्यानमें संलग्न हो गये। उनमेंसे कुछ एक पैरपर, कुछ पद्मासनमें और कुछ वीरासनमें स्थित थे; कुछने अपने नेत्र बन्द कर रखे थे। वे सब श्वासपर नियन्त्रण करके निराहार रहते हुए मुनिद्वारा उपदिष्ट मन्त्रका जप करने लगे ॥ ३३-३४ ॥ तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर करुणासागर गजानन गणेशजी देवताओंके दीर्घकालसे चल रहे अनुष्ठानको

(मध्य में चित्र)

देखकर उनके समक्ष प्रकट हुए। उन वरदायक [गणेशजी]- के [सिरपर] स्वर्ण मुकुट और [कानोंमें] सुन्दर कुण्डल सुशोभित हो रहे थे ॥ ३५-३६ ॥ उन्होंने अपने हाथमें दाँत धारण कर रखा था, उनके शरीरपर श्रेष्ठ बाजूबन्द और कटिसूत्र शोभायमान हो रहे थे। उन्होंने अपनी भुजाओंमें पाश, अंकुश, परशु और कमल धारण कर रखे थे ॥ ३७ ॥ उनका [मस्तक] रक्तचन्दन, कस्तूरी, सिन्दूर और


दायाँ स्तम्भ (Right Column)

चन्द्रमासे विभूषित था। उनके श्रीविग्रहका तेज विद्युत्के समान और उनकी कान्ति करोड़ों सूर्योंकी प्रभाके समान थी ॥ ३८ ॥ सहसा अनामय देव विनायकको [अपने समक्ष] देखकर सभी देवता उनके तेजसे पराभूत हो गये। उनमेंसे कुछ भयभीत हो गये, कुछ देवता सहसा उन गजाननको प्रणाम करने लगे, कुछ अन्य देवताओंने हर्षसे गद्गद वाणीमें उनका पूजन किया ॥ ३९-४० ॥ संकटसे रक्षा करनेवाले और कृपा करनेके लिये उत्सुक उन सुन्दर मुखवाले भगवान् गणेशका कुछ देवताओंने अपने संकटके विनाशहेतु स्तवन* भी किया ॥ ४१ ॥ **देवता बोले—**हे परमार्थरूप! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप अखिल [सृष्टि]-के कारणरूप हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप सम्पूर्ण प्राणियोंको [इस भवसागरसे] तारनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। आप [सम्पूर्ण प्राणियोंकी] सभी इन्द्रियोंमें भी निवास करते हैं, आपको नमस्कार है ॥ ४२ ॥ आप सम्पूर्ण प्राणियोंमें स्थित हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे देवेश! आप भूत-सृष्टिके कर्ता हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप [सम्पूर्ण प्राणियोंकी] बुद्धिके प्रबोधरूप हैं, संसारकी उत्पत्ति और लय करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४३ ॥ हे अखिलेश! आप विश्वका भरण-पोषण करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप कारणोंके भी कारण हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप वेदके विद्वानोंके लिये भी अदृश्य हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप सबको वर प्रदान करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४४ ॥ हे वाणीसे अनिर्वचनीय [परमात्मन्]! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप विघ्नोंका निवारण करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप अभक्तके मनोरथका नाश करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे भक्तके मनोरथको जाननेवाले!