श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 123, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०४०] * ब्रह्मा, विष्णु और शिवका त्रिपुरासुरके भयसे अपने-अपने लोकोंसे पलायन * १२१ गणोंसे घिरे हुए मन्दराचलको चले गये। कैलासशिखरपर आरूढ़ होकर अर्थात् कैलासपर्वतका स्वामित्व प्राप्तकर त्रिपुरासुर अत्यन्त हर्षित हुआ। इस प्रकार देवताओंको वशमें करके वह पुनः रसातलको आया ॥ ८-९ ॥ बलवान् भीमकायने भी पृथ्वीपर जाकर बलपूर्वक राजाओं और ऋषियोंको अपने वशमें कर लिया और उन सबको बाँध लिया। [उसने] देवताओंको तृप्ति प्रदान करनेवाले सभी अग्निकुण्डों, आश्रमों तथा विशेष रूपसे तीर्थोंको नष्ट-भ्रष्ट कर दिया ॥ १०-११ ॥ उसने तपस्वियोंको पीड़ित किया और उन्हें कारागारमें डाल दिया। सब प्रकारसे अभिमानसे भरा हुआ वह (दैत्य भीमकाय) देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वषट्कार, वेदाध्ययन करनेवालों और सदाचारियोंनोंसे सदा द्वेष रखता था ॥ १२१/२ ॥ [उधर] वज्रदंष्ट्रने भी सातों पातालों*को अपने वशमें कर लिया। उसने शेष, वासुकि और तक्षक प्रभृति सभी नागों तथा विषहीन और विषैले सर्पोंको अपने वशमें कर लिया। वज्रदंष्ट्रने [वहाँसे प्राप्त] श्रेष्ठ रत्नोंका स्वयं भी भोग किया और [उन्हें] त्रिपुरासुरके लिये भी प्रेषित किया ॥ १३-१४ ॥ वह सदा मदोन्मत्त होकर अत्यन्त हर्ष और कौतूहलपूर्वक नागलोककी नारियोंसे रमण करता था। [इस प्रकार] वह अनेक प्रकारके भोगोंका भोगकर विविध रत्नोंको लेकर त्रिपुरासुरके पास आया ॥ १५ ॥ 'पातालको वशमें कर लिया है' यह बात बतानेपर उसने [त्रिपुरासुरसे] पहलेकी भी अपेक्षा अधिक सम्मान, बहुमूल्य वस्त्र, बहुत-से ग्राम और सेवक प्राप्त किये ॥ १६ ॥ इस प्रकार त्रैलोक्यको अपने वशमें करके वह दैत्य [त्रिपुरासुर] अत्यन्त आनन्दित हुआ और उधर सभी देवता गुफाओंमें रहते हुए नित्य चिन्तित रहते थे कि इस दैत्यका वध कैसे, किस समय और किसके द्वारा होगा? हम लोग यह भी नहीं जानते कि इसने कहाँसे यह वरदान प्राप्त कर लिया है ॥ १७-१८ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ (व्यासजी) ! [जब] देवता लोग इस प्रकारसे व्याकुल थे तो [उसी समय] अपनी इच्छासे त्रिलोकीमें विचरण करनेवाले नारदजी वहाँ आये ॥ १९ ॥ [वे] उन दीन दशावाले देवोंको देखकर आकाश- मार्गसे नीचे उतर आये। नारदजीको सहसा आया देखकर वे सब आदरपूर्वक उठकर खड़े हो गये ॥ २० ॥ अवस्थाके अनुसार उनमेंसे कुछने उनका आलिंगन किया, कुछने नमस्कार किया और कुछने उनका पूजन किया; तत्पश्चात् विश्रामके अनन्तर [उन्होंने उनसे] त्रिपुरके वरदान आदिके विषयमें पूछा ॥ २१ ॥ देवता बोले-त्रिपुरासुरने स्थावर-जंगमात्मक सम्पूर्ण प्राणियोंसहित त्रैलोक्यको अधीन कर लिया है। उसने हमारे स्थान छीन लिये हैं; ब्रह्मा, विष्णु और शंकरको भी उसने जीत लिया है ॥ २२ ॥ हे [मुने]! अब हम किसकी शरणमें जायँ? उसका वध कैसे हो ? इस त्रिपुरको किसने वरदान दिया है-यह हमें बतलाइये ॥ २३ ॥ नारदजी बोले- [हे देवताओ!] दैत्य त्रिपुरासुरद्वारा किये गये महान् प्रयासको मैं संक्षेपमें कहता हूँ, उसने दिव्य सहस्र वर्षोंतक परम तप किया था ॥ २४ ॥ उसने देवाधिदेव भगवान् गणेशको [अपनी तपस्यासे] प्रसन्न किया। उन्होंने उसे सबके लिये दुर्धर्ष और भयंकर वर प्रदान किये ॥ २५ ॥ [उन्होंने उसे] एकमात्र परमात्मा शंकरके अतिरिक्त देवताओं, ऋषियों, पितरों, भूतों, यक्षों, राक्षसों, पिशाचों और नागोंसे अभय होनेका वर प्रदान किया है ॥ २६ ॥ अतः [आप लोग] आदरपूर्वक देवताओंके स्वामी गजानन गणेशजीको प्रसन्न करें; सभी सिद्धियोंको प्रदान करनेवाले विघ्नेश्वरकी आप सभी लोग आराधना करें ॥ २७ ॥ देवता बोले-हे मुनिश्रेष्ठ! उन बुद्धिमान् देवाधिदेवका आराधन कैसे करना चाहिये, कृपया इसे हम सबसे कहिये ॥ २८ ॥ नारदजी बोले-मैं आप सबके प्रति [गणेशजीके] एकाक्षर मन्त्रका कथन करता हूँ, आप सब मेरे द्वारा प्रदत्त उस मन्त्रका स्थिर मनसे भक्तिपूर्वक तबतक अनुष्ठान करें, जबतक कि वे देव गणनायक प्रत्यक्ष प्रकट होकर दर्शन न दे दें ॥ २९-३० ॥ वे ही आप सबसे उसके वधका उपाय कहेंगे,
- अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल-ये पृथ्वीके नीचे स्थित सात लोक हैं; जिनकी सप्तपाताल संज्ञा है।