श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 122, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१२० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
रे दुष्ट! तू ही आज भग्न सिरवाला होकर पृथ्वीपर | हिमालयपर्वतकी गुफाओंमें चले गये ॥ ५१ ॥ जायगा ॥ ४४-४५ ॥ | वे देव (इन्द्र) कहाँ गिरे हैं? उन विभुको हम कैसे जब देवेन्द्र ऐसा कह रहे थे, तभी उस दुष्ट | देखें ? - ऐसा चिन्तन करते और भ्रमण करते हुए उन्होंने दैत्यराजने मुष्टिकासे उनके हृदयदेशमें प्रहार किया, तब | उनको देख लिया ॥ ५२ ॥ उन दोनोंमें युद्ध होने लगा। एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छा | तब उस देवसमूहने नीचेको मुख किये आते हुए रखनेवाले उन दोनोंका वह युद्ध चाणूर और कृष्णके | उन इन्द्रको प्रणाम किया। कुछ अन्य देवताओंने उनका युद्धकी भाँति था। वे दोनों परस्पर छाती-से-छाती और | आलिंगन किया। कुछ अन्य देवताओंने उनका पूजन हाथ-से-हाथपर प्रहार कर रहे थे ॥ ४६-४७ ॥ | किया और कुछने उनपर व्यजन डुलाये तथा कुछने वे दोनों घुटनों-से-घुटनोंमें, जाँघों-से-जाँघोंमें, | भक्तिपूर्वक उनके पैर दबाये ॥ ५३-५४ ॥ मस्तक-से-मस्तकमें, कुहनी-से-कुहनीमें, पीठ-से-पीठमें, | [ तदनन्तर ] वे सभी देवता गुप्त रूपसे वहीं रहने पैरों-से-पैरोंमें प्रहार कर रहे थे। तभी उस दैत्य त्रिपुरने | लगे। [उधर] वह दैत्य (त्रिपुरासुर) ऐरावतपर आरूढ़ इन्द्रके दोनों पैरोंको पकड़कर और उन्हें बार-बार घुमाकर | होकर अमरावतीपुरीको चला गया ॥ ५५ ॥ इतनी दूर फेंक दिया कि किसीको उनके विषयमें कोई | उसने देवताओंसे द्वेष रखनेवाले दैत्योंको सम्मानपूर्वक जानकारी ही न रही और स्वयं चार दाँतोंवाले गजराज | देवताओंके पद बाँट दिये और स्वयं इन्द्रासनको हस्तगत ऐरावतपर आरूढ़ हो गया ॥ ४८-५० ॥ | कर लिया अर्थात् इन्द्र बन बैठा। किन्नरगणोंसे सेवित [वह] तदनन्तर सभी देवगण उस दैत्य त्रिपुरासुरके | त्रिपुरासुर दिव्य वाद्योंकी ध्वनि और गन्धर्वोंके गानका श्रवण सन्त्रासरूपी अग्निसे पीड़ित होकर, इन्द्रको खोजते हुए | करते हुए अप्सराओंके साथ रमण करने लगा ॥ ५६-५७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'इन्द्रपराजयवर्णन' नामक उनतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३९ ॥ चालीसवाँ अध्याय ब्रह्मा, विष्णु और शिवका त्रिपुरासुरके भयसे अपने-अपने लोकोंसे पलायन, देवताओंद्वारा गणेशाराधन, गणेशजीका प्रकट होना, देवताओंद्वारा संकष्टनाशनस्तोत्रसे उनका स्तवन ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास !] देवलोकपर | आलिंगन कर लिया ॥ ४ ॥ अधिकार करके वह दैत्य ब्रह्मलोकको गया। ब्रह्माजीने | तत्पश्चात् वह महान् असुर युद्धोत्सुक होकर उस दैत्यके पराक्रमको देवताओंके मुखसे पहले ही | कैलासपर्वतपर चढ़ गया। उस दैत्यके इस पुरुषार्थसे सुन रखा था, अतः वे [विष्णुके] नाभिकमलमें छिप | महादेवजी प्रसन्न हो गये ॥ ५ ॥ गये और विष्णु [वैकुण्ठलोकको छोड़कर] क्षीरसागरमें | अपने भक्तोंको सुख प्रदान करनेवाले [वे उसे] वर चले गये ॥ १ १/२ ॥ | देनेके लिये [अपने भवनसे] बाहर आये और दैत्य उस दैत्य (त्रिपुरासुर)-के दो मानस पुत्र थे- | त्रिपुरको देखा तथा उससे 'वर माँगो' - ऐसा कहा ॥ ६ ॥ प्रचण्ड और चण्ड। उसने स्वयं प्रचण्डको ब्रह्मलोकमें | उसने कहा कि यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो अधिनायकके रूपमें स्थापित किया और उसके बाद | [यह] कैलासपर्वत मुझे दे दीजिये, जबतक मेरी इच्छा चण्डको वैकुण्ठमें वहाँका स्वामी बनाया ॥ २-३ ॥ | हो, मैं यहाँ रहूँ और आप आज ही मन्दारपर्वतके तदनन्तर वह कैलास गया और उसे अपनी | शिखरपर चले जाइये ॥ ७ ॥ भुजाओंसे चलायमान कर दिया, जिससे भयभीत होकर | तब भगवान् शंकरने भी उस अत्यन्त अल्पजीवीको गिरिराजनन्दिनी पार्वतीने भगवान् शंकरका दृढ़तापूर्वक | कैलासपर्वत दे दिया और वे स्वयं गिरिशायी [महादेव]