भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 121, कुल 656 में से

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उ०ख०-अ० ३९] * त्रिपुरासुरका इन्द्रपर आक्रमणकर अमरावतीपुरीपर अधिकार कर लेना * ११९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 साक्षात् इन्द्रने ऐरावतपर आरूढ़ होकर गर्जना की, उनके | करनेवाले योद्धा तथा बहुत-से पैदल सैनिक [उस [उस] महान् नादसे त्रिभुवन क्षुब्ध हो उठा ॥ २४ ॥ | युद्धभूमिमें] बिना शय्याके ही सो गये थे; उनमेंसे कुछके [अन्य] देवताओंने भी हाथोंमें अस्त्र-शस्त्र धारण | पैर कट गये थे तथा दूसरे बहुत-से दैत्य उसी प्रकार दसों कर लिये और वे [युद्धके लिये] सुसज्जित हो गये। कुछ | दिशाओंमें पलायन कर गये, जैसे अचानक सिंहको [देवताओं]-ने हाथमें भिन्दिपाल, तो कुछने हाथमें शक्ति | देखकर जीवित रहनेकी इच्छा करनेवाले मृग भाग जाते और ऋष्टि [नामक शस्त्र] धारण कर रखे थे ॥ २५ ॥ | हैं ॥ ३४-३५ ॥ कुछने हाथोंमें मुद्गर और तलवार धारण कर रखी | तब देवशत्रु त्रिपुरासुरने उस भागती हुई अपनी थी तो अन्य [देवताओं]-ने धनुष-बाण धारण कर रखे | सेनाको रोका और स्वयं वह क्रोधाग्निकी महान् ज्वालामें थे। कुछके हाथोंमें गदा और खेट थे, तो कुछ दण्डपाणि | जलता हुआ तथा दूसरे मेघकी भाँति गर्जन करता हुआ अर्थात् हाथमें दण्ड लिये हुए थे ॥ २६ ॥ | इन्द्रके समीप आया। उस समय वह पृथ्वी और [तदनन्तर] ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्त्यन कराकर वज्रधारी | आकाशका भक्षण करता हुआ-सा प्रतीत हो रहा था। इन्द्र इस प्रकार देवताओंके साथ [अमरावतीपुरीसे] | उसने अपने खड्गसे वज्रधर इन्द्रके हाथपर तीव्र प्रहार बाहर आये। उस समय अनेक प्रकारके वाद्योंकी ध्वनि | किया ॥ ३६-३७॥ हो रही थी ॥ २७ ॥ | [उस प्रहारसे] इन्द्रके हाथसे वज्र गिर पड़ा—यह त्रिपुरासुरने भी दूतकी बातसे उनके युद्ध-उद्यमको | एक अद्भुत घटना घटित हुई! वज्रको लेकर उस दैत्यने जानकर अपनी शक्तिशाली और हर्षसे भरी हुई चतुरंगिणी | उसीसे ऐरावत हाथीपर प्रहार किया ॥ ३८ ॥ सेनाको युद्धके लिये सुसज्जित किया। [तत्पश्चात्] | उस प्रहारसे [व्यथित होकर] ऐरावत पलायन कर अश्वारूढ़ होकर उसने असंख्य सैनिकोंवाली सेनाके | गया। तदनन्तर इन्द्रने घूँसेसे उस दैत्यश्रेष्ठ [त्रिपुरासुर]- साथ [युद्धके लिये] प्रस्थान किया। इस प्रकार वीर | पर प्रहार किया ॥ ३९ ॥ योद्धाओंसे सुसज्जित दोनों सेनाओंने एक-दूसरेको | उससे वह क्षणभरके लिये भूमिपर गिर पड़ा, देखा ॥ २८-२९ ॥ | तत्पश्चात् पुनः वेगपूर्वक उठकर उसने मुक्केसे प्रहारकर [उस समय] हाथियोंके चिंघाड़ने, घोड़ोंके हिनहिनाने, | इन्द्रको पृथ्वीपर गिरा दिया ॥ ४० ॥ योद्धाओंके युद्धनाद, रथोंके चलनेकी ध्वनि और अनेक | तत्पश्चात् उठकर इन्द्रने क्रोधपूर्ण वाणीमें दैत्य प्रकारके वाद्योंके घोषसे वहाँ महान् कोलाहल हो गया। | त्रिपुरसे कहा—हे असुरेश्वर! अब तुम मल्लयुद्धके लिये तब त्रिपुरासुरके द्वारा हुंकारमात्रसे प्रेरित किये उसके वीर | तैयार हो जाओ ॥ ४१ ॥ योद्धा देवताओंके साथ युद्ध करने लगे और इस प्रकार | तब उस बलगर्वित त्रिपुरासुरने आश्चर्यचकित महान् संग्राम प्रारम्भ हो गया ॥ ३०-३१ ॥ | होकर कहा—हे देवेश्वर! अपने प्राणोंके प्रति क्यों निर्दय इस युद्धमें सैनिकोंको अपने-परायेका ज्ञान न रहा | हो रहे हो? ॥ ४२ ॥ और वे परस्पर एक-दूसरेको मारने लगे। इस प्रकार उस | कृमि, कीट और पतंगोंको भी अपने प्राण अत्यन्त भयंकर युद्धमें बहुत-से दानव मारे गये ॥ ३२॥ | प्रिय होते हैं, हे देवराज! धरतीपर जाओ, वहाँ मैंने तुम्हें दैत्योंके शस्त्राघातसे अत्यन्त पीड़ित होकर बहुत- | सुन्दर स्थान दे रखा है ॥ ४३ ॥ से देवता भी उस युद्धभूमिमें गिर गये। वहाँ वे | ब्रह्माजी बोले—[हे व्यास!] उसके इस प्रकारके [रक्तरंजित] सैनिक पुष्पित पलाश वृक्षोंकी भाँति सुशोभित | वचन सुनकर बलासुर और वृत्रासुरका वध करनेवाले हो रहे थे ॥ ३३॥ | इन्द्रने कहा—रे अधम शत्रु! यदि मैं तुझे जीवित ऊँट, हाथी, रथ और घोड़ोंपर आरूढ़ होकर युद्ध | छोड़ूँगा, तब तेरी आज्ञाके वशमें होकर पृथ्वीपर जाऊँगा।