भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 120, कुल 656 में से

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पृष्ठ 120

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१९८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उनतालीसवाँ अध्याय त्रिपुरासुरका इन्द्रपर आक्रमणकर अमरावतीपुरीपर अधिकार कर लेना व्यासजी बोले- हे ब्रह्मन्! गणेशजीसे वरदान प्राप्त करनेके बाद वरप्राप्तिके अहंकारसे भरे त्रिपुरासुरने क्या किया? उसे आप बिना कुछ शेष रखे बताइये, उस विषयमें मुझे कौतूहल हो रहा है ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास!] तदनन्तर उस त्रिपुरासुरने काश्मीर देशमें उत्पन्न होनेवाले पत्थरसे एक गजानन गणेशजीकी मूर्तिक निर्माण कराया और मन्त्रविद् ब्राह्मणोंद्वारा उसकी विधिवत् स्थापना करायी ॥ २ ॥ उसने गणेशपुरके मध्यमें एक महान् और सुन्दर मन्दिरका निर्माण करवाया, जो स्वर्णनिर्मित और दिव्य मणि-मुक्ताओंसे विभूषित था ॥ ३ ॥ उसने षोडशोपचारोंसे उन प्रभुका पूजन किया और असंख्य बार नमस्कार, स्तुतियाँ और क्षमा-प्रार्थना करके उन देवाधिदेवकी आज्ञा लेकर वहाँसे बाहर आया और ब्राह्मणोंको यथायोग्य अनेक दान दिये ॥ ४-५ ॥ तबसे बंगालमें स्थित त्रिपुरका वह स्थान गणेशपुर नामसे विख्यात और सबको सब प्रकारकी सिद्धियाँ देनेवाला हो गया। तदनन्तर वह त्रिपुर दैत्य गणेशजीके वरदानसे मदोन्मत्त होकर मनुष्योंका पालन और देवताओंका अतिक्रमण करनेमें संलग्न हो गया ॥ ६-७ ॥ उसके पास दसों दिशाओंसे बलवान्‌से बलवान् पैदल, अश्वारोही, गजारोही और रथारोही सैनिक सेवाके लिये आ गये। जो राजा उसके अनुकूल थे, वे सेवक हो गये और जो असमर्थ होते हुए भी उसके प्रतिकूल थे, वे मृत्युको प्राप्त हो गये ॥ ८-९ ॥ इस प्रकार भूमण्डलका अतिक्रमणकर उसने अमरावतीके लिये प्रस्थान किया। तब युद्ध-विद्यामें निष्णात अनेक देवगणोंसे घिरे हुए इन्द्रने भी कवचबद्ध हो तथा ऐरावतपर समारूढ़ हो युद्धके लिये प्रस्थान किया। उधर उस महाबली दैत्य त्रिपुरासुरने भी अपनी चतुरंगिणी- सेनाको तीन भागोंमें विभाजित किया ॥ १०-११ ॥ उसने महान् दैत्य भीमकायको एक भागका और वज्रदंष्ट्र नामक दानवको दूसरे भागका अधिपति बनाया। तदनन्तर उसने धनुर्युद्ध, गदायुद्ध, शस्त्रयुद्ध, अस्त्रयुद्ध और मल्लयुद्धमें निपुण दैत्यश्रेष्ठ भीमकायसे कहा- 'तुम मनुष्यलोकके अधिपति बनो' ॥ १२-१३ ॥ [इसके बाद] महाबली त्रिपुरासुरने वज्रदंष्ट्रसे कहा- 'तुम इस एक तिहाई सेनाको लेकर रसातलको जाओ और मेरी आज्ञासे शेषनाग आदि सभी प्रमुख नागोंको वशमें करो। मैं एक तिहाई सेना लेकर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंपर आक्रमण करूँगा' ॥ १४-१५ ॥ [तत्पश्चात्] भीमकाय और वज्रदंष्ट्रने आज्ञानुसार प्रस्थान किया और स्वयं त्रिपुरासुर चतुरंगिणी सेनासहित नन्दनवनमें जा पहुँचा ॥ १६ ॥ वहाँ उन योद्धाओंने [देव] सैनिकोंके रोकनेपर भी दिव्य वृक्षोंको तोड़ डाला। वहाँ स्थित होकर उस दैत्यराज त्रिपुरासुरने अपने दूतोंको यह कहकर भेजा कि तुम लोग इन्द्रको शीघ्र मेरे सामने ले आओ, मैं उसे देखना चाहता हूँ, अथवा उससे मेरा आदेश कहो कि तुम अभी मृत्युलोक (पृथ्वी)-को चले जाओ, वहाँ मैं तुम्हारा पालन करता रहूँगा, तुम शान्तिपूर्वक अमरावती मुझे दे दो और यदि तुम्हारी बुद्धिमें युद्ध करनेकी बात आ रही हो, तो शीघ्र ही मेरे पास आ जाओ ॥ १७-१९ ॥ उन दूतोंने इन्द्रके पास जाकर त्रिपुरासुरकी सारी चेष्टाओंका वर्णन किया। उनके वचनोंको सुनकर इन्द्रकी स्थिति वज्रसे आहत पर्वत-जैसी हो गयी ॥ २० ॥ जैसे वायुके वेगसे वृक्ष काँपने लगता है, वैसे ही पर्वतशत्रु इन्द्र काँपने लगे। 'यह क्या हो गया'-ऐसा विचार करते हुए वे चिन्तासे व्याकुल हो गये ॥ २१ ॥ वे क्रोधाग्निसे प्रज्वलित-से हो उठे थे, उनकी आँखें लाल हो गयीं। ऐसा लगता था कि वे सम्पूर्ण लोकोंको भस्म कर देंगे और समुद्रोंको सुखा डालेंगे ॥ २२ ॥ उन्होंने दूतोंसे कहा-'जाओ और युद्धके लिये शीघ्र आओ।' उनके उस वचनको सुनकर वे सब दूत जैसे आये थे, वैसे ही वापस लौट गये ॥ २३ ॥ [उस समय] देवताओंके शत्रुओंका हनन करनेवाले