श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
उद्दण्डविघ्नपरिखण्डनचण्डदण्ड-
श्रीगणेशप्रातःस्मरणस्तोत्रम् प्रातः स्मरामि गणनाथमनाथबन्धुं सिन्दूरपूरपरिशोभितगण्डयुग्मम्। उद्दण्डविघ्नपरिखण्डनचण्डदण्ड- माखण्डलादिसुरनायकवृन्दवन्द्यम्॥ १.॥ प्रातर्नमामि चतुराननवन्द्यमान- मिच्छानुकूलमखिलं च वरं ददानम्। तं तुन्दिलं द्विरसनाधिपयज्ञसूत्रं पुत्रं विलासचतुरं शिवयोः शिवाय॥ २॥ प्रातर्भजाम्यभयदं खलु भक्तशोक- दावानलं गणविभुं वरकुञ्जरास्यम्। अज्ञानकाननविनाशनहव्यवाह- मुत्साहवर्धनमहं सुतमीश्वरस्य॥ ३ ॥ श्लोकत्रयमिदं पुण्यं सदा साम्राज्यदायकम्। प्रातरुत्थाय सततं यः पठेत्प्रयतः पुमान्॥ ४॥ ॥ इति श्रीगणेशप्रातःस्मरणस्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥ जो इन्द्र आदि देवेश्वरोंके समूहसे वन्दनीय हैं, अनाथोंके बन्धु हैं, जिनके युगल कपोल सिन्दूरराशिसे अनुरञ्जित हैं, जो उद्दण्ड (प्रबल) विघ्नोंका खण्डन करनेके लिये प्रचण्ड दण्डस्वरूप हैं; उन श्रीगणेशजीका मैं प्रातःकाल स्मरण करता हूँ॥ १॥ जो ब्रह्मासे वन्दनीय हैं, अपने सेवकको उसकी इच्छाके अनुकूल पूर्ण वरदान देनेवाले हैं, तुन्दिल हैं, सर्प ही जिनका यज्ञोपवीत है, उन क्रीडाकुशल शिव-पार्वतीके पुत्र (श्रीगणेशजी)-को मैं कल्याण-प्राप्तिके लिये प्रातःकाल नमस्कार करता हूँ॥ २॥ जो अपने जनको अभय प्रदान करनेवाले हैं, भक्तोंके शोकरूप वनके लिये दावानल (वनाग्नि) हैं, गणोंके नायक हैं, जिनका मुख श्रेष्ठ हाथीके समान है और जो अज्ञानरूप वनको नष्ट करने (जलाने)-के लिये अग्नि हैं; उन उत्साह बढ़ानेवाले शिवसुत (श्रीगणेशजी)-को मैं प्रातःकाल भजता हूँ॥ ३॥ जो पुरुष प्रातःसमय उठकर संयतचित्तसे इन तीनों पवित्र श्लोकोंका नित्य पाठ करता है, उसको यह स्तोत्र सर्वदा साम्राज्य प्रदान करता है॥ ४॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशप्रातःस्मरणस्तोत्र सम्पूर्ण हुआ॥
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प्र० ति० 20-12-2020 रजि० समाचारपत्र—रजि०नं० 2308/57 पंजीकृत संख्या—NP/GR-13/2020-2022 LICENSED TO POST WITHOUT PRE-PAYMENT LICENCE No. WPP/GR-03/2020-2022
श्रीगणेशनीराजनम्
जय देव जय देव गजमुख सुखहेतो। नेतर्विघ्नगणानां जाड्यार्णवसेतो ॥ ध्रुवपदम् ॥ येन भवदुपायनतां नीता नवदूर्वा। विद्यासम्पत्कीर्तिस्तेनाप्तापूर्वा । मुक्तिर्लभ्या सुखतस्तव नित्यापूर्वा। धार्या जगतः स्थितये भूमौ दिवि धू... ॥ जय० ॥ १ ॥ प्रथमनमस्कृतिभाक्त्वं तव लोकप्रथितम्। दृष्टं सद्व्यवहारे गुरुभिरपि च कथितम्। यः कश्चन विमुखस्त्वयि निजसिद्धेः पथि सङ्गी विविधा विघ्ना भगवन् कुर्वन्ति व्यथितम् ॥ जय० ॥ २ ॥ बालं सकृदनुसरति त्वद्दृष्टिश्चेत्ता। मनुराशीनिव दासीर्विद्याः स हि वेत्ता। पविपाणिरिव परं परपक्षाणां भेत्ता। भवति मयूरोऽहेरिव मोहस्यच्छेत्ता ॥ जय० ॥ ३ ॥ ॥ इति कविवरमोरोपन्तकृतं श्रीगणेशनीराजनं सम्पूर्णम् ॥
भगवान् श्रीगणेशजीकी आरती
जय गणेश जय गणेश जय गणेश देवा। माता जाकी पार्वती पिता महादेवा ॥ एकदन्त दयावन्त चार भुजा धारी। मस्तक सिन्दूर सोहे मूसे की सवारी ॥ अन्धन को आँख देत कोढ़िन को काया। बाँझन को पुत्र देत निर्धन को माया ॥ लड्डुवन का भोग लगे सन्त करे सेवा। हार चढ़े फूल चढ़े और चढ़े मेवा ॥ दीनन की लाज राख शम्भु-सुत वारी। कामना को पूरा करो जग बलिहारी ॥