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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

इकतालीसवाँ अध्याय

१२४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 इकतालीसवाँ अध्याय श्रीगणेशजीका कलाधर विप्रके रूपमें त्रिपुरासुरके पास आना और उसे स्वर्ण, रजत एवं लौहसे निर्मित तीन पुर प्रदान करना

व्यासजी बोले—हे चतुर्मुख ब्रह्माजी ! [सृजन, पालन और संहार आदि] सम्पूर्ण कार्योंको सम्पन्न करनेवाले वरदायक भगवान् गणेशजीने क्या किया—यह मुझ जिज्ञासुको बतलाइये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी !] तदनन्तर गजानन गणेशजी ब्राह्मणका रूप धारणकर त्रिपुरासुरके पास गये। वहाँ उन ब्राह्मणश्रेष्ठने उसे महामूल्यवान् आसनपर विराजमान देखा ॥ २ ॥ उसने उठकर उन्हें नमस्कार करके अपने आसनपर बैठाया और सम्यक् रूपसे उनका पूजनकर पूछा कि 'हे द्विज ! आपका आगमन कहाँसे हुआ है ? ॥ ३ ॥ हे द्विज ! आपने किस विद्याका ज्ञान प्राप्त किया है ? आपका नाम क्या है ? आपके आनेका प्रयोजन क्या है ?—यह सब मुझ जिज्ञासुको बताइये, मैं शक्तिभर आपके कार्यको पूर्ण करूँगा' ॥ ४ ॥ द्विजरूपधारी गणेशजी बोले—हे दैत्य [राज] ! हम सर्वज्ञ और सब कुछ जाननेवाले हैं; परहितकी कामनासे इच्छानुसार लोकोंमें भ्रमण करते रहते हैं और जहाँ सायंकाल हो जाता है, वहीं रुक जाते हैं ॥ ५ ॥ मैं तीनों लोकोंमें 'कलाधर' नामसे प्रसिद्ध हूँ और आपके वैभवको देखनेकी इच्छासे आपके भवनमें आया हूँ। सम्प्रति आपकी सम्पूर्ण सम्पदाको देखकर हम तृप्त हो गये। इस प्रकारकी सम्पत्ति तो कैलास, वैकुण्ठ और ब्रह्मलोकमें भी नहीं है। इन्द्रलोकमें भी ऐसी सम्पत्ति नहीं है, जैसी आपके पास दिखायी देती है ॥ ६—७१/२ ॥ दैत्य (त्रिपुरासुर) बोला—हे द्विज ! आपका नाम ही कलाधर है या आप उसे जानते भी हैं ? ॥ ८ ॥ सम्पूर्ण लोकोंकी सम्पदाओंमें आप जो इस सम्पदाकी प्रशंसा कर रहे हैं तो यदि आप जानते हों तो मुझे उनमें जो सर्वश्रेष्ठ हो, उसे दिखायें ॥ ९ ॥ हे द्विज ! उसे देखकर मैं आपको आपका वांछित [अवश्य] प्रदान करूँगा, भले ही वह मेरा प्रिय प्राण ही क्यों न हो। हे मुने ! मुझे स्मरण नहीं है कि मैंने परिहासमें भी कभी असत्य बोला हो ॥ १० ॥ कलाधर बोले—हे देवशत्रु ! दूसरोंकी सम्पदाको देखकर तुम्हारा क्या प्रयोजन सिद्ध होगा ? तुम्हारी विनम्रतासे मैं प्रसन्न हूँ और अपनी कलासे तुम्हें एक बाणपर स्थित स्वर्ण, रजत और लौहनिर्मित तीन पुर प्रदान करता हूँ। हे दैत्य ! तुम दीर्घकालतक वहाँ रहकर सुखपूर्वक रमण करो ॥ ११-१२ ॥ ये तीनों पुर देवताओं, गन्धर्वों, मनुष्यों और सर्पोंद्वारा अभेद्य, मनोवांछित पदार्थोंको देनेवाले, इच्छानुसार गमन करनेवाले, इच्छित भोगोंको प्रदान करनेवाले और मंगलमय हैं ॥ १३ ॥ हे दैत्य ! कुछ काल बीत जानेपर जब भगवान् शिव एक ही बाणसे उनका भेदन कर देंगे, तभी उनका नाश होगा ॥ १४ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] ऐसा कहकर [उन द्विजरूपधारी गणेशजीने] धनुष लेकर और उसपर बाणका संयोजनकर तीन पुरोंका निर्माण किया, जो तीन लोकोंके सदृश थे। वे [तीनों.पुर] विशेष रूपसे चित्रित भवनों, मनोरम दीर्घिकाओं (जलाशयों) और उद्यानोंसे युक्त थे; वहाँ अनेक प्रकारके पक्षिसमूह कलरव करते थे। वे तीनों पुर सभी प्रकारके भोगोंको प्रदान करनेवाले और आकाशमार्गसे गमन करनेवाले थे ॥ १५-१६ ॥ [गणेशजीकी] मायासे मोहित वह दैत्य त्रिपुरासुर वहाँ (उन पुरोंके मध्यमें) स्थित होकर अत्यन्त हर्षित हुआ। उस दैत्यने मेघसदृश गर्जन किया, जिससे तीनों लोक काँपने लगे। त्रैलोक्यको क्षुभित करके उसने 'मुझसे श्रेष्ठ कोई नहीं है'—इस प्रकार गर्व और दर्पसे युक्त होकर उन ब्राह्मण-देवता (द्विजरूपधारी गणेशजी)— से इस प्रकार कहा— ॥ १७-१८ ॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! आप दुर्लभ-से-दुर्लभ पदार्थ माँगिये, वह मैं आपको दूँगा। यह सुनकर उन द्विज (कलाधर)—

उ०ख०-अ०४२ ] * भगवान् शंकर और त्रिपुरासुरका युद्ध * १२५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ने उस दैत्य (त्रिपुरासुर)-से किसी वस्तुकी स्पृहा न होते हुए भी कहा— ॥ १९ ॥ द्विजरूपधारी गणेशजी बोले—मैं कैलासपर्वतपर गया था, वहाँ मैंने शिवजीद्वारा सम्यक् रूपसे पूजित उत्तम गणेशमूर्तिका दर्शन किया, जो समस्त मनोरथोंको पूर्ण करनेवाली थी। हे असुरेश्वर! यदि आपमें शक्ति है, तो उसे लाकर मुझे दीजिये; क्योंकि तीनों लोकोंमें विचरण करते हुए मैंने वैसी मूर्ति कहीं नहीं देखी ॥ २०-२१॥ अतः हे दैत्यश्रेष्ठ! उसमें मेरा मन आसक्त हो गया है, हे असुरेश्वर! उसे प्राप्तकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा। मैं चराचरसहित तीनों लोकोंमें आपकी कीर्तिका विस्तार करूँगा कि 'त्रिपुरासुरसे श्रेष्ठ कोई दाता नहीं है, जो वांछित वस्तुको प्रदान करता है' ॥ २२-२३॥ दैत्य [त्रिपुरासुर] बोला—हे द्विजश्रेष्ठ ! मैं शंकरको अपना किंकर (सेवक) मानता हूँ, अन्य देवताओंकी तो मैं कोई गणना ही नहीं करता। मैं उस मूर्तिको लाकर आपको प्रदान करूँगा ॥ २४॥ ब्रह्माजी बोले— [हे व्यासजी!] ऐसा कहकर [उस दैत्यने] उन [द्विजश्रेष्ठ] कलाधरका आदरपूर्वक पूजन किया। उसने उन्हें दस ग्राम, गौएँ, वस्त्र, आभूषण, मोती, मूँगे तथा अन्य बहुत-से रत्न एवं रंकु मृगके रोमसे बने हुए कम्बल और अनेक प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित सैकड़ों दास-दासियाँ प्रदान किये। उस असुरने श्रेष्ठ अश्वोंसे युक्त एवं चाँदीसे निर्मित बहुत-से रथ भी उन्हें प्रदान किये, जो रथकी रक्षा करनेवाले कवच और सोनेके धुरोंसे युक्त थे ॥ २५-२७ ॥ उस (त्रिपुरासुर)-के द्वारा आग्रहपूर्वक दी गयी सम्पूर्ण दान-सामग्रियों आदिको ग्रहणकर वे [द्विजश्रेष्ठ] कलाधर अपने आश्रमको प्रस्थान कर गये। [उन्हें देखकर] उनकी पत्नी और सम्पूर्ण आश्रमवासी हर्षित हो गये ॥ २८ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी!] इस प्रकार इस सम्पूर्ण वृत्तान्तको नारदजीने देवताओंसे कहा। वे देवता भी उचित समयकी प्रतीक्षा करते हुए दिन व्यतीत करने लगे ॥ २९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'नारदागमन' नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४१॥ बयालीसवाँ अध्याय भगवान् शंकर और त्रिपुरासुरका युद्ध व्यासजी बोले—[हे ब्रह्मन् !] उन [द्विजश्रेष्ठ] कलाधरके चले जानेके बाद उस दैत्य (त्रिपुरासुर)-ने क्या किया? उस मंगलमयी चिन्तामणि [गणेशजीकी] मूर्तिको उसने कैसे लाकर उन कलाधरको प्रदान किया? हे चतुरानन ब्रह्माजी! यह सब मुझसे विस्तारपूर्वक कहिये; क्योंकि गजानन गणेशजीकी लीलाओंको संक्षेपमें सुनकर मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ ॥ १-२ ॥ ब्रह्माजी बोले—हे मुनिश्रेष्ठ ! उन [द्विजश्रेष्ठ कलाधर]-के चले जानेके बाद उस दैत्य त्रिपुरासुरने जो कुछ किया, वह सब मैं कहूँगा; हे मुने! उसे सावधान होकर श्रवण करो ॥ ३ ॥ [तदनन्तर] उसने मन्दराचलपर स्थित शिवके पास दो दूतोंको भेजा। उसने उन्हें यह सिखाया कि शिवके पास जाकर आदरपूर्वक मेरी बात उनसे कहो कि तुम्हारे भवनमें जो सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थोंको प्रदान करनेवाली चिन्तामणि-निर्मित मंगलमयी [गणेश] मूर्ति है, हे पार्वतीपते! उसे शान्तिपूर्वक दैत्यराज (त्रिपुरासुर)-को दे दीजिये ॥ ४-५॥ पाताल, स्वर्गलोक या मर्त्यलोकमें जो भी अद्भुत वस्तुएँ हैं, उन सबको वह दैत्य [राज] बलपूर्वक अपने घरमें लाया है, अतः हे देव ! उसे आप शीघ्र लाइये, उसे लेकर हम दोनों शीघ्र ही महाबली दैत्य त्रिपुरासुरके पास जायँ। यदि आप उसे शान्तिपूर्वक नहीं देंगे, तब वह पराक्रमी दैत्य उस मूर्तिको आपसे बलपूर्वक ले लेगा, तब आपको दुःखकी प्राप्ति होगी-उस दैत्यके इस प्रकारके वचन सुनकर वे दोनों दूत शिवके पास गये ॥ ६–८॥

१२६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

उ०ख०-अ०४३] * त्रिपुरासुरके साथ युद्धमें भगवान् शंकरकी पराजय * १२७ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 धूलके शान्त हो जानेपर वीर योद्धा [शत्रुपक्ष]- | भाँति बह रहे थे। वह वीरोंके मनमें सन्तोष उत्पन्न के दूसरे योद्धाओंसे युद्ध करने लगे। उनमेंसे कुछ | करनेवाली और गृध्रों एवं शृगालोंके लिये प्रसन्नताका भालोंसे, कुछ खड्गोंसे, कुछ पत्थरपर घिसकर तेज | कारण थी ॥ ३२ ॥ किये गये बाणोंसे, कुछ ऋष्टि (दुधारी तलवार)-से, | उस नदीको देखकर गिरिशायी बलवान् भगवान् कुछ मुष्टिकासे, कुछ परशुसे, तो कुछ तोमरोंसे युद्ध कर | शंकर दैत्य त्रिपुरासुरके निकट गये, [तब] वह दैत्य भी रहे थे॥ २९ १/२ ॥ | त्रिपुरमें आरूढ़ होकर सेनाके साथ उनके सामने वहाँ मारे गये वीरों, घोड़ों और पैदल सैनिकोंके | आया ॥ ३३ ॥ रक्तसे एक रक्तकी नदी उत्पन्न हो गयी, जिसमें | तब दोनों नायकोंको युद्धोद्यत देखकर भगवान् शैवालकी भाँति केश प्रवाहित हो रहे थे। [उस नदीमें] | शंकर और त्रिपुरासुरके सैनिक बिना व्याकुल हुए परस्पर ढालें कछुओंकी भाँति, तलवारें मत्स्योंकी तरह और | द्वन्द्व-युद्ध करने लगे ॥ ३४ ॥ [योद्धाओंके कटे] सिर कमलसदृश प्रतीत हो रहे | उस समय वे अनेक प्रकारके आयुधों, दिव्य थे ॥ ३०-३१ ॥ | अस्त्र-शस्त्रों और वृक्षोंसे प्रहार कर रहे थे। उन भयंकरसे भी भयंकर प्रतीत होनेवाली उस नदीमें | योद्धाओंके नामों और युद्धविषयक चेष्टाओंको मैं छत्र आवर्त (भँवर)-की भाँति और कबन्ध वृक्षकी | [आगे] संक्षेपमें कहूँगा ॥ ३५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'युद्धका वर्णन' नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४२ ॥ तैंतालीसवाँ अध्याय त्रिपुरासुरके साथ युद्धमें भगवान् शंकरकी पराजय ब्रह्माजी बोले-[हे व्यासजी!] उस द्वन्द्व-युद्धमें | गजारोहियोंके साथ, अश्वारोही अपने सदृश अश्वारोहियोंके गिरिशायी भगवान् शंकर असुर सेनानायक त्रिपुरासुरसे, | साथ और पैदल सैनिक पैदल सैनिकोंके साथ युद्ध करने षडानन भगवान् स्कन्द प्रचण्डसे और नन्दी चण्डसे युद्ध | लगे। उस भयंकर संग्राममें अनेक प्रकारके वाद्योंके घोष, करने लगे ॥ १ ॥ | हाथियोंकी चिंघाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, वीरोंके बलवान् पुष्पदन्त भी भीमकायसे तथा भुशुण्डी | सिंहनाद और रथोंके धुरोंके घर्षणसे उत्पन्न ध्वनिसे [वह विषके सदृश प्राणहारी कालकूटसे युद्ध करने लगे ॥ २ ॥ | रणभूमि] अत्यन्त कोलाहलयुक्त हो गयी थी ॥ ६-७ ॥ वज्रदंष्ट्र और वीरभद्र-दोनों महान् बलशाली | उस युद्धमें कुछ वीर शस्त्रोंका त्याग करके विविध [परस्पर] युद्ध करने लगे। वहाँ [उस संग्राममें] | प्रकारसे मल्लयुद्ध करने लगे। वे अपने अंगोंसे दूसरेके बलवान् इन्द्रने भी दैत्य (त्रिपुरासुर)-के अमात्यसे युद्ध | अंगोंपर प्रहार कर रहे थे ॥ ८ ॥ किया। दैत्यपुत्र बलिके साथ रणदुर्मद [इन्द्रपुत्र] जयन्तने | तभी प्रचण्डने धनुषको कानतक खींचकर पत्थरपर और [दैत्यगुरु] शुक्राचार्यके साथ अस्त्रोंके ज्ञाता देवताओंके | घिसकर तेज किये गये नौ दृढ़ बाणोंसे षडानन आचार्य बृहस्पतिने युद्ध किया ॥ ३-४ ॥ | कार्तिकेयजीपर प्रहार किया ॥ ९ ॥ इस प्रकार देवताओं और दैत्योंके अनेक जोड़ोंमें | तब भगवान् कार्तिकेयने उन्हें अपनेतक पहुँचनेके युद्ध हुआ, जिसका वर्णन करनेमें मैं सैकड़ों वर्षोंमें भी | पहले ही झुकी हुई गाँठवाले बाणोंसे काटकर पाँच समर्थ नहीं हूँ ॥ ५ ॥ | बाणोंसे उसपर प्रहार किया। इससे भ्रान्तचित्त प्रचण्ड उस युद्धमें रथी रथियोंके साथ, गजारोही | मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़ा ॥ १० १/२ ॥

१२८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[उधर] नन्दीने भी चण्डपर पाँच तीक्ष्ण बाणोंसे प्रहार किया, वह भी मूर्च्छित होकर सहसा धरतीपर गिर पड़ा। भीमकायने पुष्पदन्तपर दस बाणोंसे प्रहार किया, परंतु पुष्पदन्तने अपने तीक्ष्ण बाणोंसे उन्हें समरभूमिमें काट डाला और उसपर तीन बाणोंसे प्रहार किया, जिससे उसने भी भूतलका आश्रय ले लिया अर्थात् पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ ११-१३ ॥ भुशुण्डीने पाँच बाणोंसे कालकूटको गिरा दिया। महाबली वीरभद्रने भी उस समरभूमिमें क्रोधित होकर वज्रदंष्ट्रपर चार तीक्ष्ण बाणोंका प्रहार किया, उन बाणोंका निवारण करके उसने वीरभद्रपर तीन बाणोंका प्रहार किया ॥ १४-१५ ॥ उन आते हुए बाणोंको वीरभद्रने शीघ्र ही तीन बाणोंसे काट डाला और वेगपूर्वक चलाये गये तीन बाणोंसे वज्रदंष्ट्रको गिरा दिया ॥ १६ ॥ इन्द्रने भी वज्रके प्रहारसे दैत्य त्रिपुरासुरके अमात्यको गिरा दिया। अनेक वीरोंका पतन हो जानेपर इन्द्रपुत्र जयन्तको मारनेकी इच्छासे तीक्ष्ण तलवार उठाये दैत्यपुत्र बलि उसके निकट आया। उसे इस प्रकार आते देखकर एक पंखयुक्त बाणसे [जयन्तने उसके] खड्गको काट डाला ॥ १७-१८ ॥ पुनः जयन्तने शीघ्र ही दैत्यपुत्र बलिपर तीन बाणोंसे प्रहार किया। उससे आहत होकर वह रक्तका वमन करते हुए मूर्च्छित होकर गिर पड़ा ॥ १९ ॥ इस प्रकार सम्पूर्ण सेनाके नष्ट-भ्रष्ट हो जानेपर देवसमूहद्वारा पीड़ित होकर चारों ओर पलायन कर रहे दैत्योंको देखकर कुछ विजयी प्रमथगण उनके पीछे दौड़ पड़े। इस प्रकार देवताओंकी विजय होने और अपनी सेनाके पलायन कर जानेपर भी त्रिपुरमें अधिष्ठित असुर त्रिपुरासुर स्वयं ही ईश्वर [भगवान् शंकर]-से युद्ध करनेके लिये आया। पहले उन दोनोंने शस्त्र-युद्ध किया और तत्पश्चात् अस्त्रोंसे युद्ध किया ॥ २०-२२ ॥ उस दैत्य त्रिपुरासुरने वरुणास्त्र छोड़ा, जिससे भयंकरसे-भी-भयंकर वर्षा होने लगी। उस समय अत्यधिक कुहासा छा जानेके कारण कुछ भी ज्ञात नहीं हो रहा था ॥ २३ ॥ उस कोलाहलपूर्ण, भयंकर और अत्यन्त कठिनाईसे जीते जा सकनेवाले युद्धमें कभी-कभी बिजलीकी चमकसे ही अपने-परायेका ज्ञान हो पाता था ॥ २४ ॥ वर्षा और आँधीसे पीड़ित उस अपनी सम्पूर्ण सेनाको उपलवृष्टिके भयसे दसों दिशाओंमें भागते देखकर गिरिशायी भगवान् शंकरने तुरंत वायव्यास्त्र छोड़ा। [उससे उत्पन्न] महान् वायुसे विशाल बादल खण्ड-खण्ड होकर आकाशमें बिखर गये ॥ २५-२६ ॥ दैत्योंकी सम्पूर्ण सेना वायुवेगसे घूमने लगी। पक्षियोंके पंखोंसे युक्त वीरोंकी पगड़ियाँ दूर-दूरतक उड़ गयीं। कुछ रथ, अश्व और हाथीसवार सैनिक गिरकर चूर-चूर हो गये, उन्मूलित वृक्षों और लताओंने सैनिकोंको आच्छादित कर लिया ॥ २७-२८ ॥ तब दैत्य त्रिपुरासुरने पर्वतास्त्रसे उस वायुका निवारण किया और अपने तूणीरसे एक बाण लेकर उसे आग्नेयास्त्रसे अभिमन्त्रितकर धनुषको कानतक खींचकर शिवकी सेनापर छोड़ दिया। उससे सहसा सब कुछ भस्म कर डालनेवाली अंगारोंकी वर्षा होने लगी ॥ २९-३० ॥ उस समय ज्वालामालाओंसे पीड़ित सम्पूर्ण शिवसेना उसे प्रलयकाल ही मानने लगी। उन देदीप्यमान ज्वालाओंसे एक महाभयंकर पुरुषका प्राकट्य हुआ, जिसका सिर नभतलको स्पर्श कर रहा था। उसका मुख भयंकर दाढ़ोंसे युक्त था। वह भूखसे पीड़ित और उच्च स्वरमें चिल्ला रहा था ॥ ३१-३२ ॥ वह अपनी सौ योजन विस्तृत जिह्वाको लपलपा रहा था और अपनी नासिकासे छोड़ी गयी वायुके वेगसे युद्धभूमिमें हाथियोंको घुमाते हुए उस सेनाका उसी प्रकार भक्षण करने लगा, जैसे पक्षिराज गरुड़ सर्पोंका भक्षण करते हैं ॥ ३३ १/२ ॥ तब उस पुरुषसे अत्यन्त पीड़ित भगवान् शंकरकी सेना भागने लगी और शिवके पीछे छिपकर 'रक्षा करो, रक्षा करो'-ऐसा कहने लगी ॥ ३४ १/२ ॥ तब गिरिजापति शिवने उस सेनाको 'भय मत करो'-ऐसा कहकर अभयदान दिया और पर्जन्यास्त्रका

उ०ख०-अ०४४] * नारदजीके निर्देशसे भगवान् शंकरका तप करके गणेशजीको प्रसन्न करना * १२९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 प्रक्षेपण करके उस अग्निका निवारण कर दिया और एक | पार्वती निर्भयतापूर्वक रहने लगीं। तदनन्तर वह दैत्य बाणके प्रहारसे उस घोर पुरुषको गिरा दिया ॥ ३५-३६ ॥ | (त्रिपुरासुर) भी उन्हें पकड़ ले जानेकी इच्छासे तदनन्तर वह पुरुष [पुनः] उठकर शिवजीके | हिमालयपर्वतपर आया, परंतु हे मुनिश्रेष्ठ ! उसने कहीं सैनिकोंका भक्षण करने लगा, तब वे प्रमथगण भयसे | गिरिराजनन्दिनी पार्वतीको नहीं देखा ॥ ४१-४२१/२ ॥ विह्वल होकर भागने लगे ॥ ३७॥ | वहाँ भ्रमण करते हुए उसने चिन्तामणि गणेशकी वे लुढ़कते, गिरते, हाँफते हुए काँपने लगे थे और | एक मंगलमयी मूर्ति देखी, जो सहस्रों सूर्योंके सदृश शिवजी भी निःसहाय होकर गुफामें चले गये ॥ ३८ ॥ | प्रकाशमान और अनेक प्रकारके अलंकारोंसे शोभायमान षडानन स्कन्द आदि वीरोंने भी उन्हींका अनुसरण | थी। उस त्रैलोक्यसुन्दरी मूर्तिको शीघ्र ग्रहणकर वह किया। तब दैत्य त्रिपुरासुरने [मनमें] यह विचारकर कि | अपने स्थानको चला आया। उस समय वह स्तुतिपाठ पर्वतपर गिरिराजनन्दिनी पार्वती अकेली हैं, वह रणभूमि | करनेवाले वन्दीजनोंसे घिरा हुआ था और अनेक छोड़कर उनके अपहरणकी इच्छासे मन्दराचलपर गया। | प्रकारके वाद्य बज रहे थे ॥ ४३-४४१/२॥ तब दूरसे ही उसे आते देखकर गिरिराजनन्दिनी पार्वती काँपने | तदनन्तर वह सर्वत्र विजयी और बलवान् दैत्य लगीं और अपने पिताके पास जाकर बोलीं कि क्या वह | पातालमें गया। वहाँ जाते ही वह चिन्तामणिगणेशकी दैत्य मुझे हरण करके ले ही जायगा ? ॥ ३९-४०१/२ ॥ | मूर्ति उसके हाथसे अन्तर्धान हो गयी। वह एक अद्भुत- पार्वतीके उस वचनको सुनकर [पिता हिमालयने] | सी घटना घटित हुई। उस घटनाको ही अपशकुन मानकर उन्हें ले जाकर एक अत्यन्त दुर्गम गृहमें रख दिया, जो | वह पुनः अपने नगरमें वापस लौट गया और अत्यन्त स्वयं उनके अतिरिक्त सबके लिये अज्ञात था। वहाँ वे | खिन्नचित्त होकर घोर चिन्तामें पड़ गया ॥ ४५-४७॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शंकरजीकी पराजयका वर्णन' नामक तैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४३ ॥ चौवालीसवाँ अध्याय नारदजीके निर्देशसे भगवान् शंकरका तप करके गणेशजीको प्रसन्न करना व्यासजी बोले—[हे ब्रह्मन्!] तब त्रिपुरासुरसे | उन्हें देखकर भगवान् शिव वैसे ही हर्षित हो उठे, पराजित शम्भुने क्या किया? कैसे उस जयशाली दैत्य | जैसे कोई मुमूर्षु व्यक्ति अमृतको प्राप्त करके हर्षित हो त्रिपुरासुरपर उन्होंने विजय प्राप्त की? ॥ १ ॥ | उठता है। उन्होंने उन्हें आसनपर विराजमानकर उनका ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] तब भूतलको | विधिवत् पूजन किया ॥ ५ ॥ स्वाहा और स्वधासे विहीन (देवकार्य और पितृकार्यसे | चिन्तासे अत्यन्त आतुर उन शिवने उनका आलिंगन विहीन) समझकर भगवान् शम्भु मनमें बार-बार चिन्ता | करके देवताओंके हित और दैत्यके वधकी इच्छासे उनसे करने लगे कि देवगण कब कष्टसे मुक्त होंगे और अपने | कहा—॥ ६ ॥ स्थानको प्राप्त कर सकेंगे अथवा किस उपायसे इस | शिवजी बोले—[हे मुनिवर !] दैत्य त्रिपुरासुरने दुर्जय [दैत्य]-की पराजय होगी? ॥ २-३ ॥ | सम्पूर्ण देवताओंको बलपूर्वक पराजितकर उनकी दुर्दशा उनके इस प्रकार चिन्तातुर होनेपर संयोगसे [उसी | कर दी है। उसके साथ संग्राममें सभी देवताओंको समय] मुनिश्रेष्ठ नारदजी भगवान् शंकर और सभी | विफलमनोरथ होकर भागना पड़ा ॥ ७ ॥ देवताओंको देखनेके लिये आये ॥ ४ ॥ | हे ब्रह्मन् ! वे देवता दसों दिशाओंमें भाग गये हैं।

अस्त्रोंसे [टकराकर] सहस्रों खण्ड हो गये हैं॥८॥

१३० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-


[बायाँ स्तम्भ]

मैं नहीं जानता कि कौन कहाँ है। मेरे भी अस्त्र उसके अस्त्रोंसे [टकराकर] सहस्रों खण्ड हो गये हैं॥८॥ ब्रह्माजी कहते हैं- [हे व्यासजी!] मुनिश्रेष्ठ नारदजीने शिवजीके वचन सुनकर तीनों लोकोंके ईश्वर शिवके पराभवको परम आश्चर्यका विषय मानते हुए उनसे कहा- ॥९॥ नारदजी बोले- हे प्रभो! आप सब कुछ जाननेवाले, सम्पूर्ण विद्याओंके स्वामी, सबके स्वामी, सब कुछ करनेवाले, सबके रक्षक, सबका संहार करनेवाले, सबका नियमन करनेवाले, कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ, अणिमादि सिद्धियोंसे युक्त तथा षड् ऐश्वर्यों*के साथ विलास करनेवाले हैं। हे देव! आप समस्त वक्ताओंमें श्रेष्ठ हैं; मैं गायनमें आसक्त होकर त्रिलोकीमें निरन्तर भ्रमण करनेवाला मुनि आपके समक्ष क्या कह सकता हूँ? फिर भी आपके वचनोंका मान रखनेके लिये विचार करके कुछ कहता हूँ॥१०-१२१/२॥ ब्रह्माजी कहते हैं- [हे व्यासजी!] इस प्रकार कहकर और क्षणभर ध्यान करके मुनि [नारदजी]-ने शिवजीसे पुनः कहा- ॥ १३॥ नारदजी बोले- हे वह्निनेत्र (जिनके नेत्रमें अग्निका निवास है)! हे पिनाकधृक् (पिनाक नामक धनुष धारण करनेवाले)! आपने युद्धके लिये जब प्रस्थान करनेकी कामना की थी, उस समय आपने गणोंके अधिपति गणेशजीका अर्चन नहीं किया था, इसीलिये आप पराभवको प्राप्त हुए। इस समय पहले आप विघ्नोंका निवारण करनेवाले विघ्नेश्वरका अर्चन कीजिये, उन्हें आदरपूर्वक प्रसन्न करके, उनसे वर प्राप्तकर युद्धके लिये प्रस्थान कीजिये। आप उस दैत्यको पराजित करेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं है॥ १४-१५१/२॥ उस [दैत्य]-ने भी पूर्वकालमें महान् तपस्याके


[दायाँ स्तम्भ]

द्वारा उन देव [भगवान् गणेश]-की आराधना की थी। उस तपके फलस्वरूप उन अखिल विघ्नसमूहोंके हर्ता गणेशजीने उसे वर दिया था कि महेश्वरसे अतिरिक्त और किसीसे भी तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी॥ १६-१७॥ इसलिये हे गिरिशायी शिव! आप उसके इच्छानुसार गमन करनेवाले त्रिपुर (स्वर्ण, रजत और लौहनिर्मित तीन विमानों)-को एक बाणसे विदीर्ण कर दीजिये- यही आपकी विजयका उपाय कहा गया है॥ १८॥ ब्रह्माजी बोले- गजमुख गणेशजीद्वारा कही गयी वाणीको स्मरणकर और मुनिश्रेष्ठ नारदजीद्वारा [कहे गये] उपायका श्रवणकर गिरिशायी भगवान् शंकर अत्यन्त हर्षित हुए और उन्होंने पुनः उनसे कहा- ॥ १९॥ शिवजी बोले- हे ब्रह्मन्! आपने सत्य कहा है। हे मुने! आपकी बातसे मुझे पूर्वकालमें [गणेशजीद्वारा] उपदिष्ट दो मन्त्रोंका स्मरण हो आया है। उनमेंसे एक षडक्षर और दूसरा एकाक्षर मन्त्र है। वे दोनों [मन्त्र] संकटका हरण करनेवाले हैं। युद्धमें विशेष रूपसे संलग्न चित्तवाला होनेके कारण न तो मैं उन दोनों मन्त्रोंका जप कर सका, न सम्यक् रूपसे स्मरण ही कर सका॥ २०-२१॥ सम्पूर्ण विघ्नोंका हरण करनेवाले, सबके कारणस्वरूप, सृजन-पालन और संहार करनेवाले गजानन भगवान् विनायकका मैंने स्मरण भी नहीं किया था॥ २२॥ [नारद] मुनि बोले- हे महादेव! उन महान् देव गजानन गणेशजीको आप प्रसन्न कीजिये॥ २२१/२॥ ब्रह्माजी कहते हैं- [हे व्यासजी!] तब नारदजीको विदाकर भगवान् शिव तपस्या करनेके लिये चले गये॥ २३॥ उन्होंने दण्डकारण्यदेशमें पद्मासनपर स्थित होकर बलपूर्वक इन्द्रियोंका नियमन करके [गणेशजीके] ध्यानमें


[पाद-टिप्पणी / Footnote]

* सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः। अनन्तशक्तिश्च महेश्वरस्य यन्मानसैश्वर्यमवैति वेदः॥ (शिवपुराण, विद्येश्वरसंहिता १८। १२) अर्थात् सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादिबोध, स्वतन्त्रता, नित्य अलुप्त शक्ति आदिसे संयुक्त होना और अपने भीतर अनन्त शक्तियोंको धारण करना-महेश्वरके इन छः प्रकारके मानसिक ऐश्वर्योंको केवल वेद जानता है।

उ०ख०-अ०४५ ] * शिवकृत गणपतिस्तुति * १३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ - उपरि भाग] तत्पर होकर [गणेशमन्त्रका] जप किया ॥ २४ ॥ [इस प्रकार] उन भगवान् शंकरने सौ वर्षोंतक उग्र तप किया, तब उनके मुखकमलसे एक श्रेष्ठ पुरुष आविर्भूत हुआ ॥ २५ ॥ उसके पाँच मुख, दस भुजाएँ, मस्तकपर चन्द्रमा, गलेमें मुण्डोंकी माला, सर्पोंके आभूषण, [सिरपर] मुकुट और [हाथोंमें] बाजूबन्द शोभित हो रहे थे। उसकी [श्रीविग्रहकी] प्रभा चन्द्रमाके समान थी ॥ २६ ॥ उसकी कान्ति अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाकी कान्तिको तिरस्कृत कर रही थी। उसने [अपनी दसों भुजाओंमें] दस आयुध धारण कर रखे थे। उसकी कान्तिसे धर्षित उन भगवान् शिवने उस उग्र स्वरूपवाले [श्रेष्ठ पुरुष]- को अपने सम्मुख स्थित देखा ॥ २७ ॥ उस दूसरे पंचमुख शिवके समान पंचमुख विनायकको देखकर भगवान् शिवने विचार किया कि क्या मैं ही दो शरीरवाला हो गया हूँ ! ॥ २८ ॥ अथवा क्या मेरा ही रूप धारण करके यह त्रिपुरासुर आ गया है? क्या तैंतीस करोड़ देवताओंमें कोई दूसरा भी पाँच मुखवाला है? ॥ २९ ॥

[दायाँ स्तम्भ - उपरि भाग] अथवा मैंने यह कोई दीर्घकालिक स्वप्न देख लिया है या सम्पूर्ण विघ्नोंका हरण करनेवाले जिन [इष्ट-] देवका मैं रात-दिन ध्यान करता हूँ, वे गजानन ही मुझे वर देनेके लिये आ गये हैं ! ॥ ३०१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] उन [शिव]- के इस प्रकारके वचन सुनकर गजानन गणेशजीने कहा— हे देव ! आप अपने अन्तःकरणमें जिसका ध्यान करते हैं, मैं वही विघ्नहर्ता विभु हूँ। मेरे स्वरूपको देवता, ऋषि और चार मुखोंवाले ब्रह्माजी भी नहीं जानते हैं ॥ ३१-३२ ॥ उपनिषदोंसहित वेद भी मेरे स्वरूपको नहीं जानते तो षट्शास्त्रियों (षड्दर्शन¹के जाननेवालों)-की तो बात ही क्या ? मैं ही अखिल भुवनोंका सृजन, रक्षण और संहार करनेवाला हूँ ॥ ३३ ॥ ब्रह्मासे लेकर त्रिगुण (सत्त्व, रज, तम)-से युक्त सम्पूर्ण स्थावर-जंगमात्मक प्राणियोंका मैं ही स्वामी हूँ। तुम्हारी इस तपस्यासे सन्तुष्ट होकर मैं तुम्हें वर देनेके लिये यहाँ आया हूँ। हे महादेव ! आप जितने वरदान चाहते हों, उन्हें मुझसे माँग लें, मैं आपपर सन्तुष्ट हूँ, अतः वे सभी वर प्रदान करूँगा, इसमें सन्देह न करो ॥ ३४ ॥

[मध्य भाग] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'तपोवर्णन' नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४४ ॥ पैंतालीसवाँ अध्याय शिवकृत गणपतिस्तुति

[बायाँ स्तम्भ - निचला भाग] [व्यास] मुनि बोले—[हे ब्रह्मन् !] तब प्रसन्न हुए विघ्नहर्ता देवाधिदेव विघ्नेश्वरके भगवान् शंकरको वर देनेके लिये उत्सुक होनेपर उन सदाशिवने क्या-क्या वर माँगे थे? ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] गणेशजीके वचनको सुनकर उन वर प्रदान करनेवाले अपने ही सदृश स्वरूपवाले (पंचमुखस्वरूपवाले) गजाननकी वन्दना करके शिवजीने ये वाक्य कहे— ॥ २ ॥

[दायाँ स्तम्भ - निचला भाग] शिवजी बोले—हे देव ! [आपका दर्शनकर] आज मेरे दसों नेत्र धन्य हो गये, आज आपका पूजनकर मेरी [दसों] भुजाएँ धन्य हो गयीं। आपको नमन करनेसे [मेरे] पाँचों सिर धन्य हो गये और आपकी स्तुति करनेसे मेरे पाँचों मुख धन्य हो गये ॥ ३ ॥ पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश (पंच महाभूत); गन्ध, रस, स्पर्श, रूप और शब्द (पंचतन्मात्राएँ); मन एवं इन्द्रियाँ², दिशाएँ, गणनात्मक काल (समय),

[पाद-टिप्पणी] १. 'दृश्यते अनेन इति दर्शनम्' अर्थात् 'दर्शन' शब्दका तात्पर्य है कि जिस शास्त्र या चिन्तनप्रक्रियाद्वारा किसी वस्तुके तात्त्विक-स्वरूपको जाना जाय। दर्शन छः हैं—१. मीमांसा, २. वेदान्त, ३. न्याय, ४. वैशेषिक, ५. सांख्य और ६. योग। २. इन्द्रियाँ दो प्रकारकी होती हैं—१. ज्ञानेन्द्रियाँ और २. कर्मेन्द्रियाँ। ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं—१. श्रोत्र, २. त्वक्, ३. चक्षु, ४. रसना और घ्राण। कर्मेन्द्रियाँ भी पाँच हैं—१. वाक्, २. पाणि, ३. पाद, ४. पायु और उपस्थ। इस प्रकार कुल दस इन्द्रियाँ हैं।

१३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गन्धर्व, यक्ष, पितर, मनुष्य, देवर्षि, सभी देवगण, ब्रह्मा, | सभीके सम्पूर्ण कार्योंमें, चाहे वे वैदिक हों या लौकिक, इन्द्र, रुद्र१, वसुगण२, साध्यगण३—सम्पूर्ण स्थावर- | शुभ हों या अशुभ—सबमें आप ही प्रयत्नपूर्वक सर्वप्रथम जंगम प्राणी आपसे ही उत्पन्न हुए हैं॥ ४-५॥ | अर्चनीय हैं। हे देव! चूँकि आप यक्षों, विद्याधरों और हे अनन्यबुद्धे! आप रजोगुणका आश्रय लेकर इस | सर्पोंसहित सभी लोगोंके मंगल (हित, कल्याण, क्षेम)- विश्वका सृजन करते हैं, सत्त्वगुणका आश्रय लेकर | के अधिपति हैं और [विशेषरूपसे] अपने भक्तोंका इसकी रक्षा करते हैं और तमोगुणका आश्रय लेकर | मंगल करनेवाले हैं, इसीलिये आप मंगलमूर्ति [कहे इसका संहार करते हैं। हे गणेश! आप शाश्वत, निष्काम | जाते] हैं॥ १०—१११/२॥ और सम्पूर्ण कर्मोंके साक्षी हैं॥ ६॥ | हे ईश! पूर्वकालमें दैत्यश्रेष्ठ [त्रिपुरासुर]-के साथ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी!] तदनन्तर मैंने | युद्धमें आपका अर्चन, आपका स्मरण और आपका शिवजीकी आज्ञासे उन भगवान् गणेशसे जो कुछ कहा | वन्दन न करनेके कारण मैं पराभवको प्राप्त हुआ, था और जो उनका नाम रखा; हे महामते! उसे सुनिये। | इसलिये मैं आपके चरणोंकी शरणमें आया हूँ। हे [मैंने गणेशजीसे कहा—] मातृकाओं४में जो प्रथम बीज | सर्वशक्तिमान्! आप मेरे अपराधको क्षमा करें और अक्षर 'ॐ' है, जो कि श्रुतिका मूल है, वही आपका | सम्पूर्ण युद्धोंके समय मुझे जय प्रदान करें॥ १२-१३॥ नाम है; क्योंकि आप गणोंके ईश हैं, इसलिये आपका | हे देव! जो आपका सर्वथा भजन नहीं करते, वे 'गणेश' नाम हो। गणाधिपतिके द्वारा 'ओम्'—इस | मूर्ख और दरिद्र होंगे। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक आपका प्रकार कहे जानेपर भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये और | भजन करते हैं, वे सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाली उन्होंने ये वरदान प्रदान किये—॥ ७—८१/२॥ | सिद्धि प्राप्त करेंगे॥ १४॥ शिवजी बोले—हे ईश! जो [अपने] सम्पूर्ण | ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी!] यह सुनकर कार्यों [-के आरम्भ]-में आपका स्मरण करता है, उसे | अखिलवाक्यार्थविशारद गणेशजीने शिवजीसे कहा कि कार्यसिद्धिमें अविघ्नताकी प्राप्ति होती है॥ ९॥ | हे उमेश! आप जब-जब मेरा स्मरण करेंगे, तब-तब मैं बिना आपकी स्मृतिके कृमि-कीटोंको भी अपनी | [शीघ्र ही] आपके पास आ जाऊँगा॥ १५॥ मनोकामनाकी सिद्धि नहीं प्राप्त होती। शैव, आपके भक्त | हे महेश्वर! आप मेरे नामके बीजमन्त्र५से एक बाणको (गणेश-उपासक), वैष्णव, शाक्त और सूर्योपासक— | अभिमन्त्रित करके उससे उस दैत्य त्रिपुरासुरसहित उसके १. रुद्र एकादश हैं— हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः। वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा॥ मृगव्याधश्च शर्वश्च कपाली च विशांपते। एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः॥ (हरिवंशपुराण १।३।५१-५२) हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली—ये ग्यारह रुद्र कहलाते हैं। २. वसु आठ हैं— धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः॥ (महा० आदि० ६६।१८) धर, ध्रुव, सोम, अहः, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—इन आठोंको वसु कहते हैं। इनमें अनल (अग्नि) वसुओंके राजा, देवताओंको हवि पहुँचानेवाले और भगवान्के मुख माने जाते हैं। ३. साध्यदेवता बारह हैं— मनोऽनुमन्ता प्राणश्च नरो यानश्च वीर्यवान्॥ चित्तिर्हयो नयश्चैव हंसो नारायणस्तथा। प्रभवोऽथ विभुश्चैव साध्या द्वादश जज्ञिरे॥ (वायुपुराण ६६।१५-१६) मन, अनुमन्ता, प्राण, नर, यान, चित्ति, हय, नय, हंस, नारायण, प्रभव और विभु—ये बारह साध्यदेवता हैं। ४. 'अ' से 'क्ष' तक कुल ५२ मातृकाएँ हैं। 'ॐ' = अ+उ+म्' होने से 'ॐ' को प्रथम बीजाक्षर कहा गया है। ओंकारमाद्यं प्रवदन्ति संतो वाचः श्रुतीनामपि यं गृणन्ति। गजाननं देवगणान्ताङ्घ्रिं भजेऽहमर्धेन्दुकृतावंतसम्॥ ५. गणेशजीका बीजमन्त्र 'गं' है।

उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १३३ तीनों पुरोंको मेरे प्रतापसे गिराकर भस्मसात् कर दें ॥ १६ ॥ प्रकारके दान देकर वरदाता देव गणेशजीका भलीभाँति तदनन्तर भक्तिसे परितुष्ट चित्तवाले गणाधिपति पूजन करके उन्हें पुनः नमस्कार किया ॥ २० ॥ गणेशजीने उन विनम्र शिवजीको सम्यग् रूपसे अपने तब [देवताओं, मुनियों, सिद्धों और ब्राह्मणों-] सहस्र नाम बतलाये, जो सभी लोगोंके लिये विजय प्रदान सभीने कहा कि यह मणिपूर* [गणपति-क्षेत्रके रूपमें] करनेवाले और मनोकामना पूर्ण करनेवाले हैं ॥ १७ ॥ सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात हो। भगवान् गणेश तथा अन्य और उन्होंने यह भी कहा कि [हे शिव!] युद्धके सबके द्वारा 'तथास्तु' कहे जानेके उपरान्त वे देवगण समय आप इसका पाठ करें, इससे आप शीघ्र ही और गणाधिपति गणेशजी अन्तर्धान हो गये ॥ २१ ॥ दैत्योंका वध कर देंगे। तीनों सन्ध्याओंमें इसका जप मुनिगणों और देवताओंसहित गणेशजीके अन्तर्धान करनेसे मनुष्योंकी सभी कामनाएँ और सम्पूर्ण अभीष्ट हो जानेपर अपने गणोंसे घिरे हुए शिवजी भी अपने कार्य सिद्ध हो जाते हैं ॥ १८ ॥ निवास-स्थलको चले आये; जो गन्धर्वों, यक्षगणों और गजानन गणेशजीके वचन सुनकर शिवजीने उनका देवांगनाओंसे घिरा हुआ था। वहाँ उन्होंने परम प्रसन्नतापूर्वक सम्यक् रूपसे पूजन किया और अत्यन्त हर्षित हुए। गिरिराजनन्दिनी पार्वतीसे अपना सारा वृत्तान्त कहा। उन्होंने महागणेशकी [मूर्तिकी] स्थापना की और शीघ्र शिवजीके मुखसे निकली उस अमृतमयी वाणीको सुनकर ही उनके सुदृढ़ एवं उच्च प्रासाद (मन्दिर)-का निर्माण पत्नियोंसहित सभी देवेश्वर, मुनिगण, मुनिपत्नियों और करा दिया ॥ १९ ॥ योगीश्वर प्रसन्न हो गये, उन्होंने त्रिपुरासुरको मरा हुआ तदनन्तर शिवजीने देवताओं, मुनियों और सिद्धगणोंको और भगवान् शिवके अनुग्रहसे अपने अधिकारोंको पुनः भलीभाँति तृप्त करके और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको विविध प्राप्त हुआ मान लिया ॥ २२-२३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शिवको वरदान' नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥ छियालीसवाँ अध्याय श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र व्यासजीने पूछा—सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेमें विघ्नशान्तिका उपाय पूछा। भगवान् शिवद्वारा की गयी तत्पर रहनेवाले पितामह ! गणेशजीने भगवान् शिवके उस पूजासे संतुष्ट होकर महागणपतिने स्वयं उनसे अपने प्रति अपने सहस्र नामोंका उपदेश किस प्रकार किया, इस सहस्रनामका वर्णन किया। यह समस्त विघ्नोंका यह मुझे बताइये ॥ १ ॥ एकमात्र हरण करनेवाला तथा सम्पूर्ण मनोवांछित ब्रह्माजीने कहा—ब्रह्मन् ! कहते हैं, पूर्वकालमें फलोंको देनेवाला है ॥ ३-५ ॥ त्रिपुरारि महादेवजीने जब त्रिपुरविजयके लिये उद्योग विनियोग किया, उस समय पहले गणेशजीकी अर्चना न करनेके अस्य श्रीमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य महागणपति- कारण वे विघ्नोंसे घिर गये ॥ २ ॥ ऋषिः। अनुष्टुप् छन्दः। महागणपतिर्देवता। गं बीजम्। हुं तदनन्तर विघ्नका क्या कारण है, यह मन-ही-मन शक्तिः। स्वाहा कीलकम्। चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धयर्थे जपादौ निश्चय करके शिवजीने भक्तिभावसे महागणपतिकी विनियोगः। विधिपूर्वक पूजा की और उन अपराजित देवने उनसे इस 'श्रीमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्र-मन्त्र' के 'महा- *महाराष्ट्रके पूना जिलेमें पूनासे ३१ मीलकी दूरीपर स्थित 'राजणगाँव' को मणिपूरक्षेत्र कहा जाता है। यह अष्ट गणपति-क्षेत्रोंमेंसे एक है। यहाँके श्रीविग्रहको 'महागणपति' कहते हैं। ये अष्ट विनायकोंमेंसे एक हैं। मन्दिरके तहखानेमें रखी मूर्ति 'महोत्कट' कहलाती है, उसके दस सूँड़ और बीस भुजाएँ हैं। कहा जाता है कि मुस्लिम आक्रांताओंसे रक्षाके लिये इसे छिपाकर रखा गया था।

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१३४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गणपति' ऋषि हैं, 'अनुष्टुप्' छन्द है, 'महागणपति' देवता | अग्रभागमें माणिक्य-निर्मित कलश ले रखा है, जिसके हैं, 'गं' बीज है, 'हुं' शक्ति है एवं 'स्वाहा' कीलक है। मुखभागसे रत्नोंकी वर्षा हो रही है और जिसके द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चार पुरुषार्थोंकी सिद्धिके वे अपने धनार्थी साधक भक्तोंको तृप्त कर रहे हैं। लिये जप आदिमें इसका विनियोग होता है। कपोलोंपर झरते हुए मदसे वे विह्वल हैं। उनके मस्तकपर ऋष्यादिन्यास मणिमय मुकुट शोभा देता है तथा वे सम्पूर्ण आभूषणोंसे ॐ महागणापतये ऋषये नमः, शिरसि। अनुष्टुप्छन्दसे विभूषित हैं। ऐसे महागणपतिकामैं ध्यान करता हूँ। नमः, मुखे। महागणपतिदेवतायै नमः, हृदि। गं बीजाय नमः, इस तरह ध्यान करके 'ॐ गणेश्वरः' इत्यादिसे गुह्ये। हुं शक्तये नमः, पादयोः। स्वाहा कीलकाय नमः, नाभौ। आरम्भ होनेवाले 'श्रीमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्र' का -इन छः वाक्योंको पृथक्-पृथक् पढ़कर क्रमशः पाठ करना चाहिये- मस्तक, मुख, हृदय, गुदाभाग, दोनों चरण तथा नाभिका ध्यान स्पर्श दाहिने हाथसे करे। ॐ सच्चिदानन्दस्वरूप, १. गणेश्वरः-आकाशादि ध्यान प्रपंचके समूहको 'गण' कहते हैं, वह गण उनका हस्तीन्द्राननमिन्दुचूड़मरुणच्छायं त्रिनेत्रं रसा- स्वरूप है और वे उस गणके ईश्वर हैं, इसलिये जिन्हें दाश्लिष्टं प्रियया सपद्मकरया स्वाङ्कस्थया संततम्। 'गणेश्वर' कहा गया, वे श्रीगणेश; २. गणक्रीडः*- बीजापूरगदाधनुस्त्रिशिखयुक्चक्राब्जपाशोत्पल- गणक्रीड-नामक गुरुस्वरूप; अथवा आकाशादि गणके व्रीह्यग्रस्वविषाणरत्नकलशान् हस्तैर्वहन्तं भजे॥ भीतर प्रवेश करके क्रीड़ा करनेके कारण 'गणक्रीड' जिनका गजराजके समान मुख है; जिनके मस्तकपर नामसे प्रसिद्ध; ३. गणनायः-गणोंके नाथ एवं जिनका चन्द्रमाका मुकुट है; जिनकी अंगकान्ति अरुण है; जो गणन-गुणोंकी गणना करना मंगलमय है, वे भगवान् तीन नेत्रोंसे सुशोभित हैं; जिन्हें हाथमें कमल धारण गणपति; ४. गणाधिपः-आदित्यादि गणदेवताओंके करनेवाली अंकगत प्रिया (सिद्धलक्ष्मी)-का परिरंभग अधिपति; ५. एकदंष्ट्रः-भूमिका उद्धार अथवा जगत्का सदा प्राप्त है तथा जो अपने दस हाथोंमें क्रमशः बीजापुर नाश करनेके निमित्त जिनकी एक ही दंष्ट्रा (दाढ़) है, (बिजौरा नीबू या अनार), गदा, धनुष, त्रिशूल, चक्र, वे भगवान् गणेश; ६. वक्रतुण्डः-वक्र-टेढ़े तुण्ड- कमल, पाश, उत्पल, धानकी बाल तथा अपना ही टूटा शुण्ड-दण्डसे युक्त; ७. गजवक्त्रः-गज अर्थात् हाथीके दाँत धारण करते हैं एवं शुण्डमें रत्नमय कलश लिये हुए समान मुखवाले; ८. महोदरः-अनन्तकोटि ब्रह्माण्डको हैं; उन गणपतिकामैं भजन (ध्यान) करता हूँ। अपने भीतर रखनेके कारण महान् उदरवाले ॥ ६ ॥ गण्डपालीगलद्दानपूरलालसमानसान् । ९. लम्बोदरः-ब्रह्माण्डके आलम्बनरूप उदरवाले; द्विरेफान् कर्णतालाभ्यां वारयन्तं मुहुर्मुहुः ॥ १०. धूम्रवर्णः-धूम्रके समान वर्णवाले; अथवा वायुका कराग्रधृतमाणिक्यकुम्भवक्त्रविनिर्गतैः । बीज धूम्रवर्णका है, तत्स्वरूप होनेके कारण गणेशजी भी रत्नवर्षैः प्रीणयन्तं साधकान् मदविह्वलम् । 'धूम्रवर्ण' कहे गये हैं; ११. विकटः-कट अर्थात् माणिक्यमुकुटोपेतं सर्वाभरणभूषितम् ॥ आवरणसे रहित विभुस्वरूप; १२. विघ्ननायकः- गणेशजीके गण्डस्थलसे मदकी धारा बह रही है। अभक्तसमुदायके प्रति विघ्नोंका नयन करनेवाले; या उसका आस्वादन करनेके लिये भ्रमरोंकी भीड़ टूटी विघ्नोंके अधिपति; अथवा प्राणियोंका विहनन एवं नयन पड़ती है। उन भ्रमरोंको वे अपने ताड़पत्रके समान करनेवाले; १३. सुमुखः-मुखका अर्थ है-आरम्भ; कानोंद्वारा बारम्बार हटाते हैं। उन्होंने अपने शुण्डदण्डके जिनसे सम्पूर्ण आरम्भ सुन्दर या शोभन होते हैं, वे; * गणेशके शिष्य गणक्रीड हैं, जो विकटके गुरु हैं, विकटके शिष्य विघ्ननायक हैं। ये तीनों गुरु एवं गणेशरूप कहे गये हैं (खद्योतभाष्य)।

उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १३५


अथवा सुन्दर मुखवाले; १४. दुर्मुखः — जिनके मुखका स्पर्श करना दुष्कर है; अथवा अग्नि और सूर्यके रूपमें जिनकी ओर देखना अत्यन्त कठिन है, वे; १५. बुद्धः — नित्य बुद्धस्वरूप अविद्यावृत्तिके नाशक; अथवा बुद्धावतारस्वरूप; १६. विघ्नराजः — विघ्नोंके साथ विराजमान; अथवा विघ्नोंके राजा; किंवा जो विघ्न-भक्ताधीन तथा राजा हैं, वे भगवान् गणेश; १७. गजाननः — गजों-हाथियोंको अनुप्राणित — प्राणशक्तिसे सम्पन्न करनेवाले ॥ ७ ॥

१८. भीमः — दुष्टोंके लिये भयदायक होनेसे 'भीम' नामसे प्रसिद्ध; १९. प्रमोदः — अभीष्ट वस्तुके लाभसे होनेवाले सुखका नाम है — 'प्रमोद', तत्स्वरूप; २०. आमोदः — प्रमोदसे पहले अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिके निश्चयसे जो सुख होता है, उसे 'आमोद' कहते हैं, ऐसे आमोदस्वरूप; २१. सुरानन्दः — देवताओंके लिये आनन्दप्रद; २२. मदोत्कटः — गण्डस्थलसे झरनेवाले मदके कारण उत्कट; अथवा मदसे आवरणका उत्क्रमण करनेवाले; २३. हेरम्बः — 'हे' का अर्थ है — शंकर तथा 'रम्ब' का अर्थ है — शब्द। शैवागमके प्रवर्तक होनेसे 'हेरम्ब' नामवाले; अथवा उद्यम-शौर्यसे युक्त होनेके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध; २४. शम्बरः — 'शम्' अर्थात् सुख है वर — श्रेष्ठ जिनमें, वे; २५. शम्भुः — जिनसे 'शम्' अर्थात् कल्याणका उद्भव होता है, वे; २६. लम्बकर्णः — भक्तजन जहाँ-कहीं भी गणेशजीका आवाहन या स्तवन आदि करते हैं, वहीं वे जैसे दूर न हों, इस तरह सुन लेते हैं। इसलिये लम्बे-सुदूरतक सुननेवाले कान हैं जिनके, वे; २७. महाबलः — जिनके अनुग्रहसे बलासुर महान् हो गया, वे; अथवा महान् बलशाली ॥ ८ ॥

२८. नन्दनः — समृद्धिके हेतुभूत; २९. अलम्पटः — पर्याप्त पट-वस्त्रोंसे समृद्ध; अथवा पट ही जिनका अलंकार है, वे; ३०. अभीरुः — भयशून्य; अथवा भीरु स्वभाववाली स्त्रीसे रहित; ३१. मेघनादः — मेघगर्जनाके समान नाद या सिंहनाद करनेवाले; अथवा मेघोंके नाशक; ३२. गणञ्जयः — शत्रु-समूहोंपर अनायास विजय पानेवाले; ३३. विनायकः — 'वि' अर्थात् पक्षिरूप जीव-समुदायके नेता या नायक; ३४. विरूपाक्षः — विरूप-विकट दीखनेवाले अग्नि, सूर्य तथा चन्द्ररूप नेत्रोंसे युक्त; ३५. धीरशूरः — धैर्य और शौर्यसे सम्पन्न; ३६. वरप्रदः — अपने भक्तजनोंको उत्तम एवं मनोवांछित वर प्रदान करनेवाले ॥ ९ ॥

३७. महागणापतिः — गुल्म आदि सेना-भेदोंको 'गण' कहते हैं; वे जिनकी अधीनतामें महान्-बहु-संख्यक हैं, वे; अथवा महागर्णोंके अधिपति; ३८. बुद्धिप्रियः — निश्चयात्मिका बुद्धि जिनको प्रिय है, वे; अर्थात् संशयनिवारक; ३९. क्षिप्रप्रसादनः — भक्तोंद्वारा ध्यान किये जानेपर उनके ऊपर शीघ्र प्रसन्न होनेवाले; ४०. रुद्रप्रियः — ग्यारहों रुद्रोंके प्रिय; ४१. गणाध्यक्षः — छत्तीस तत्त्वरूप गणसमुदायके पालक; ४२. उमापुत्रः — पार्वतीके पुत्र (उमाका पुन्नामक नरकलोकसे उद्धार करनेवाले); ४३. अघनाशनः — लम्बोदर या महोदर होनेपर भी स्वल्पमात्र नैवेद्यसे तृप्त होनेवाले (अघन — स्वल्प है अशन — भोजन जिनका, वे); अथवा अघके फलस्वरूप दुःखोंका नाश करनेवाले ॥ १० ॥

४४. कुमारगुरुः — सनत्कुमारस्वरूप होते हुए विद्याका उपदेश करनेके कारण गुरु; अथवा कुमार कार्तिकेयसे भी पहले उत्पन्न होनेके कारण उनके ज्येष्ठ भ्राता; ४५. ईशानपुत्रः — भगवान् शंकरके आत्मज; ४६. मूषकवाहनः — मूषक (चूहे)-को वाहन बनानेके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध; ४७. सिद्धिप्रियः — अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ जिन्हें प्रिय हैं, वे; ४८. सिद्धिपतिः — अणिमा आदि आठ सिद्धियोंके पालक; ४९. सिद्धः — गोरक्षनाथ आदि सिद्धस्वरूप; ५०. सिद्धिविनायकः — भक्तोंतक सिद्धिका नयन करनेवाले (भक्तोंको सिद्धि प्राप्त करानेवाले) ॥ ११ ॥

५१. अविघ्नः — अविभाव; अर्थात् पशुताका हनन (हरण) करनेवाले; अथवा विघ्नोंसे रहित; ५२. तुम्बुरुः — तुम्ब (अलाबू या लौकी)-के द्वारा जो रव करता है, वह 'तुम्बुरु' है। तुम्बुरु नाम है — वीणाका। वीणापर गणपतिका यशोगान होनेसे वे 'तुम्बुरु' नामसे प्रसिद्ध हैं; ५३. सिंहवाहनः — मोर और मूषककी भाँति सिंहको भी

१३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] वाहन बनानेवाले; अथवा सिंहवाहिनी देवीसे अभिन्न होनेके कारण सिंहवाहन; ५४. मोहिनीप्रियः—मोहिनीपति शिवसे अभिन्न; ५५. कटंकटः—'कट' का अर्थ है— आवरण या अज्ञान; गणेशजी ज्ञान प्रदान करके उस अज्ञानको भी ढक देते या मिटा देते हैं। इसलिये 'कटंकट' नामसे प्रसिद्ध हैं; ५६. राजपुत्रः—राजा वरेण्यके यहाँ पुत्रवत् आचरण करनेवाले; अथवा राजा— चन्द्रमाको पुत्रवत् माननेवाले; ५७. शालकः—'श' 'परोक्ष' अर्थमें है और 'अलक' शब्द 'केश' या अंशका वाचक है। जिनका एक अंश भी प्रत्यक्ष नहीं है, जो अतीन्द्रिय हैं, वे 'शालक' हैं; अथवा शालित- शोभित होते हैं, इसलिये 'शालक' हैं; ५८. सम्मितः— सर्वव्यापी होते हुए भी अंगुष्ठमात्रसे मित; ५९. अमितः— अणु, स्थूल, ह्रस्व और दीर्घ—चारों प्रकारके प्रमाणोंसे मित न होनेवाले ॥ १२ ॥ ६०. कूष्माण्डसामसम्भूतः—'कूष्माण्डैर्जुहु- यात्।'—इस कूष्माण्ड-होमविधिमें जो प्रसिद्ध मन्त्र या साम हैं, वे गणेशजीकी विभूति हैं। अतएव वे उक्त नामसे प्रसिद्ध हैं; ६१. दुर्जयः—बलवान् दैत्य जिन्हें मनसे भी जीत नहीं सकते, ऐसे; ६२. धूर्जयः— जगच्चक्रकी धुरीको अनायास वहन करनेवाले; ६३. जयः—जयस्वरूप; अथवा जय—महाभारत आदि इतिहास-पुराण जिनके रूप हैं, वे; ६४. भूपतिः— पृथ्वीके पालक, अथवा भूपति-नामसे प्रसिद्ध अग्निभ्राता; ६५. भुवनपतिः—समस्त भुवनोंके स्वामी; अथवा उक्त नामवाले अग्निभ्राता; ६६. भूतानाम्पतिः—समस्त भूतोंके पालक अथवा भूतपतिनामक अग्निभ्राता; ६७. अव्ययः— अविनाशी ॥ १३ ॥ ६८. विश्वकर्ता—संसारके स्रष्टा; ६९. विश्व- मुखः—जिनसे विश्वका मुख—आरम्भ हुआ है, वे; अथवा विश्व जिनके मुखमें है; या जो मुखकी भाँति विश्वकी वृत्तिके हेतु हैं, वे गणेश; ७०. विश्वरूपः— सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंच जिनका ही रूप है, वे; अथवा त्वष्टा-प्रजापतिके पुत्र देवपुरोहित विश्वरूपसे अभिन्न; ७१. निधिः—आकाश आदि सम्पूर्ण जगत्समूह जिनमें

[दायाँ स्तम्भ] पूर्ण रूपसे आहित या धृत है, वे; अथवा महापद्म आदि नव निधिस্বরূপ; ७२. घृणिः—सूर्यस्वरूप; ७३. कविः— सृष्टिरूप काव्यके कर्ता; ७४. कवीनामृषभः—कवियोंमें श्रेष्ठ; ७५. ब्रह्मण्यः—ब्राह्मण, वेद, तप तथा ब्रह्माके प्रति सद्भाव रखनेवाले; ७६. ब्रह्मणस्पतिः—ब्रह्म अर्थात् वाणीके अधिपति ॥ १४ ॥ ७७. ज्येष्ठराजः—'ज्येष्ठ'-संज्ञक साममें राजमान; ७८. निधिपतिः—नव निधियोंके परिपालक; ७९. निधिप्रियपतिप्रियः—निधियोंको प्रिय माननेवाले जो कुबेर आदि राजा हैं, उनके द्वारा भी उपास्य; ८०. हिरण्मयपुरान्तःस्थः—हिरण्यपुर-दहराकाशके मध्यमें विराजमान; (चिन्मय ब्रह्मके निवासस्थान अन्तर्हृदयमें विद्यमान); ८१. सूर्यमण्डलमध्यगः—सूर्यमण्डलके भीतर स्थित ॥ १५ ॥ ८२. कराहतिध्वस्तसिन्धुसलिलः—जिन्होंने अपने शुण्डदण्डके आघातसे समुद्रके जलको विध्वस्त (निष्कासित) कर दिया था, वे; ८३. पूषदन्तभित्— वीरभद्ररूपसे दक्ष-यज्ञमें पूषाके दाँतको तोड़नेवाले; ८४. उमाङ्ककेलिकुतुकी—उमाके अंकमें बैठकर बालोचित क्रीड़ा करनेका कौतूहल रखनेवाले; ८५. मुक्तिदः— कारागारकी बेड़ीसे छुड़ानेवाले तथा मोक्षदाता; ८६. कुलपालनः—वंशके तथा कौलतन्त्रके भी पालक ॥ १६ ॥ ८७. किरीटी—मस्तकपर मुकुट धारण करनेवाले; अथवा अर्जुनस्वरूप; ८८. कुण्डली—कानोंमें कुण्डल पहननेवाले; अथवा शेषनागरूपधारी; ८९. हारी—मुक्ता आदि मणियोंकी माला धारण करनेवाले; अथवा अत्यन्त मनोहर; ९०. वनमाली—कन्धेसे लेकर पैरोंतक लटकनेवाली 'वनमाला' धारण करनेवाले; ९१. मनोमयः—अपने संकल्पद्वारा निर्मित एक शरीर धारण करनेवाले; ९२. वैमुख्यहतदैत्यश्रीः—जिनके विमुख हो जानेके कारण दैत्योंकी लक्ष्मी नष्ट हो गयी, वे; ९३. पादाहतिजितक्षितिः—अपने पैरोंके आघातसे पृथ्वीको नीचे झुका देनेवाले ॥ १७ ॥ ९४. सद्योजातस्वर्णमुञ्जमेखली—तत्काल तैयार की गयी स्वर्णमय मुंजकी मेखलासे मण्डित; ९५.

उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १३७ दुनिमित्तहृत्—देवमूर्तियोंके फूटने, भूकम्प होने तथा महान् उल्कापात आदिके द्वारा सूचित जो दुर्निमित्त (अपशकुन) हैं, उनका हनन करनेवाले; ९६. दुःस्वप्नहृत्—बुरे स्वप्नोंके दुष्प्रभावको दूर करके उन्हें सुस्वप्नमें परिणत कर देनेवाले; ९७. प्रसहनः-भक्तोंके अपराधको सहन करनेवाले भगवान्; ९८. गुणी— अनेक सद्गुणोंसे सम्पन्न; ९९. नादप्रतिष्ठितः— प्रणवनादके वाच्यार्थरूपसे प्रतिष्ठित ॥ १८॥ १००. सुरूपः—अधिक लावण्यसे युक्त; अथवा उत्तम तत्त्वका निरूपण करनेवाले; १०१. सर्वनेत्राधिवासः-सबके नेत्रोंमें द्रष्टा पुरुषके रूपमें निवास करनेवाले; १०२. वीरासनाश्रयः—बायें घुटनेपर दायाँ पैर रखकर बैठना 'वीरासन' कहलाता है, ऐसे वीरासनसे बैठनेवाले; १०३. पीताम्बरः—आकाशको पी जानेवाले; अथवा पीतवस्त्र धारण करनेवाले; १०४. खण्डरदः-खण्डित दायाँ दाँत धारण करनेवाले; १०५. खण्डेन्दुकृतशेखरः—भालदेशमें आधे चन्द्रमाको धारण करनेवाले ॥ १९ ॥ १०६. चित्राङ्गश्यामदशनः- जिनमें श्यामरंगकी अधिकता है, ऐसे; चित्रोंसे अंकित या अलंकृत श्याम दन्तवाले; १०७. भालचन्द्रः-भालदेशमें चन्द्रमाको धारण करनेवाले; अथवा अष्टमीके चन्द्रमाकी भाँति ललाटवाले; १०८. चतुर्भुजः-चार भुजावाले; १०९. योगाधिपः- 'लिङ्गपुराण' में वर्णित जो लकुलीशादि अट्ठाईस योगाचार्यावतार हैं, उनसे अभिन्न रूपवाले; अथवा योगेश्वर; ११०. तारकस्थः- तारक अर्थात् प्रणव-मन्त्रके अभिधेय; १११. पुरुषः- समस्त पुरों- शरीरोंमें शयन करनेवाले साक्षी आत्मा; ११२. गजकर्णकः- हाथीके समान विशाल कानवाले ॥ २० ॥ ११३. गणाधिराजः—काव्यके पद्योंमें जो मगण, यगण, रगण और सगण आदि गण आते हैं, उनसे राजमान-शोभायमान; अथवा गणोंके अधिपति; ११४. विजयस्थिरः—भक्तोंकी विजयमें स्थीररूपसे प्रवृत्त; ११५. गजपतिध्वजी—अपने ध्वजमें गजराजका चिह्न धारण करनेवाले; ११६. देवदेवः-देवताओंके भी देवता- इन्द्र आदि देवताओंके उपास्य; ११७. स्मरप्राणदीपकः- रुद्रद्वारा कामदेवके शरीरके दग्ध कर दिये जानेपर भी उसके प्राणोंको उज्ज्रीवित करनेवाले; ११८. वायुकीलकः- नवद्वारवाले शरीरमें प्राणोंका स्तम्भन करनेवाले ॥ २१ ॥ ११९. विपश्चिद्वरदः- राजा विपश्चित्को वर देनेवाले; १२०. नादोन्नादभिन्नबलाहकः- अपने मन्द या उच्च नाद (घोष) - से मेघोंको छिन्न-भिन्न कर देनेवाले; १२१. वराहरदनः- महावराहकी दंष्ट्रा (दाढ़)- की शोभाको तिरस्कृत करनेवाले एक दाँतसे सुशोभित; १२२. मृत्युञ्जयः-काल, मृत्यु अथवा प्रमादपर विजय पानेवाले; १२३. व्याघ्राजिनाम्बरः- वस्त्रके स्थानमें व्याघ्रचर्मको धारण करनेवाले ॥ २२ ॥ १२४. इच्छाशक्तिधरः- जगत्की सृष्टिकी इच्छा धारण करनेवाले होनेसे इच्छाशक्तिधारी; १२५. देवत्राता- दैत्योंके भयसे देवताओंकी रक्षा करनेवाले; १२६. दैत्यविमर्दनः- दैत्योंका संहार करनेवाले; १२७. शम्भुवक्त्रोद्भवः—शिवके मुखसे प्रकट होनेवाले; १२८. शम्भुकोपहृत्—अपनी बाल-लीलाओंसे भगवान् शिवके क्रोधको हर लेनेवाले; १२९. शम्भुहास्यभूः-नादान बालककी भाँति चेष्टा करके शिवको हँसा देनेवाले ॥ २३ ॥ १३०. शम्भुतेजाः- शिवके तेजसे सम्पन्न; १३१. शिवाशोकहारी-महिषासुर आदिके मर्दनकालमें शिवा (पार्वती)- के बल एवं उत्साहको बढ़ाकर उनके शोकको हर लेनेवाले; १३२. गौरीसुखावहः- पार्वतीजीको सुख पहुँचानेवाले; १३३. उमाङ्गमलजः- गिरिराजनन्दिनी उमाके अंगोंमें लगे हुए उबटनके मैलसे प्रकट हुए शरीरमें प्रवेश करके उसे सप्राण बनानेवाले; १३४. गौरीतेजोभूः—गौरीके तेजसे उत्पन्न; अथवा पार्वतीके तेजकी आधारभूमि; १३५. स्वर्धुनीभवः- गंगाजीसे उत्पन्न स्वामिकार्तिकेयसे अभिन्न; अथवा गंगाजीकी उत्पत्तिके हेतुभूत ॥ २४ ॥ १३६. यज्ञकायः-अश्वमेधादि यज्ञस्वरूप; १३७. महानादः- उच्चस्वरसे गर्जना करनेवाले; १३८. गिरिवर्ष्मा-विराट् स्वरूपसे पर्वतोंको शरीरके अवयवरूपमें

१३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १३९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 प्रथमेश्वरः—मुख्य देवता—ब्रह्मा, विष्णु और शिवके | २०७. उन्नतप्रपदः—जिनके पैरोंका अग्रभाग भी ईश्वर ॥ ३३ ॥ | कूर्मपीठके समान ऊँचा है, वे; २०८. गूढगुल्फः— १९१. चिन्तामणिद्वीपपतिः—चिन्तामणि नामक | जिनके गुल्फ (टखने) मांससे छिपे हुए हैं, वे; २०९. द्वीपके स्वामी; १९२. कल्पद्रुमवनालयः—कल्पवृक्षोंके | संवृतपाष्णिंकः—जिनके टखनेके नीचेका भाग भी वनमें वास करनेवाले; १९३. रत्नमण्डपमध्यस्थः— | मांसल है, वे; २१०. पीनजङ्घः—पीन (मांसल) रत्नमय मण्डपके मध्यमें विराजमान; १९४. रत्न- | पिंडलियोंवाले; २११. श्लिष्टजानुः—जिनके दोनों सिंहासनाश्रयः—रत्नसिंहासनपर आसीन ॥ ३४ ॥ | घुटने स्पष्ट नहीं दिखायी देते, वे; २१२. स्थूलोरुः— १९५. तीव्रा१शिरोधृतपदः—तीव्रा नामक | मोटी जाँघवाले; २१३. प्रोन्नमत्कटिः—ऊँचे कटि- पीठशक्तिने जिनके चरणोंको अपने मस्तकपर धारण कर | प्रदेशवाले ॥ ३८ ॥ रखा है, वे भगवान् गणेश; १९६. ज्वालिनी- | २१४. निम्ननाभिः—गहरी नाभिवाले; २१५. मौलिलालितः—ज्वालिनी नामक शक्ति अपने मुकुटसे | स्थूलकुक्षिः—लम्बोदर; २१६. पीनवक्षाः—ऊँची जिनके चरणोंका स्पर्श करके लाड़ लड़ाती है, वे; १९७. | छातीवाले; २१७. बृहद्भुजः—बड़ी बाँहवाले; २१८. नन्दानन्दितपीठश्रीः—नन्दा नामक शक्ति जिनके पीठकी | पीनस्कन्धः—मांसल कन्धेवाले; २१९. कम्बुकण्ठः— शोभाका अभिनन्दन करती है, वे; १९८. भोगदा- | त्रिवलीयुक्त शंखाकार ग्रीवावाले; २२०. लम्बोष्ठः— भूषितासनः—जिनका सिंहासन भोगदा नामक पीठशक्तिसे | लटकते हुए ओठोंवाले; २२१. लम्बनासिकः—लम्बी विभूषित है, वे ॥ ३५ ॥ | नासिका (सूँड़)-वाले ॥ ३९ ॥ १९९. सकामदायिनीपीठः—जिनका पीठ | २२२. भग्नवामरदः—जिनके बायें दाँतका अग्रभाग कामदायिनीशक्तिसे समलंकृत है, वे; २००. | टूट गया है, वे; २२३. तुङ्गसव्यदन्तः—जिनका दाहिना स्फुरदुग्रासनाश्रयः—तेजस्विनी उग्रा-शक्तिसे सुशोभित | दाँत ऊँचा है, वे; २२४. महाहनुः—लम्बी ठोढ़ीवाले; आसनपर बैठनेवाले; २०१. तेजोवतीशिरोरत्नं—तेजोवती | २२५. ह्रस्वनेत्रत्रयः—छोटे-छोटे तीन नेत्रोंवाले; २२६. नामक शक्तिके सिरके मणिरत्न; २०२. सत्यानित्या- | शूर्पकर्णः—सूपके समान विशाल कानवाले; २२७. वतंसितः—सत्या नामक शक्ति जिन्हें नित्य अपने | निबिडमस्तकः—घनीभूत कठोर मस्तकवाले ॥ ४० ॥ मस्तकका आभूषण बनाये रखती है, वे ॥ ३६ ॥ | २२८. स्तबकाकारकुम्भाग्रः—जिनके कुम्भस्थल २०३. सविघ्ननाशिनीपीठः—विघ्ननाशिनी नामक | (मस्तक)-का अग्रभाग गुच्छके समान दिखायी देता है, शक्तिसे सुशोभित पीठवाले; २०४. सर्वशक्त्यम्बु- | वे; २२९. रत्नमौलिः—रत्नमय मुकुटसे मण्डित; २३०. जाश्रयः—सम्पूर्ण शक्तियोंसे युक्त कमलके आसनपर | निरङ्कुशः—जिनके कुम्भस्थलपर कभी अंकुशका स्पर्श विराजमान; २०५. लिपिद्मासनाधारः२—अक्षरोंसे युक्त | नहीं होता, वे; अथवा परम स्वतन्त्र; २३१. कमल (मातृकापद्म)-के आसनपर बैठनेवाले; २०६. | सर्पहारकटीसूत्रः—जो सर्पाकार हार और कटिसूत्र वह्निधामत्रयाश्रयः—कमलकी कर्णिकाके ऊपर | (मेखला) धारण करते हैं, वे; २३२. सर्पयज्ञो- विराजमान सूर्य, चन्द्र और अग्निसंज्ञक त्रिविध तेजोमण्डलमें | पवीतवान्—सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करनेवाले ॥ ४१ ॥ स्थित ॥ ३७ ॥ | २३३. सर्पकोटीरकटकः—मुकुट और वलयके ───────────────────────────────────────────────────────────────────────────── १. तीव्रा, ज्वालिनी, नन्दा, भोगदा, कामदायिनी, उग्रा, तेजोवती, सत्या और विघ्ननाशिनी—ये नौ पीठशक्तियाँ हैं। पीठगत अष्टदल कमल और उसकी कर्णिकामें ये पूजित होती हैं। इन नौ शक्तियों और कमलके सम्बन्धसे यहाँ क्रमशः दस नाम वर्णित हुए हैं। २. अष्टदलकमलके आठ किंजल्कोंमें क्रमशः दो-दो स्वर, आठ दलोंमें क्रमशः क, च, ट, त, प, य, श—इन आठ वर्गोंको तथा कर्णिकामें प्रसादको अंकित करनेपर उसे 'लिपिद्म' या 'मातृकापद्म' कहते हैं। (खद्योतभाष्य) Kalyana Visheshank 2021_Section_6_1_Front

यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और सटीक देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:

१४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐


[बायाँ स्तम्भ]

रूपमें सर्पको धारण करनेवाले; २३४. सर्पग्रैवेय- **काङ्गदः—**सर्पके ही कण्ठहार और बाजूबंद पहननेवाले; **२३५. सर्पकक्ष्योदराबन्धः—**करधनीके रूपमें सर्पको ही धारण करनेवाले; **२३६. सर्पराजोत्तरीयकः—**नागराज वासुकिको उत्तरीयके रूपमें धारण करनेवाले ॥ ४२ ॥ **२३७. रक्तः—**रक्तवर्ण; २३८. रक्ताम्बरधरः— लाल वस्त्र धारण करनेवाले; २३९. रक्तमाल्य- **विभूषणः—**लाल रंगके ही हार और आभूषण धारण करनेवाले; **२४०. रक्तेक्षणः—**लाल नेत्रोंवाले; २४१. **रक्तकरः—**लाल हाथोंवाले; २४२. रक्तताल्वोष्ठ- **पल्लवः—**रक्तवर्णके तालु और ओष्ठपल्लव धारण करनेवाले ॥ ४३ ॥ २४३. श्वेतः—(विद्याकी कामना रखनेवाले साधकोंको भगवान् गणेशके श्वेत रूपका ध्यान करना चाहिये, इस दृष्टिसे श्वेत आदि पाँच नाम दिये जाते हैं—) श्वेतवर्ण; **२४४. श्वेताम्बरधरः—**श्वेत वस्त्रधारी; **२४५. श्वेतमाल्यविभूषणः—**श्वेत माला और आभूषण धारण करनेवाले; **२४६. श्वेतातपत्ररुचिरः—**श्वेतच्छत्र धारण करनेके कारण अत्यन्त सुन्दर दिखायी देनेवाले; **२४७. श्वेतचामरवीजितः—**श्वेत चँवर डुलाकर जिनकी सेवा की जाती है, वे ॥ ४४ ॥ २४८. सर्वावयवसम्पूर्णसर्वलक्षणलक्षितः— सम्पूर्ण अंगोंमें सामुद्रिक शास्त्रोक्त समस्त शुभ लक्षणोंसे परिपूर्ण दिखायी देनेवाले; २४९. सर्वाभरणशोभाढ्यः— सम्पूर्ण आभूषणोंकी शोभासे सम्पन्न; २५०. सर्वशोभा- **समन्वितः—**लावण्य नामक सम्पूर्ण अंगकान्तिसे शोभायमान ॥ ४५ ॥ **२५१. सर्वमङ्गलमङ्गल्यः—**समस्त मंगलोंके लिये भी मंगलकारी; **२५२. सर्वकारणकारणम्—**सम्पूर्ण कारणोंके भी कारण; **२५३. सर्वदैककरः—**जिनका एकमात्र कर (शुण्ड-दण्ड) सब कुछ देनेवाला है, वे; २५४. शार्ङ्गी— शृंगनिर्मित धनुष धारण करनेवाले; (यहाँ 'शार्ङ्गी' आदि नामोंसे उनके दस आयुधोंको लक्षित कराया जाता है); **२५५. बीजापूरी—**बिजौरा नीबू या अनार धारण करनेवाले; **२५६. गदाधरः—**गदाधारी ॥ ४६ ॥


[दायाँ स्तम्भ]

**२५७. इक्षुचापधरः—**गन्नेका धनुष धारण करनेवाले; **२५८. शूली—**शूलधारी; **२५९. चक्रपाणिः—**हाथमें चक्र धारण करनेवाले; **२६०. सरोजभृत्—**कमलधारी; २६१. **पाशी—**पाशधारी; **२६२. धृतोत्पलः—**उत्पल धारण करनेवाले; **२६३. शालीमञ्जरीभृत्—**धानकी बाल धारण करनेवाले; **२६४. स्वदन्तभृत्—**एक हाथमें अपने दाँतको लिये रहनेवाले ॥ ४७ ॥ **२६५. कल्पवल्लीधरः—**हाथमें कल्पलता ग्रहण करनेवाले; **२६६. विश्वाभयदैककरः—**जिनका मुख्य कर सम्पूर्ण विश्वसे अभयदान करनेवाला है; अथवा एक हाथमें 'अभय' नामक मुद्रा धारण करनेवाले; २६७. **वशी—**सम्पूर्ण विश्वको वशमें रखनेवाले; २६८. **अक्षमालाधरः—**अक्षमालाधारी; २६९. ज्ञानमुद्रावान्— ज्ञानकी मुद्रासे युक्त; **२७०. मुद्गरायुधः—**मुद्गर नामक शस्त्र धारण करनेवाले ॥ ४८ ॥ **२७१. पूर्णपात्री—**पूर्णपात्रयुक्त यज्ञस्वरूप; अथवा अमृतसे भरे पात्रवाले; **२७२. कम्बुधरः—**शंखधारी; **२७३. विधुतालिसमुद्गकः—**मदजलसे आर्द्र गण्ड- स्थलपर मँडराते हुए भ्रमरसमूहसे युक्त; २७४. **मातुलिङ्गधरः—**बिजौरा नीबू लिये रहनेवाले; **२७५. चूतकलिकामृत्—**आम्रमंजरी धारण करनेवाले; **२७६. कुठारवान्—**कुठारधारी ॥ ४९ ॥ २७७. पुष्करस्थस्वर्णघटीपूर्णरत्नाभिवर्षकः— शून्यमें गृहीत सुवर्णमय कलशसे पूर्ण रत्नोंकी वर्षा करनेवाले; **२७८. भारतीसुन्दरीनाथः—**सरस्वती, गौरी तथा लक्ष्मीके स्वामी ब्रह्मा, शिव और विष्णुरूप; २७९. **विनायकरतिप्रियः—**विनायक नामवाले अपने गणोंके साथ खेलनेमें रुचि रखनेवाले ॥ ५० ॥ **२८०. महालक्ष्मीप्रियतमः—**महालक्ष्मीके प्रियतम (ये महालक्ष्मी विष्णुपत्नी लक्ष्मीसे भिन्न हैं; ये गणेशकी अपनी प्रिया बुद्धिरूपा हैं। सिद्धलक्ष्मी इनकी दूसरी पत्नी हैं); **२८१. सिद्धलक्ष्मीमनोरमः—**सिद्धलक्ष्मीके हृदयवल्लभ; **२८२. रमारमेशपूर्वाङ्गः—**आवरण- देवताओंमें रमा और रमापति (लक्ष्मी तथा विष्णु) गणेशजीके पूर्वभागमें (सम्मुख) विराजमान होते हैं,


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उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १४१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

१४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] अजयासे घिरे हुए; ३१७. विजयाविजयावहः—विजयाको विजय देनेवाले ॥ ६० ॥ ३१८. अर्जिताचितपादाब्जः—अपराजिताशक्तिसे पूजित चरणारविन्दवाले; ३१९. नित्यानित्यावतंसितः— नित्याशक्तिने जिनके चरणोंको नित्य अपना शिरोभूषण बना रखा है, वे; ३२०. विलासिनीकृतोल्लासः— विलासिनीकी सेवासे उल्लसित होनेवाले; ३२१. शौण्डी- सौन्दर्यमण्डितः—शौण्डी नामक शक्तिके सौन्दर्यसे मण्डित ॥ ६१ ॥ ३२२. अनन्तानन्तसुखदः—अनन्ता नामक शक्तिको अनन्त सुख देनेवाले; ३२३. सुमङ्गलसुमङ्गलः—जिस पीठपर मंगला नामक शक्ति विद्यमान है, उसका नाम 'सुमंगल' है। ऐसा सुमंगल-पीठ जिनके कारण परम मंगलमय होता है, वे गणेशजी 'सुमंगलके सुमंगल' हैं; ३२४. इच्छाशक्तिज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिनिषेवितः— इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति तथा क्रियाशक्तिसे सेवित ॥ ६२ ॥ ३२५. सुभागासंश्रितपदः—सुभागादेवीके द्वारा सेवित चरणकमलवाले; ३२६. ललिताललिताश्रयः—ललिता- देवीके मनोरम आश्रय; ३२७. कामिनीकामनः— कामिनी या कामकला नामक शक्तिकी कामना रखनेवाले; ३२८. काममालिनीकेलिलालितः—कामेशी अथवा काममालिनी नामक शक्तिकी क्रीडाओंद्वारा प्रसन्न किये गये ॥ ६३ ॥ ३२९. सरस्वत्याश्रयः—सरस्वती (वाग्देवता)- के आश्रय; ३३०. गौरीनन्दनः—पार्वतीदेवीको आनन्द प्रदान करनेवाले; ३३१. श्रीनिकेतनः—लक्ष्मी या शोभाके आगार; ३३२. गुरुगुप्तपदः—गणक्रीड आदि गुरुओंद्वारा गोपित पदवाले; ३३३. वाचासिद्धः—जिनकी भक्तिसे वाक्-सिद्धि प्राप्त होती है, वे; ३३४. वागीश्वरीपतिः— वागीश्वरी अर्थात् नकुली नामक शक्तिके प्रियतम ॥ ६४ ॥ ३३५. नलिनीकामुकः—नलिनी अर्थात् सुरापगा नामक शक्तिके प्राणवल्लभ; ३३६. वामारामः—वामा नामक शक्ति जिनकी रामा अर्थात् प्रिया हैं, वे; ३३७. ज्येष्ठामनोरमः—ज्येष्ठा नामक शक्ति जिनकी मनोरमा हैं, वे; ३३८. रौद्रीमुद्रितपादाब्जः—रौद्री नामक शक्ति

[दायाँ स्तम्भ] जिनके चरणारविन्दोंको अपनी अंजलिमें बाँधे रखती हैं, वे; ३३९. हुम्बीजः—‘वक्रतुण्डाय हुम्’—इस षडक्षर मन्त्रका अन्तिम वर्ण जो ‘हुम्’ है, वही समस्त पुरुषार्थोंका बीज (कारण) है; अतएव भगवान् गणपति ‘हुं बीज’ नामसे प्रसिद्ध हैं; ३४०. तुङ्गशक्तिकः— उच्चशक्तिसे सम्पन्न; अथवा वक्रतुण्ड-मन्त्रमें जो ‘हुम्’ बीज है, यही उक्त गणेश-मन्त्रकी शक्ति है। इसलिये वे उक्त नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ ६५ ॥ ३४१. विश्वादिजननत्राणः—विश्वके आदिभूत हिरण्यगर्भके जन्म और पालन जिनसे होते हैं, वे; ३४२. स्वाहाशक्तिः—‘स्वाहा’ जिनकी शक्ति है, वे; ३४३. सकीलकः—कीलकयुक्त; ३४४. अमृताब्धि- कृतावासः—सुधासिन्धुमें निवास करनेवाले; ३४५. मदघूर्णितलोचनः—सुधापानके मदसे अथवा गण्डस्थलसे झरते हुए मदसे घूमते हुए नेत्रवाले ॥ ६६ ॥ ३४६. उच्छिष्टगणः—उत्कृष्ट और शिष्ट गणोंके स्वामी; ३४७. उच्छिष्टगणेशः—(उच्छिष्टे नामरूपं च) इत्यादि अथर्ववेदीय मन्त्रोंके समूहसे प्रतिपाद्य ईश्वर; अथवा सतत मोदक-भक्षणके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध श्रीगणेश; ३४८. गणनायकः—जिनके गणोंकी गणना भक्तोंद्वारा होती रहती है, वे; ३४९. सार्वकालिक- संसिद्धिः—जिनकी सिद्धियाँ सब समय बनी रहती हैं, वे; ३५०. नित्यशैवः—सदा शिवका चिन्तन करनेवाले; ३५१. दिगम्बरः—दिशाओंको ही वस्त्र बनानेवाले ॥ ६७ ॥ ३५२. अनपायः—अविनाशी; ३५३. अनन्त- दृष्टिः—असीम ज्ञानशक्तिसे सम्पन्न; ३५४. अप्रमेयः— वाणी, मन एवं ज्ञानेन्द्रियोंसे अगम्य होनेके कारण प्रमाणातीत; ३५५. अजरामरः—जरा और मृत्युसे रहित; ३५६. अनाविलः—कालुष्यरहित; ३५७. अप्रतिरथः— प्रतिद्वन्द्वीसे शून्य; ३५८. अच्युतः—मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले; अथवा श्रीकृष्णसे अभिन्न; ३५९. अमृतम्— अमृत या मोक्षस्वरूप; ३६०. अक्षरम्—व्यापक अथवा अक्षय ॥ ६८ ॥ ३६१. अप्रतर्क्यः—जिसका वेदोंके द्वारा अनुमोदन न हो, ऐसे तर्कसे अगम्य; ३६२. अक्षयः—क्षय-

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उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १४३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 रहित; ३६३. अजय्यः—जिनहें जीता न जा सके, ऐसे; | ३८६. इन्दीवरदलश्यामः—नीलकमलके समान ३६४. अनाधारः—स्वयं सबके आधार होनेके कारण | श्याम; ३८७. इन्दुमण्डलनिर्मलः—चन्द्रमण्डलके समान अपने लिये आधारसे रहित; ३६५. अनामयः—रोगरहित; | गौर कान्तिवाले; ३८८. इध्मप्रियः—अग्निरूपसे काष्ठ ३६६. अमलः—मलिनतासे शून्य; ३६७. अमोघ- | या ईंधनके प्रेमी; ३८९. इडाभागः—ऋत्विक् और सिद्धिः—अमोघ (अव्यर्थ) सिद्धिवाले; ३६८. अद्वैतम्— | यजमान आदिके रूपमें यज्ञकर्ममें भाग लेनेवाले; ३९०. द्वैत-प्रपंचसे रहित; ३६९. अघोरः—शिवरूप; ३७०. | इराधामा—पृथ्वीमें अन्तर्यामीरूपसे अवस्थित; ३९१. अप्रमिताननः—असंख्य मुखवाले ॥ ६९ ॥ | इन्दिराप्रियः—लक्ष्मीद्वारा पूज्य; अथवा विष्णुरूपसे लक्ष्मीके ३७१. अनाकारः—निराकार परमात्मा; ३७२. | प्रियतम ॥ ७३ ॥ अब्धिभूम्यग्निबलघ्नः—जलधि या जलकी शक्ति क्लेदन, | ३९२. इक्ष्वाकुविघ्नविध्वंसी—राजा इक्ष्वाकुके भूमिकी शक्ति स्तम्भन तथा अग्निकी शक्ति दहनका | विघ्नका नाश करनेवाले; ३९३. इतिकर्तव्यतेप्सितः— जिनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वे भूमि, जल और | इतिकर्तव्यता (क्रतुकी अंगभूत सामग्री)—की अपेक्षा अग्निकी शक्तिको प्रतिहत कर देनेवाले; ३७३. | रखकर यजमानकी मनोवांछा पूर्ण करनेवाले; ३९४. अव्यक्तलक्षणः—बहिर्मुख मानवोंकी बुद्धिमें जिनके | ईशानमौलिः—नरेश, भूतेश और सुरेश आदि ईशानों स्वरूप-लक्षण तथा तटस्थ-लक्षणकी अभिव्यक्ति नहीं | (ईश्वरों)—के शिरोमणि; ३९५. ईशानः—ईशानोंको जीवन होती, वे; ३७४. आधारपीठः—पृथ्वीसे लेकर शिवपर्यन्त | देनेवाले; ३९६. ईशानसुतः—ईश्वरपुत्र; ३९७. ईतिहा— छत्तीस आधारभूत तत्त्वोंके भी आश्रय; ३७५. आधारः— | अतिवृष्टि, अनावृष्टि, मूषकजनित उपद्रव, शलभ, शुक अ—विष्णु तथा आ—ब्रह्माको भी धारण करनेवाले; | आदि पक्षी, स्वमण्डल तथा परमण्डल—इन सबसे प्राप्त ३७६. आधाराधेयवर्जितः—आधार-आधेय-भावसे | होनेवाले भयको 'ईति-भीति' कहते हैं; उस 'ईति- रहित, अद्वैतस्वरूप ॥ ७० ॥ | भीति' के नाशक ॥ ७४ ॥ ३७७. आखुकेतनः—मूषकचिह्नसे युक्त ध्वज- | ३९८. ईषणात्रयकल्पान्तः—लोकैषणा, पुत्रैषणा वाले; ३७८. आशापूरकः—सर्वव्यापी होनेसे दिशाओंके | और वित्तैषणा—इन त्रिविध एषणाओंके लिये प्रलयंकर; पूरक अथवा सबकी आशा पूर्ण करनेवाले; ३७९. | अथवा वैराग्यदायक; ३९९. ईहामात्रविवर्जितः—चेष्टा- आखुमहार्थः—मूषकरूपी महान् रथ (वाहन)-से युक्त; | मात्रसे शून्य; चित्स्वरूप; ४००. उपेन्द्रः—कश्यप और ३८०. इक्षुसागरमध्यस्थः—ईखके रसके सागरमें | अदितिके यहाँ अवतीर्ण महोत्कट विनायक; अथवा विराजमान; ३८१. इक्षुभक्षणलालसः—ईख खानेकी | वामनसे अभिन्न; ४०१. उडुभृन्मौलिः—नक्षत्र-पालक इच्छा रखनेवाले ॥ ७१ ॥ | चन्द्रमाको भालदेशमें धारण करनेवाले; ४०२. उण्डेरक- ३८२. इक्षुचापातिरेकश्रीः—इक्षुधन्वा (कामदेव)- | बलिप्रियः—गोल-गोल मिष्टान्नके उपहारको प्रिय से भी अधिक सौन्दर्य-श्रीसे सम्पन्न; ३८३. इक्षुचाप- | माननेवाले ॥ ७५ ॥ निषेवितः—इक्षुमय चापकी अधिष्ठात्री देवी अथवा | ४०३. उन्नताननः—उत्कृष्ट ब्रह्मा आदि देवोंको कामदेवसे सेवित; ३८४. इन्द्रगोपसमानश्रीः—इन्द्रगोप | प्राणवान् करनेवाले; ४०४. उत्तुङ्गः—वराहरूपधारी (बीरबहूटी नामक कीट)-के समान अरुण कान्तिवाले; | भगवान्की दाढ़से तुंगा—नामवाली एक नदी प्रकट हुई, ३८५. इन्द्रनीलसमद्युतिः*—इन्द्रनीलमणिके समान श्याम | जिससे वे भगवान् 'उत्तुंग' कहलाये। उनसे अभिन्न कान्तिवाले ॥ ७२ ॥ | होनेके कारण गणेशजीका भी नाम 'उत्तुंग' है; ४०५.

  • कामनाभेदसे भिन्न रूप-रंगमें गणेशजीका ध्यान होता है। अथवा भिन्न-भिन्न युगोंमें अवतार लेकर वे अरुण एवं श्याम-कान्ति धारण करते हैं। (खद्योतभाष्य)