भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 133, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 133

उ०ख०-अ०४५ ] * शिवकृत गणपतिस्तुति * १३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ - उपरि भाग] तत्पर होकर [गणेशमन्त्रका] जप किया ॥ २४ ॥ [इस प्रकार] उन भगवान् शंकरने सौ वर्षोंतक उग्र तप किया, तब उनके मुखकमलसे एक श्रेष्ठ पुरुष आविर्भूत हुआ ॥ २५ ॥ उसके पाँच मुख, दस भुजाएँ, मस्तकपर चन्द्रमा, गलेमें मुण्डोंकी माला, सर्पोंके आभूषण, [सिरपर] मुकुट और [हाथोंमें] बाजूबन्द शोभित हो रहे थे। उसकी [श्रीविग्रहकी] प्रभा चन्द्रमाके समान थी ॥ २६ ॥ उसकी कान्ति अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाकी कान्तिको तिरस्कृत कर रही थी। उसने [अपनी दसों भुजाओंमें] दस आयुध धारण कर रखे थे। उसकी कान्तिसे धर्षित उन भगवान् शिवने उस उग्र स्वरूपवाले [श्रेष्ठ पुरुष]- को अपने सम्मुख स्थित देखा ॥ २७ ॥ उस दूसरे पंचमुख शिवके समान पंचमुख विनायकको देखकर भगवान् शिवने विचार किया कि क्या मैं ही दो शरीरवाला हो गया हूँ ! ॥ २८ ॥ अथवा क्या मेरा ही रूप धारण करके यह त्रिपुरासुर आ गया है? क्या तैंतीस करोड़ देवताओंमें कोई दूसरा भी पाँच मुखवाला है? ॥ २९ ॥

[दायाँ स्तम्भ - उपरि भाग] अथवा मैंने यह कोई दीर्घकालिक स्वप्न देख लिया है या सम्पूर्ण विघ्नोंका हरण करनेवाले जिन [इष्ट-] देवका मैं रात-दिन ध्यान करता हूँ, वे गजानन ही मुझे वर देनेके लिये आ गये हैं ! ॥ ३०१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] उन [शिव]- के इस प्रकारके वचन सुनकर गजानन गणेशजीने कहा— हे देव ! आप अपने अन्तःकरणमें जिसका ध्यान करते हैं, मैं वही विघ्नहर्ता विभु हूँ। मेरे स्वरूपको देवता, ऋषि और चार मुखोंवाले ब्रह्माजी भी नहीं जानते हैं ॥ ३१-३२ ॥ उपनिषदोंसहित वेद भी मेरे स्वरूपको नहीं जानते तो षट्शास्त्रियों (षड्दर्शन¹के जाननेवालों)-की तो बात ही क्या ? मैं ही अखिल भुवनोंका सृजन, रक्षण और संहार करनेवाला हूँ ॥ ३३ ॥ ब्रह्मासे लेकर त्रिगुण (सत्त्व, रज, तम)-से युक्त सम्पूर्ण स्थावर-जंगमात्मक प्राणियोंका मैं ही स्वामी हूँ। तुम्हारी इस तपस्यासे सन्तुष्ट होकर मैं तुम्हें वर देनेके लिये यहाँ आया हूँ। हे महादेव ! आप जितने वरदान चाहते हों, उन्हें मुझसे माँग लें, मैं आपपर सन्तुष्ट हूँ, अतः वे सभी वर प्रदान करूँगा, इसमें सन्देह न करो ॥ ३४ ॥

[मध्य भाग] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'तपोवर्णन' नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४४ ॥ पैंतालीसवाँ अध्याय शिवकृत गणपतिस्तुति

[बायाँ स्तम्भ - निचला भाग] [व्यास] मुनि बोले—[हे ब्रह्मन् !] तब प्रसन्न हुए विघ्नहर्ता देवाधिदेव विघ्नेश्वरके भगवान् शंकरको वर देनेके लिये उत्सुक होनेपर उन सदाशिवने क्या-क्या वर माँगे थे? ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] गणेशजीके वचनको सुनकर उन वर प्रदान करनेवाले अपने ही सदृश स्वरूपवाले (पंचमुखस्वरूपवाले) गजाननकी वन्दना करके शिवजीने ये वाक्य कहे— ॥ २ ॥

[दायाँ स्तम्भ - निचला भाग] शिवजी बोले—हे देव ! [आपका दर्शनकर] आज मेरे दसों नेत्र धन्य हो गये, आज आपका पूजनकर मेरी [दसों] भुजाएँ धन्य हो गयीं। आपको नमन करनेसे [मेरे] पाँचों सिर धन्य हो गये और आपकी स्तुति करनेसे मेरे पाँचों मुख धन्य हो गये ॥ ३ ॥ पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश (पंच महाभूत); गन्ध, रस, स्पर्श, रूप और शब्द (पंचतन्मात्राएँ); मन एवं इन्द्रियाँ², दिशाएँ, गणनात्मक काल (समय),

[पाद-टिप्पणी] १. 'दृश्यते अनेन इति दर्शनम्' अर्थात् 'दर्शन' शब्दका तात्पर्य है कि जिस शास्त्र या चिन्तनप्रक्रियाद्वारा किसी वस्तुके तात्त्विक-स्वरूपको जाना जाय। दर्शन छः हैं—१. मीमांसा, २. वेदान्त, ३. न्याय, ४. वैशेषिक, ५. सांख्य और ६. योग। २. इन्द्रियाँ दो प्रकारकी होती हैं—१. ज्ञानेन्द्रियाँ और २. कर्मेन्द्रियाँ। ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं—१. श्रोत्र, २. त्वक्, ३. चक्षु, ४. रसना और घ्राण। कर्मेन्द्रियाँ भी पाँच हैं—१. वाक्, २. पाणि, ३. पाद, ४. पायु और उपस्थ। इस प्रकार कुल दस इन्द्रियाँ हैं।