श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
उ०ख०-अ०४५ ] * शिवकृत गणपतिस्तुति * १३१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ - उपरि भाग] तत्पर होकर [गणेशमन्त्रका] जप किया ॥ २४ ॥ [इस प्रकार] उन भगवान् शंकरने सौ वर्षोंतक उग्र तप किया, तब उनके मुखकमलसे एक श्रेष्ठ पुरुष आविर्भूत हुआ ॥ २५ ॥ उसके पाँच मुख, दस भुजाएँ, मस्तकपर चन्द्रमा, गलेमें मुण्डोंकी माला, सर्पोंके आभूषण, [सिरपर] मुकुट और [हाथोंमें] बाजूबन्द शोभित हो रहे थे। उसकी [श्रीविग्रहकी] प्रभा चन्द्रमाके समान थी ॥ २६ ॥ उसकी कान्ति अग्नि, सूर्य और चन्द्रमाकी कान्तिको तिरस्कृत कर रही थी। उसने [अपनी दसों भुजाओंमें] दस आयुध धारण कर रखे थे। उसकी कान्तिसे धर्षित उन भगवान् शिवने उस उग्र स्वरूपवाले [श्रेष्ठ पुरुष]- को अपने सम्मुख स्थित देखा ॥ २७ ॥ उस दूसरे पंचमुख शिवके समान पंचमुख विनायकको देखकर भगवान् शिवने विचार किया कि क्या मैं ही दो शरीरवाला हो गया हूँ ! ॥ २८ ॥ अथवा क्या मेरा ही रूप धारण करके यह त्रिपुरासुर आ गया है? क्या तैंतीस करोड़ देवताओंमें कोई दूसरा भी पाँच मुखवाला है? ॥ २९ ॥
[दायाँ स्तम्भ - उपरि भाग] अथवा मैंने यह कोई दीर्घकालिक स्वप्न देख लिया है या सम्पूर्ण विघ्नोंका हरण करनेवाले जिन [इष्ट-] देवका मैं रात-दिन ध्यान करता हूँ, वे गजानन ही मुझे वर देनेके लिये आ गये हैं ! ॥ ३०१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] उन [शिव]- के इस प्रकारके वचन सुनकर गजानन गणेशजीने कहा— हे देव ! आप अपने अन्तःकरणमें जिसका ध्यान करते हैं, मैं वही विघ्नहर्ता विभु हूँ। मेरे स्वरूपको देवता, ऋषि और चार मुखोंवाले ब्रह्माजी भी नहीं जानते हैं ॥ ३१-३२ ॥ उपनिषदोंसहित वेद भी मेरे स्वरूपको नहीं जानते तो षट्शास्त्रियों (षड्दर्शन¹के जाननेवालों)-की तो बात ही क्या ? मैं ही अखिल भुवनोंका सृजन, रक्षण और संहार करनेवाला हूँ ॥ ३३ ॥ ब्रह्मासे लेकर त्रिगुण (सत्त्व, रज, तम)-से युक्त सम्पूर्ण स्थावर-जंगमात्मक प्राणियोंका मैं ही स्वामी हूँ। तुम्हारी इस तपस्यासे सन्तुष्ट होकर मैं तुम्हें वर देनेके लिये यहाँ आया हूँ। हे महादेव ! आप जितने वरदान चाहते हों, उन्हें मुझसे माँग लें, मैं आपपर सन्तुष्ट हूँ, अतः वे सभी वर प्रदान करूँगा, इसमें सन्देह न करो ॥ ३४ ॥
[मध्य भाग] ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'तपोवर्णन' नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४४ ॥ पैंतालीसवाँ अध्याय शिवकृत गणपतिस्तुति
[बायाँ स्तम्भ - निचला भाग] [व्यास] मुनि बोले—[हे ब्रह्मन् !] तब प्रसन्न हुए विघ्नहर्ता देवाधिदेव विघ्नेश्वरके भगवान् शंकरको वर देनेके लिये उत्सुक होनेपर उन सदाशिवने क्या-क्या वर माँगे थे? ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी !] गणेशजीके वचनको सुनकर उन वर प्रदान करनेवाले अपने ही सदृश स्वरूपवाले (पंचमुखस्वरूपवाले) गजाननकी वन्दना करके शिवजीने ये वाक्य कहे— ॥ २ ॥
[दायाँ स्तम्भ - निचला भाग] शिवजी बोले—हे देव ! [आपका दर्शनकर] आज मेरे दसों नेत्र धन्य हो गये, आज आपका पूजनकर मेरी [दसों] भुजाएँ धन्य हो गयीं। आपको नमन करनेसे [मेरे] पाँचों सिर धन्य हो गये और आपकी स्तुति करनेसे मेरे पाँचों मुख धन्य हो गये ॥ ३ ॥ पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश (पंच महाभूत); गन्ध, रस, स्पर्श, रूप और शब्द (पंचतन्मात्राएँ); मन एवं इन्द्रियाँ², दिशाएँ, गणनात्मक काल (समय),
[पाद-टिप्पणी] १. 'दृश्यते अनेन इति दर्शनम्' अर्थात् 'दर्शन' शब्दका तात्पर्य है कि जिस शास्त्र या चिन्तनप्रक्रियाद्वारा किसी वस्तुके तात्त्विक-स्वरूपको जाना जाय। दर्शन छः हैं—१. मीमांसा, २. वेदान्त, ३. न्याय, ४. वैशेषिक, ५. सांख्य और ६. योग। २. इन्द्रियाँ दो प्रकारकी होती हैं—१. ज्ञानेन्द्रियाँ और २. कर्मेन्द्रियाँ। ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच हैं—१. श्रोत्र, २. त्वक्, ३. चक्षु, ४. रसना और घ्राण। कर्मेन्द्रियाँ भी पाँच हैं—१. वाक्, २. पाणि, ३. पाद, ४. पायु और उपस्थ। इस प्रकार कुल दस इन्द्रियाँ हैं।
१३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गन्धर्व, यक्ष, पितर, मनुष्य, देवर्षि, सभी देवगण, ब्रह्मा, | सभीके सम्पूर्ण कार्योंमें, चाहे वे वैदिक हों या लौकिक, इन्द्र, रुद्र१, वसुगण२, साध्यगण३—सम्पूर्ण स्थावर- | शुभ हों या अशुभ—सबमें आप ही प्रयत्नपूर्वक सर्वप्रथम जंगम प्राणी आपसे ही उत्पन्न हुए हैं॥ ४-५॥ | अर्चनीय हैं। हे देव! चूँकि आप यक्षों, विद्याधरों और हे अनन्यबुद्धे! आप रजोगुणका आश्रय लेकर इस | सर्पोंसहित सभी लोगोंके मंगल (हित, कल्याण, क्षेम)- विश्वका सृजन करते हैं, सत्त्वगुणका आश्रय लेकर | के अधिपति हैं और [विशेषरूपसे] अपने भक्तोंका इसकी रक्षा करते हैं और तमोगुणका आश्रय लेकर | मंगल करनेवाले हैं, इसीलिये आप मंगलमूर्ति [कहे इसका संहार करते हैं। हे गणेश! आप शाश्वत, निष्काम | जाते] हैं॥ १०—१११/२॥ और सम्पूर्ण कर्मोंके साक्षी हैं॥ ६॥ | हे ईश! पूर्वकालमें दैत्यश्रेष्ठ [त्रिपुरासुर]-के साथ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी!] तदनन्तर मैंने | युद्धमें आपका अर्चन, आपका स्मरण और आपका शिवजीकी आज्ञासे उन भगवान् गणेशसे जो कुछ कहा | वन्दन न करनेके कारण मैं पराभवको प्राप्त हुआ, था और जो उनका नाम रखा; हे महामते! उसे सुनिये। | इसलिये मैं आपके चरणोंकी शरणमें आया हूँ। हे [मैंने गणेशजीसे कहा—] मातृकाओं४में जो प्रथम बीज | सर्वशक्तिमान्! आप मेरे अपराधको क्षमा करें और अक्षर 'ॐ' है, जो कि श्रुतिका मूल है, वही आपका | सम्पूर्ण युद्धोंके समय मुझे जय प्रदान करें॥ १२-१३॥ नाम है; क्योंकि आप गणोंके ईश हैं, इसलिये आपका | हे देव! जो आपका सर्वथा भजन नहीं करते, वे 'गणेश' नाम हो। गणाधिपतिके द्वारा 'ओम्'—इस | मूर्ख और दरिद्र होंगे। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक आपका प्रकार कहे जानेपर भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये और | भजन करते हैं, वे सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाली उन्होंने ये वरदान प्रदान किये—॥ ७—८१/२॥ | सिद्धि प्राप्त करेंगे॥ १४॥ शिवजी बोले—हे ईश! जो [अपने] सम्पूर्ण | ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी!] यह सुनकर कार्यों [-के आरम्भ]-में आपका स्मरण करता है, उसे | अखिलवाक्यार्थविशारद गणेशजीने शिवजीसे कहा कि कार्यसिद्धिमें अविघ्नताकी प्राप्ति होती है॥ ९॥ | हे उमेश! आप जब-जब मेरा स्मरण करेंगे, तब-तब मैं बिना आपकी स्मृतिके कृमि-कीटोंको भी अपनी | [शीघ्र ही] आपके पास आ जाऊँगा॥ १५॥ मनोकामनाकी सिद्धि नहीं प्राप्त होती। शैव, आपके भक्त | हे महेश्वर! आप मेरे नामके बीजमन्त्र५से एक बाणको (गणेश-उपासक), वैष्णव, शाक्त और सूर्योपासक— | अभिमन्त्रित करके उससे उस दैत्य त्रिपुरासुरसहित उसके १. रुद्र एकादश हैं— हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः। वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा॥ मृगव्याधश्च शर्वश्च कपाली च विशांपते। एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः॥ (हरिवंशपुराण १।३।५१-५२) हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली—ये ग्यारह रुद्र कहलाते हैं। २. वसु आठ हैं— धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः॥ (महा० आदि० ६६।१८) धर, ध्रुव, सोम, अहः, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—इन आठोंको वसु कहते हैं। इनमें अनल (अग्नि) वसुओंके राजा, देवताओंको हवि पहुँचानेवाले और भगवान्के मुख माने जाते हैं। ३. साध्यदेवता बारह हैं— मनोऽनुमन्ता प्राणश्च नरो यानश्च वीर्यवान्॥ चित्तिर्हयो नयश्चैव हंसो नारायणस्तथा। प्रभवोऽथ विभुश्चैव साध्या द्वादश जज्ञिरे॥ (वायुपुराण ६६।१५-१६) मन, अनुमन्ता, प्राण, नर, यान, चित्ति, हय, नय, हंस, नारायण, प्रभव और विभु—ये बारह साध्यदेवता हैं। ४. 'अ' से 'क्ष' तक कुल ५२ मातृकाएँ हैं। 'ॐ' = अ+उ+म्' होने से 'ॐ' को प्रथम बीजाक्षर कहा गया है। ओंकारमाद्यं प्रवदन्ति संतो वाचः श्रुतीनामपि यं गृणन्ति। गजाननं देवगणान्ताङ्घ्रिं भजेऽहमर्धेन्दुकृतावंतसम्॥ ५. गणेशजीका बीजमन्त्र 'गं' है।
उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १३३ तीनों पुरोंको मेरे प्रतापसे गिराकर भस्मसात् कर दें ॥ १६ ॥ प्रकारके दान देकर वरदाता देव गणेशजीका भलीभाँति तदनन्तर भक्तिसे परितुष्ट चित्तवाले गणाधिपति पूजन करके उन्हें पुनः नमस्कार किया ॥ २० ॥ गणेशजीने उन विनम्र शिवजीको सम्यग् रूपसे अपने तब [देवताओं, मुनियों, सिद्धों और ब्राह्मणों-] सहस्र नाम बतलाये, जो सभी लोगोंके लिये विजय प्रदान सभीने कहा कि यह मणिपूर* [गणपति-क्षेत्रके रूपमें] करनेवाले और मनोकामना पूर्ण करनेवाले हैं ॥ १७ ॥ सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात हो। भगवान् गणेश तथा अन्य और उन्होंने यह भी कहा कि [हे शिव!] युद्धके सबके द्वारा 'तथास्तु' कहे जानेके उपरान्त वे देवगण समय आप इसका पाठ करें, इससे आप शीघ्र ही और गणाधिपति गणेशजी अन्तर्धान हो गये ॥ २१ ॥ दैत्योंका वध कर देंगे। तीनों सन्ध्याओंमें इसका जप मुनिगणों और देवताओंसहित गणेशजीके अन्तर्धान करनेसे मनुष्योंकी सभी कामनाएँ और सम्पूर्ण अभीष्ट हो जानेपर अपने गणोंसे घिरे हुए शिवजी भी अपने कार्य सिद्ध हो जाते हैं ॥ १८ ॥ निवास-स्थलको चले आये; जो गन्धर्वों, यक्षगणों और गजानन गणेशजीके वचन सुनकर शिवजीने उनका देवांगनाओंसे घिरा हुआ था। वहाँ उन्होंने परम प्रसन्नतापूर्वक सम्यक् रूपसे पूजन किया और अत्यन्त हर्षित हुए। गिरिराजनन्दिनी पार्वतीसे अपना सारा वृत्तान्त कहा। उन्होंने महागणेशकी [मूर्तिकी] स्थापना की और शीघ्र शिवजीके मुखसे निकली उस अमृतमयी वाणीको सुनकर ही उनके सुदृढ़ एवं उच्च प्रासाद (मन्दिर)-का निर्माण पत्नियोंसहित सभी देवेश्वर, मुनिगण, मुनिपत्नियों और करा दिया ॥ १९ ॥ योगीश्वर प्रसन्न हो गये, उन्होंने त्रिपुरासुरको मरा हुआ तदनन्तर शिवजीने देवताओं, मुनियों और सिद्धगणोंको और भगवान् शिवके अनुग्रहसे अपने अधिकारोंको पुनः भलीभाँति तृप्त करके और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको विविध प्राप्त हुआ मान लिया ॥ २२-२३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शिवको वरदान' नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥ छियालीसवाँ अध्याय श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र व्यासजीने पूछा—सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेमें विघ्नशान्तिका उपाय पूछा। भगवान् शिवद्वारा की गयी तत्पर रहनेवाले पितामह ! गणेशजीने भगवान् शिवके उस पूजासे संतुष्ट होकर महागणपतिने स्वयं उनसे अपने प्रति अपने सहस्र नामोंका उपदेश किस प्रकार किया, इस सहस्रनामका वर्णन किया। यह समस्त विघ्नोंका यह मुझे बताइये ॥ १ ॥ एकमात्र हरण करनेवाला तथा सम्पूर्ण मनोवांछित ब्रह्माजीने कहा—ब्रह्मन् ! कहते हैं, पूर्वकालमें फलोंको देनेवाला है ॥ ३-५ ॥ त्रिपुरारि महादेवजीने जब त्रिपुरविजयके लिये उद्योग विनियोग किया, उस समय पहले गणेशजीकी अर्चना न करनेके अस्य श्रीमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य महागणपति- कारण वे विघ्नोंसे घिर गये ॥ २ ॥ ऋषिः। अनुष्टुप् छन्दः। महागणपतिर्देवता। गं बीजम्। हुं तदनन्तर विघ्नका क्या कारण है, यह मन-ही-मन शक्तिः। स्वाहा कीलकम्। चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धयर्थे जपादौ निश्चय करके शिवजीने भक्तिभावसे महागणपतिकी विनियोगः। विधिपूर्वक पूजा की और उन अपराजित देवने उनसे इस 'श्रीमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्र-मन्त्र' के 'महा- *महाराष्ट्रके पूना जिलेमें पूनासे ३१ मीलकी दूरीपर स्थित 'राजणगाँव' को मणिपूरक्षेत्र कहा जाता है। यह अष्ट गणपति-क्षेत्रोंमेंसे एक है। यहाँके श्रीविग्रहको 'महागणपति' कहते हैं। ये अष्ट विनायकोंमेंसे एक हैं। मन्दिरके तहखानेमें रखी मूर्ति 'महोत्कट' कहलाती है, उसके दस सूँड़ और बीस भुजाएँ हैं। कहा जाता है कि मुस्लिम आक्रांताओंसे रक्षाके लिये इसे छिपाकर रखा गया था।
Here is the complete transcription of the text from the image:
१३४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गणपति' ऋषि हैं, 'अनुष्टुप्' छन्द है, 'महागणपति' देवता | अग्रभागमें माणिक्य-निर्मित कलश ले रखा है, जिसके हैं, 'गं' बीज है, 'हुं' शक्ति है एवं 'स्वाहा' कीलक है। मुखभागसे रत्नोंकी वर्षा हो रही है और जिसके द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चार पुरुषार्थोंकी सिद्धिके वे अपने धनार्थी साधक भक्तोंको तृप्त कर रहे हैं। लिये जप आदिमें इसका विनियोग होता है। कपोलोंपर झरते हुए मदसे वे विह्वल हैं। उनके मस्तकपर ऋष्यादिन्यास मणिमय मुकुट शोभा देता है तथा वे सम्पूर्ण आभूषणोंसे ॐ महागणापतये ऋषये नमः, शिरसि। अनुष्टुप्छन्दसे विभूषित हैं। ऐसे महागणपतिकामैं ध्यान करता हूँ। नमः, मुखे। महागणपतिदेवतायै नमः, हृदि। गं बीजाय नमः, इस तरह ध्यान करके 'ॐ गणेश्वरः' इत्यादिसे गुह्ये। हुं शक्तये नमः, पादयोः। स्वाहा कीलकाय नमः, नाभौ। आरम्भ होनेवाले 'श्रीमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्र' का -इन छः वाक्योंको पृथक्-पृथक् पढ़कर क्रमशः पाठ करना चाहिये- मस्तक, मुख, हृदय, गुदाभाग, दोनों चरण तथा नाभिका ध्यान स्पर्श दाहिने हाथसे करे। ॐ सच्चिदानन्दस्वरूप, १. गणेश्वरः-आकाशादि ध्यान प्रपंचके समूहको 'गण' कहते हैं, वह गण उनका हस्तीन्द्राननमिन्दुचूड़मरुणच्छायं त्रिनेत्रं रसा- स्वरूप है और वे उस गणके ईश्वर हैं, इसलिये जिन्हें दाश्लिष्टं प्रियया सपद्मकरया स्वाङ्कस्थया संततम्। 'गणेश्वर' कहा गया, वे श्रीगणेश; २. गणक्रीडः*- बीजापूरगदाधनुस्त्रिशिखयुक्चक्राब्जपाशोत्पल- गणक्रीड-नामक गुरुस्वरूप; अथवा आकाशादि गणके व्रीह्यग्रस्वविषाणरत्नकलशान् हस्तैर्वहन्तं भजे॥ भीतर प्रवेश करके क्रीड़ा करनेके कारण 'गणक्रीड' जिनका गजराजके समान मुख है; जिनके मस्तकपर नामसे प्रसिद्ध; ३. गणनायः-गणोंके नाथ एवं जिनका चन्द्रमाका मुकुट है; जिनकी अंगकान्ति अरुण है; जो गणन-गुणोंकी गणना करना मंगलमय है, वे भगवान् तीन नेत्रोंसे सुशोभित हैं; जिन्हें हाथमें कमल धारण गणपति; ४. गणाधिपः-आदित्यादि गणदेवताओंके करनेवाली अंकगत प्रिया (सिद्धलक्ष्मी)-का परिरंभग अधिपति; ५. एकदंष्ट्रः-भूमिका उद्धार अथवा जगत्का सदा प्राप्त है तथा जो अपने दस हाथोंमें क्रमशः बीजापुर नाश करनेके निमित्त जिनकी एक ही दंष्ट्रा (दाढ़) है, (बिजौरा नीबू या अनार), गदा, धनुष, त्रिशूल, चक्र, वे भगवान् गणेश; ६. वक्रतुण्डः-वक्र-टेढ़े तुण्ड- कमल, पाश, उत्पल, धानकी बाल तथा अपना ही टूटा शुण्ड-दण्डसे युक्त; ७. गजवक्त्रः-गज अर्थात् हाथीके दाँत धारण करते हैं एवं शुण्डमें रत्नमय कलश लिये हुए समान मुखवाले; ८. महोदरः-अनन्तकोटि ब्रह्माण्डको हैं; उन गणपतिकामैं भजन (ध्यान) करता हूँ। अपने भीतर रखनेके कारण महान् उदरवाले ॥ ६ ॥ गण्डपालीगलद्दानपूरलालसमानसान् । ९. लम्बोदरः-ब्रह्माण्डके आलम्बनरूप उदरवाले; द्विरेफान् कर्णतालाभ्यां वारयन्तं मुहुर्मुहुः ॥ १०. धूम्रवर्णः-धूम्रके समान वर्णवाले; अथवा वायुका कराग्रधृतमाणिक्यकुम्भवक्त्रविनिर्गतैः । बीज धूम्रवर्णका है, तत्स्वरूप होनेके कारण गणेशजी भी रत्नवर्षैः प्रीणयन्तं साधकान् मदविह्वलम् । 'धूम्रवर्ण' कहे गये हैं; ११. विकटः-कट अर्थात् माणिक्यमुकुटोपेतं सर्वाभरणभूषितम् ॥ आवरणसे रहित विभुस्वरूप; १२. विघ्ननायकः- गणेशजीके गण्डस्थलसे मदकी धारा बह रही है। अभक्तसमुदायके प्रति विघ्नोंका नयन करनेवाले; या उसका आस्वादन करनेके लिये भ्रमरोंकी भीड़ टूटी विघ्नोंके अधिपति; अथवा प्राणियोंका विहनन एवं नयन पड़ती है। उन भ्रमरोंको वे अपने ताड़पत्रके समान करनेवाले; १३. सुमुखः-मुखका अर्थ है-आरम्भ; कानोंद्वारा बारम्बार हटाते हैं। उन्होंने अपने शुण्डदण्डके जिनसे सम्पूर्ण आरम्भ सुन्दर या शोभन होते हैं, वे; * गणेशके शिष्य गणक्रीड हैं, जो विकटके गुरु हैं, विकटके शिष्य विघ्ननायक हैं। ये तीनों गुरु एवं गणेशरूप कहे गये हैं (खद्योतभाष्य)।
उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १३५
अथवा सुन्दर मुखवाले; १४. दुर्मुखः — जिनके मुखका स्पर्श करना दुष्कर है; अथवा अग्नि और सूर्यके रूपमें जिनकी ओर देखना अत्यन्त कठिन है, वे; १५. बुद्धः — नित्य बुद्धस्वरूप अविद्यावृत्तिके नाशक; अथवा बुद्धावतारस्वरूप; १६. विघ्नराजः — विघ्नोंके साथ विराजमान; अथवा विघ्नोंके राजा; किंवा जो विघ्न-भक्ताधीन तथा राजा हैं, वे भगवान् गणेश; १७. गजाननः — गजों-हाथियोंको अनुप्राणित — प्राणशक्तिसे सम्पन्न करनेवाले ॥ ७ ॥
१८. भीमः — दुष्टोंके लिये भयदायक होनेसे 'भीम' नामसे प्रसिद्ध; १९. प्रमोदः — अभीष्ट वस्तुके लाभसे होनेवाले सुखका नाम है — 'प्रमोद', तत्स्वरूप; २०. आमोदः — प्रमोदसे पहले अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिके निश्चयसे जो सुख होता है, उसे 'आमोद' कहते हैं, ऐसे आमोदस्वरूप; २१. सुरानन्दः — देवताओंके लिये आनन्दप्रद; २२. मदोत्कटः — गण्डस्थलसे झरनेवाले मदके कारण उत्कट; अथवा मदसे आवरणका उत्क्रमण करनेवाले; २३. हेरम्बः — 'हे' का अर्थ है — शंकर तथा 'रम्ब' का अर्थ है — शब्द। शैवागमके प्रवर्तक होनेसे 'हेरम्ब' नामवाले; अथवा उद्यम-शौर्यसे युक्त होनेके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध; २४. शम्बरः — 'शम्' अर्थात् सुख है वर — श्रेष्ठ जिनमें, वे; २५. शम्भुः — जिनसे 'शम्' अर्थात् कल्याणका उद्भव होता है, वे; २६. लम्बकर्णः — भक्तजन जहाँ-कहीं भी गणेशजीका आवाहन या स्तवन आदि करते हैं, वहीं वे जैसे दूर न हों, इस तरह सुन लेते हैं। इसलिये लम्बे-सुदूरतक सुननेवाले कान हैं जिनके, वे; २७. महाबलः — जिनके अनुग्रहसे बलासुर महान् हो गया, वे; अथवा महान् बलशाली ॥ ८ ॥
२८. नन्दनः — समृद्धिके हेतुभूत; २९. अलम्पटः — पर्याप्त पट-वस्त्रोंसे समृद्ध; अथवा पट ही जिनका अलंकार है, वे; ३०. अभीरुः — भयशून्य; अथवा भीरु स्वभाववाली स्त्रीसे रहित; ३१. मेघनादः — मेघगर्जनाके समान नाद या सिंहनाद करनेवाले; अथवा मेघोंके नाशक; ३२. गणञ्जयः — शत्रु-समूहोंपर अनायास विजय पानेवाले; ३३. विनायकः — 'वि' अर्थात् पक्षिरूप जीव-समुदायके नेता या नायक; ३४. विरूपाक्षः — विरूप-विकट दीखनेवाले अग्नि, सूर्य तथा चन्द्ररूप नेत्रोंसे युक्त; ३५. धीरशूरः — धैर्य और शौर्यसे सम्पन्न; ३६. वरप्रदः — अपने भक्तजनोंको उत्तम एवं मनोवांछित वर प्रदान करनेवाले ॥ ९ ॥
३७. महागणापतिः — गुल्म आदि सेना-भेदोंको 'गण' कहते हैं; वे जिनकी अधीनतामें महान्-बहु-संख्यक हैं, वे; अथवा महागर्णोंके अधिपति; ३८. बुद्धिप्रियः — निश्चयात्मिका बुद्धि जिनको प्रिय है, वे; अर्थात् संशयनिवारक; ३९. क्षिप्रप्रसादनः — भक्तोंद्वारा ध्यान किये जानेपर उनके ऊपर शीघ्र प्रसन्न होनेवाले; ४०. रुद्रप्रियः — ग्यारहों रुद्रोंके प्रिय; ४१. गणाध्यक्षः — छत्तीस तत्त्वरूप गणसमुदायके पालक; ४२. उमापुत्रः — पार्वतीके पुत्र (उमाका पुन्नामक नरकलोकसे उद्धार करनेवाले); ४३. अघनाशनः — लम्बोदर या महोदर होनेपर भी स्वल्पमात्र नैवेद्यसे तृप्त होनेवाले (अघन — स्वल्प है अशन — भोजन जिनका, वे); अथवा अघके फलस्वरूप दुःखोंका नाश करनेवाले ॥ १० ॥
४४. कुमारगुरुः — सनत्कुमारस्वरूप होते हुए विद्याका उपदेश करनेके कारण गुरु; अथवा कुमार कार्तिकेयसे भी पहले उत्पन्न होनेके कारण उनके ज्येष्ठ भ्राता; ४५. ईशानपुत्रः — भगवान् शंकरके आत्मज; ४६. मूषकवाहनः — मूषक (चूहे)-को वाहन बनानेके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध; ४७. सिद्धिप्रियः — अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ जिन्हें प्रिय हैं, वे; ४८. सिद्धिपतिः — अणिमा आदि आठ सिद्धियोंके पालक; ४९. सिद्धः — गोरक्षनाथ आदि सिद्धस्वरूप; ५०. सिद्धिविनायकः — भक्तोंतक सिद्धिका नयन करनेवाले (भक्तोंको सिद्धि प्राप्त करानेवाले) ॥ ११ ॥
५१. अविघ्नः — अविभाव; अर्थात् पशुताका हनन (हरण) करनेवाले; अथवा विघ्नोंसे रहित; ५२. तुम्बुरुः — तुम्ब (अलाबू या लौकी)-के द्वारा जो रव करता है, वह 'तुम्बुरु' है। तुम्बुरु नाम है — वीणाका। वीणापर गणपतिका यशोगान होनेसे वे 'तुम्बुरु' नामसे प्रसिद्ध हैं; ५३. सिंहवाहनः — मोर और मूषककी भाँति सिंहको भी
१३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] वाहन बनानेवाले; अथवा सिंहवाहिनी देवीसे अभिन्न होनेके कारण सिंहवाहन; ५४. मोहिनीप्रियः—मोहिनीपति शिवसे अभिन्न; ५५. कटंकटः—'कट' का अर्थ है— आवरण या अज्ञान; गणेशजी ज्ञान प्रदान करके उस अज्ञानको भी ढक देते या मिटा देते हैं। इसलिये 'कटंकट' नामसे प्रसिद्ध हैं; ५६. राजपुत्रः—राजा वरेण्यके यहाँ पुत्रवत् आचरण करनेवाले; अथवा राजा— चन्द्रमाको पुत्रवत् माननेवाले; ५७. शालकः—'श' 'परोक्ष' अर्थमें है और 'अलक' शब्द 'केश' या अंशका वाचक है। जिनका एक अंश भी प्रत्यक्ष नहीं है, जो अतीन्द्रिय हैं, वे 'शालक' हैं; अथवा शालित- शोभित होते हैं, इसलिये 'शालक' हैं; ५८. सम्मितः— सर्वव्यापी होते हुए भी अंगुष्ठमात्रसे मित; ५९. अमितः— अणु, स्थूल, ह्रस्व और दीर्घ—चारों प्रकारके प्रमाणोंसे मित न होनेवाले ॥ १२ ॥ ६०. कूष्माण्डसामसम्भूतः—'कूष्माण्डैर्जुहु- यात्।'—इस कूष्माण्ड-होमविधिमें जो प्रसिद्ध मन्त्र या साम हैं, वे गणेशजीकी विभूति हैं। अतएव वे उक्त नामसे प्रसिद्ध हैं; ६१. दुर्जयः—बलवान् दैत्य जिन्हें मनसे भी जीत नहीं सकते, ऐसे; ६२. धूर्जयः— जगच्चक्रकी धुरीको अनायास वहन करनेवाले; ६३. जयः—जयस्वरूप; अथवा जय—महाभारत आदि इतिहास-पुराण जिनके रूप हैं, वे; ६४. भूपतिः— पृथ्वीके पालक, अथवा भूपति-नामसे प्रसिद्ध अग्निभ्राता; ६५. भुवनपतिः—समस्त भुवनोंके स्वामी; अथवा उक्त नामवाले अग्निभ्राता; ६६. भूतानाम्पतिः—समस्त भूतोंके पालक अथवा भूतपतिनामक अग्निभ्राता; ६७. अव्ययः— अविनाशी ॥ १३ ॥ ६८. विश्वकर्ता—संसारके स्रष्टा; ६९. विश्व- मुखः—जिनसे विश्वका मुख—आरम्भ हुआ है, वे; अथवा विश्व जिनके मुखमें है; या जो मुखकी भाँति विश्वकी वृत्तिके हेतु हैं, वे गणेश; ७०. विश्वरूपः— सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंच जिनका ही रूप है, वे; अथवा त्वष्टा-प्रजापतिके पुत्र देवपुरोहित विश्वरूपसे अभिन्न; ७१. निधिः—आकाश आदि सम्पूर्ण जगत्समूह जिनमें
[दायाँ स्तम्भ] पूर्ण रूपसे आहित या धृत है, वे; अथवा महापद्म आदि नव निधिस্বরূপ; ७२. घृणिः—सूर्यस्वरूप; ७३. कविः— सृष्टिरूप काव्यके कर्ता; ७४. कवीनामृषभः—कवियोंमें श्रेष्ठ; ७५. ब्रह्मण्यः—ब्राह्मण, वेद, तप तथा ब्रह्माके प्रति सद्भाव रखनेवाले; ७६. ब्रह्मणस्पतिः—ब्रह्म अर्थात् वाणीके अधिपति ॥ १४ ॥ ७७. ज्येष्ठराजः—'ज्येष्ठ'-संज्ञक साममें राजमान; ७८. निधिपतिः—नव निधियोंके परिपालक; ७९. निधिप्रियपतिप्रियः—निधियोंको प्रिय माननेवाले जो कुबेर आदि राजा हैं, उनके द्वारा भी उपास्य; ८०. हिरण्मयपुरान्तःस्थः—हिरण्यपुर-दहराकाशके मध्यमें विराजमान; (चिन्मय ब्रह्मके निवासस्थान अन्तर्हृदयमें विद्यमान); ८१. सूर्यमण्डलमध्यगः—सूर्यमण्डलके भीतर स्थित ॥ १५ ॥ ८२. कराहतिध्वस्तसिन्धुसलिलः—जिन्होंने अपने शुण्डदण्डके आघातसे समुद्रके जलको विध्वस्त (निष्कासित) कर दिया था, वे; ८३. पूषदन्तभित्— वीरभद्ररूपसे दक्ष-यज्ञमें पूषाके दाँतको तोड़नेवाले; ८४. उमाङ्ककेलिकुतुकी—उमाके अंकमें बैठकर बालोचित क्रीड़ा करनेका कौतूहल रखनेवाले; ८५. मुक्तिदः— कारागारकी बेड़ीसे छुड़ानेवाले तथा मोक्षदाता; ८६. कुलपालनः—वंशके तथा कौलतन्त्रके भी पालक ॥ १६ ॥ ८७. किरीटी—मस्तकपर मुकुट धारण करनेवाले; अथवा अर्जुनस्वरूप; ८८. कुण्डली—कानोंमें कुण्डल पहननेवाले; अथवा शेषनागरूपधारी; ८९. हारी—मुक्ता आदि मणियोंकी माला धारण करनेवाले; अथवा अत्यन्त मनोहर; ९०. वनमाली—कन्धेसे लेकर पैरोंतक लटकनेवाली 'वनमाला' धारण करनेवाले; ९१. मनोमयः—अपने संकल्पद्वारा निर्मित एक शरीर धारण करनेवाले; ९२. वैमुख्यहतदैत्यश्रीः—जिनके विमुख हो जानेके कारण दैत्योंकी लक्ष्मी नष्ट हो गयी, वे; ९३. पादाहतिजितक्षितिः—अपने पैरोंके आघातसे पृथ्वीको नीचे झुका देनेवाले ॥ १७ ॥ ९४. सद्योजातस्वर्णमुञ्जमेखली—तत्काल तैयार की गयी स्वर्णमय मुंजकी मेखलासे मण्डित; ९५.
उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १३७ दुनिमित्तहृत्—देवमूर्तियोंके फूटने, भूकम्प होने तथा महान् उल्कापात आदिके द्वारा सूचित जो दुर्निमित्त (अपशकुन) हैं, उनका हनन करनेवाले; ९६. दुःस्वप्नहृत्—बुरे स्वप्नोंके दुष्प्रभावको दूर करके उन्हें सुस्वप्नमें परिणत कर देनेवाले; ९७. प्रसहनः-भक्तोंके अपराधको सहन करनेवाले भगवान्; ९८. गुणी— अनेक सद्गुणोंसे सम्पन्न; ९९. नादप्रतिष्ठितः— प्रणवनादके वाच्यार्थरूपसे प्रतिष्ठित ॥ १८॥ १००. सुरूपः—अधिक लावण्यसे युक्त; अथवा उत्तम तत्त्वका निरूपण करनेवाले; १०१. सर्वनेत्राधिवासः-सबके नेत्रोंमें द्रष्टा पुरुषके रूपमें निवास करनेवाले; १०२. वीरासनाश्रयः—बायें घुटनेपर दायाँ पैर रखकर बैठना 'वीरासन' कहलाता है, ऐसे वीरासनसे बैठनेवाले; १०३. पीताम्बरः—आकाशको पी जानेवाले; अथवा पीतवस्त्र धारण करनेवाले; १०४. खण्डरदः-खण्डित दायाँ दाँत धारण करनेवाले; १०५. खण्डेन्दुकृतशेखरः—भालदेशमें आधे चन्द्रमाको धारण करनेवाले ॥ १९ ॥ १०६. चित्राङ्गश्यामदशनः- जिनमें श्यामरंगकी अधिकता है, ऐसे; चित्रोंसे अंकित या अलंकृत श्याम दन्तवाले; १०७. भालचन्द्रः-भालदेशमें चन्द्रमाको धारण करनेवाले; अथवा अष्टमीके चन्द्रमाकी भाँति ललाटवाले; १०८. चतुर्भुजः-चार भुजावाले; १०९. योगाधिपः- 'लिङ्गपुराण' में वर्णित जो लकुलीशादि अट्ठाईस योगाचार्यावतार हैं, उनसे अभिन्न रूपवाले; अथवा योगेश्वर; ११०. तारकस्थः- तारक अर्थात् प्रणव-मन्त्रके अभिधेय; १११. पुरुषः- समस्त पुरों- शरीरोंमें शयन करनेवाले साक्षी आत्मा; ११२. गजकर्णकः- हाथीके समान विशाल कानवाले ॥ २० ॥ ११३. गणाधिराजः—काव्यके पद्योंमें जो मगण, यगण, रगण और सगण आदि गण आते हैं, उनसे राजमान-शोभायमान; अथवा गणोंके अधिपति; ११४. विजयस्थिरः—भक्तोंकी विजयमें स्थीररूपसे प्रवृत्त; ११५. गजपतिध्वजी—अपने ध्वजमें गजराजका चिह्न धारण करनेवाले; ११६. देवदेवः-देवताओंके भी देवता- इन्द्र आदि देवताओंके उपास्य; ११७. स्मरप्राणदीपकः- रुद्रद्वारा कामदेवके शरीरके दग्ध कर दिये जानेपर भी उसके प्राणोंको उज्ज्रीवित करनेवाले; ११८. वायुकीलकः- नवद्वारवाले शरीरमें प्राणोंका स्तम्भन करनेवाले ॥ २१ ॥ ११९. विपश्चिद्वरदः- राजा विपश्चित्को वर देनेवाले; १२०. नादोन्नादभिन्नबलाहकः- अपने मन्द या उच्च नाद (घोष) - से मेघोंको छिन्न-भिन्न कर देनेवाले; १२१. वराहरदनः- महावराहकी दंष्ट्रा (दाढ़)- की शोभाको तिरस्कृत करनेवाले एक दाँतसे सुशोभित; १२२. मृत्युञ्जयः-काल, मृत्यु अथवा प्रमादपर विजय पानेवाले; १२३. व्याघ्राजिनाम्बरः- वस्त्रके स्थानमें व्याघ्रचर्मको धारण करनेवाले ॥ २२ ॥ १२४. इच्छाशक्तिधरः- जगत्की सृष्टिकी इच्छा धारण करनेवाले होनेसे इच्छाशक्तिधारी; १२५. देवत्राता- दैत्योंके भयसे देवताओंकी रक्षा करनेवाले; १२६. दैत्यविमर्दनः- दैत्योंका संहार करनेवाले; १२७. शम्भुवक्त्रोद्भवः—शिवके मुखसे प्रकट होनेवाले; १२८. शम्भुकोपहृत्—अपनी बाल-लीलाओंसे भगवान् शिवके क्रोधको हर लेनेवाले; १२९. शम्भुहास्यभूः-नादान बालककी भाँति चेष्टा करके शिवको हँसा देनेवाले ॥ २३ ॥ १३०. शम्भुतेजाः- शिवके तेजसे सम्पन्न; १३१. शिवाशोकहारी-महिषासुर आदिके मर्दनकालमें शिवा (पार्वती)- के बल एवं उत्साहको बढ़ाकर उनके शोकको हर लेनेवाले; १३२. गौरीसुखावहः- पार्वतीजीको सुख पहुँचानेवाले; १३३. उमाङ्गमलजः- गिरिराजनन्दिनी उमाके अंगोंमें लगे हुए उबटनके मैलसे प्रकट हुए शरीरमें प्रवेश करके उसे सप्राण बनानेवाले; १३४. गौरीतेजोभूः—गौरीके तेजसे उत्पन्न; अथवा पार्वतीके तेजकी आधारभूमि; १३५. स्वर्धुनीभवः- गंगाजीसे उत्पन्न स्वामिकार्तिकेयसे अभिन्न; अथवा गंगाजीकी उत्पत्तिके हेतुभूत ॥ २४ ॥ १३६. यज्ञकायः-अश्वमेधादि यज्ञस्वरूप; १३७. महानादः- उच्चस्वरसे गर्जना करनेवाले; १३८. गिरिवर्ष्मा-विराट् स्वरूपसे पर्वतोंको शरीरके अवयवरूपमें
१३८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १३९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 प्रथमेश्वरः—मुख्य देवता—ब्रह्मा, विष्णु और शिवके | २०७. उन्नतप्रपदः—जिनके पैरोंका अग्रभाग भी ईश्वर ॥ ३३ ॥ | कूर्मपीठके समान ऊँचा है, वे; २०८. गूढगुल्फः— १९१. चिन्तामणिद्वीपपतिः—चिन्तामणि नामक | जिनके गुल्फ (टखने) मांससे छिपे हुए हैं, वे; २०९. द्वीपके स्वामी; १९२. कल्पद्रुमवनालयः—कल्पवृक्षोंके | संवृतपाष्णिंकः—जिनके टखनेके नीचेका भाग भी वनमें वास करनेवाले; १९३. रत्नमण्डपमध्यस्थः— | मांसल है, वे; २१०. पीनजङ्घः—पीन (मांसल) रत्नमय मण्डपके मध्यमें विराजमान; १९४. रत्न- | पिंडलियोंवाले; २११. श्लिष्टजानुः—जिनके दोनों सिंहासनाश्रयः—रत्नसिंहासनपर आसीन ॥ ३४ ॥ | घुटने स्पष्ट नहीं दिखायी देते, वे; २१२. स्थूलोरुः— १९५. तीव्रा१शिरोधृतपदः—तीव्रा नामक | मोटी जाँघवाले; २१३. प्रोन्नमत्कटिः—ऊँचे कटि- पीठशक्तिने जिनके चरणोंको अपने मस्तकपर धारण कर | प्रदेशवाले ॥ ३८ ॥ रखा है, वे भगवान् गणेश; १९६. ज्वालिनी- | २१४. निम्ननाभिः—गहरी नाभिवाले; २१५. मौलिलालितः—ज्वालिनी नामक शक्ति अपने मुकुटसे | स्थूलकुक्षिः—लम्बोदर; २१६. पीनवक्षाः—ऊँची जिनके चरणोंका स्पर्श करके लाड़ लड़ाती है, वे; १९७. | छातीवाले; २१७. बृहद्भुजः—बड़ी बाँहवाले; २१८. नन्दानन्दितपीठश्रीः—नन्दा नामक शक्ति जिनके पीठकी | पीनस्कन्धः—मांसल कन्धेवाले; २१९. कम्बुकण्ठः— शोभाका अभिनन्दन करती है, वे; १९८. भोगदा- | त्रिवलीयुक्त शंखाकार ग्रीवावाले; २२०. लम्बोष्ठः— भूषितासनः—जिनका सिंहासन भोगदा नामक पीठशक्तिसे | लटकते हुए ओठोंवाले; २२१. लम्बनासिकः—लम्बी विभूषित है, वे ॥ ३५ ॥ | नासिका (सूँड़)-वाले ॥ ३९ ॥ १९९. सकामदायिनीपीठः—जिनका पीठ | २२२. भग्नवामरदः—जिनके बायें दाँतका अग्रभाग कामदायिनीशक्तिसे समलंकृत है, वे; २००. | टूट गया है, वे; २२३. तुङ्गसव्यदन्तः—जिनका दाहिना स्फुरदुग्रासनाश्रयः—तेजस्विनी उग्रा-शक्तिसे सुशोभित | दाँत ऊँचा है, वे; २२४. महाहनुः—लम्बी ठोढ़ीवाले; आसनपर बैठनेवाले; २०१. तेजोवतीशिरोरत्नं—तेजोवती | २२५. ह्रस्वनेत्रत्रयः—छोटे-छोटे तीन नेत्रोंवाले; २२६. नामक शक्तिके सिरके मणिरत्न; २०२. सत्यानित्या- | शूर्पकर्णः—सूपके समान विशाल कानवाले; २२७. वतंसितः—सत्या नामक शक्ति जिन्हें नित्य अपने | निबिडमस्तकः—घनीभूत कठोर मस्तकवाले ॥ ४० ॥ मस्तकका आभूषण बनाये रखती है, वे ॥ ३६ ॥ | २२८. स्तबकाकारकुम्भाग्रः—जिनके कुम्भस्थल २०३. सविघ्ननाशिनीपीठः—विघ्ननाशिनी नामक | (मस्तक)-का अग्रभाग गुच्छके समान दिखायी देता है, शक्तिसे सुशोभित पीठवाले; २०४. सर्वशक्त्यम्बु- | वे; २२९. रत्नमौलिः—रत्नमय मुकुटसे मण्डित; २३०. जाश्रयः—सम्पूर्ण शक्तियोंसे युक्त कमलके आसनपर | निरङ्कुशः—जिनके कुम्भस्थलपर कभी अंकुशका स्पर्श विराजमान; २०५. लिपिद्मासनाधारः२—अक्षरोंसे युक्त | नहीं होता, वे; अथवा परम स्वतन्त्र; २३१. कमल (मातृकापद्म)-के आसनपर बैठनेवाले; २०६. | सर्पहारकटीसूत्रः—जो सर्पाकार हार और कटिसूत्र वह्निधामत्रयाश्रयः—कमलकी कर्णिकाके ऊपर | (मेखला) धारण करते हैं, वे; २३२. सर्पयज्ञो- विराजमान सूर्य, चन्द्र और अग्निसंज्ञक त्रिविध तेजोमण्डलमें | पवीतवान्—सर्पमय यज्ञोपवीत धारण करनेवाले ॥ ४१ ॥ स्थित ॥ ३७ ॥ | २३३. सर्पकोटीरकटकः—मुकुट और वलयके ───────────────────────────────────────────────────────────────────────────── १. तीव्रा, ज्वालिनी, नन्दा, भोगदा, कामदायिनी, उग्रा, तेजोवती, सत्या और विघ्ननाशिनी—ये नौ पीठशक्तियाँ हैं। पीठगत अष्टदल कमल और उसकी कर्णिकामें ये पूजित होती हैं। इन नौ शक्तियों और कमलके सम्बन्धसे यहाँ क्रमशः दस नाम वर्णित हुए हैं। २. अष्टदलकमलके आठ किंजल्कोंमें क्रमशः दो-दो स्वर, आठ दलोंमें क्रमशः क, च, ट, त, प, य, श—इन आठ वर्गोंको तथा कर्णिकामें प्रसादको अंकित करनेपर उसे 'लिपिद्म' या 'मातृकापद्म' कहते हैं। (खद्योतभाष्य) Kalyana Visheshank 2021_Section_6_1_Front
यहाँ पृष्ठ का पूर्ण और सटीक देवनागरी पाठ प्रस्तुत है:
१४० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ]
रूपमें सर्पको धारण करनेवाले; २३४. सर्पग्रैवेय- **काङ्गदः—**सर्पके ही कण्ठहार और बाजूबंद पहननेवाले; **२३५. सर्पकक्ष्योदराबन्धः—**करधनीके रूपमें सर्पको ही धारण करनेवाले; **२३६. सर्पराजोत्तरीयकः—**नागराज वासुकिको उत्तरीयके रूपमें धारण करनेवाले ॥ ४२ ॥ **२३७. रक्तः—**रक्तवर्ण; २३८. रक्ताम्बरधरः— लाल वस्त्र धारण करनेवाले; २३९. रक्तमाल्य- **विभूषणः—**लाल रंगके ही हार और आभूषण धारण करनेवाले; **२४०. रक्तेक्षणः—**लाल नेत्रोंवाले; २४१. **रक्तकरः—**लाल हाथोंवाले; २४२. रक्तताल्वोष्ठ- **पल्लवः—**रक्तवर्णके तालु और ओष्ठपल्लव धारण करनेवाले ॥ ४३ ॥ २४३. श्वेतः—(विद्याकी कामना रखनेवाले साधकोंको भगवान् गणेशके श्वेत रूपका ध्यान करना चाहिये, इस दृष्टिसे श्वेत आदि पाँच नाम दिये जाते हैं—) श्वेतवर्ण; **२४४. श्वेताम्बरधरः—**श्वेत वस्त्रधारी; **२४५. श्वेतमाल्यविभूषणः—**श्वेत माला और आभूषण धारण करनेवाले; **२४६. श्वेतातपत्ररुचिरः—**श्वेतच्छत्र धारण करनेके कारण अत्यन्त सुन्दर दिखायी देनेवाले; **२४७. श्वेतचामरवीजितः—**श्वेत चँवर डुलाकर जिनकी सेवा की जाती है, वे ॥ ४४ ॥ २४८. सर्वावयवसम्पूर्णसर्वलक्षणलक्षितः— सम्पूर्ण अंगोंमें सामुद्रिक शास्त्रोक्त समस्त शुभ लक्षणोंसे परिपूर्ण दिखायी देनेवाले; २४९. सर्वाभरणशोभाढ्यः— सम्पूर्ण आभूषणोंकी शोभासे सम्पन्न; २५०. सर्वशोभा- **समन्वितः—**लावण्य नामक सम्पूर्ण अंगकान्तिसे शोभायमान ॥ ४५ ॥ **२५१. सर्वमङ्गलमङ्गल्यः—**समस्त मंगलोंके लिये भी मंगलकारी; **२५२. सर्वकारणकारणम्—**सम्पूर्ण कारणोंके भी कारण; **२५३. सर्वदैककरः—**जिनका एकमात्र कर (शुण्ड-दण्ड) सब कुछ देनेवाला है, वे; २५४. शार्ङ्गी— शृंगनिर्मित धनुष धारण करनेवाले; (यहाँ 'शार्ङ्गी' आदि नामोंसे उनके दस आयुधोंको लक्षित कराया जाता है); **२५५. बीजापूरी—**बिजौरा नीबू या अनार धारण करनेवाले; **२५६. गदाधरः—**गदाधारी ॥ ४६ ॥
[दायाँ स्तम्भ]
**२५७. इक्षुचापधरः—**गन्नेका धनुष धारण करनेवाले; **२५८. शूली—**शूलधारी; **२५९. चक्रपाणिः—**हाथमें चक्र धारण करनेवाले; **२६०. सरोजभृत्—**कमलधारी; २६१. **पाशी—**पाशधारी; **२६२. धृतोत्पलः—**उत्पल धारण करनेवाले; **२६३. शालीमञ्जरीभृत्—**धानकी बाल धारण करनेवाले; **२६४. स्वदन्तभृत्—**एक हाथमें अपने दाँतको लिये रहनेवाले ॥ ४७ ॥ **२६५. कल्पवल्लीधरः—**हाथमें कल्पलता ग्रहण करनेवाले; **२६६. विश्वाभयदैककरः—**जिनका मुख्य कर सम्पूर्ण विश्वसे अभयदान करनेवाला है; अथवा एक हाथमें 'अभय' नामक मुद्रा धारण करनेवाले; २६७. **वशी—**सम्पूर्ण विश्वको वशमें रखनेवाले; २६८. **अक्षमालाधरः—**अक्षमालाधारी; २६९. ज्ञानमुद्रावान्— ज्ञानकी मुद्रासे युक्त; **२७०. मुद्गरायुधः—**मुद्गर नामक शस्त्र धारण करनेवाले ॥ ४८ ॥ **२७१. पूर्णपात्री—**पूर्णपात्रयुक्त यज्ञस्वरूप; अथवा अमृतसे भरे पात्रवाले; **२७२. कम्बुधरः—**शंखधारी; **२७३. विधुतालिसमुद्गकः—**मदजलसे आर्द्र गण्ड- स्थलपर मँडराते हुए भ्रमरसमूहसे युक्त; २७४. **मातुलिङ्गधरः—**बिजौरा नीबू लिये रहनेवाले; **२७५. चूतकलिकामृत्—**आम्रमंजरी धारण करनेवाले; **२७६. कुठारवान्—**कुठारधारी ॥ ४९ ॥ २७७. पुष्करस्थस्वर्णघटीपूर्णरत्नाभिवर्षकः— शून्यमें गृहीत सुवर्णमय कलशसे पूर्ण रत्नोंकी वर्षा करनेवाले; **२७८. भारतीसुन्दरीनाथः—**सरस्वती, गौरी तथा लक्ष्मीके स्वामी ब्रह्मा, शिव और विष्णुरूप; २७९. **विनायकरतिप्रियः—**विनायक नामवाले अपने गणोंके साथ खेलनेमें रुचि रखनेवाले ॥ ५० ॥ **२८०. महालक्ष्मीप्रियतमः—**महालक्ष्मीके प्रियतम (ये महालक्ष्मी विष्णुपत्नी लक्ष्मीसे भिन्न हैं; ये गणेशकी अपनी प्रिया बुद्धिरूपा हैं। सिद्धलक्ष्मी इनकी दूसरी पत्नी हैं); **२८१. सिद्धलक्ष्मीमनोरमः—**सिद्धलक्ष्मीके हृदयवल्लभ; **२८२. रमारमेशपूर्वाङ्गः—**आवरण- देवताओंमें रमा और रमापति (लक्ष्मी तथा विष्णु) गणेशजीके पूर्वभागमें (सम्मुख) विराजमान होते हैं,
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उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १४१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
१४२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] अजयासे घिरे हुए; ३१७. विजयाविजयावहः—विजयाको विजय देनेवाले ॥ ६० ॥ ३१८. अर्जिताचितपादाब्जः—अपराजिताशक्तिसे पूजित चरणारविन्दवाले; ३१९. नित्यानित्यावतंसितः— नित्याशक्तिने जिनके चरणोंको नित्य अपना शिरोभूषण बना रखा है, वे; ३२०. विलासिनीकृतोल्लासः— विलासिनीकी सेवासे उल्लसित होनेवाले; ३२१. शौण्डी- सौन्दर्यमण्डितः—शौण्डी नामक शक्तिके सौन्दर्यसे मण्डित ॥ ६१ ॥ ३२२. अनन्तानन्तसुखदः—अनन्ता नामक शक्तिको अनन्त सुख देनेवाले; ३२३. सुमङ्गलसुमङ्गलः—जिस पीठपर मंगला नामक शक्ति विद्यमान है, उसका नाम 'सुमंगल' है। ऐसा सुमंगल-पीठ जिनके कारण परम मंगलमय होता है, वे गणेशजी 'सुमंगलके सुमंगल' हैं; ३२४. इच्छाशक्तिज्ञानशक्तिक्रियाशक्तिनिषेवितः— इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति तथा क्रियाशक्तिसे सेवित ॥ ६२ ॥ ३२५. सुभागासंश्रितपदः—सुभागादेवीके द्वारा सेवित चरणकमलवाले; ३२६. ललिताललिताश्रयः—ललिता- देवीके मनोरम आश्रय; ३२७. कामिनीकामनः— कामिनी या कामकला नामक शक्तिकी कामना रखनेवाले; ३२८. काममालिनीकेलिलालितः—कामेशी अथवा काममालिनी नामक शक्तिकी क्रीडाओंद्वारा प्रसन्न किये गये ॥ ६३ ॥ ३२९. सरस्वत्याश्रयः—सरस्वती (वाग्देवता)- के आश्रय; ३३०. गौरीनन्दनः—पार्वतीदेवीको आनन्द प्रदान करनेवाले; ३३१. श्रीनिकेतनः—लक्ष्मी या शोभाके आगार; ३३२. गुरुगुप्तपदः—गणक्रीड आदि गुरुओंद्वारा गोपित पदवाले; ३३३. वाचासिद्धः—जिनकी भक्तिसे वाक्-सिद्धि प्राप्त होती है, वे; ३३४. वागीश्वरीपतिः— वागीश्वरी अर्थात् नकुली नामक शक्तिके प्रियतम ॥ ६४ ॥ ३३५. नलिनीकामुकः—नलिनी अर्थात् सुरापगा नामक शक्तिके प्राणवल्लभ; ३३६. वामारामः—वामा नामक शक्ति जिनकी रामा अर्थात् प्रिया हैं, वे; ३३७. ज्येष्ठामनोरमः—ज्येष्ठा नामक शक्ति जिनकी मनोरमा हैं, वे; ३३८. रौद्रीमुद्रितपादाब्जः—रौद्री नामक शक्ति
[दायाँ स्तम्भ] जिनके चरणारविन्दोंको अपनी अंजलिमें बाँधे रखती हैं, वे; ३३९. हुम्बीजः—‘वक्रतुण्डाय हुम्’—इस षडक्षर मन्त्रका अन्तिम वर्ण जो ‘हुम्’ है, वही समस्त पुरुषार्थोंका बीज (कारण) है; अतएव भगवान् गणपति ‘हुं बीज’ नामसे प्रसिद्ध हैं; ३४०. तुङ्गशक्तिकः— उच्चशक्तिसे सम्पन्न; अथवा वक्रतुण्ड-मन्त्रमें जो ‘हुम्’ बीज है, यही उक्त गणेश-मन्त्रकी शक्ति है। इसलिये वे उक्त नामसे प्रसिद्ध हैं ॥ ६५ ॥ ३४१. विश्वादिजननत्राणः—विश्वके आदिभूत हिरण्यगर्भके जन्म और पालन जिनसे होते हैं, वे; ३४२. स्वाहाशक्तिः—‘स्वाहा’ जिनकी शक्ति है, वे; ३४३. सकीलकः—कीलकयुक्त; ३४४. अमृताब्धि- कृतावासः—सुधासिन्धुमें निवास करनेवाले; ३४५. मदघूर्णितलोचनः—सुधापानके मदसे अथवा गण्डस्थलसे झरते हुए मदसे घूमते हुए नेत्रवाले ॥ ६६ ॥ ३४६. उच्छिष्टगणः—उत्कृष्ट और शिष्ट गणोंके स्वामी; ३४७. उच्छिष्टगणेशः—(उच्छिष्टे नामरूपं च) इत्यादि अथर्ववेदीय मन्त्रोंके समूहसे प्रतिपाद्य ईश्वर; अथवा सतत मोदक-भक्षणके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध श्रीगणेश; ३४८. गणनायकः—जिनके गणोंकी गणना भक्तोंद्वारा होती रहती है, वे; ३४९. सार्वकालिक- संसिद्धिः—जिनकी सिद्धियाँ सब समय बनी रहती हैं, वे; ३५०. नित्यशैवः—सदा शिवका चिन्तन करनेवाले; ३५१. दिगम्बरः—दिशाओंको ही वस्त्र बनानेवाले ॥ ६७ ॥ ३५२. अनपायः—अविनाशी; ३५३. अनन्त- दृष्टिः—असीम ज्ञानशक्तिसे सम्पन्न; ३५४. अप्रमेयः— वाणी, मन एवं ज्ञानेन्द्रियोंसे अगम्य होनेके कारण प्रमाणातीत; ३५५. अजरामरः—जरा और मृत्युसे रहित; ३५६. अनाविलः—कालुष्यरहित; ३५७. अप्रतिरथः— प्रतिद्वन्द्वीसे शून्य; ३५८. अच्युतः—मर्यादासे कभी च्युत न होनेवाले; अथवा श्रीकृष्णसे अभिन्न; ३५९. अमृतम्— अमृत या मोक्षस्वरूप; ३६०. अक्षरम्—व्यापक अथवा अक्षय ॥ ६८ ॥ ३६१. अप्रतर्क्यः—जिसका वेदोंके द्वारा अनुमोदन न हो, ऐसे तर्कसे अगम्य; ३६२. अक्षयः—क्षय-
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उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १४३ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 रहित; ३६३. अजय्यः—जिनहें जीता न जा सके, ऐसे; | ३८६. इन्दीवरदलश्यामः—नीलकमलके समान ३६४. अनाधारः—स्वयं सबके आधार होनेके कारण | श्याम; ३८७. इन्दुमण्डलनिर्मलः—चन्द्रमण्डलके समान अपने लिये आधारसे रहित; ३६५. अनामयः—रोगरहित; | गौर कान्तिवाले; ३८८. इध्मप्रियः—अग्निरूपसे काष्ठ ३६६. अमलः—मलिनतासे शून्य; ३६७. अमोघ- | या ईंधनके प्रेमी; ३८९. इडाभागः—ऋत्विक् और सिद्धिः—अमोघ (अव्यर्थ) सिद्धिवाले; ३६८. अद्वैतम्— | यजमान आदिके रूपमें यज्ञकर्ममें भाग लेनेवाले; ३९०. द्वैत-प्रपंचसे रहित; ३६९. अघोरः—शिवरूप; ३७०. | इराधामा—पृथ्वीमें अन्तर्यामीरूपसे अवस्थित; ३९१. अप्रमिताननः—असंख्य मुखवाले ॥ ६९ ॥ | इन्दिराप्रियः—लक्ष्मीद्वारा पूज्य; अथवा विष्णुरूपसे लक्ष्मीके ३७१. अनाकारः—निराकार परमात्मा; ३७२. | प्रियतम ॥ ७३ ॥ अब्धिभूम्यग्निबलघ्नः—जलधि या जलकी शक्ति क्लेदन, | ३९२. इक्ष्वाकुविघ्नविध्वंसी—राजा इक्ष्वाकुके भूमिकी शक्ति स्तम्भन तथा अग्निकी शक्ति दहनका | विघ्नका नाश करनेवाले; ३९३. इतिकर्तव्यतेप्सितः— जिनपर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, वे भूमि, जल और | इतिकर्तव्यता (क्रतुकी अंगभूत सामग्री)—की अपेक्षा अग्निकी शक्तिको प्रतिहत कर देनेवाले; ३७३. | रखकर यजमानकी मनोवांछा पूर्ण करनेवाले; ३९४. अव्यक्तलक्षणः—बहिर्मुख मानवोंकी बुद्धिमें जिनके | ईशानमौलिः—नरेश, भूतेश और सुरेश आदि ईशानों स्वरूप-लक्षण तथा तटस्थ-लक्षणकी अभिव्यक्ति नहीं | (ईश्वरों)—के शिरोमणि; ३९५. ईशानः—ईशानोंको जीवन होती, वे; ३७४. आधारपीठः—पृथ्वीसे लेकर शिवपर्यन्त | देनेवाले; ३९६. ईशानसुतः—ईश्वरपुत्र; ३९७. ईतिहा— छत्तीस आधारभूत तत्त्वोंके भी आश्रय; ३७५. आधारः— | अतिवृष्टि, अनावृष्टि, मूषकजनित उपद्रव, शलभ, शुक अ—विष्णु तथा आ—ब्रह्माको भी धारण करनेवाले; | आदि पक्षी, स्वमण्डल तथा परमण्डल—इन सबसे प्राप्त ३७६. आधाराधेयवर्जितः—आधार-आधेय-भावसे | होनेवाले भयको 'ईति-भीति' कहते हैं; उस 'ईति- रहित, अद्वैतस्वरूप ॥ ७० ॥ | भीति' के नाशक ॥ ७४ ॥ ३७७. आखुकेतनः—मूषकचिह्नसे युक्त ध्वज- | ३९८. ईषणात्रयकल्पान्तः—लोकैषणा, पुत्रैषणा वाले; ३७८. आशापूरकः—सर्वव्यापी होनेसे दिशाओंके | और वित्तैषणा—इन त्रिविध एषणाओंके लिये प्रलयंकर; पूरक अथवा सबकी आशा पूर्ण करनेवाले; ३७९. | अथवा वैराग्यदायक; ३९९. ईहामात्रविवर्जितः—चेष्टा- आखुमहार्थः—मूषकरूपी महान् रथ (वाहन)-से युक्त; | मात्रसे शून्य; चित्स्वरूप; ४००. उपेन्द्रः—कश्यप और ३८०. इक्षुसागरमध्यस्थः—ईखके रसके सागरमें | अदितिके यहाँ अवतीर्ण महोत्कट विनायक; अथवा विराजमान; ३८१. इक्षुभक्षणलालसः—ईख खानेकी | वामनसे अभिन्न; ४०१. उडुभृन्मौलिः—नक्षत्र-पालक इच्छा रखनेवाले ॥ ७१ ॥ | चन्द्रमाको भालदेशमें धारण करनेवाले; ४०२. उण्डेरक- ३८२. इक्षुचापातिरेकश्रीः—इक्षुधन्वा (कामदेव)- | बलिप्रियः—गोल-गोल मिष्टान्नके उपहारको प्रिय से भी अधिक सौन्दर्य-श्रीसे सम्पन्न; ३८३. इक्षुचाप- | माननेवाले ॥ ७५ ॥ निषेवितः—इक्षुमय चापकी अधिष्ठात्री देवी अथवा | ४०३. उन्नताननः—उत्कृष्ट ब्रह्मा आदि देवोंको कामदेवसे सेवित; ३८४. इन्द्रगोपसमानश्रीः—इन्द्रगोप | प्राणवान् करनेवाले; ४०४. उत्तुङ्गः—वराहरूपधारी (बीरबहूटी नामक कीट)-के समान अरुण कान्तिवाले; | भगवान्की दाढ़से तुंगा—नामवाली एक नदी प्रकट हुई, ३८५. इन्द्रनीलसमद्युतिः*—इन्द्रनीलमणिके समान श्याम | जिससे वे भगवान् 'उत्तुंग' कहलाये। उनसे अभिन्न कान्तिवाले ॥ ७२ ॥ | होनेके कारण गणेशजीका भी नाम 'उत्तुंग' है; ४०५.
- कामनाभेदसे भिन्न रूप-रंगमें गणेशजीका ध्यान होता है। अथवा भिन्न-भिन्न युगोंमें अवतार लेकर वे अरुण एवं श्याम-कान्ति धारण करते हैं। (खद्योतभाष्य)
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१४४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 उदारत्रिदशाग्रणीः—उदार देवताओंमें श्रेष्ठ; ४०६. ऊर्जस्वान्—तेजस्वी; ४०७. ऊष्मलमदः—गण्डस्थलसे गर्म-गर्म मदजल बहानेवाले; ४०८. ऊहापोहदुरासदः—ऊह (वितर्क) और अपोह (उसके बाध)-से दुष्प्राप्य ॥ ७६ ॥ ओजस्वान्—शौर्य और उत्कर्षके कारणभूत तेजसे सम्पन्न; ४२९. ओषधीपतिः—ओषधियोंके स्वामी चन्द्रमारूप; ४३०. औदार्यनिधिः—उदारताके सिन्धु; ४३१. औद्धत्यधुर्यः—अपने भक्तोंपर कृपा करनेके लिये उनके सामने अपना उत्कर्ष प्रकट करनेमें श्रेष्ठ; ४३२. औन्नत्यनिस्वनः—सबकी अपेक्षा उच्चस्वरसे गर्जना करनेवाले ॥ ८१ ॥ ४०९. ऋग्यजुस्सामसम्भूतिः—अपने निःश्वाससे ऋग्वेद, यजुर्वेद तथा सामवेदको प्रकट करनेवाले; ४१०. ऋद्धिसिद्धिप्रवर्तकः—राज्य-सम्पत्ति तथा अणिमा आदि सम्पत्तियोंको देनेवाले; ४११. ऋजुचित्तैकसुलभः—एकमात्र सरलचित्त—निर्मल मनसे ही सुलभ होनेवाले; ४१२. ऋणत्रयविमोचकः—देव-ऋण, ऋषि-ऋण और पितृ-ऋण—इन तीनोंसे छुटकारा दिलानेवाले ॥ ७७ ॥ ४३३. सुरनागानामङ्कुशः—देवलोक, मर्त्यलोक और पाताललोक—तीनोंको अपने नियन्त्रणमें रखनेवाले; ४३४. सुरविद्विषामङ्कुशः—देवताओं और विद्वानोंके द्वेषियोंको दण्डित करनेवाले; ४३५. समस्तविसर्गान्तपदेषु परिकीर्तितः अः—'अ' से लेकर 'क्ष' पर्यन्त जो ५१ अक्षर हैं, उनके अन्तमें विसर्ग लगानेपर जिसका उच्चारण होता है, वह 'अः' गणेशजीका एक नाम है ॥ ८२ ॥ ४१३. स्वभक्तानां लुप्तविघ्नः—अपने भक्तजनोंका विघ्न नष्ट करनेवाले; ४१४. सुरद्विषां लुप्तशक्तिः—देवद्रोही दैत्योंकी शक्ति नष्ट करनेवाले; ४१५. विमुखार्चानां लुप्तश्रीः—अपनी पूजासे विमुख या विरुद्ध रहनेवालोंकी धन-सम्पत्तिका नाश करनेवाले; ४१६. लूतास्फोटनाशनः—मकड़ी और फोड़े-फुंसी आदि रोगोंका नाश करनेवाले ॥ ७८ ॥ ४३६. कमण्डलुधरः—कमण्डलु धारण करनेवाले; अथवा सूँड़से अमृतकलश धारण करनेवाले; ४३७. कल्पः—प्रलयकालस्वरूप; अथवा निर्माणमें समर्थ; ४३८. कपर्दी—कौड़ी अथवा जटाजूट धारण करनेवाले; ४३९. कलभाननः—नाद, कान्ति और प्राणशक्तिसे सम्पन्न; ४४०. कर्मसाक्षी—अदृष्ट कर्मोंके भी साक्षी; ४४१. कर्मकर्ता—कर्मठ पुरुषोंके अन्तःप्रेरक होनेके कारण स्वयं ही कर्म करनेवाले; ४४२. कर्माकर्मफलप्रदः—स्वर्ग और मोक्षरूप फल देनेवाले ॥ ८३ ॥ ४१७. एकारपीठमध्यस्थः—त्रिकोणचक्रके मध्य-भागमें विराजमान; ४१८. एकपादकृतासनः—काशीमें एक पैरसे खड़े रहनेवाले; ४१९. एजिताखिलदैत्यश्रीः—समस्त असुरोंकी राज्य-लक्ष्मीको कम्पित कर देनेवाले; ४२०. एधिताखिलसंश्रयः—अपनी शरण लेनेवाले भक्तोंकी श्रीवृद्धि करनेवाले ॥ ७९ ॥ ४४३. कदम्बगोलकाकारः—समस्त नाड़ियोंका जो उद्गम-स्थान है, वहाँ कदम्ब-पुष्पके समान गोल आकारका कोई देवता है, जो गणेशजीसे अभिन्न है; ४४४. कूष्माण्डगणनायकः—दुष्ट ग्रहोंके नायक अर्थात् उन्हें नियन्त्रणमें रखनेवाले; ४४५. कारुण्यदेहः—करुणामूर्ति; ४४६. कपिलः-कपिलमुनिस्वरूप; ४४७. कथकः—सम्प्रदायप्रवर्तक; ४४८. कटिसूत्रभृत्—कांची धारण करनेवाले ॥ ८४ ॥ ४२१. ऐश्वर्यनिधिः—ऐश्वर्यके आधार अथवा भक्तोंके यहाँ ऐश्वर्य स्थापित करनेवाले; ४२२. ऐश्वर्यम्—ईश्वरकोटिके पुरुषोंमें ऐश्वर्यरूपा अणिमा आदि विभूतिरूप; ४२३. ऐहिकामुष्मिकप्रदः—लौकिक और पारलौकिक सुख देनेवाले; ४२४. ऐरम्मदसमोन्मेषः—जिनकी दृष्टिका उन्मेष (खोलना) विद्युत्के समान प्रकाशमान है, वे; ४२५. ऐरावतनिभाननः—ऐरावत हाथीके समान मुखवाले ॥ ८० ॥ ४४९. खर्वः—वामनरूप; ४५०. खड्गप्रियः—खड्ग (तलवार या गैंडा) जिन्हें प्रिय है; ४५१. खड्गखान्तान्तस्थः—खड्ग-शब्दगत खकारसे परे जो डकार है, उससे परे जो गकार है, वह गणेशजीका ४२६. ओंकारवाच्यः—ओंकार अर्थात् प्रणवके वाच्यार्थरूप; ४२७. ओंकारः—ओंकार-नामवाले; ४२८.
उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १४५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] बीजाक्षर है, उसमें विद्यमान; ४५२. खनिर्मलः- आकाशकी भाँति सर्वगत होते हुए निर्लिप्त; ४५३. खल्वाटशृङ्गनिलयः-वृक्षविहीन पर्वतके शिखरपर निवास करनेवाले; ४५४. खट्वाङ्गी-खट्वांग नामसे प्रसिद्ध अस्त्र धारण करनेवाले; ४५५. खदुरासदः-आकाशकी भाँति पकड़में न आ सकनेवाले ॥ ८५ ॥ ४५६. गुणाढ्यः-अनन्त कल्याणमय गुणगणसे सम्पन्न; ४५७. गहनः-जहाँ जाना या पहुँचना सम्भव न हो सके, वे; ४५८. गस्थः-अपने बीजस्वरूप गकारमें स्थित; ४५९. गद्यपद्यसुधार्णवः-गद्य-पद्यरूप काव्यरसामृतके सागर; ४६०. गद्यगानप्रियः-गद्य- सामगानके प्रेमी; ४६१. गर्जः-मेघगर्जनस्वरूप; ४६२. गीतगीर्वाणपूर्वजः-नादसे गीत आदि शब्द प्रकट हुए हैं और नादके अर्थसे देवता आदि; अतः नाद और नादार्थस्वरूप होनेके कारण गीत और देवताओंके पूर्वज ॥ ८६ ॥ ४६३. गुह्याचाररतः-हृदयगुहामें प्रविष्ट जीवात्मा और परमात्माके चिन्तनमें लगे हुए अन्तर्मुख साधकपर संतुष्ट रहनेवाले; ४६४. गुह्यः-एकान्तमें जाननेयोग्य; अथवा गुह-कार्तिकेयके हितकारी; ४६५. गुह्यागम- निरूपितः-गुह्य अर्थात् एकान्तवेद्य होनेके कारण 'गुह्यागमनिरूपित' के नामसे प्रसिद्ध; ४६६. गुहाशयः- हृदयगुहामें शयन करनेवाले अन्तर्यामी पुरुष; ४६७. गुहाब्धिस्थः-अव्याकृत आकाश गूढ़ और अगाध होनेके कारण गुहाब्धिके तुल्य है, उसमें विराजमान; ४६८. गुरुगम्यः-गुरुके बताये हुए योग या उपायसे प्राप्तव्य; ४६९. गुरोर्गुरुः-ब्रह्मा आदिको भी वेदका ज्ञान देनेवाले होनेके कारण गुरुके भी गुरु ॥ ८७ ॥ ४७०. घण्टाघर्घरिकामाली-घण्टाकी तरह मनोहर शब्द करनेवाली किंकिणीको 'घर्घरिका' कहते हैं। बालोचित क्रीड़ाके समय उसकी माला धारण करनेवाले; ४७१. घटकुम्भः-उलटे रखे हुए दो घड़ोंके समान दो कुम्भस्थलवाले; ४७२. घटोदरः-घटके समान विशाल उदरवाले; ४७३. चण्डः-प्रचण्ड पराक्रमी; ४७४. चण्डेश्वरसुहृत्-शिव-पार्षद चण्डेश्वरके सखा; ४७५.
[दायाँ स्तम्भ] चण्डीशः-चण्डीनाथ शिव; ४७६. चण्डविक्रमः- अत्यन्त क्रोधशील दुष्टोंपर आक्रमण करके उन्हें वशमें करनेवाले ॥ ८८ ॥ ४७७. चराचरपतिः-स्थावर-जंगम जगत्के स्वामी; ४७८. चिन्तामणिचर्वणलालसः-अपनी अतिशय उदारताके कारण चिन्तामणि, कामधेनु और कल्पवृक्षके गर्वको चूर्ण करनेकी लालसावाले; ४७९. छन्दः-गायत्री आदि छन्दःस्वरूप; ४८०. छन्दोवपुः- छन्दोमय शरीरवाले; ४८१. छन्दोदुर्लक्ष्यः-वेदसे भी कठिनतापूर्वक लक्षित होनेवाले; ४८२. छन्दविग्रहः- अपनी इच्छाके अनुसार या भक्तोंकी भावनाके अनुकूल अवतार-शरीर धारण करनेवाले ॥ ८९ ॥ ४८३. जगद्योनिः-जगत्के कारण; ४८४. जगत्साक्षी-जगत्के साक्षी या द्रष्टा; ४८५. जगदीशः- जगत्के स्वामी या रक्षक; ४८६. जगन्मयः-जगत्स्वरूप या जगत्के अधिष्ठान; ४८७. जपः-जपकर्मरूप; ४८८. जपपरः-जपकर्ता; ४८९. जप्यः-जपनीय मन्त्ररूप; ४९०. जिह्वासिंहासनप्रभुः-जिनके नाम-कीर्तनके समय जो भक्तके जिह्वारूपी सिंहासनपर विराजमान रहते हैं, वे ॥ ९० ॥ ४९१. झलज्झलोल्लसद्दानझङ्कारिभ्रमराकुलः- कानोंके हिलानेसे उड़-उड़कर मदजलके आस-पास झंकार-रव करनेवाले भ्रमरोंसे व्याप्त; ४९२. टंकारस्फारसंरावः-काँसेकी घण्टी या थालीके बजनेसे होनेवाले रण-रणनात्मक रवके समान जिनके आभूषणकी झनकार होती है, वे; ४९३. टंकारिमणिनूपुरः-बजते हुए रत्नमय पादकटककी ध्वनि फैलानेवाले ॥ ९१ ॥ ४९४. ठद्वयीपल्लवान्तःस्थसर्वमन्त्रैकसिद्धिदः- सम्पूर्ण स्वाहान्त मन्त्रोंके एकमात्र सिद्धिदाता; ४९५. डिण्डिमुण्डः-उलटकर रखे हुए नगाड़ेके समान कुम्भ- स्थलवाले; ४९६. डाकिनीशः-योगिनियोंके ईश्वर; ४९७. डामरः-डामर नामक तन्त्रस्वरूप; ४९८. डिण्डिम- प्रियः-डिण्डिम-घोष या दुन्दुभिकी ध्वनिसे प्रसन्न होनेवाले ॥ ९२ ॥ ४९९. ढक्कानिनादमुदितः-पटहध्वनिसे प्रसन्न;
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१४६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ५००. ढौकः—सर्वगत; अथवा सर्वज्ञ; ५०१. दुण्ढिविनायकः—विशिष्ट नायकके रूपमें अन्वेषणीय; ५०२. तत्त्वानां परमं तत्त्वम्—तत्त्वोंमें परम (छब्बीसवें) तत्त्वरूप; ५०३. तत्त्वंपदनिरूपितः—'तत्-पदार्थ' और 'त्वम्-पदार्थ' की एकताद्वारा निरूपित ॥ ९३ ॥ ५०४. तारकान्तरसंस्थानः—आँखकी पुतलीमें चिन्तन करनेयोग्य; ५०५. तारकः—प्रणवकी भाँति भवसागरसे पार करनेवाले; ५०६. तारकान्तकः— तारकासुरका संहार करनेवाले; ५०७. स्थाणुः—सुस्थिर; सर्वथा अकम्पित; ५०८. स्थाणुप्रियः—शिवके प्रिय पुत्र; ५०९. स्थाता—युद्धमें दृढ़तापूर्वक डटे रहनेवाले; ५१०. स्थावरं जङ्गमं जगत्—चराचर जगत्स्वरूप ॥ ९४ ॥ ५११. दक्षयज्ञप्रमथनः—दक्ष प्रजापतिके यज्ञका विध्वंस करनेवाले शिवरूप; ५१२. दाता—दानी अथवा शोधक*—पतितपावन; ५१३. दानवमोहनः—दानवोंको मोहित (तत्त्वविमुख) करनेवाले; ५१४. दयावान्— दयालु; ५१५. दिव्यविभवः—लक्ष्मीकी प्राप्ति करानेवाले; अथवा दिव्य वैभवसे सम्पन्न; ५१६. दण्डभृत्— दण्डनीतिके पालक; ५१७. दण्डनायकः—दण्डके प्रवर्तक ॥ ९५ ॥ ५१८. दन्तप्रभिन्नाभ्रमालः—सिर हिलानेमात्रसे दन्ताघातके द्वारा बादलोंकी पंक्तिको छिन्न-भिन्न कर देनेवाले; ५१९. दैत्यवारणदारणः—दैत्योंको रोकने और विदीर्ण करनेवाले; ५२०. दंष्ट्रालग्नद्विपघटः— जिनके दाढ़के एक देशमें भी शत्रुओंके हाथियोंका समुदाय संलग्न है, ऐसे; ५२१. देवार्थनृगजाकृतिः— देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये मनुष्य और हाथीकी आकृति स्वीकार करनेवाले ॥ ९६ ॥ ५२२. धनधान्यपतिः—धन और धान्यके स्वामी तथा दाता; ५२३. धन्यः—धनसे सम्पन्न एवं पुण्यवान्; ५२४. धनदः—धनके दाता; अथवा कुबेरस्वरूप; ५२५. धरणीधरः—शेषनाग तथा आदिवराहके रूपमें पृथ्वीको धारण करनेवाले; ५२६. ध्यानैकप्रकटः—एकमात्र ध्यानमें ही प्रकट होनेवाले; ५२७. ध्येयः—ध्यानमें द्रष्टव्य; ५२८. ध्यानम्—ध्यानस्वरूप; ५२९. ध्यानपरायणः— ध्यानमें संलग्न रहनेवाले ॥ ९७ ॥ ५३०. नन्द्यः—आनन्दनीय; ५३१. नन्दिप्रियः— नन्दिकेश्वरके प्रिय; ५३२. नादः—नादानुसन्धानसे प्राप्त होनेवाले नादस्वरूप; ५३३. नादमध्यप्रतिष्ठितः— नादमें प्रतिष्ठित; ५३४. निष्कलः—अवयवरहित; ५३५. निर्मलः—दोषरहित; ५३६. नित्यः—नाशरहित; ५३७. नित्यानित्यः—आकाश और पृथ्वी आदि नित्य एवं अनित्य रूप धारण करनेवाले; ५३८. निरामयः— अविद्यारूपी महारोगसे शून्य ॥ ९८ ॥ ५३९. परं व्योम—अव्याकृत आकाश या नित्य धामस्वरूप; ५४०. परं धाम—ज्योतिके ज्योतिःस्वरूप; ५४१. परमात्मा—सम्पूर्ण जीवोंसे उत्कृष्ट आत्मा— पुरुषोत्तम; ५४२. परं पदम्—परमपदरूप; ५४३. परात्परः—परसे भी पर—ब्रह्मा, विष्णु और महेशसे भी उत्तम; ५४४. पशुपतिः—ब्रह्मासे लेकर कीटपर्यन्त समस्त जीवोंके पालक; ५४५. पशुपाशविमोचकः— पशुओं (जीवों)-को विविध पाशों (बन्धनों)-से छुटकारा दिलानेवाले ॥ ९९ ॥ ५४६. पूर्णानन्दः—क्रिया, कर्ता और कर्मके भेदसे रहित परिपूर्ण सुखस्वरूप; ५४७. परानन्दः— भूलोकसे लेकर शतगुणोत्तर बढ़े हुए ब्रह्मलोकपर्यन्तके सम्पूर्ण आनन्दोंको नीचा करके सबसे उत्कृष्ट परमानन्द— महासुखस्वरूप; ५४८. पुराणपुरुषोत्तमः—क्षर-अक्षरसे भी उत्तम एवं अनादि होनेके कारण पुराणपुरुषोत्तम; ५४९. पद्मप्रसन्ननयनः—प्रफुल्ल कमलके समान उल्लासयुक्त नेत्रवाले; ५५०. प्रणताज्ञानमोचनः— शरणागत सेवकोंको तत्त्वज्ञान देकर उनके अज्ञानका निवारण करनेवाले ॥ १०० ॥ ५५१. प्रमाणप्रत्ययातीतः—प्रमाणजनित प्रतीतियोंसे ऊपर उठे हुए नित्यज्ञानैकस्वरूप; ५५२. प्रणतार्ति- निवारणः—प्रणतजनोंकी पीड़ाको दूर कर देनेवाले; ५५३. फलहस्तः—भक्तजनोंको अविलम्ब फल देनेके कारण मानो समस्त फलोंको हाथमें ही लिये रहनेवाले;
- शोधनार्थक 'दै' धातुसे 'दाता' बनता है।
उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १४७ ५५४. फणिपतिः—शेष और वासुकि नागके भी स्वामी; ५५५. फेत्कारः—फेत्कार-तन्त्रस्वरूप; ५५६. फाणितप्रियः—फाणित अर्थात् खाँडके प्रेमी ॥ १०१ ॥ ५५७. बाणार्चिताङ्घ्रियुगलः—बाणासुरसे पूजित युगल चरणवाले; ५५८. बालकेलिकुतूहली—बालोचित क्रीड़ाके लिये उत्सुक; ५५९. ब्रह्म—परब्रह्मस्वरूप; ५६०. ब्रह्मार्चितपदः—ब्रह्माजीसे पूजित चरणवाले; अथवा वेदपूजित पदवाले; ५६१. ब्रह्मचारी—ब्रह्मचर्यनिष्ठ; ५६२. बृहस्पतिः—देवगुरु बृहस्पतिरूप ॥ १०२ ॥ ५६३. बृहत्तमः—बड़ेसे भी बड़े; ५६४. ब्रह्मपरः— ब्रह्माजीसे भी श्रेष्ठ; अथवा एकमात्र वेदके ही अनुशीलनमें तत्पर; ५६५. ब्रह्मण्यः—ब्राह्मणोंको मान देनेवाले; अथवा उनके हितकारी; ५६६. ब्रह्मवित्प्रियः—ब्रह्म-वेत्ताओंके प्रिय; अथवा ब्रह्मवेत्ताओंको प्रिय माननेवाले; ५६७. बृहन्नादाग्रयचीत्कारः—मेघोंकी गर्जना और बिजलीकी गड़गड़ाहटसे भी अधिक उच्चस्वरसे चीत्कार या गर्जना करनेवाले; ५६८. ब्रह्माण्डावलिमेखलः—कटिसूत्रमें किंकिणीकी भाँति समस्त ब्रह्माण्डोंको ही गूँथ लेनेवाले; अथवा विराट्रूपधारी ॥ १०३ ॥ ५६९. भ्रूक्षेपदत्तलक्ष्मीकः—भक्तोंको भौंहोंके संकेतमात्रसे लक्ष्मी (धन-सम्पत्ति) प्रदान करनेवाले; ५७०. भर्गः—तेजःस्वरूप; ५७१. भद्रः—भद्रजातीय गजरूप; ५७२. भयापहः—भयके नाशक; ५७३. भगवान्— षड्विध ऐश्वर्यसे सम्पन्न; ५७४. भक्तिसुलभः— भक्तिके द्वारा ही सुगमतापूर्वक प्राप्य; ५७५. भूतिदः— अष्टसिद्धियोंके दाता; ५७६. भूतिभूषणः—भस्म धारण करनेवाले ॥ १०४ ॥ ५७७. भव्यः—कल्याणस्वरूप; ५७८. भूता- लयः—पंचभूतों, भूत-प्रेत आदिकों तथा समस्त भूत- प्राणियोंके अधिष्ठान; ५७९. भोगदाता—प्राणियोंके कर्मानुसार दुःख और सुखका अनुभव करानेवाले; ५८०. भ्रूमध्यगोचरः—भौंहोंके मध्यभागमें ध्येय; ५८१. मन्त्रः—विविध मन्त्रस्वरूप; ५८२. मन्त्रपतिः—मन्त्रणाके अधिकारी, पालक एवं प्रवर्तक; ५८३. मन्त्री— राज्यसंचालनोपयोगी मन्त्रशक्तिके अधिष्ठाता; ५८४. मदमत्तमनोरमः—समाधिजनित आनन्दसे मत्त हृदयमें ध्येयरूपसे रमण करनेवाले ॥ १०५ ॥ ५८५. मेखलावान्—करधनीसे विभूषित कटिप्रदेश- वाले; ५८६. मन्दगतिः—मन्द पुरुषोंके भी आश्रयदाता; ५८७. मतिमत्कमलेक्षणः—सद्बुद्धि देनेवाले कमलोपम नेत्रोंसे युक्त; ५८८. महाबलः—महाबलसे सम्पन्न; ५८९. महावीर्यः—महापराक्रमी; ५९०. महाप्राणः— महान् प्राणशक्तिसे सम्पन्न; ५९१. महामनाः—महा- मनस्वी ॥ १०६ ॥ ५९२. यज्ञः—यज्ञस्वरूप; ५९३. यज्ञपतिः— यज्ञोंके स्वामी; ५९४. यज्ञगोप्ता—यज्ञोंके संरक्षक; ५९५. यज्ञफलप्रदः—यज्ञफलके दाता; ५९६. यश- स्करः—सुयशका विस्तार करनेवाले; ५९७. योगगम्यः— योगसे प्राप्तव्य; ५९८. याज्ञिकः—यज्ञकर्ता; ५९९. याजकप्रियः—यज्ञ करानेवालोंके प्रेमी ॥ १०७ ॥ ६००. रसः—परमानन्दस्वरूप; ६०१. रसप्रियः— मधुर आदि रसोंमें प्रीति रखनेवाले; ६०२. रस्यः— आस्वादके विषय; ६०३. रञ्जकः—दूसरोंके मनका अनुरंजन करनेवाले; ६०४. रावणार्चितः—दशमुख रावणके द्वारा भी पूजित; ६०५. रक्षोरक्षाकरः— राक्षसोंको जलाकर राख कर देनेवाले; अथवा अपनी आराधना करनेवाले राक्षसोंके रक्षक; ६०६. रत्नगर्भः— पृथ्वीके आश्रय; ६०७. राजसुखप्रदः—राज-सम्बन्धी सुख देनेवाले ॥ १०८ ॥ ६०८. लक्ष्यम्—प्रणवरूपी धनुषके द्वारा चित्तरूपी बाणसे वेधनेयोग्य ब्रह्म; ६०९. लक्ष्यप्रदः—निर्विघ्नतापूर्वक लक्ष्यकी प्राप्ति करानेवाले; ६१०. लक्ष्यः—‘तत्त्वमसि’— इत्यादि महावाक्यगत पदोंद्वारा लक्षणाशक्तिसे बोध्य; ६११. लयस्थः—प्रलयकालमें भी स्थित रहनेवाले; अथवा चित्तलयकी स्थितिमें विद्यमान; ६१२. लड्डुक- प्रियः—लड्डूसे प्रसन्न रहनेवाले; ६१३. लानप्रियः— गजशालामें प्रीति रखनेवाले; ६१४. लास्यपरः— विलासयोग्य परमधामवाले; ६१५. लाभकृल्लोक- विश्रुतः—लाभकारी (भक्तोंको शीघ्र वरदान देनेवाले) लोगोंमें श्रेष्ठताके लिये विख्यात ॥ १०९ ॥
१४८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ६१६. वरेण्यः—गणपतिभक्त राजा वरेण्यसे अभिन्न; | करनेवाले ॥ ११४॥ ६१७. वह्निवदनः—अग्निरूप मुखवाले; ६१८. वन्द्यः— | ६४६. साक्षी—विश्वको साक्षात् देखनेवाले; ६४७. वन्दनीय; ६१९. वेदान्तगोचरः—उपनिषद्गम्य; ६२०. | समुद्रमथनः—समुद्रमन्थनकालमें देवताओंद्वारा सर्वप्रथम विकर्ता—छः भावविकारोंके प्रवर्तक; ६२१. | पूजित; ६४८. स्वसंवेद्यः—स्वयंज्योतिःस्वरूप; ६४९. विश्वतश्चक्षुः—सब ओर नेत्रवाले; ६२२. विधाता— | स्वदक्षिणः—स्वयं समर्थ; ६५०. स्वतन्त्रः—अपराधीन; स्रष्टा; ६२३. विश्वतोमुखः—सब ओर मुखवाले ॥ ११० ॥ | ६५१. सत्यसंकल्पः—कभी व्यर्थ न जानेवाले संकल्पसे ६२४. वामदेवः—सुन्दर देवता; अथवा शिवस्वरूप; | युक्त; ६५२. सामगानरतः—साममन्त्रोंके गानमें संलग्न; ६२५. विश्वनेता—जगत्के नायक; ६२६. वज्रिवज्र- | ६५३. सुखी—सुखका अनुभव करनेवाले ॥ ११५ ॥ निवारणः—इन्द्रके वज्रको स्तम्भित कर देनेवाले; ६२७. | ६५४. हंसः—यति-विशेषरूप; अथवा सूर्यरूप; विश्वबन्धनविष्कम्भाधारः—विश्वकी सृष्टिके लिये | ६५५. हस्तिपिशाचीशः—हस्तिपिशाचीश नामक पर्याप्त देशको 'विष्कम्भ' कहते हैं। उसके भी आधार; | नवाक्षरमन्त्रके देवता; ६५६. हवनम्—आहुतिस्वरूप; ६२८. विश्वेश्वरप्रभुः—सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों और उनके | ६५७. हव्यकव्यभुक्—हव्य-कव्यके भोक्ता देवता- अधीश्वरोंके भी ईश्वर ॥ १११ ॥ | पितृस्वरूप; ६५८. हव्यः—हविष्यरूप; ६५९. हुतप्रियः— ६२९. शब्दब्रह्म—परावाणीसे अतीत नादरूपधारी; | आहुतिमें दिये गये द्रव्यके प्रेमी; ६६०. हर्षः— ६३०. शमप्राप्यः—मनोनिग्रहसे प्राप्तव्य; ६३१. | आनन्दस्वरूप; ६६१. हल्लेखामन्त्रमध्यगः—हल्लेखा- शम्भुशक्तिगणेश्वरः—शैवों और शाक्तोंके समुदायके | मन्त्रके मध्यवर्ती—ह्रींकारवाच्य ॥ ११६ ॥ ईश्वर; ६३२. शास्ता—'शास्ता' नामसे प्रसिद्ध केरलदेशीय | ६६२. क्षेत्राधिपः—प्रयाग आदि क्षेत्रों अथवा देवतास्वरूप; अथवा बुद्धरूप; ६३३. शिखाग्रनिलयः— | शरीर आदिके स्वामी; ६६३. क्ष्माभर्ता—पृथ्वी अथवा शास्ताके शिखाग्रभागमें निवास करनेवाले; ६३४. | क्षमाको धारण करनेवाले; ६६४. क्षमापरपरायणः— शरण्यः—रक्षक; ६३५. शिखरीश्वरः—हिमालय- | क्षमाशील मुनियोंके प्राप्य; ६६५. क्षिप्रक्षेमकरः—शीघ्र स्वरूप ॥ ११२ ॥ | सिद्धि प्रदान करनेवाले; ६६६. क्षेमानन्दः—क्षेम और ६३६. षडृतुकुसुमस्त्रग्वी—छहों ऋतुओंमें | आनन्दस्वरूप; ६६७. क्षोणीसुरद्रुमः—भूतलपर खिलनेवाले पुष्पोंकी मालासे अलंकृत; ६३७. षडाधारः— | कल्पवृक्षके समान समस्त मनोरथोंके दाता ॥ ११७ ॥ छहों चक्रोंके आधारभूत मूलाधार-चक्रस्वरूप; ६३८. | ६६८. धर्मप्रदः—धर्म प्रदान करनेवाले, ६६९. षडक्षरः—छः अक्षरोंवाले वक्रतुण्ड-मन्त्रस्वरूप; ६३९. | अर्थदः—धन देनेवाले; ६७०. कामदाता—कामप्रद; संसारवैद्यः—भवरोगका नाश करनेवाले; ६४०. सर्वज्ञः— | ६७१. सौभाग्यवर्धनः—स्त्रियोंको सौभाग्यवृद्धिका वर सब कुछ जाननेवाले; अथवा बुद्धस्वरूप; ६४१. सर्वभेषज- | देनेवाले; ६७२. विद्याप्रदः—ज्ञानदाता; ६७३. विभवदः— भेषजम्—समस्त रोगोंकी दवा दिव्य अमृतके भी | सम्पत्तिदाता; ६७४. भुक्तिमुक्तिफलप्रदः—भोग और दोषनिवारक ॥ ११३ ॥ | मोक्षरूप फल देनेवाले ॥ ११८ ॥ ६४२. सृष्टिस्थितिलयक्रीडः—जगत्की सृष्टि, | ६७५. आभिरूप्यकरः—विद्वत्ता एवं सुन्दरता पालन और संहार जिनकी लीलाएँ हैं, वे; ६४३. | प्राप्त करानेवाले; ६७६. वीरश्रीप्रदः—नामस्मरण करनेवाले सुरकुञ्जरभेदनः—दानवसे पूजित होकर देवश्रेष्ठोंमें | भक्तोंको वीरोचित लक्ष्मी प्रदान करनेवाले; ६७७. भेद उत्पन्न करनेवाले; अथवा देवराजके भेदक; ६४४. | विजयप्रदः—विजय देनेवाले; ६७८. सर्ववश्यकरः— सिन्दूरितमहाकुम्भः—सिन्दूरसे अरुण मस्तकवाले; ६४५. | सबको भक्तके वशमें कर देनेवाले; ६७९. गर्भदोषहा— सदसद्व्यक्तिदायकः—अपने भक्तोंको सदसद्विवेक प्रदान | गर्भस्राव या गर्भपात आदि बीजदोषोंको नष्ट करनेवाले;
उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १४९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ६८०. पुत्रपौत्रदः—पुत्र और पौत्र प्रदान करनेवाले ॥ ११९ ॥ | ७०९. राशिः—मेष आदि द्वादश राशिरूप; ७१०. ६८१. मेधादः—धारणावती बुद्धि प्रदान करनेवाले; | तारा—कृत्तिका आदि नक्षत्ररूप; ७११. तिथिः—चन्द्रमाकी ६८२. कीर्तिदः—लोकमें कीर्ति देनेवाले; ६८३. | पन्द्रह कलाओंमेंसे एक; ७१२. योगः—अमृतसिद्धि एवं शोकहारी—ज्ञानदान करके शोक-मोहको हर लेनेवाले; | आनन्द आदि योगरूप; ७१३. वारः—रविवार आदि ६८४. दौर्भाग्यनाशनः—स्त्रियोंके विधवापन आदि | सप्तदिनस्वरूप; ७१४. करणम्—'बव' आदि करणरूप; दुर्भाग्यसूचक दोषोंको नष्ट करनेवाले; ६८५. प्रतिवादि- | ७१५. अंशकम्—अंशस्वरूप; ७१६. लग्नम्—मेष आदि मुखस्तम्भः—प्रतिकूल बोलनेवाले दुष्टोंका मुख बन्द | राशियोंका उदय; ७१७. होरा—अर्धलग्न; ७१८. काल- कर देनेवाले; ६८६. रुष्टचित्तप्रसादनः—कुपित हुए राजा | चक्रम्—शिशुमारचक्रस्वरूप; ७१९. मेरुः—सुवर्णमय आदिके चित्तको प्रसन्न (स्नेहयुक्त) करनेवाले ॥ १२० ॥ | पर्वतरूप; ७२०. सप्तर्षयः—कश्यप आदि सात ऋषिरूप; ६८७. पराभिचारशमनः—दूसरोंके द्वारा किये | ७२१. ध्रुवः—उत्तानपादके पुत्ररूप ॥ १२३ ॥ गये मारण आदि उपायोंको शान्त करनेवाले; ६८८. | ७२२. राहुः—राहु नामक ग्रह; ७२३. मन्दः— दुःखभञ्जनकारकः—सब दुःखोंको दूर कर देनेवाले; | शनैश्चर; ७२४. कविः—शुक्र; ७२५. जीवः—बृहस्पति; ६८९. लवः—लवस्वरूप; ६९०. त्रुटिः—सहस्रलव- | ७२६. बुधः—बुध; ७२७. भौमः—मंगल; ७२८. शशी— जनित काल; (यहाँ यह परिभाषा समझ लेनी चाहिये— | सोम; ७२९. रविः—सूर्य; ७३०. कालः—जगत्का संहार सौ त्रुटियोंका एक तत्पर होता है, तीस तत्परोंका एक | करनेवाले; ७३१. सृष्टिः—सृष्टिक्रियारूप; ७३२. स्थितिः— निमेष होता है, अठारह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है | पालनकर्मरूप; ७३३. स्थावरं जङ्गमं विश्वम्—चराचर और तीस काष्ठाओंकी एक कला होती है।) ६९१. | जगत्-रूप ॥ १२४ ॥ कला—तीस काष्ठाका समय; ६९२. काष्ठा—अठारह | ७३४. भूः—पृथ्वीरूप; ७३५. आपः—जलरूप; निमेषका समय; ६९३. निमेषः—तीस तत्परका काल; | ७३६. अग्निः—तेजःस्वरूप; ७३७. मरुत्—वायुरूप; ६९४. तत्परः—सौ त्रुटियोंका काल; ६९५. क्षणः— | ७३८. व्योम—आकाशरूप; ७३९. अहङ्कृतिः— तीस कलाओंका समय; ॥ १२१ ॥ | अहंकाररूप; ७४०. प्रकृतिः—जगत्का मूलकारण ६९६. घटी—छः क्षणका समय; ६९७. मुहूर्तम्— | अव्यक्त प्रकृतिरूप; ७४१. पुमान्—पुरुषरूप; ७४२. दो घटीका समय; ६९८. प्रहरः—चार मुहूर्तका समय; | ब्रह्मा—सृष्टिकर्ता; ७४३. विष्णुः—पालनकर्ता; ७४४. ६९९. दिवा—दिन (चार पहरका समय); ७००. | शिवः—शिव; ७४५. रुद्रः—संहारकर्ता; ७४६. ईशः— नक्तम्—रात्रि—चार पहरका समय; ७०१. अहर्निशम्— | ईशान; ७४७. शक्तिः—कामेश्वरी; ७४८. सदाशिवः— दिन-रात—आठ पहरका समय; ७०२. पक्षः—पन्द्रह | कामेश्वर शिव ॥ १२५ ॥ दिन-रातका समय; ७०३. मासः—दो पक्षोंका समय; | ७४९. त्रिदशाः—देवसमुदायरूप; ७५०. पितरः— ७०४. अयनम्—छः मासका समय; ७०५. वर्षम्—दो | पितृसमूह; ७५१. सिद्धाः—सिद्धसमुदाय; ७५२. यक्षाः— अयनोंका मानव वर्ष (तीन सौ साठ मानव वर्षका एक | यक्षवृन्द; ७५३. रक्षांसि—राक्षससमूह; ७५४. किन्नराः— दिव्य वर्ष होता है); ७०६. युगम्—बारह हजार दिव्य | किंनरवर्ग; ७५५. साध्याः—साध्यगण; ७५६. विद्याधराः— वर्षोंका चतुर्युग; ७०७. कल्पः—सहस्र चतुर्युगका एक | विद्याधरगण; ७५७. भूताः—भूतगण; ७५८. मनुष्याः— कल्प (जो ब्रह्माका एक दिन है); ७०८. महालयः— | मनुष्यगण; ७५९. पशवः—पशुगण; ७६०. खगाः— बहत्तर हजार कल्पोंका एक महाप्रलय होता है (जिसमें | पक्षिगण ॥ १२६ ॥ ब्रह्माका भी लय हो जाता है।) * ॥ १२२ ॥ | ७६१. समुद्राः—विभिन्न समुद्र; ७६२. सरितः—
- 'लव' से लेकर 'महालय' तक सभी कालभेद महाकालस्वरूप गणपतिके अवयव हैं।
१५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- नदीसमुदाय; ७६३. शैलाः—पर्वतगण; ७६४.भूतम्— | ८०५. सत्यम्—त्रिकालमें अबाधित; ८०६. अणुः— अतीतकाल; ७६५. भव्यम्—भविष्यकाल; ७६६. | मन-इन्द्रियोंके अगोचर; ८०७. महान्—जिससे बढ़कर भवोद्भवः—जगत्की उत्पत्तिके कारण; ७६७. | कोई आनन्द नहीं है, तादृश भूमा; ८०८. स्वस्ति— साङ्ख्यम्—कपिलमुनिद्वारा प्रतिपादित शास्त्र; ७६८. | सम्यक् सत्तावान्; ८०९ हुम्—अपनेसे इतरका बाध पातञ्जलम्—पतंजलिप्रोक्त योगसूत्र; ७६९. योगः— | करनेके कारण हुम्-स्वरूप ब्रह्म; ८१०. फट्—इतर नागराज शेषद्वारा प्रतिपादित; ७७०. पुराणानि—'ब्राह्म' | सत्ताके भ्रमका नाश करनेवाले; ८११. स्वधा—श्राद्धरूप; आदि पुराणसमुदाय; ७७१. श्रुतिः—ऋग्वेद आदि; | ८१२. स्वाहा—यज्ञकर्मरूप; ८१३. श्रौषट्—श्रौषट्- ७७२. स्मृतिः—मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्र ॥ १२७ ॥ | कारोपलक्षित कर्मरूप; ८१४. वौषट्—वौषट्कारोपलक्षित ७७३. वेदाङ्गानि—व्याकरणादि छः वेदांगसमूह; | कर्मरूप; ८१५. वषट्—वषट्कारोपलक्षित कर्मरूप; ८१६. ७७४. सदाचारः—सदाचार-संग्रहात्मक ग्रन्थ; ७७५. | नमः—नमस्कारस्वरूप ॥ १३१ ॥ मीमांसा—सोलह अध्यायोंमें वर्णित कर्ममीमांसा— | ८१७. ज्ञानम्—मोक्षविषयक ज्ञानस्वरूप; ८१८. जैमिनिसूत्र तथा चार अध्यायोंमें कथित ब्रह्ममीमांसा; | विज्ञानम्—विज्ञानस्वरूप; ८१९. आनन्दः—आत्मानन्द- ७७६. न्यायविस्तरः—कणाद और गौतम मुनियोंके | स्वरूप; ८२०. बोधः—अन्तर्बोधरूप; ८२१. संवित्— द्वारा प्रतिपादित न्यायशास्त्र; ७७७. आयुर्वेदः— | बाह्य वृत्तियोंको निरस्त करनेवाला अन्तर्बोध; ८२२. शमः— धन्वन्तरिप्रोक्त उपवेद; ७७८. धनुर्वेदः—अस्त्रविद्या; | मनोनिग्रह; ८२३. यमः—इन्द्रियसंयम; ८२४. एकः— ७७९. गान्धर्वम्—संगीतशास्त्र; ७८०. काव्यनाटकम्— | एकमात्र अद्वितीय; ८२५. एकाक्षराधारः—एक अक्षर श्रव्य काव्य और दृश्य नाटक ॥ १२८ ॥ | 'ग'बीजमात्रमें स्थित रहनेवाले; ८२६. एकाक्षरपरायणः— ७८१. वैखानसम्—विष्णुप्रोक्त वैखानस-तन्त्र; | ॐ—इस एकाक्षरमात्रमें स्थित ॥ १३२ ॥ ७८२. भागवतम्—वैष्णवशास्त्र; ७८३. सात्त्वतम्— | ८२७. एकाग्रधीः—अपने-आपमें एकाग्र रहनेवाले सात्त्वततन्त्र; ७८४. पाञ्चरात्रकम्—पांचरात्र आगम | बुद्धिरूप; ८२८. एकवीरः—अद्वितीय वीर; ८२९. (ये चारों वैष्णवतन्त्र हैं); ७८५. शैवम्—शैवसन्त्र; | एकानेकस्वरूपधृक्—एक होते हुए भी अनेक रूप ७८६. पाशुपतम्—पाशुपतशास्त्र; ७८७. कालामुखम्— | धारण करनेवाले; ८३०. द्विरूपः—'पर' और 'अपर' कालामुखनामसे प्रसिद्ध तन्त्र; ७८८. भैरवशासनम्— | ब्रह्मरूपसे दो रूपवाले; ८३१. द्विभुजः—दो बाँहोंवाले; भैरवकथित शास्त्र (ये चारों शैवतन्त्र हैं) ॥ १२९ ॥ | ८३२. द्व्यक्षः—दो नेत्रोंवाले; ८३३. द्विरदः—दो दाँतोंवाले, ७८९. शाक्तम्—शक्तितन्त्र; ७९०. वैनायकम्— | गजरूप; ८३४. द्वीपरक्षकः—सप्तद्वीपाधिपतित्व प्रदान विनायकतन्त्र; ७९१. सौरम्—सूर्यप्रोक्त तन्त्र; ७९२. | करनेके कारण द्वीपके रक्षक ॥ १३३ ॥ जैनम्—जैनशास्त्र; ७९३. आर्हतसंहिता—आर्हतशास्त्र; | ८३५. द्वैमातुरः—उमा और गंगा—दो माताओंके ७९४. सत्—कारणरूपमें स्थित; ७९५. असत्—कार्यरूपमें | पुत्र; ८३६. द्विवदनः—अग्निरूप मुख तथा गजमुख स्थित; ७९६. व्यक्तम्—सर्वकार्यरूप; ७९७. अव्यक्तम्— | दोनोंसे युक्त होनेके कारण दो मुखवाले; ८३७. द्वन्द्वातीतः— कारणरूप; ७९८. सचेतनम्—सचेतन प्राणिमात्र; | सर्दी-गर्मी आदि द्वन्द्व-दुःखोंसे ऊपर उठे हुए; ८३८. ७९९. अचेतनम्—अचेतन आकाश आदि ॥ १३० ॥ | द्वयातिगः—रजोगुण और तमोगुण—दोनोंको लाँघ करके ८००. बन्धः—आत्मामें अनात्माका और अनात्मामें | विराजमान; ८३९. त्रिधामा—सूर्य, चन्द्र और अग्नि— आत्माका जो भ्रम है, तादृश भ्रमात्मक बन्धनरूप; ८०१. | इन त्रिविध तेजोंसे युक्त मूर्तिवाले; ८४०. त्रिकरः—तीनों मोक्षः—अज्ञाननाशरूप; ८०२. सुखम्—विशुद्धानन्द; | लोकोंके कर्ता; ८४१. त्रेतात्रिवर्गफलदायकः—त्रिविध ८०३. भोगः—अनुभव; ८०४. अयोगः—अनासक्त; | अग्निके चयनसे प्राप्त होनेवाले धर्म, काम और अर्थरूपी