श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 139, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १३७ दुनिमित्तहृत्—देवमूर्तियोंके फूटने, भूकम्प होने तथा महान् उल्कापात आदिके द्वारा सूचित जो दुर्निमित्त (अपशकुन) हैं, उनका हनन करनेवाले; ९६. दुःस्वप्नहृत्—बुरे स्वप्नोंके दुष्प्रभावको दूर करके उन्हें सुस्वप्नमें परिणत कर देनेवाले; ९७. प्रसहनः-भक्तोंके अपराधको सहन करनेवाले भगवान्; ९८. गुणी— अनेक सद्गुणोंसे सम्पन्न; ९९. नादप्रतिष्ठितः— प्रणवनादके वाच्यार्थरूपसे प्रतिष्ठित ॥ १८॥ १००. सुरूपः—अधिक लावण्यसे युक्त; अथवा उत्तम तत्त्वका निरूपण करनेवाले; १०१. सर्वनेत्राधिवासः-सबके नेत्रोंमें द्रष्टा पुरुषके रूपमें निवास करनेवाले; १०२. वीरासनाश्रयः—बायें घुटनेपर दायाँ पैर रखकर बैठना 'वीरासन' कहलाता है, ऐसे वीरासनसे बैठनेवाले; १०३. पीताम्बरः—आकाशको पी जानेवाले; अथवा पीतवस्त्र धारण करनेवाले; १०४. खण्डरदः-खण्डित दायाँ दाँत धारण करनेवाले; १०५. खण्डेन्दुकृतशेखरः—भालदेशमें आधे चन्द्रमाको धारण करनेवाले ॥ १९ ॥ १०६. चित्राङ्गश्यामदशनः- जिनमें श्यामरंगकी अधिकता है, ऐसे; चित्रोंसे अंकित या अलंकृत श्याम दन्तवाले; १०७. भालचन्द्रः-भालदेशमें चन्द्रमाको धारण करनेवाले; अथवा अष्टमीके चन्द्रमाकी भाँति ललाटवाले; १०८. चतुर्भुजः-चार भुजावाले; १०९. योगाधिपः- 'लिङ्गपुराण' में वर्णित जो लकुलीशादि अट्ठाईस योगाचार्यावतार हैं, उनसे अभिन्न रूपवाले; अथवा योगेश्वर; ११०. तारकस्थः- तारक अर्थात् प्रणव-मन्त्रके अभिधेय; १११. पुरुषः- समस्त पुरों- शरीरोंमें शयन करनेवाले साक्षी आत्मा; ११२. गजकर्णकः- हाथीके समान विशाल कानवाले ॥ २० ॥ ११३. गणाधिराजः—काव्यके पद्योंमें जो मगण, यगण, रगण और सगण आदि गण आते हैं, उनसे राजमान-शोभायमान; अथवा गणोंके अधिपति; ११४. विजयस्थिरः—भक्तोंकी विजयमें स्थीररूपसे प्रवृत्त; ११५. गजपतिध्वजी—अपने ध्वजमें गजराजका चिह्न धारण करनेवाले; ११६. देवदेवः-देवताओंके भी देवता- इन्द्र आदि देवताओंके उपास्य; ११७. स्मरप्राणदीपकः- रुद्रद्वारा कामदेवके शरीरके दग्ध कर दिये जानेपर भी उसके प्राणोंको उज्ज्रीवित करनेवाले; ११८. वायुकीलकः- नवद्वारवाले शरीरमें प्राणोंका स्तम्भन करनेवाले ॥ २१ ॥ ११९. विपश्चिद्वरदः- राजा विपश्चित्को वर देनेवाले; १२०. नादोन्नादभिन्नबलाहकः- अपने मन्द या उच्च नाद (घोष) - से मेघोंको छिन्न-भिन्न कर देनेवाले; १२१. वराहरदनः- महावराहकी दंष्ट्रा (दाढ़)- की शोभाको तिरस्कृत करनेवाले एक दाँतसे सुशोभित; १२२. मृत्युञ्जयः-काल, मृत्यु अथवा प्रमादपर विजय पानेवाले; १२३. व्याघ्राजिनाम्बरः- वस्त्रके स्थानमें व्याघ्रचर्मको धारण करनेवाले ॥ २२ ॥ १२४. इच्छाशक्तिधरः- जगत्की सृष्टिकी इच्छा धारण करनेवाले होनेसे इच्छाशक्तिधारी; १२५. देवत्राता- दैत्योंके भयसे देवताओंकी रक्षा करनेवाले; १२६. दैत्यविमर्दनः- दैत्योंका संहार करनेवाले; १२७. शम्भुवक्त्रोद्भवः—शिवके मुखसे प्रकट होनेवाले; १२८. शम्भुकोपहृत्—अपनी बाल-लीलाओंसे भगवान् शिवके क्रोधको हर लेनेवाले; १२९. शम्भुहास्यभूः-नादान बालककी भाँति चेष्टा करके शिवको हँसा देनेवाले ॥ २३ ॥ १३०. शम्भुतेजाः- शिवके तेजसे सम्पन्न; १३१. शिवाशोकहारी-महिषासुर आदिके मर्दनकालमें शिवा (पार्वती)- के बल एवं उत्साहको बढ़ाकर उनके शोकको हर लेनेवाले; १३२. गौरीसुखावहः- पार्वतीजीको सुख पहुँचानेवाले; १३३. उमाङ्गमलजः- गिरिराजनन्दिनी उमाके अंगोंमें लगे हुए उबटनके मैलसे प्रकट हुए शरीरमें प्रवेश करके उसे सप्राण बनानेवाले; १३४. गौरीतेजोभूः—गौरीके तेजसे उत्पन्न; अथवा पार्वतीके तेजकी आधारभूमि; १३५. स्वर्धुनीभवः- गंगाजीसे उत्पन्न स्वामिकार्तिकेयसे अभिन्न; अथवा गंगाजीकी उत्पत्तिके हेतुभूत ॥ २४ ॥ १३६. यज्ञकायः-अश्वमेधादि यज्ञस्वरूप; १३७. महानादः- उच्चस्वरसे गर्जना करनेवाले; १३८. गिरिवर्ष्मा-विराट् स्वरूपसे पर्वतोंको शरीरके अवयवरूपमें