श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 138, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१३६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] वाहन बनानेवाले; अथवा सिंहवाहिनी देवीसे अभिन्न होनेके कारण सिंहवाहन; ५४. मोहिनीप्रियः—मोहिनीपति शिवसे अभिन्न; ५५. कटंकटः—'कट' का अर्थ है— आवरण या अज्ञान; गणेशजी ज्ञान प्रदान करके उस अज्ञानको भी ढक देते या मिटा देते हैं। इसलिये 'कटंकट' नामसे प्रसिद्ध हैं; ५६. राजपुत्रः—राजा वरेण्यके यहाँ पुत्रवत् आचरण करनेवाले; अथवा राजा— चन्द्रमाको पुत्रवत् माननेवाले; ५७. शालकः—'श' 'परोक्ष' अर्थमें है और 'अलक' शब्द 'केश' या अंशका वाचक है। जिनका एक अंश भी प्रत्यक्ष नहीं है, जो अतीन्द्रिय हैं, वे 'शालक' हैं; अथवा शालित- शोभित होते हैं, इसलिये 'शालक' हैं; ५८. सम्मितः— सर्वव्यापी होते हुए भी अंगुष्ठमात्रसे मित; ५९. अमितः— अणु, स्थूल, ह्रस्व और दीर्घ—चारों प्रकारके प्रमाणोंसे मित न होनेवाले ॥ १२ ॥ ६०. कूष्माण्डसामसम्भूतः—'कूष्माण्डैर्जुहु- यात्।'—इस कूष्माण्ड-होमविधिमें जो प्रसिद्ध मन्त्र या साम हैं, वे गणेशजीकी विभूति हैं। अतएव वे उक्त नामसे प्रसिद्ध हैं; ६१. दुर्जयः—बलवान् दैत्य जिन्हें मनसे भी जीत नहीं सकते, ऐसे; ६२. धूर्जयः— जगच्चक्रकी धुरीको अनायास वहन करनेवाले; ६३. जयः—जयस्वरूप; अथवा जय—महाभारत आदि इतिहास-पुराण जिनके रूप हैं, वे; ६४. भूपतिः— पृथ्वीके पालक, अथवा भूपति-नामसे प्रसिद्ध अग्निभ्राता; ६५. भुवनपतिः—समस्त भुवनोंके स्वामी; अथवा उक्त नामवाले अग्निभ्राता; ६६. भूतानाम्पतिः—समस्त भूतोंके पालक अथवा भूतपतिनामक अग्निभ्राता; ६७. अव्ययः— अविनाशी ॥ १३ ॥ ६८. विश्वकर्ता—संसारके स्रष्टा; ६९. विश्व- मुखः—जिनसे विश्वका मुख—आरम्भ हुआ है, वे; अथवा विश्व जिनके मुखमें है; या जो मुखकी भाँति विश्वकी वृत्तिके हेतु हैं, वे गणेश; ७०. विश्वरूपः— सम्पूर्ण दृश्य-प्रपंच जिनका ही रूप है, वे; अथवा त्वष्टा-प्रजापतिके पुत्र देवपुरोहित विश्वरूपसे अभिन्न; ७१. निधिः—आकाश आदि सम्पूर्ण जगत्समूह जिनमें
[दायाँ स्तम्भ] पूर्ण रूपसे आहित या धृत है, वे; अथवा महापद्म आदि नव निधिस্বরূপ; ७२. घृणिः—सूर्यस्वरूप; ७३. कविः— सृष्टिरूप काव्यके कर्ता; ७४. कवीनामृषभः—कवियोंमें श्रेष्ठ; ७५. ब्रह्मण्यः—ब्राह्मण, वेद, तप तथा ब्रह्माके प्रति सद्भाव रखनेवाले; ७६. ब्रह्मणस्पतिः—ब्रह्म अर्थात् वाणीके अधिपति ॥ १४ ॥ ७७. ज्येष्ठराजः—'ज्येष्ठ'-संज्ञक साममें राजमान; ७८. निधिपतिः—नव निधियोंके परिपालक; ७९. निधिप्रियपतिप्रियः—निधियोंको प्रिय माननेवाले जो कुबेर आदि राजा हैं, उनके द्वारा भी उपास्य; ८०. हिरण्मयपुरान्तःस्थः—हिरण्यपुर-दहराकाशके मध्यमें विराजमान; (चिन्मय ब्रह्मके निवासस्थान अन्तर्हृदयमें विद्यमान); ८१. सूर्यमण्डलमध्यगः—सूर्यमण्डलके भीतर स्थित ॥ १५ ॥ ८२. कराहतिध्वस्तसिन्धुसलिलः—जिन्होंने अपने शुण्डदण्डके आघातसे समुद्रके जलको विध्वस्त (निष्कासित) कर दिया था, वे; ८३. पूषदन्तभित्— वीरभद्ररूपसे दक्ष-यज्ञमें पूषाके दाँतको तोड़नेवाले; ८४. उमाङ्ककेलिकुतुकी—उमाके अंकमें बैठकर बालोचित क्रीड़ा करनेका कौतूहल रखनेवाले; ८५. मुक्तिदः— कारागारकी बेड़ीसे छुड़ानेवाले तथा मोक्षदाता; ८६. कुलपालनः—वंशके तथा कौलतन्त्रके भी पालक ॥ १६ ॥ ८७. किरीटी—मस्तकपर मुकुट धारण करनेवाले; अथवा अर्जुनस्वरूप; ८८. कुण्डली—कानोंमें कुण्डल पहननेवाले; अथवा शेषनागरूपधारी; ८९. हारी—मुक्ता आदि मणियोंकी माला धारण करनेवाले; अथवा अत्यन्त मनोहर; ९०. वनमाली—कन्धेसे लेकर पैरोंतक लटकनेवाली 'वनमाला' धारण करनेवाले; ९१. मनोमयः—अपने संकल्पद्वारा निर्मित एक शरीर धारण करनेवाले; ९२. वैमुख्यहतदैत्यश्रीः—जिनके विमुख हो जानेके कारण दैत्योंकी लक्ष्मी नष्ट हो गयी, वे; ९३. पादाहतिजितक्षितिः—अपने पैरोंके आघातसे पृथ्वीको नीचे झुका देनेवाले ॥ १७ ॥ ९४. सद्योजातस्वर्णमुञ्जमेखली—तत्काल तैयार की गयी स्वर्णमय मुंजकी मेखलासे मण्डित; ९५.