भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 137, कुल 656 में से

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पृष्ठ 137

उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १३५


अथवा सुन्दर मुखवाले; १४. दुर्मुखः — जिनके मुखका स्पर्श करना दुष्कर है; अथवा अग्नि और सूर्यके रूपमें जिनकी ओर देखना अत्यन्त कठिन है, वे; १५. बुद्धः — नित्य बुद्धस्वरूप अविद्यावृत्तिके नाशक; अथवा बुद्धावतारस्वरूप; १६. विघ्नराजः — विघ्नोंके साथ विराजमान; अथवा विघ्नोंके राजा; किंवा जो विघ्न-भक्ताधीन तथा राजा हैं, वे भगवान् गणेश; १७. गजाननः — गजों-हाथियोंको अनुप्राणित — प्राणशक्तिसे सम्पन्न करनेवाले ॥ ७ ॥

१८. भीमः — दुष्टोंके लिये भयदायक होनेसे 'भीम' नामसे प्रसिद्ध; १९. प्रमोदः — अभीष्ट वस्तुके लाभसे होनेवाले सुखका नाम है — 'प्रमोद', तत्स्वरूप; २०. आमोदः — प्रमोदसे पहले अभीष्ट वस्तुकी प्राप्तिके निश्चयसे जो सुख होता है, उसे 'आमोद' कहते हैं, ऐसे आमोदस्वरूप; २१. सुरानन्दः — देवताओंके लिये आनन्दप्रद; २२. मदोत्कटः — गण्डस्थलसे झरनेवाले मदके कारण उत्कट; अथवा मदसे आवरणका उत्क्रमण करनेवाले; २३. हेरम्बः — 'हे' का अर्थ है — शंकर तथा 'रम्ब' का अर्थ है — शब्द। शैवागमके प्रवर्तक होनेसे 'हेरम्ब' नामवाले; अथवा उद्यम-शौर्यसे युक्त होनेके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध; २४. शम्बरः — 'शम्' अर्थात् सुख है वर — श्रेष्ठ जिनमें, वे; २५. शम्भुः — जिनसे 'शम्' अर्थात् कल्याणका उद्भव होता है, वे; २६. लम्बकर्णः — भक्तजन जहाँ-कहीं भी गणेशजीका आवाहन या स्तवन आदि करते हैं, वहीं वे जैसे दूर न हों, इस तरह सुन लेते हैं। इसलिये लम्बे-सुदूरतक सुननेवाले कान हैं जिनके, वे; २७. महाबलः — जिनके अनुग्रहसे बलासुर महान् हो गया, वे; अथवा महान् बलशाली ॥ ८ ॥

२८. नन्दनः — समृद्धिके हेतुभूत; २९. अलम्पटः — पर्याप्त पट-वस्त्रोंसे समृद्ध; अथवा पट ही जिनका अलंकार है, वे; ३०. अभीरुः — भयशून्य; अथवा भीरु स्वभाववाली स्त्रीसे रहित; ३१. मेघनादः — मेघगर्जनाके समान नाद या सिंहनाद करनेवाले; अथवा मेघोंके नाशक; ३२. गणञ्जयः — शत्रु-समूहोंपर अनायास विजय पानेवाले; ३३. विनायकः — 'वि' अर्थात् पक्षिरूप जीव-समुदायके नेता या नायक; ३४. विरूपाक्षः — विरूप-विकट दीखनेवाले अग्नि, सूर्य तथा चन्द्ररूप नेत्रोंसे युक्त; ३५. धीरशूरः — धैर्य और शौर्यसे सम्पन्न; ३६. वरप्रदः — अपने भक्तजनोंको उत्तम एवं मनोवांछित वर प्रदान करनेवाले ॥ ९ ॥

३७. महागणापतिः — गुल्म आदि सेना-भेदोंको 'गण' कहते हैं; वे जिनकी अधीनतामें महान्-बहु-संख्यक हैं, वे; अथवा महागर्णोंके अधिपति; ३८. बुद्धिप्रियः — निश्चयात्मिका बुद्धि जिनको प्रिय है, वे; अर्थात् संशयनिवारक; ३९. क्षिप्रप्रसादनः — भक्तोंद्वारा ध्यान किये जानेपर उनके ऊपर शीघ्र प्रसन्न होनेवाले; ४०. रुद्रप्रियः — ग्यारहों रुद्रोंके प्रिय; ४१. गणाध्यक्षः — छत्तीस तत्त्वरूप गणसमुदायके पालक; ४२. उमापुत्रः — पार्वतीके पुत्र (उमाका पुन्नामक नरकलोकसे उद्धार करनेवाले); ४३. अघनाशनः — लम्बोदर या महोदर होनेपर भी स्वल्पमात्र नैवेद्यसे तृप्त होनेवाले (अघन — स्वल्प है अशन — भोजन जिनका, वे); अथवा अघके फलस्वरूप दुःखोंका नाश करनेवाले ॥ १० ॥

४४. कुमारगुरुः — सनत्कुमारस्वरूप होते हुए विद्याका उपदेश करनेके कारण गुरु; अथवा कुमार कार्तिकेयसे भी पहले उत्पन्न होनेके कारण उनके ज्येष्ठ भ्राता; ४५. ईशानपुत्रः — भगवान् शंकरके आत्मज; ४६. मूषकवाहनः — मूषक (चूहे)-को वाहन बनानेके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध; ४७. सिद्धिप्रियः — अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ जिन्हें प्रिय हैं, वे; ४८. सिद्धिपतिः — अणिमा आदि आठ सिद्धियोंके पालक; ४९. सिद्धः — गोरक्षनाथ आदि सिद्धस्वरूप; ५०. सिद्धिविनायकः — भक्तोंतक सिद्धिका नयन करनेवाले (भक्तोंको सिद्धि प्राप्त करानेवाले) ॥ ११ ॥

५१. अविघ्नः — अविभाव; अर्थात् पशुताका हनन (हरण) करनेवाले; अथवा विघ्नोंसे रहित; ५२. तुम्बुरुः — तुम्ब (अलाबू या लौकी)-के द्वारा जो रव करता है, वह 'तुम्बुरु' है। तुम्बुरु नाम है — वीणाका। वीणापर गणपतिका यशोगान होनेसे वे 'तुम्बुरु' नामसे प्रसिद्ध हैं; ५३. सिंहवाहनः — मोर और मूषककी भाँति सिंहको भी