भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 136, कुल 656 में से

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पृष्ठ 136

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१३४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गणपति' ऋषि हैं, 'अनुष्टुप्' छन्द है, 'महागणपति' देवता | अग्रभागमें माणिक्य-निर्मित कलश ले रखा है, जिसके हैं, 'गं' बीज है, 'हुं' शक्ति है एवं 'स्वाहा' कीलक है। मुखभागसे रत्नोंकी वर्षा हो रही है और जिसके द्वारा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-इन चार पुरुषार्थोंकी सिद्धिके वे अपने धनार्थी साधक भक्तोंको तृप्त कर रहे हैं। लिये जप आदिमें इसका विनियोग होता है। कपोलोंपर झरते हुए मदसे वे विह्वल हैं। उनके मस्तकपर ऋष्यादिन्यास मणिमय मुकुट शोभा देता है तथा वे सम्पूर्ण आभूषणोंसे ॐ महागणापतये ऋषये नमः, शिरसि। अनुष्टुप्छन्दसे विभूषित हैं। ऐसे महागणपतिकामैं ध्यान करता हूँ। नमः, मुखे। महागणपतिदेवतायै नमः, हृदि। गं बीजाय नमः, इस तरह ध्यान करके 'ॐ गणेश्वरः' इत्यादिसे गुह्ये। हुं शक्तये नमः, पादयोः। स्वाहा कीलकाय नमः, नाभौ। आरम्भ होनेवाले 'श्रीमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्र' का -इन छः वाक्योंको पृथक्-पृथक् पढ़कर क्रमशः पाठ करना चाहिये- मस्तक, मुख, हृदय, गुदाभाग, दोनों चरण तथा नाभिका ध्यान स्पर्श दाहिने हाथसे करे। ॐ सच्चिदानन्दस्वरूप, १. गणेश्वरः-आकाशादि ध्यान प्रपंचके समूहको 'गण' कहते हैं, वह गण उनका हस्तीन्द्राननमिन्दुचूड़मरुणच्छायं त्रिनेत्रं रसा- स्वरूप है और वे उस गणके ईश्वर हैं, इसलिये जिन्हें दाश्लिष्टं प्रियया सपद्मकरया स्वाङ्कस्थया संततम्। 'गणेश्वर' कहा गया, वे श्रीगणेश; २. गणक्रीडः*- बीजापूरगदाधनुस्त्रिशिखयुक्चक्राब्जपाशोत्पल- गणक्रीड-नामक गुरुस्वरूप; अथवा आकाशादि गणके व्रीह्यग्रस्वविषाणरत्नकलशान् हस्तैर्वहन्तं भजे॥ भीतर प्रवेश करके क्रीड़ा करनेके कारण 'गणक्रीड' जिनका गजराजके समान मुख है; जिनके मस्तकपर नामसे प्रसिद्ध; ३. गणनायः-गणोंके नाथ एवं जिनका चन्द्रमाका मुकुट है; जिनकी अंगकान्ति अरुण है; जो गणन-गुणोंकी गणना करना मंगलमय है, वे भगवान् तीन नेत्रोंसे सुशोभित हैं; जिन्हें हाथमें कमल धारण गणपति; ४. गणाधिपः-आदित्यादि गणदेवताओंके करनेवाली अंकगत प्रिया (सिद्धलक्ष्मी)-का परिरंभग अधिपति; ५. एकदंष्ट्रः-भूमिका उद्धार अथवा जगत्का सदा प्राप्त है तथा जो अपने दस हाथोंमें क्रमशः बीजापुर नाश करनेके निमित्त जिनकी एक ही दंष्ट्रा (दाढ़) है, (बिजौरा नीबू या अनार), गदा, धनुष, त्रिशूल, चक्र, वे भगवान् गणेश; ६. वक्रतुण्डः-वक्र-टेढ़े तुण्ड- कमल, पाश, उत्पल, धानकी बाल तथा अपना ही टूटा शुण्ड-दण्डसे युक्त; ७. गजवक्त्रः-गज अर्थात् हाथीके दाँत धारण करते हैं एवं शुण्डमें रत्नमय कलश लिये हुए समान मुखवाले; ८. महोदरः-अनन्तकोटि ब्रह्माण्डको हैं; उन गणपतिकामैं भजन (ध्यान) करता हूँ। अपने भीतर रखनेके कारण महान् उदरवाले ॥ ६ ॥ गण्डपालीगलद्दानपूरलालसमानसान् । ९. लम्बोदरः-ब्रह्माण्डके आलम्बनरूप उदरवाले; द्विरेफान् कर्णतालाभ्यां वारयन्तं मुहुर्मुहुः ॥ १०. धूम्रवर्णः-धूम्रके समान वर्णवाले; अथवा वायुका कराग्रधृतमाणिक्यकुम्भवक्त्रविनिर्गतैः । बीज धूम्रवर्णका है, तत्स्वरूप होनेके कारण गणेशजी भी रत्नवर्षैः प्रीणयन्तं साधकान् मदविह्वलम् । 'धूम्रवर्ण' कहे गये हैं; ११. विकटः-कट अर्थात् माणिक्यमुकुटोपेतं सर्वाभरणभूषितम् ॥ आवरणसे रहित विभुस्वरूप; १२. विघ्ननायकः- गणेशजीके गण्डस्थलसे मदकी धारा बह रही है। अभक्तसमुदायके प्रति विघ्नोंका नयन करनेवाले; या उसका आस्वादन करनेके लिये भ्रमरोंकी भीड़ टूटी विघ्नोंके अधिपति; अथवा प्राणियोंका विहनन एवं नयन पड़ती है। उन भ्रमरोंको वे अपने ताड़पत्रके समान करनेवाले; १३. सुमुखः-मुखका अर्थ है-आरम्भ; कानोंद्वारा बारम्बार हटाते हैं। उन्होंने अपने शुण्डदण्डके जिनसे सम्पूर्ण आरम्भ सुन्दर या शोभन होते हैं, वे; * गणेशके शिष्य गणक्रीड हैं, जो विकटके गुरु हैं, विकटके शिष्य विघ्ननायक हैं। ये तीनों गुरु एवं गणेशरूप कहे गये हैं (खद्योतभाष्य)।