श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 135, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १३३ तीनों पुरोंको मेरे प्रतापसे गिराकर भस्मसात् कर दें ॥ १६ ॥ प्रकारके दान देकर वरदाता देव गणेशजीका भलीभाँति तदनन्तर भक्तिसे परितुष्ट चित्तवाले गणाधिपति पूजन करके उन्हें पुनः नमस्कार किया ॥ २० ॥ गणेशजीने उन विनम्र शिवजीको सम्यग् रूपसे अपने तब [देवताओं, मुनियों, सिद्धों और ब्राह्मणों-] सहस्र नाम बतलाये, जो सभी लोगोंके लिये विजय प्रदान सभीने कहा कि यह मणिपूर* [गणपति-क्षेत्रके रूपमें] करनेवाले और मनोकामना पूर्ण करनेवाले हैं ॥ १७ ॥ सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात हो। भगवान् गणेश तथा अन्य और उन्होंने यह भी कहा कि [हे शिव!] युद्धके सबके द्वारा 'तथास्तु' कहे जानेके उपरान्त वे देवगण समय आप इसका पाठ करें, इससे आप शीघ्र ही और गणाधिपति गणेशजी अन्तर्धान हो गये ॥ २१ ॥ दैत्योंका वध कर देंगे। तीनों सन्ध्याओंमें इसका जप मुनिगणों और देवताओंसहित गणेशजीके अन्तर्धान करनेसे मनुष्योंकी सभी कामनाएँ और सम्पूर्ण अभीष्ट हो जानेपर अपने गणोंसे घिरे हुए शिवजी भी अपने कार्य सिद्ध हो जाते हैं ॥ १८ ॥ निवास-स्थलको चले आये; जो गन्धर्वों, यक्षगणों और गजानन गणेशजीके वचन सुनकर शिवजीने उनका देवांगनाओंसे घिरा हुआ था। वहाँ उन्होंने परम प्रसन्नतापूर्वक सम्यक् रूपसे पूजन किया और अत्यन्त हर्षित हुए। गिरिराजनन्दिनी पार्वतीसे अपना सारा वृत्तान्त कहा। उन्होंने महागणेशकी [मूर्तिकी] स्थापना की और शीघ्र शिवजीके मुखसे निकली उस अमृतमयी वाणीको सुनकर ही उनके सुदृढ़ एवं उच्च प्रासाद (मन्दिर)-का निर्माण पत्नियोंसहित सभी देवेश्वर, मुनिगण, मुनिपत्नियों और करा दिया ॥ १९ ॥ योगीश्वर प्रसन्न हो गये, उन्होंने त्रिपुरासुरको मरा हुआ तदनन्तर शिवजीने देवताओं, मुनियों और सिद्धगणोंको और भगवान् शिवके अनुग्रहसे अपने अधिकारोंको पुनः भलीभाँति तृप्त करके और श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको विविध प्राप्त हुआ मान लिया ॥ २२-२३ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शिवको वरदान' नामक पैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४५ ॥ छियालीसवाँ अध्याय श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र व्यासजीने पूछा—सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेमें विघ्नशान्तिका उपाय पूछा। भगवान् शिवद्वारा की गयी तत्पर रहनेवाले पितामह ! गणेशजीने भगवान् शिवके उस पूजासे संतुष्ट होकर महागणपतिने स्वयं उनसे अपने प्रति अपने सहस्र नामोंका उपदेश किस प्रकार किया, इस सहस्रनामका वर्णन किया। यह समस्त विघ्नोंका यह मुझे बताइये ॥ १ ॥ एकमात्र हरण करनेवाला तथा सम्पूर्ण मनोवांछित ब्रह्माजीने कहा—ब्रह्मन् ! कहते हैं, पूर्वकालमें फलोंको देनेवाला है ॥ ३-५ ॥ त्रिपुरारि महादेवजीने जब त्रिपुरविजयके लिये उद्योग विनियोग किया, उस समय पहले गणेशजीकी अर्चना न करनेके अस्य श्रीमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्रमन्त्रस्य महागणपति- कारण वे विघ्नोंसे घिर गये ॥ २ ॥ ऋषिः। अनुष्टुप् छन्दः। महागणपतिर्देवता। गं बीजम्। हुं तदनन्तर विघ्नका क्या कारण है, यह मन-ही-मन शक्तिः। स्वाहा कीलकम्। चतुर्विधपुरुषार्थसिद्धयर्थे जपादौ निश्चय करके शिवजीने भक्तिभावसे महागणपतिकी विनियोगः। विधिपूर्वक पूजा की और उन अपराजित देवने उनसे इस 'श्रीमहागणपतिसहस्रनामस्तोत्र-मन्त्र' के 'महा- *महाराष्ट्रके पूना जिलेमें पूनासे ३१ मीलकी दूरीपर स्थित 'राजणगाँव' को मणिपूरक्षेत्र कहा जाता है। यह अष्ट गणपति-क्षेत्रोंमेंसे एक है। यहाँके श्रीविग्रहको 'महागणपति' कहते हैं। ये अष्ट विनायकोंमेंसे एक हैं। मन्दिरके तहखानेमें रखी मूर्ति 'महोत्कट' कहलाती है, उसके दस सूँड़ और बीस भुजाएँ हैं। कहा जाता है कि मुस्लिम आक्रांताओंसे रक्षाके लिये इसे छिपाकर रखा गया था।