भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 134, कुल 656 में से

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१३२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 गन्धर्व, यक्ष, पितर, मनुष्य, देवर्षि, सभी देवगण, ब्रह्मा, | सभीके सम्पूर्ण कार्योंमें, चाहे वे वैदिक हों या लौकिक, इन्द्र, रुद्र१, वसुगण२, साध्यगण३—सम्पूर्ण स्थावर- | शुभ हों या अशुभ—सबमें आप ही प्रयत्नपूर्वक सर्वप्रथम जंगम प्राणी आपसे ही उत्पन्न हुए हैं॥ ४-५॥ | अर्चनीय हैं। हे देव! चूँकि आप यक्षों, विद्याधरों और हे अनन्यबुद्धे! आप रजोगुणका आश्रय लेकर इस | सर्पोंसहित सभी लोगोंके मंगल (हित, कल्याण, क्षेम)- विश्वका सृजन करते हैं, सत्त्वगुणका आश्रय लेकर | के अधिपति हैं और [विशेषरूपसे] अपने भक्तोंका इसकी रक्षा करते हैं और तमोगुणका आश्रय लेकर | मंगल करनेवाले हैं, इसीलिये आप मंगलमूर्ति [कहे इसका संहार करते हैं। हे गणेश! आप शाश्वत, निष्काम | जाते] हैं॥ १०—१११/२॥ और सम्पूर्ण कर्मोंके साक्षी हैं॥ ६॥ | हे ईश! पूर्वकालमें दैत्यश्रेष्ठ [त्रिपुरासुर]-के साथ ब्रह्माजी बोले—[हे व्यासजी!] तदनन्तर मैंने | युद्धमें आपका अर्चन, आपका स्मरण और आपका शिवजीकी आज्ञासे उन भगवान् गणेशसे जो कुछ कहा | वन्दन न करनेके कारण मैं पराभवको प्राप्त हुआ, था और जो उनका नाम रखा; हे महामते! उसे सुनिये। | इसलिये मैं आपके चरणोंकी शरणमें आया हूँ। हे [मैंने गणेशजीसे कहा—] मातृकाओं४में जो प्रथम बीज | सर्वशक्तिमान्! आप मेरे अपराधको क्षमा करें और अक्षर 'ॐ' है, जो कि श्रुतिका मूल है, वही आपका | सम्पूर्ण युद्धोंके समय मुझे जय प्रदान करें॥ १२-१३॥ नाम है; क्योंकि आप गणोंके ईश हैं, इसलिये आपका | हे देव! जो आपका सर्वथा भजन नहीं करते, वे 'गणेश' नाम हो। गणाधिपतिके द्वारा 'ओम्'—इस | मूर्ख और दरिद्र होंगे। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक आपका प्रकार कहे जानेपर भगवान् शंकर प्रसन्न हो गये और | भजन करते हैं, वे सम्पूर्ण कामनाओंको प्रदान करनेवाली उन्होंने ये वरदान प्रदान किये—॥ ७—८१/२॥ | सिद्धि प्राप्त करेंगे॥ १४॥ शिवजी बोले—हे ईश! जो [अपने] सम्पूर्ण | ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी!] यह सुनकर कार्यों [-के आरम्भ]-में आपका स्मरण करता है, उसे | अखिलवाक्यार्थविशारद गणेशजीने शिवजीसे कहा कि कार्यसिद्धिमें अविघ्नताकी प्राप्ति होती है॥ ९॥ | हे उमेश! आप जब-जब मेरा स्मरण करेंगे, तब-तब मैं बिना आपकी स्मृतिके कृमि-कीटोंको भी अपनी | [शीघ्र ही] आपके पास आ जाऊँगा॥ १५॥ मनोकामनाकी सिद्धि नहीं प्राप्त होती। शैव, आपके भक्त | हे महेश्वर! आप मेरे नामके बीजमन्त्र५से एक बाणको (गणेश-उपासक), वैष्णव, शाक्त और सूर्योपासक— | अभिमन्त्रित करके उससे उस दैत्य त्रिपुरासुरसहित उसके १. रुद्र एकादश हैं— हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्चापराजितः। वृषाकपिश्च शम्भुश्च कपर्दी रैवतस्तथा॥ मृगव्याधश्च शर्वश्च कपाली च विशांपते। एकादशैते कथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वराः॥ (हरिवंशपुराण १।३।५१-५२) हर, बहुरूप, त्र्यम्बक, अपराजित, वृषाकपि, शम्भु, कपर्दी, रैवत, मृगव्याध, शर्व और कपाली—ये ग्यारह रुद्र कहलाते हैं। २. वसु आठ हैं— धरो ध्रुवश्च सोमश्च अहश्चैवानिलोऽनलः। प्रत्यूषश्च प्रभासश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः॥ (महा० आदि० ६६।१८) धर, ध्रुव, सोम, अहः, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास—इन आठोंको वसु कहते हैं। इनमें अनल (अग्नि) वसुओंके राजा, देवताओंको हवि पहुँचानेवाले और भगवान्के मुख माने जाते हैं। ३. साध्यदेवता बारह हैं— मनोऽनुमन्ता प्राणश्च नरो यानश्च वीर्यवान्॥ चित्तिर्हयो नयश्चैव हंसो नारायणस्तथा। प्रभवोऽथ विभुश्चैव साध्या द्वादश जज्ञिरे॥ (वायुपुराण ६६।१५-१६) मन, अनुमन्ता, प्राण, नर, यान, चित्ति, हय, नय, हंस, नारायण, प्रभव और विभु—ये बारह साध्यदेवता हैं। ४. 'अ' से 'क्ष' तक कुल ५२ मातृकाएँ हैं। 'ॐ' = अ+उ+म्' होने से 'ॐ' को प्रथम बीजाक्षर कहा गया है। ओंकारमाद्यं प्रवदन्ति संतो वाचः श्रुतीनामपि यं गृणन्ति। गजाननं देवगणान्ताङ्घ्रिं भजेऽहमर्धेन्दुकृतावंतसम्॥ ५. गणेशजीका बीजमन्त्र 'गं' है।