श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 152, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- नदीसमुदाय; ७६३. शैलाः—पर्वतगण; ७६४.भूतम्— | ८०५. सत्यम्—त्रिकालमें अबाधित; ८०६. अणुः— अतीतकाल; ७६५. भव्यम्—भविष्यकाल; ७६६. | मन-इन्द्रियोंके अगोचर; ८०७. महान्—जिससे बढ़कर भवोद्भवः—जगत्की उत्पत्तिके कारण; ७६७. | कोई आनन्द नहीं है, तादृश भूमा; ८०८. स्वस्ति— साङ्ख्यम्—कपिलमुनिद्वारा प्रतिपादित शास्त्र; ७६८. | सम्यक् सत्तावान्; ८०९ हुम्—अपनेसे इतरका बाध पातञ्जलम्—पतंजलिप्रोक्त योगसूत्र; ७६९. योगः— | करनेके कारण हुम्-स्वरूप ब्रह्म; ८१०. फट्—इतर नागराज शेषद्वारा प्रतिपादित; ७७०. पुराणानि—'ब्राह्म' | सत्ताके भ्रमका नाश करनेवाले; ८११. स्वधा—श्राद्धरूप; आदि पुराणसमुदाय; ७७१. श्रुतिः—ऋग्वेद आदि; | ८१२. स्वाहा—यज्ञकर्मरूप; ८१३. श्रौषट्—श्रौषट्- ७७२. स्मृतिः—मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्र ॥ १२७ ॥ | कारोपलक्षित कर्मरूप; ८१४. वौषट्—वौषट्कारोपलक्षित ७७३. वेदाङ्गानि—व्याकरणादि छः वेदांगसमूह; | कर्मरूप; ८१५. वषट्—वषट्कारोपलक्षित कर्मरूप; ८१६. ७७४. सदाचारः—सदाचार-संग्रहात्मक ग्रन्थ; ७७५. | नमः—नमस्कारस्वरूप ॥ १३१ ॥ मीमांसा—सोलह अध्यायोंमें वर्णित कर्ममीमांसा— | ८१७. ज्ञानम्—मोक्षविषयक ज्ञानस्वरूप; ८१८. जैमिनिसूत्र तथा चार अध्यायोंमें कथित ब्रह्ममीमांसा; | विज्ञानम्—विज्ञानस्वरूप; ८१९. आनन्दः—आत्मानन्द- ७७६. न्यायविस्तरः—कणाद और गौतम मुनियोंके | स्वरूप; ८२०. बोधः—अन्तर्बोधरूप; ८२१. संवित्— द्वारा प्रतिपादित न्यायशास्त्र; ७७७. आयुर्वेदः— | बाह्य वृत्तियोंको निरस्त करनेवाला अन्तर्बोध; ८२२. शमः— धन्वन्तरिप्रोक्त उपवेद; ७७८. धनुर्वेदः—अस्त्रविद्या; | मनोनिग्रह; ८२३. यमः—इन्द्रियसंयम; ८२४. एकः— ७७९. गान्धर्वम्—संगीतशास्त्र; ७८०. काव्यनाटकम्— | एकमात्र अद्वितीय; ८२५. एकाक्षराधारः—एक अक्षर श्रव्य काव्य और दृश्य नाटक ॥ १२८ ॥ | 'ग'बीजमात्रमें स्थित रहनेवाले; ८२६. एकाक्षरपरायणः— ७८१. वैखानसम्—विष्णुप्रोक्त वैखानस-तन्त्र; | ॐ—इस एकाक्षरमात्रमें स्थित ॥ १३२ ॥ ७८२. भागवतम्—वैष्णवशास्त्र; ७८३. सात्त्वतम्— | ८२७. एकाग्रधीः—अपने-आपमें एकाग्र रहनेवाले सात्त्वततन्त्र; ७८४. पाञ्चरात्रकम्—पांचरात्र आगम | बुद्धिरूप; ८२८. एकवीरः—अद्वितीय वीर; ८२९. (ये चारों वैष्णवतन्त्र हैं); ७८५. शैवम्—शैवसन्त्र; | एकानेकस्वरूपधृक्—एक होते हुए भी अनेक रूप ७८६. पाशुपतम्—पाशुपतशास्त्र; ७८७. कालामुखम्— | धारण करनेवाले; ८३०. द्विरूपः—'पर' और 'अपर' कालामुखनामसे प्रसिद्ध तन्त्र; ७८८. भैरवशासनम्— | ब्रह्मरूपसे दो रूपवाले; ८३१. द्विभुजः—दो बाँहोंवाले; भैरवकथित शास्त्र (ये चारों शैवतन्त्र हैं) ॥ १२९ ॥ | ८३२. द्व्यक्षः—दो नेत्रोंवाले; ८३३. द्विरदः—दो दाँतोंवाले, ७८९. शाक्तम्—शक्तितन्त्र; ७९०. वैनायकम्— | गजरूप; ८३४. द्वीपरक्षकः—सप्तद्वीपाधिपतित्व प्रदान विनायकतन्त्र; ७९१. सौरम्—सूर्यप्रोक्त तन्त्र; ७९२. | करनेके कारण द्वीपके रक्षक ॥ १३३ ॥ जैनम्—जैनशास्त्र; ७९३. आर्हतसंहिता—आर्हतशास्त्र; | ८३५. द्वैमातुरः—उमा और गंगा—दो माताओंके ७९४. सत्—कारणरूपमें स्थित; ७९५. असत्—कार्यरूपमें | पुत्र; ८३६. द्विवदनः—अग्निरूप मुख तथा गजमुख स्थित; ७९६. व्यक्तम्—सर्वकार्यरूप; ७९७. अव्यक्तम्— | दोनोंसे युक्त होनेके कारण दो मुखवाले; ८३७. द्वन्द्वातीतः— कारणरूप; ७९८. सचेतनम्—सचेतन प्राणिमात्र; | सर्दी-गर्मी आदि द्वन्द्व-दुःखोंसे ऊपर उठे हुए; ८३८. ७९९. अचेतनम्—अचेतन आकाश आदि ॥ १३० ॥ | द्वयातिगः—रजोगुण और तमोगुण—दोनोंको लाँघ करके ८००. बन्धः—आत्मामें अनात्माका और अनात्मामें | विराजमान; ८३९. त्रिधामा—सूर्य, चन्द्र और अग्नि— आत्माका जो भ्रम है, तादृश भ्रमात्मक बन्धनरूप; ८०१. | इन त्रिविध तेजोंसे युक्त मूर्तिवाले; ८४०. त्रिकरः—तीनों मोक्षः—अज्ञाननाशरूप; ८०२. सुखम्—विशुद्धानन्द; | लोकोंके कर्ता; ८४१. त्रेतात्रिवर्गफलदायकः—त्रिविध ८०३. भोगः—अनुभव; ८०४. अयोगः—अनासक्त; | अग्निके चयनसे प्राप्त होनेवाले धर्म, काम और अर्थरूपी