श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 151, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १४९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ६८०. पुत्रपौत्रदः—पुत्र और पौत्र प्रदान करनेवाले ॥ ११९ ॥ | ७०९. राशिः—मेष आदि द्वादश राशिरूप; ७१०. ६८१. मेधादः—धारणावती बुद्धि प्रदान करनेवाले; | तारा—कृत्तिका आदि नक्षत्ररूप; ७११. तिथिः—चन्द्रमाकी ६८२. कीर्तिदः—लोकमें कीर्ति देनेवाले; ६८३. | पन्द्रह कलाओंमेंसे एक; ७१२. योगः—अमृतसिद्धि एवं शोकहारी—ज्ञानदान करके शोक-मोहको हर लेनेवाले; | आनन्द आदि योगरूप; ७१३. वारः—रविवार आदि ६८४. दौर्भाग्यनाशनः—स्त्रियोंके विधवापन आदि | सप्तदिनस्वरूप; ७१४. करणम्—'बव' आदि करणरूप; दुर्भाग्यसूचक दोषोंको नष्ट करनेवाले; ६८५. प्रतिवादि- | ७१५. अंशकम्—अंशस्वरूप; ७१६. लग्नम्—मेष आदि मुखस्तम्भः—प्रतिकूल बोलनेवाले दुष्टोंका मुख बन्द | राशियोंका उदय; ७१७. होरा—अर्धलग्न; ७१८. काल- कर देनेवाले; ६८६. रुष्टचित्तप्रसादनः—कुपित हुए राजा | चक्रम्—शिशुमारचक्रस्वरूप; ७१९. मेरुः—सुवर्णमय आदिके चित्तको प्रसन्न (स्नेहयुक्त) करनेवाले ॥ १२० ॥ | पर्वतरूप; ७२०. सप्तर्षयः—कश्यप आदि सात ऋषिरूप; ६८७. पराभिचारशमनः—दूसरोंके द्वारा किये | ७२१. ध्रुवः—उत्तानपादके पुत्ररूप ॥ १२३ ॥ गये मारण आदि उपायोंको शान्त करनेवाले; ६८८. | ७२२. राहुः—राहु नामक ग्रह; ७२३. मन्दः— दुःखभञ्जनकारकः—सब दुःखोंको दूर कर देनेवाले; | शनैश्चर; ७२४. कविः—शुक्र; ७२५. जीवः—बृहस्पति; ६८९. लवः—लवस्वरूप; ६९०. त्रुटिः—सहस्रलव- | ७२६. बुधः—बुध; ७२७. भौमः—मंगल; ७२८. शशी— जनित काल; (यहाँ यह परिभाषा समझ लेनी चाहिये— | सोम; ७२९. रविः—सूर्य; ७३०. कालः—जगत्का संहार सौ त्रुटियोंका एक तत्पर होता है, तीस तत्परोंका एक | करनेवाले; ७३१. सृष्टिः—सृष्टिक्रियारूप; ७३२. स्थितिः— निमेष होता है, अठारह निमेषोंकी एक काष्ठा होती है | पालनकर्मरूप; ७३३. स्थावरं जङ्गमं विश्वम्—चराचर और तीस काष्ठाओंकी एक कला होती है।) ६९१. | जगत्-रूप ॥ १२४ ॥ कला—तीस काष्ठाका समय; ६९२. काष्ठा—अठारह | ७३४. भूः—पृथ्वीरूप; ७३५. आपः—जलरूप; निमेषका समय; ६९३. निमेषः—तीस तत्परका काल; | ७३६. अग्निः—तेजःस्वरूप; ७३७. मरुत्—वायुरूप; ६९४. तत्परः—सौ त्रुटियोंका काल; ६९५. क्षणः— | ७३८. व्योम—आकाशरूप; ७३९. अहङ्कृतिः— तीस कलाओंका समय; ॥ १२१ ॥ | अहंकाररूप; ७४०. प्रकृतिः—जगत्का मूलकारण ६९६. घटी—छः क्षणका समय; ६९७. मुहूर्तम्— | अव्यक्त प्रकृतिरूप; ७४१. पुमान्—पुरुषरूप; ७४२. दो घटीका समय; ६९८. प्रहरः—चार मुहूर्तका समय; | ब्रह्मा—सृष्टिकर्ता; ७४३. विष्णुः—पालनकर्ता; ७४४. ६९९. दिवा—दिन (चार पहरका समय); ७००. | शिवः—शिव; ७४५. रुद्रः—संहारकर्ता; ७४६. ईशः— नक्तम्—रात्रि—चार पहरका समय; ७०१. अहर्निशम्— | ईशान; ७४७. शक्तिः—कामेश्वरी; ७४८. सदाशिवः— दिन-रात—आठ पहरका समय; ७०२. पक्षः—पन्द्रह | कामेश्वर शिव ॥ १२५ ॥ दिन-रातका समय; ७०३. मासः—दो पक्षोंका समय; | ७४९. त्रिदशाः—देवसमुदायरूप; ७५०. पितरः— ७०४. अयनम्—छः मासका समय; ७०५. वर्षम्—दो | पितृसमूह; ७५१. सिद्धाः—सिद्धसमुदाय; ७५२. यक्षाः— अयनोंका मानव वर्ष (तीन सौ साठ मानव वर्षका एक | यक्षवृन्द; ७५३. रक्षांसि—राक्षससमूह; ७५४. किन्नराः— दिव्य वर्ष होता है); ७०६. युगम्—बारह हजार दिव्य | किंनरवर्ग; ७५५. साध्याः—साध्यगण; ७५६. विद्याधराः— वर्षोंका चतुर्युग; ७०७. कल्पः—सहस्र चतुर्युगका एक | विद्याधरगण; ७५७. भूताः—भूतगण; ७५८. मनुष्याः— कल्प (जो ब्रह्माका एक दिन है); ७०८. महालयः— | मनुष्यगण; ७५९. पशवः—पशुगण; ७६०. खगाः— बहत्तर हजार कल्पोंका एक महाप्रलय होता है (जिसमें | पक्षिगण ॥ १२६ ॥ ब्रह्माका भी लय हो जाता है।) * ॥ १२२ ॥ | ७६१. समुद्राः—विभिन्न समुद्र; ७६२. सरितः—
- 'लव' से लेकर 'महालय' तक सभी कालभेद महाकालस्वरूप गणपतिके अवयव हैं।