भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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१४८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ६१६. वरेण्यः—गणपतिभक्त राजा वरेण्यसे अभिन्न; | करनेवाले ॥ ११४॥ ६१७. वह्निवदनः—अग्निरूप मुखवाले; ६१८. वन्द्यः— | ६४६. साक्षी—विश्वको साक्षात् देखनेवाले; ६४७. वन्दनीय; ६१९. वेदान्तगोचरः—उपनिषद्गम्य; ६२०. | समुद्रमथनः—समुद्रमन्थनकालमें देवताओंद्वारा सर्वप्रथम विकर्ता—छः भावविकारोंके प्रवर्तक; ६२१. | पूजित; ६४८. स्वसंवेद्यः—स्वयंज्योतिःस्वरूप; ६४९. विश्वतश्चक्षुः—सब ओर नेत्रवाले; ६२२. विधाता— | स्वदक्षिणः—स्वयं समर्थ; ६५०. स्वतन्त्रः—अपराधीन; स्रष्टा; ६२३. विश्वतोमुखः—सब ओर मुखवाले ॥ ११० ॥ | ६५१. सत्यसंकल्पः—कभी व्यर्थ न जानेवाले संकल्पसे ६२४. वामदेवः—सुन्दर देवता; अथवा शिवस्वरूप; | युक्त; ६५२. सामगानरतः—साममन्त्रोंके गानमें संलग्न; ६२५. विश्वनेता—जगत्के नायक; ६२६. वज्रिवज्र- | ६५३. सुखी—सुखका अनुभव करनेवाले ॥ ११५ ॥ निवारणः—इन्द्रके वज्रको स्तम्भित कर देनेवाले; ६२७. | ६५४. हंसः—यति-विशेषरूप; अथवा सूर्यरूप; विश्वबन्धनविष्कम्भाधारः—विश्वकी सृष्टिके लिये | ६५५. हस्तिपिशाचीशः—हस्तिपिशाचीश नामक पर्याप्त देशको 'विष्कम्भ' कहते हैं। उसके भी आधार; | नवाक्षरमन्त्रके देवता; ६५६. हवनम्—आहुतिस्वरूप; ६२८. विश्वेश्वरप्रभुः—सम्पूर्ण ब्रह्माण्डों और उनके | ६५७. हव्यकव्यभुक्—हव्य-कव्यके भोक्ता देवता- अधीश्वरोंके भी ईश्वर ॥ १११ ॥ | पितृस्वरूप; ६५८. हव्यः—हविष्यरूप; ६५९. हुतप्रियः— ६२९. शब्दब्रह्म—परावाणीसे अतीत नादरूपधारी; | आहुतिमें दिये गये द्रव्यके प्रेमी; ६६०. हर्षः— ६३०. शमप्राप्यः—मनोनिग्रहसे प्राप्तव्य; ६३१. | आनन्दस्वरूप; ६६१. हल्लेखामन्त्रमध्यगः—हल्लेखा- शम्भुशक्तिगणेश्वरः—शैवों और शाक्तोंके समुदायके | मन्त्रके मध्यवर्ती—ह्रींकारवाच्य ॥ ११६ ॥ ईश्वर; ६३२. शास्ता—'शास्ता' नामसे प्रसिद्ध केरलदेशीय | ६६२. क्षेत्राधिपः—प्रयाग आदि क्षेत्रों अथवा देवतास्वरूप; अथवा बुद्धरूप; ६३३. शिखाग्रनिलयः— | शरीर आदिके स्वामी; ६६३. क्ष्माभर्ता—पृथ्वी अथवा शास्ताके शिखाग्रभागमें निवास करनेवाले; ६३४. | क्षमाको धारण करनेवाले; ६६४. क्षमापरपरायणः— शरण्यः—रक्षक; ६३५. शिखरीश्वरः—हिमालय- | क्षमाशील मुनियोंके प्राप्य; ६६५. क्षिप्रक्षेमकरः—शीघ्र स्वरूप ॥ ११२ ॥ | सिद्धि प्रदान करनेवाले; ६६६. क्षेमानन्दः—क्षेम और ६३६. षडृतुकुसुमस्त्रग्वी—छहों ऋतुओंमें | आनन्दस्वरूप; ६६७. क्षोणीसुरद्रुमः—भूतलपर खिलनेवाले पुष्पोंकी मालासे अलंकृत; ६३७. षडाधारः— | कल्पवृक्षके समान समस्त मनोरथोंके दाता ॥ ११७ ॥ छहों चक्रोंके आधारभूत मूलाधार-चक्रस्वरूप; ६३८. | ६६८. धर्मप्रदः—धर्म प्रदान करनेवाले, ६६९. षडक्षरः—छः अक्षरोंवाले वक्रतुण्ड-मन्त्रस्वरूप; ६३९. | अर्थदः—धन देनेवाले; ६७०. कामदाता—कामप्रद; संसारवैद्यः—भवरोगका नाश करनेवाले; ६४०. सर्वज्ञः— | ६७१. सौभाग्यवर्धनः—स्त्रियोंको सौभाग्यवृद्धिका वर सब कुछ जाननेवाले; अथवा बुद्धस्वरूप; ६४१. सर्वभेषज- | देनेवाले; ६७२. विद्याप्रदः—ज्ञानदाता; ६७३. विभवदः— भेषजम्—समस्त रोगोंकी दवा दिव्य अमृतके भी | सम्पत्तिदाता; ६७४. भुक्तिमुक्तिफलप्रदः—भोग और दोषनिवारक ॥ ११३ ॥ | मोक्षरूप फल देनेवाले ॥ ११८ ॥ ६४२. सृष्टिस्थितिलयक्रीडः—जगत्की सृष्टि, | ६७५. आभिरूप्यकरः—विद्वत्ता एवं सुन्दरता पालन और संहार जिनकी लीलाएँ हैं, वे; ६४३. | प्राप्त करानेवाले; ६७६. वीरश्रीप्रदः—नामस्मरण करनेवाले सुरकुञ्जरभेदनः—दानवसे पूजित होकर देवश्रेष्ठोंमें | भक्तोंको वीरोचित लक्ष्मी प्रदान करनेवाले; ६७७. भेद उत्पन्न करनेवाले; अथवा देवराजके भेदक; ६४४. | विजयप्रदः—विजय देनेवाले; ६७८. सर्ववश्यकरः— सिन्दूरितमहाकुम्भः—सिन्दूरसे अरुण मस्तकवाले; ६४५. | सबको भक्तके वशमें कर देनेवाले; ६७९. गर्भदोषहा— सदसद्व्यक्तिदायकः—अपने भक्तोंको सदसद्विवेक प्रदान | गर्भस्राव या गर्भपात आदि बीजदोषोंको नष्ट करनेवाले;