श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 149, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १४७ ५५४. फणिपतिः—शेष और वासुकि नागके भी स्वामी; ५५५. फेत्कारः—फेत्कार-तन्त्रस्वरूप; ५५६. फाणितप्रियः—फाणित अर्थात् खाँडके प्रेमी ॥ १०१ ॥ ५५७. बाणार्चिताङ्घ्रियुगलः—बाणासुरसे पूजित युगल चरणवाले; ५५८. बालकेलिकुतूहली—बालोचित क्रीड़ाके लिये उत्सुक; ५५९. ब्रह्म—परब्रह्मस्वरूप; ५६०. ब्रह्मार्चितपदः—ब्रह्माजीसे पूजित चरणवाले; अथवा वेदपूजित पदवाले; ५६१. ब्रह्मचारी—ब्रह्मचर्यनिष्ठ; ५६२. बृहस्पतिः—देवगुरु बृहस्पतिरूप ॥ १०२ ॥ ५६३. बृहत्तमः—बड़ेसे भी बड़े; ५६४. ब्रह्मपरः— ब्रह्माजीसे भी श्रेष्ठ; अथवा एकमात्र वेदके ही अनुशीलनमें तत्पर; ५६५. ब्रह्मण्यः—ब्राह्मणोंको मान देनेवाले; अथवा उनके हितकारी; ५६६. ब्रह्मवित्प्रियः—ब्रह्म-वेत्ताओंके प्रिय; अथवा ब्रह्मवेत्ताओंको प्रिय माननेवाले; ५६७. बृहन्नादाग्रयचीत्कारः—मेघोंकी गर्जना और बिजलीकी गड़गड़ाहटसे भी अधिक उच्चस्वरसे चीत्कार या गर्जना करनेवाले; ५६८. ब्रह्माण्डावलिमेखलः—कटिसूत्रमें किंकिणीकी भाँति समस्त ब्रह्माण्डोंको ही गूँथ लेनेवाले; अथवा विराट्रूपधारी ॥ १०३ ॥ ५६९. भ्रूक्षेपदत्तलक्ष्मीकः—भक्तोंको भौंहोंके संकेतमात्रसे लक्ष्मी (धन-सम्पत्ति) प्रदान करनेवाले; ५७०. भर्गः—तेजःस्वरूप; ५७१. भद्रः—भद्रजातीय गजरूप; ५७२. भयापहः—भयके नाशक; ५७३. भगवान्— षड्विध ऐश्वर्यसे सम्पन्न; ५७४. भक्तिसुलभः— भक्तिके द्वारा ही सुगमतापूर्वक प्राप्य; ५७५. भूतिदः— अष्टसिद्धियोंके दाता; ५७६. भूतिभूषणः—भस्म धारण करनेवाले ॥ १०४ ॥ ५७७. भव्यः—कल्याणस्वरूप; ५७८. भूता- लयः—पंचभूतों, भूत-प्रेत आदिकों तथा समस्त भूत- प्राणियोंके अधिष्ठान; ५७९. भोगदाता—प्राणियोंके कर्मानुसार दुःख और सुखका अनुभव करानेवाले; ५८०. भ्रूमध्यगोचरः—भौंहोंके मध्यभागमें ध्येय; ५८१. मन्त्रः—विविध मन्त्रस्वरूप; ५८२. मन्त्रपतिः—मन्त्रणाके अधिकारी, पालक एवं प्रवर्तक; ५८३. मन्त्री— राज्यसंचालनोपयोगी मन्त्रशक्तिके अधिष्ठाता; ५८४. मदमत्तमनोरमः—समाधिजनित आनन्दसे मत्त हृदयमें ध्येयरूपसे रमण करनेवाले ॥ १०५ ॥ ५८५. मेखलावान्—करधनीसे विभूषित कटिप्रदेश- वाले; ५८६. मन्दगतिः—मन्द पुरुषोंके भी आश्रयदाता; ५८७. मतिमत्कमलेक्षणः—सद्बुद्धि देनेवाले कमलोपम नेत्रोंसे युक्त; ५८८. महाबलः—महाबलसे सम्पन्न; ५८९. महावीर्यः—महापराक्रमी; ५९०. महाप्राणः— महान् प्राणशक्तिसे सम्पन्न; ५९१. महामनाः—महा- मनस्वी ॥ १०६ ॥ ५९२. यज्ञः—यज्ञस्वरूप; ५९३. यज्ञपतिः— यज्ञोंके स्वामी; ५९४. यज्ञगोप्ता—यज्ञोंके संरक्षक; ५९५. यज्ञफलप्रदः—यज्ञफलके दाता; ५९६. यश- स्करः—सुयशका विस्तार करनेवाले; ५९७. योगगम्यः— योगसे प्राप्तव्य; ५९८. याज्ञिकः—यज्ञकर्ता; ५९९. याजकप्रियः—यज्ञ करानेवालोंके प्रेमी ॥ १०७ ॥ ६००. रसः—परमानन्दस्वरूप; ६०१. रसप्रियः— मधुर आदि रसोंमें प्रीति रखनेवाले; ६०२. रस्यः— आस्वादके विषय; ६०३. रञ्जकः—दूसरोंके मनका अनुरंजन करनेवाले; ६०४. रावणार्चितः—दशमुख रावणके द्वारा भी पूजित; ६०५. रक्षोरक्षाकरः— राक्षसोंको जलाकर राख कर देनेवाले; अथवा अपनी आराधना करनेवाले राक्षसोंके रक्षक; ६०६. रत्नगर्भः— पृथ्वीके आश्रय; ६०७. राजसुखप्रदः—राज-सम्बन्धी सुख देनेवाले ॥ १०८ ॥ ६०८. लक्ष्यम्—प्रणवरूपी धनुषके द्वारा चित्तरूपी बाणसे वेधनेयोग्य ब्रह्म; ६०९. लक्ष्यप्रदः—निर्विघ्नतापूर्वक लक्ष्यकी प्राप्ति करानेवाले; ६१०. लक्ष्यः—‘तत्त्वमसि’— इत्यादि महावाक्यगत पदोंद्वारा लक्षणाशक्तिसे बोध्य; ६११. लयस्थः—प्रलयकालमें भी स्थित रहनेवाले; अथवा चित्तलयकी स्थितिमें विद्यमान; ६१२. लड्डुक- प्रियः—लड्डूसे प्रसन्न रहनेवाले; ६१३. लानप्रियः— गजशालामें प्रीति रखनेवाले; ६१४. लास्यपरः— विलासयोग्य परमधामवाले; ६१५. लाभकृल्लोक- विश्रुतः—लाभकारी (भक्तोंको शीघ्र वरदान देनेवाले) लोगोंमें श्रेष्ठताके लिये विख्यात ॥ १०९ ॥