भारतकोश
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श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

१५० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- नदीसमुदाय; ७६३. शैलाः—पर्वतगण; ७६४.भूतम्— | ८०५. सत्यम्—त्रिकालमें अबाधित; ८०६. अणुः— अतीतकाल; ७६५. भव्यम्—भविष्यकाल; ७६६. | मन-इन्द्रियोंके अगोचर; ८०७. महान्—जिससे बढ़कर भवोद्भवः—जगत्की उत्पत्तिके कारण; ७६७. | कोई आनन्द नहीं है, तादृश भूमा; ८०८. स्वस्ति— साङ्ख्यम्—कपिलमुनिद्वारा प्रतिपादित शास्त्र; ७६८. | सम्यक् सत्तावान्; ८०९ हुम्—अपनेसे इतरका बाध पातञ्जलम्—पतंजलिप्रोक्त योगसूत्र; ७६९. योगः— | करनेके कारण हुम्-स्वरूप ब्रह्म; ८१०. फट्—इतर नागराज शेषद्वारा प्रतिपादित; ७७०. पुराणानि—'ब्राह्म' | सत्ताके भ्रमका नाश करनेवाले; ८११. स्वधा—श्राद्धरूप; आदि पुराणसमुदाय; ७७१. श्रुतिः—ऋग्वेद आदि; | ८१२. स्वाहा—यज्ञकर्मरूप; ८१३. श्रौषट्—श्रौषट्- ७७२. स्मृतिः—मनुस्मृति आदि धर्मशास्त्र ॥ १२७ ॥ | कारोपलक्षित कर्मरूप; ८१४. वौषट्—वौषट्कारोपलक्षित ७७३. वेदाङ्गानि—व्याकरणादि छः वेदांगसमूह; | कर्मरूप; ८१५. वषट्—वषट्कारोपलक्षित कर्मरूप; ८१६. ७७४. सदाचारः—सदाचार-संग्रहात्मक ग्रन्थ; ७७५. | नमः—नमस्कारस्वरूप ॥ १३१ ॥ मीमांसा—सोलह अध्यायोंमें वर्णित कर्ममीमांसा— | ८१७. ज्ञानम्—मोक्षविषयक ज्ञानस्वरूप; ८१८. जैमिनिसूत्र तथा चार अध्यायोंमें कथित ब्रह्ममीमांसा; | विज्ञानम्—विज्ञानस्वरूप; ८१९. आनन्दः—आत्मानन्द- ७७६. न्यायविस्तरः—कणाद और गौतम मुनियोंके | स्वरूप; ८२०. बोधः—अन्तर्बोधरूप; ८२१. संवित्— द्वारा प्रतिपादित न्यायशास्त्र; ७७७. आयुर्वेदः— | बाह्य वृत्तियोंको निरस्त करनेवाला अन्तर्बोध; ८२२. शमः— धन्वन्तरिप्रोक्त उपवेद; ७७८. धनुर्वेदः—अस्त्रविद्या; | मनोनिग्रह; ८२३. यमः—इन्द्रियसंयम; ८२४. एकः— ७७९. गान्धर्वम्—संगीतशास्त्र; ७८०. काव्यनाटकम्— | एकमात्र अद्वितीय; ८२५. एकाक्षराधारः—एक अक्षर श्रव्य काव्य और दृश्य नाटक ॥ १२८ ॥ | 'ग'बीजमात्रमें स्थित रहनेवाले; ८२६. एकाक्षरपरायणः— ७८१. वैखानसम्—विष्णुप्रोक्त वैखानस-तन्त्र; | ॐ—इस एकाक्षरमात्रमें स्थित ॥ १३२ ॥ ७८२. भागवतम्—वैष्णवशास्त्र; ७८३. सात्त्वतम्— | ८२७. एकाग्रधीः—अपने-आपमें एकाग्र रहनेवाले सात्त्वततन्त्र; ७८४. पाञ्चरात्रकम्—पांचरात्र आगम | बुद्धिरूप; ८२८. एकवीरः—अद्वितीय वीर; ८२९. (ये चारों वैष्णवतन्त्र हैं); ७८५. शैवम्—शैवसन्त्र; | एकानेकस्वरूपधृक्—एक होते हुए भी अनेक रूप ७८६. पाशुपतम्—पाशुपतशास्त्र; ७८७. कालामुखम्— | धारण करनेवाले; ८३०. द्विरूपः—'पर' और 'अपर' कालामुखनामसे प्रसिद्ध तन्त्र; ७८८. भैरवशासनम्— | ब्रह्मरूपसे दो रूपवाले; ८३१. द्विभुजः—दो बाँहोंवाले; भैरवकथित शास्त्र (ये चारों शैवतन्त्र हैं) ॥ १२९ ॥ | ८३२. द्व्यक्षः—दो नेत्रोंवाले; ८३३. द्विरदः—दो दाँतोंवाले, ७८९. शाक्तम्—शक्तितन्त्र; ७९०. वैनायकम्— | गजरूप; ८३४. द्वीपरक्षकः—सप्तद्वीपाधिपतित्व प्रदान विनायकतन्त्र; ७९१. सौरम्—सूर्यप्रोक्त तन्त्र; ७९२. | करनेके कारण द्वीपके रक्षक ॥ १३३ ॥ जैनम्—जैनशास्त्र; ७९३. आर्हतसंहिता—आर्हतशास्त्र; | ८३५. द्वैमातुरः—उमा और गंगा—दो माताओंके ७९४. सत्—कारणरूपमें स्थित; ७९५. असत्—कार्यरूपमें | पुत्र; ८३६. द्विवदनः—अग्निरूप मुख तथा गजमुख स्थित; ७९६. व्यक्तम्—सर्वकार्यरूप; ७९७. अव्यक्तम्— | दोनोंसे युक्त होनेके कारण दो मुखवाले; ८३७. द्वन्द्वातीतः— कारणरूप; ७९८. सचेतनम्—सचेतन प्राणिमात्र; | सर्दी-गर्मी आदि द्वन्द्व-दुःखोंसे ऊपर उठे हुए; ८३८. ७९९. अचेतनम्—अचेतन आकाश आदि ॥ १३० ॥ | द्वयातिगः—रजोगुण और तमोगुण—दोनोंको लाँघ करके ८००. बन्धः—आत्मामें अनात्माका और अनात्मामें | विराजमान; ८३९. त्रिधामा—सूर्य, चन्द्र और अग्नि— आत्माका जो भ्रम है, तादृश भ्रमात्मक बन्धनरूप; ८०१. | इन त्रिविध तेजोंसे युक्त मूर्तिवाले; ८४०. त्रिकरः—तीनों मोक्षः—अज्ञाननाशरूप; ८०२. सुखम्—विशुद्धानन्द; | लोकोंके कर्ता; ८४१. त्रेतात्रिवर्गफलदायकः—त्रिविध ८०३. भोगः—अनुभव; ८०४. अयोगः—अनासक्त; | अग्निके चयनसे प्राप्त होनेवाले धर्म, काम और अर्थरूपी

उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १५१ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

१५२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ८८०. षड्‌तर्कदूरः—छः दर्शनोंमें कथित तर्कोंके | आठ अंगोंसे युक्त योगके चित्तवृत्तिनिरोधरूप फल अगोचर—वाणीसे अतीत; ८८१. षट्कर्मनिरतः—यजन, | देनेवाले; ८९९. अष्टपत्राम्बुजासनः—अष्टदलकमलपर याजन, अध्ययन, अध्यापन, दान और प्रतिग्रह—इन छः | आसीन होनेके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध; ९००. कर्मोंमें तत्पर रहनेवाले; ८८२. षड्रसाश्रयः—मधुर, | अष्टशक्तिसमृद्धश्रीः—आठ दलोंमें निवास करनेवाली अम्ल, लवण, कटु, कषाय और तिक्त—इन छः रसोंके | तीव्रा आदि आठ शक्तियोंसे सेवित होनेके कारण बढ़ी आधार; ८८३. सप्तपातालचरणः—तल, अतल, वितल, | हुई श्रीसे सम्पन्न; ९०१. अष्टैश्वर्यप्रदायकः—अणिमा सुतल, रसातल, महातल और पाताल—ये नीचेके सात | आदि आठ सिद्धियोंके दाता ॥ १४६ ॥ लोक जिनके चरणोंके आश्रित हैं, वे; ८८४. | ९०२. अष्टपीठोपपीठश्रीः—आठ महापीठ और सप्तद्वीपोरुमण्डलः—जम्बू आदि सात द्वीप जिनके | उपपीठोंकी श्री—सम्पत्तिसे युक्त; ९०३. अष्टमातृ- ऊरुमण्डलके आश्रित हैं, वे ॥ १४२ ॥ | समावृतः—ब्राह्मी आदि सात मातृकाओंके साथ जो ८८५. सप्तस्वर्लोकमुकुटः—भुवर्लोकसे लेकर | आठवीं महालक्ष्मी हैं, वे आठों आवरणदेवताके रूपमें गोलोकपर्यन्त सात स्वर्लोक जिनके मुकुट हैं, वे; ८८६. | जिन्हें घेरे रहती हैं, वे; ९०४. अष्टभैरवसेव्यः—बटुक सप्तसप्तिवरप्रदः—सूर्यको वर देनेवाले; ८८७. | आदि आठ भैरवोंसे सेव्य; ९०५. अष्टवसुवन्द्यः— सप्ताङ्गराज्यसुखदः—स्वामी, अमात्य, राष्ट्र, दुर्ग, कोष, | धरसे लेकर प्रभासतक आठ वसुओंसे वन्दनीय; ९०६. सेना और सुहृद्—इन सातों अंगोंसे युक्त राज्यका सुख | अष्टमूर्तिभृत्—अष्टमूर्तिधारी ॥ १४७ ॥ देनेवाले; ८८८. सप्तर्षिगणमण्डितः—कश्यप आदि सात | ९०७. अष्टचक्रस्फुरन्मूर्तिः—अष्टचक्रवाले यन्त्रमें ऋषियों तथा गण-देवताओंसे सेवित एवं सुशोभित ॥ १४३ ॥ | प्रकाशमान मूर्तिवाले; ९०८. अष्टद्रव्यहविःप्रियः— ८८९. सप्तच्छन्दोनिधिः—गायत्रीसे लेकर जगती- | ईख, सत्तू, चिउड़ा, कदली, मोदक, तिल, नारियल और पर्यन्त सात छन्दोंके आश्रय; ८९०. सप्तहोता—होतासे | घृतपक्व आदि पदार्थ—इन आठ द्रव्योंके हविष्यसे लेकर उद्गाता-पर्यन्त सात होता जिनके स्वरूप हैं, वे; | प्रसन्न होनेवाले; ९०९. नवनागासनाध्यासी—कर्कौटक ८९१. सप्तस्वराश्रयः—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, | आदि नौ नागोंके आसनपर बैठनेवाले; ९१०. नवनिध्यनु- पंचम, धैवत और निषाद—इन सात स्वरोंके आश्रय; | शासिता—नौ निधियोंपर अनुशासन रखनेवाले ॥ १४८ ॥ ८९२. सप्ताब्धिकेलिकासारः—सातों समुद्र जिनके | ९११. नवद्वारपुराधारः—नौ द्वारोंवाले पुर—शरीरको क्रीड़ा-सरोवर हैं, वे; ८९३. सप्तमातृनिषेवितः— | जीवात्मारूपसे धारण करनेवाले; ९१२. नवाधार- ब्राह्मी, माहेश्वरी आदि सात मातृकाओंसे सेवित ॥ १४४ ॥ | निकेतनः—कुलाकुल, सहस्रार, मूलाधार, स्वाधिष्ठान, ८९४. सप्तच्छन्दोमोदमदः—पथ्यसंज्ञक सात | मणिपूर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और लम्बिका—इन छन्दोंके मोदजनक मदसे युक्त; ८९५. सप्तच्छन्दो- | नौ आधारोंमें निवास करनेवाले; ९१३. नवनारायण- मखप्रभुः—सप्त छन्दोंके यज्ञके स्वामी; ८९६. | स्तुत्यः—धर्मनारायण, आदिनारायण, अनन्तनारायण, अष्टमूर्तिध्येयमूर्तिः—अष्टमूर्ति-शिवसे ध्येय मूर्तिवाले; | बदरीनारायण, रूपनारायण, शंकरनारायण, सुन्दरनारायण, अर्थात् भगवान् शिव भी अपने हृदयमें जिनके स्वरूपका | लक्ष्मीनारायण और साध्यनारायण—इन नौ नारायणोंसे चिन्तन करते हैं, वे; ८९७. अष्टप्रकृतिकारणम्— | स्तुत्य; ९१४. नवदुर्गांनिषेवितः—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और | चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, अहंकार—इन आठ प्रकृतियोंकी उत्पत्तिके कारण ॥ १४५ ॥ | महागौरी और सिद्धिदात्री—इन नौ दुर्गाओंसे सेवित ॥ १४९ ॥ ८९८. अष्टाङ्गयोगफलभूः—यम, नियम, आसन, | ९१५. नवनाथमहानाथः—ज्ञान, प्रकाश, सत्य, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि—इन | आनन्द, विमर्श, स्वभाव, सुभग, प्रतिभ और पूर्ण—इन

उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १५३ नौ नाथोंके महानाथ; ९१६. नवनागविभूषणः-कर्कोटक आदि नौ नागोंको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले; ९१७. नवरत्नविचित्राङ्गः-हीरा, मोती आदि नौ रत्नोंकी शोभासे विचित्र अंगोंवाले; ९१८. नवशक्तिशिरोधृतः- तीव्रा आदि नौ शक्तियोंद्वारा सिरपर धारित अर्थात् वन्दित ॥ १५० ॥ ९१९. दशात्मकः-दसों दिशाओंमें व्यापक; ९२०. दशभुजः-दस भुजाओंसे युक्त; ९२१. दशदिक्पति- वन्दितः-इन्द्र आदि दस दिक्पालोंसे स्तुत्य; ९२२. दशाध्यायः-चार वेद और छः अंगोंके अध्येता; ९२३. दशप्राणः- प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय-इन दस प्राणोंसे युक्त; ९२४. दशेन्द्रियनियामकः-पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले ॥ १५१ ॥ ९२५. दशाक्षरमहामन्त्रः-दस अक्षरवाले महा- मन्त्रस्वरूप; ९२६. दशाशाव्यापिविग्रहः-दसों दिशाओंमें व्याप्त शरीरवाले; ९२७. एकादशादिभी रुद्रैः स्तुतः- ग्यारहसे लेकर एक सहस्रतक रुद्र होते हैं, उन सबके द्वारा स्तुत; ९२८. एकादशाक्षरः-एकादश अक्षरवाले मन्त्रस्वरूप ॥ १५२ ॥ ९२९. द्वादशोद्दण्डदोर्दण्डः-बारह उद्दण्ड (ऊपर उठे हुए) बाहुदण्डोंसे युक्त; ९३०. द्वादशान्तनिकेतनः- ललाटसे ऊपर ब्रह्मरन्ध्रतकके स्थानको 'द्वादशान्त' कहते हैं, उसमें निवास करनेवाले; ९३१. त्रयोदशभिदाभिन्नविश्वे- देवाधिदैवतम्-तेरह विश्वेदेवोंके अधिदेवता ॥ १५३ ॥ ९३२. चतुर्दशेन्द्रवरदः- चौदह इन्द्रोंको वर देनेवाले; ९३३. चतुर्दशमनुप्रभुः- चौदह मनुओंके अधिपति; ९३४. चतुर्दशादिविद्याढ्यः - चार (आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति), दस (चार वेद और छः वेदांग) आदि विद्याओंसे सम्पन्न; ९३५. चतुर्दशजगत्प्रभुः- चौदह भुवनोंके स्वामी ॥ १५४ ॥ ९३६. सामपञ्चदशः-पन्द्रह स्तोममन्त्रोंके साथ, जो चार आज्यस्तोत्र-सम्बन्धी मन्त्र हैं, वे सामयुक्त होकर गणपति के स्वरूप हैं, अतः वे उक्त नामसे प्रसिद्ध हैं; ९३७. पञ्चदशीशीतांशुनिर्मलः - पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान स्वच्छ; ९३८. षोडशाधारनिलयः- षड्दल, नवदल एवं षोडशदल आदि चक्रोंमें निवास करनेवाले; ९३९. षोडशस्वरमातृकः-सोलह स्वर-अक्षररूप ॥ १५५॥ ९४०. षोडशान्तपदावासः - ब्रह्मरन्ध्रके अन्तर्गत कमलकी कर्णिकासे लेकर ऊपरके भागको 'षोडशान्त' कहते हैं। उसमें निवास करनेवाले अर्थात् उन्मनीसे परे विराजमान; ९४१. षोडशेन्दुकलात्मकः- अमृता और मानिनी आदि षोडशचन्द्रकलास्वरूप; ९४२. कला- सप्तदशी- 'त्रिपुरागम' में प्रसिद्ध 'सप्तदशी' नामक कलास्वरूप; ९४३. सप्तदशः- सामयुक्त सप्तदशस्तोम- स्वरूप; ९४४. सप्तदशाक्षरः - वषट् (२), ओश्रावय (४), यज (२), अस्तु श्रौषट् (४), ये यजामहे (५) - इस प्रकार सत्रह अक्षरोंवाले मन्त्रोंसे यज्ञमें आहुति ग्रहण करनेवाले ॥ १५६ ॥ ९४५. अष्टादशद्वीपपतिः- 'जम्बू' आदि सात द्वीपों और 'सिंहल' आदि ग्यारह उपद्वीपोंके अधीश्वर; ९४६. अष्टादशपुराणकृत्- अठारह पुराणोंके कर्ता व्यासरूप; ९४७. अष्टादशौषधीसृष्टिः- बारह मुख्य धान्य और छः उपधान्य- इन अठारह ओषधियों (अन्नों)- की सृष्टि करनेवाले; ९४८. अष्टादशविधिः- अठारह विधिस্বরূপ; (अपूर्व विधि, नियम-विधि और परिसंख्या- विधि-ये प्रयोग और विनियोग आदिके भेदसे नौ प्रकारकी होती हैं। फिर गौणी और मुख्य भेदसे इनके अठारह प्रकार होते हैं।) ॥ १५७॥ ९४९. अष्टादशलिपिव्यष्टिसमष्टिज्ञानकोविदः -नागरी, द्राविड़ी और आन्ध्री आदिके भेदसे भूतलपर विभिन्न अठारह लिपियाँ हैं। उन भाषाओंको तथा उनके अवान्तर-भेदोंको भी पृथक्-पृथक् एवं समष्टिरूपसे जाननेमें कुशल; ९५०. एकविंशः पुमान् - पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच विषय और पाँच भूत-इन बीस तत्त्वोंसे परे इक्कीसवाँ तत्त्व आत्मा; ९५१. एकविंशत्यङ्गुलिपल्लवः- दस हाथकी अंगुलियाँ, दस पैरोंकी अंगुलियाँ और एक शुण्डदण्ड- इस प्रकार इक्कीस अंगुलिपल्लवोंसे युक्त ॥ १५८ ॥ ९५२. चतुर्विंशतितत्त्वात्मा- प्रकृति, महत्तत्त्व,

१५४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अहंकार, ग्यारह इन्द्रियाँ, पाँच विषय और पाँच भूत— | निर्णायक; ९६८. चतुःषष्टिकलानिधिः—चौंसठ कलाओंके इस प्रकार चौबीस तत्त्व हैं; चौबीस तत्त्वस्वरूप; ९५३. | आधार; ९६९. चतुःषष्टिमहासिद्धियोगिनीवृन्दवन्दितः— पञ्चविंशाख्यपूरुषः—चौबीस तत्त्वोंसे परे विद्यमान, | अक्षोभ्य आदि चौंसठ महासिद्धों और उतनी ही योगिनियोंके पचीसवें तत्त्वस्वरूप पुरुष; ९५४. सप्तविंशतितारेशः— | समुदायसे वन्दित ॥ १६३ ॥ अश्विनी आदि सत्ताईस नक्षत्रोंके स्वामी; ९५५. | ९७०. अष्टषष्टिमहातीर्थक्षेत्रभैरवभावनः— सप्तविंशतियोगकृत्—सत्ताईस योगोंके कर्ता ॥ १५९ ॥ | काशीखण्ड और पद्मपुराणमें शिव-सम्बन्धी अड़सठ ९५६. द्वात्रिंशद्भैरवाधीशः—बत्तीस भैरवोंके स्वामी | महातीर्थ बताये गये हैं। उन सभी तीर्थक्षेत्रोंमें भैरव (असितांग आदि चार भैरव हैं, जो आठ-आठके | शिवकी भावना करनेवाले; ९७१. चतुर्नवतिमन्त्रात्मा— समुदाय हैं। इस तरह कुल बत्तीस भैरव हैं); ९५७. | अड़तीस कलामन्त्र और पचास मातृका कलाएँ—ये चतुस्त्रिंशन्महाह्रदः—पुष्कर आदि जो देवताओंद्वारा | अठासी मन्त्र हुए। इनके अतिरिक्त हंस, शुचि, प्रतद्विष्णु, खोदे गये विशाल सरोवर हैं, वे पवित्र 'महाह्रद' | विष्णु, योनि और त्र्यम्बक—ये छः विष्णुकी मूलविद्याएँ कहलाते हैं। उनकी संख्या चौंतीस बतलायी गयी है। ये | हैं। इन सबका योग चौरानबे हुआ। इस प्रकार चौरानबे चौंतीस महाह्रद जिनके स्वरूप हैं, वे; ९५८. | मन्त्रस्वरूप; ९७२. षण्णवत्यधिकप्रभुः—तन्त्रराजमें षट्त्रिंशत्तत्त्वसम्भूतिः—शैव-तन्त्रोक्त जो शिव आदि | श्रीचक्रके छियानबे देवता बताये गये हैं। विद्या और पृथ्वीपर्यन्त छत्तीस तत्त्व हैं, उनकी उत्पत्तिके कारण; | गणेशके योगसे अधिक देवता हो जाते हैं। इस प्रकार ९५९. अष्टात्रिंशत्कलातनुः—अग्निकी दस, सूर्यकी | छियानबेसे अधिक देवताओंके अधिपति ॥ १६४ ॥ बारह और चन्द्रमाकी सोलह कलाएँ—कुल अड़तीस | ९७३. शतानन्दः—मानुषादि शतगुणोत्तर आनन्द- कलाएँ होती हैं। ये सब जिनके शरीर हैं, वे गणपति ॥ १६० ॥ | स्वरूप; ९७४. शतधृतिः—अनन्त ब्रह्माण्डोंको धारण ९६०. नमदेकोनपञ्चाशन्मरुद्गणनिरर्गलः— | करनेवाले; ९७५. शतपत्रायतेक्षणः—प्रफुल्ल कमलके उनचास मरुद्गणोंसे नमस्कृत एवं अप्रतिहत गतिवाले; | समान विशाल नेत्रवाले; ९७६. शतानीकः—बहुसंख्यक ९६१. पञ्चाशदक्षरश्रेणी—पचास अक्षरोंके मालारूप; | सैन्यशक्तिसे सम्पन्न; ९७७. शतमखः—सौ यज्ञोंका ९६२. पञ्चाशद्रुद्रविग्रहः—श्रीकण्ठ आदि पचास शिव- | अनुष्ठान करनेवाले इन्द्रस्वरूप; ९७८. शतधारावरायुधः— स्वरूप ॥ १६१ ॥ | सौ धारों अथवा अरोंसे युक्त 'वज्र' नामक श्रेष्ठ आयुध ९६३. पञ्चाशद्विष्णुशक्तीशः—केशव आदि | धारण करनेवाले ॥ १६५ ॥ विष्णुरूप और कीर्ति आदि उनकी शक्तियाँ—ये सब पचासकी | ९७९. सहस्रपत्रनिलयः—ब्रह्मरन्ध्रगत सहस्र- संख्यामें हैं; इन सबके स्वामी; ९६४. पञ्चाशत्- | दलकमलमें विराजमान; ९८०. सहस्रफणभूषणः— मातृकालयः—पचास मातृका-वर्णोंके आलय अथवा | सहस्रफणधारी सर्पोंसे विभूषित; ९८१. सहस्रशीर्षा लयस्थान नादस्वरूप; ९६५. द्विपञ्चाशद्वपुःश्रेणी— | पुरुषः—असंख्य मस्तकवाले परमात्मा; ९८२. लिंगपुराणमें वर्णित जो बावन पाश हैं, वे नूतन शरीर प्रदान | सहस्राक्षः—सहस्रों नेत्रोंवाले ९८३. सहस्रपात्—सहस्रों करनेवाले हैं, अतः बावन शरीरपङ्क्तिस्वरूप; ९६६. | पैरोंवाले ॥ १६६ ॥ त्रिषष्ट्यक्षरसंश्रयः—तिरसठ अक्षरोंके आधार* ॥ १६२ ॥ | ९८४. सहस्रनामसंस्तुत्यः—सहस्रनामोंद्वारा ९६७. चतुःषष्ट्यर्णनिर्णोता—चौंसठ अक्षरोंके | स्तवनीय; ९८५. सहस्राक्षबलापहः—इन्द्रके बलको

  • वर्णोंकी संख्या तिरसठ अथवा चौंसठ मानी गयी है। इनमें इक्कीस स्वर, पचीस स्पर्श, आठ यादि एवं चार यम कहे गये हैं। अनुस्वार, विसर्ग, दो पराश्रित वर्ण—जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय (क और प) और दुःस्पृष्ट लकार—ये तिरसठ वर्ण हैं। इनमें प्लुत लकारको और गिन लिया जाय तो वर्णोंकी संख्या चौंसठ हो जाती है।

उ०ख०-अ० ४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १५५ भी विध्वस्त कर देनेवाले; ९८६. दशसाहस्रफण- भृत्फणिराजकृतासनः — दस हजार फण धारण करनेवाले नागराजके ऊपर आसीन ॥ १६७ ॥ ९८७. अष्टाशीतिसहस्राद्यमहर्षिस्तोत्रयन्त्रितः — अट्ठासी हजारकी संख्यावाले आदि महर्षियोंके द्वारा किये गये स्तोत्रके द्वारा वशीभूत; ९८८. लक्षाधीश- प्रियाधारः — लखपतियोंके प्रिय आधार; ९८९. लक्षा- धारमनोमयः — लक्ष (लक्ष्य)-पर एकाग्र किये गये चित्तवाले; अथवा एकाग्रचित्त सत्पुरुषस्वरूप ॥ १६८ ॥ ९९०. चतुर्लक्षजपप्रीतः — चार लाख मन्त्रके जपसे प्रसन्न होनेवाले; ९९१. चतुर्लक्षप्रकाशितः — अठारह पुराणोंके चार लाख श्लोकोंद्वारा प्रकाशित रूपवाले; ९९२. चतुरशीतिलक्षाणां जीवानां देहसंस्थितः — चौरासी लाख जीवोंके शरीरमें विराजमान ॥ १६९ ॥ ९९३. कोटिसूर्यप्रतीकाशः — करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी; ९९४. कोटिचन्द्रांशुनिर्मलः — करोड़ों चन्द्रमाओंकी किरणोंके समान निर्मल; ९९५. शिवा- भवाध्युष्टकोटिविनायकधुरन्धरः — पार्वती और शिवके अधीनस्थ करोड़ों विनायकोंके संचालनका भार ढोनेवाले ॥ १७० ॥ ९९६. सप्तकोटिमहामन्त्रमन्त्रितावयवद्युतिः — सात करोड़ महामन्त्रोंसे मन्त्रित अवयवोंकी कान्तिसे प्रकाशमान; ९९७. त्रयस्त्रिंशत्कोटिसुरश्रेणीप्रणत- पादुकः — जिनकी चरणपादुकाओंमें तैंतीस करोड़ देवताओंकी पंक्ति प्रणाम करती है, वे ॥ १७१ ॥ ९९८. अनन्तनामा — अनन्त नामवाले; ९९९. अनन्तश्रीः — अनन्त विद्या, सम्पत्ति और कीर्तिवाले; १०००. अनन्तानन्तसौख्यदः — अनन्तानन्त सौख्य प्रदान करनेवाले। इस प्रकार गणेशजीके ये सहस्र नाम बताये गये ॥ १७२॥ जो मनुष्य प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्तमें इन नामोंका पाठ करता है, उसके हाथमें लौकिक और पारलौकिक सारे सुख आ जाते हैं। इसके एक बार जप करनेसे आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धैर्य, शौर्य, बल, यश, धारणावती बुद्धि, प्रज्ञा, धृति, कान्ति, सौभाग्य, अतिशय रूप-सौन्दर्य, सत्य, दया, क्षमा, शान्ति, दाक्षिण्य, धर्मशीलता, जगद्वशीकरण, सबकी अनुकूलता, शास्त्रार्थमें पटुता, सभापाण्डित्य, उदारता, गम्भीरता, ब्रह्मतेज, उन्नति, उत्तम कुल, शील, प्रताप, वीर्य, आर्यत्व, ज्ञान, विज्ञान, आस्तिक्य, स्थिरता, विश्वमें उत्कर्ष और धन-धान्यकी वृद्धि — ये सभी उत्तम फल प्राप्त होते हैं ॥ १७३-१७७ ॥ इस मन्त्रके जपसे मनुष्योंके लिये चार प्रकारका वशीकरण सिद्ध होता है — राजाका, राजाके अन्तःपुरका, राजकुमारका तथा राज्यमन्त्रीका। जिसको वशमें करनेके लिये इस सहस्रनामका जप किया जाता है, वह उस प्रयोग करनेवालेका दास हो जाता है। इस सहस्रनामके द्वारा बिना किसी प्रयासके धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धि होती है ॥ १७८-१७९ ॥ यह स्तोत्र शाकिनी, डाकिनी, राक्षस, यक्ष और सर्पके भयका नाश करनेवाला है। यह साम्राज्यका सुख देनेवाला तथा समस्त शत्रुओंका मर्दन करनेवाला है ॥ १८० ॥ इस सहस्रनामसे सब प्रकारके कलह-क्लेशका नाश होता है, इससे जले हुए बीजमें भी अंकुर निकल आते हैं। यह बुरे स्वप्नोंके कुफलको मिटाता है और रोषमें भरे हुए स्वामीके चित्तको प्रसन्न करनेवाला है ॥ १८१ ॥ यह सहस्रनाम मोहन-आकर्षण आदि छः कर्म, आठ महासिद्धि तथा त्रिकालज्ञानका साधन करनेवाला है। शत्रुओंद्वारा अपने ऊपर प्रेरित कृत्याको शान्त करनेवाला तथा शत्रु-मण्डलका मर्दन करनेवाला है। संग्रामकी रंगभूमिमें यह अकेला ही सबको विजय दिलानेवाला, वन्ध्यापन- सम्बन्धी सम्पूर्ण दोषोंका नाशक और गर्भकी रक्षाका मुख्य साधन है ॥ १८२-१८३ ॥ जहाँ प्रतिदिन गणपतिके इस स्तोत्रका पाठ किया जाता है, उस देशमें दुर्भिक्ष, ईतिभय और दुराचार नहीं होते ॥ १८४ ॥ जहाँ इस स्तोत्रका पाठ होता है, उस घरको लक्ष्मी कभी नहीं छोड़ती हैं। क्षय, कोढ़, प्रमेह, बवासीर, भगंदर, विषूचिका (हैजा), गुल्म, प्लीहा, पथरी, अतिसार, उदर-वृद्धि, खाँसी, दमा, ऊपरकी डकार उठना, शूल, शोथ आदि, शिरोरोग, वमन, हिचकी, गण्डमाला

१५६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-

[बायाँ स्तम्भ] (गलसुआ), अरुचि, वात-पित्त-कफजनित द्वन्द्व, त्रिदोषजनित ज्वर, आगन्तुक ज्वर, विषमज्वर, शीतज्वर, उष्णज्वर, एकाहिक आदि ज्वर, यहाँ कथित या अकथित दोषादि-सम्भव रोग—इन सबका इस स्तोत्रके एक बार पाठसे शीघ्र शमन हो जाता है। यह सहस्रनाम एक बारके पाठसे ही सिद्ध हो जाता है। स्त्री, शूद्र और पतितोंको भी शुभकी प्राप्तिके लिये इस सहस्रनाम-स्तोत्रका जप (पाठ) करना चाहिये॥ १८५-१८९१/२॥ महागणपतिके इस स्तोत्रका सकामभावसे जप करनेवाला पुरुष इहलोकमें पृथ्वीपर सुलभ समस्त मनोवांछित भोगोंको भोगकर मनोरथ-फलोंकी प्राप्तिपूर्वक दिव्य एवं मनोरम व्योम-विमानोंपर बैठकर चन्द्र, इन्द्र, सूर्य, विष्णु, ब्रह्मा और शिव आदिके लोकोंमें इच्छानुसार रूप धारण करके विचरता है; जहाँ-जहाँ इच्छा होती है, वहाँ-वहाँ पहुँचता है; अपने बन्धुजनोंके साथ अभीष्ट भोगोंको भोगता है; महागणपतिका प्रिय अनुचर होता है और नन्दीश्वर आदिके साथ आनन्दित हो सकल शिवगणोंद्वारा अभिनन्दित होता है। पार्वती और शिव—ये दोनों पुत्रकी भाँति उसका लाड-प्यार करते हैं। वह शिवभक्त तथा पूर्णकाम होता है। फिर गणेशजीके वरदानसे इहलोकमें धर्मपरायण सार्वभौम सम्राट् होता है और उसे पूर्वजन्मकी बातें स्मरण रहती हैं॥ १९०-१९५॥ जो भक्तिभावसे गणेशजीके भजनमें तत्पर हो निष्काम भावसे इस स्तोत्रका नित्य पाठ करता है, वह योगजनित परम सिद्धिको पा लेता है और ज्ञान- वैराग्यनिष्ठ हो जहाँ निरन्तर आनन्दका उदय होता है, जो परमानन्द संवित्स्वरूप, लोकातीत, पुनरावृत्तिरहित तथा परम पाररूप है, उस गणपतिधाममें नित्यलीन एवं परमानन्दनिमग्न हो रमता रहता है॥ १९६-१९७१/२॥ जो मनुष्य इन सहस्रनामोंद्वारा हवन, अर्चन और पूजन करता है, राजालोग उसके वशमें होते हैं और शत्रु दासवत् हो जाते हैं। उसके सारे मन्त्र सिद्ध होते हैं और उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ सुलभ होती हैं॥ १९८-१९९॥ [गणेशजी कहते हैं— ] मूलमन्त्रकी अपेक्षा भी यह स्तोत्र मुझे अधिक प्रिय है। भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी

[दायाँ स्तम्भ] चतुर्थी-तिथिको मेरे जन्म-दिवसपर इन सहस्रनामोंद्वारा दूर्वार्पण करते हुए विधिवत् मेरा पूजन एवं तर्पण करे। विशेषतः अष्टगन्ध-द्रव्योंद्वारा भक्तिपूर्वक हवन करे। जो ऐसा करता है, उसके सम्पूर्ण अभीष्ट मनोरथ सिद्ध होते हैं; इसमें संशय नहीं है। इसके जप, पठन-पाठन, सुनना-सुनाना, व्याख्यान, चर्चा, ध्यान, विचार और अभिनन्दन—ये इहलोक और परलोकमें सबके लिये सम्पूर्ण ऐश्वर्यको देनेवाले हैं॥ २००-२०३॥ जो इस स्तोत्रको धारण करता है, वह स्वच्छन्दतापूर्वक कहीं भी क्यों न विचरता रहे, भगवान् शिवके करोड़ों गण उसकी रक्षा करते रहते हैं॥ २०४॥ जिस घरमें इस स्तोत्रको पुस्तकरूपमें लिखकर कोई इसका पूजन करता है, वहाँ सर्वोत्कृष्ट लक्ष्मी निरन्तर निवास करती हैं॥ २०५॥ श्रीगणेशसहस्रनामका स्मरण (जप) करके मनुष्य जिस फलको तत्काल प्राप्त कर लेता है, उसे सब प्रकारके दान, व्रत, तीर्थसेवन और यज्ञोंके अनुष्ठानद्वारा भी नहीं पा सकता। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदयके समय, मध्याह्नकालमें या सायंकालमें अथवा तीनों समय या सदा ही इन सहस्र नामोंका पाठ करता है, वह सत्पुरुषोंमें ऐश्वर्यशाली होता है, अपनी कीर्तिका अतिशय विस्तार करता है, विघ्नोंको नष्ट कर देता है, संसारको वशमें कर लेता है तथा वह पुत्र-पौत्रोंके साथ सुदीर्घकालतक निरन्तर वृद्धिशील होता है॥ २०६-२०७॥ जिसके पास कुछ नहीं है, जो दरिद्र है, वह मेरी प्राप्तिके उद्देश्यसे नियमित (शास्त्रसम्मत) आहार करके मुझ गणेशके पूजनमें तत्पर रहकर चार मासतक इस स्तोत्रका जप करे। ऐसा करनेसे वह सात जन्मोंसे चली आनेवाली दरिद्रताका भी उन्मूलन करके महती लक्ष्मीको प्राप्त कर लेता है, यह मुझ परमेश्वरकी आज्ञा है। आयु, आरोग्य, निर्मल कुल, पीड़ितोंको दी जा सकनेवाली सम्पत्ति, नित्य उज्ज्वल कीर्ति, नयी- नयी सूक्ति, रोगहीनताके साथ भव्य कान्ति, सत्पुत्र, मनोऽनुकूल गुणवती स्त्री और सत्यसंकल्पता—ये सारी वस्तुएँ, जो गणपतिके इस स्तोत्रका नित्य पाठ करता

उ०ख०-अ०४७ ] * त्रिपुरदाह एवं त्रिपुरासुरका वध * १५७ है, उसके हाथमें आ जाती हैं॥ २०८-२१० ॥ | गणेशको नमस्कार है, नमस्कार है। अनुपम मंगलस्वरूप १. गणंजय, २. गणपति, ३. हेरम्ब, ४. धरणीधर, | गणपतिको बारम्बार नमस्कार है। एकमात्र जिनसे ५. महागणपति, ६. लक्षप्रद, ७. क्षिप्रप्रसादन, ८. | विपुलपद-परमधामकी सिद्धि होती है, उन गणाधीशको अमोघसिद्धि, ९. अमित, १०. मन्त्र, ११. चिन्तामणि, | बारम्बार नमस्कार है। हे प्रभो! गजशावकके समान १२. निधि, १३. सुमंगल, १४. बीज, १५. आशापूरक, | मुखवाले आपको बारम्बार नमस्कार है॥ २१५ ॥ १६. वरद, १७. शिव, १८. काश्यप, १९. नन्दन, | हे गणपति! हे अज! हे ईश! हे हेरम्ब! हे २०. वाचासिद्ध तथा २१. ढुंढिविनायक-ये इक्कीस | द्वैमातुर! हे गजानन! हे भालेन्दु! हे धूम्रकेतु! हे नाम-मोदक हैं। जो पुरुष इन मोदकस्वरूप इक्कीस | लम्बोदर! हे विनायक! हे ब्रह्मन्! हे एकदन्त! हे नामोंद्वारा (मुझे भक्तिपूर्वक उपहार अर्पित करता है; | विघ्नेश्वर! हे विष्णो! हे कपिल! हे निर्गुण! हे काल! मेरा प्रसाद चाहता है और अभीष्ट-सिद्धिके लिये | हे आद्य! हे सिद्धिदाता! हे अनन्त! इस संसारसागरसे एक वर्षतक मुझ विघ्नराजके इस यथार्थ स्तोत्रका | मेरा परित्राण कीजिये॥ २१६-२१७॥ पाठ करता है;) मुझमें मन लगाकर, मेरी आराधनामें | जिनके सुन्दर चरणोंमें बँधी हुई किंकिणियाँ ध्वनित तत्पर रहकर मेरा स्तवन करता है, उसके द्वारा | हो रही हैं, जिन्होंने अपने अमेया लीलाचरित्रोंको स्वयं सहस्रनामस्तोत्रसे मेरी स्तुति हो जाती है, इसमें संशय | प्रकट किया है, जिनका सुन्दर कपोल मदजलकी नहीं है॥ २११-२१४॥ | लहरोंसे युक्त है, वे गणोंके अधिपति गणेशजी मनुष्योंके ब्रह्माजी बोले- श्रेष्ठ देवताओंद्वारा पूजित चरणवाले | पापोंका शमन करें॥ २१८॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'ईश्वर-गणेश-संवादान्तर्गत गणेशसहस्रनाम- स्तोत्रकथन' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४६॥

सैंतालीसवाँ अध्याय त्रिपुरदाह एवं त्रिपुरासुरका वध व्यासजी बोले- हे ब्रह्मन्! गजानन गणेशजीके | किन्नरों आदि सभीने भगवान् शिवको नमस्कारकर प्रसन्न होने तथा उनसे सहस्र नामोंको प्राप्त कर लेनेके | उनकी स्तुति की- ॥ ४॥ अनन्तर शिवजीने क्या किया; यह सब मुझसे कहिये॥ १॥ | देवता बोले- हे महादेव! हे जगन्नाथ! हे ब्रह्माजी बोले-[हे व्यास!] गणेशजीके द्वारा | जगत्को आनन्द देनेवाले! [उस] महादैत्य (त्रिपुरासुर)- वरदान तथा सहस्रनामका उपदेश प्राप्तकर भगवान् | को आपके द्वारा मारा गया हम कब देखेंगे? उस शंकर अत्यन्त प्रसन्न होकर नाचने लगे और उन्होंने | विश्वविघातीने हम सबको स्थानभ्रष्ट (अपने अधिकारोंसे महान् ध्वनिके साथ गर्जना की॥ २॥ | वंचित) कर रखा है॥ ५ १/२ ॥ उन्होंने अपने गणोंको बुलाया और देवताओंको | ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास!] देवताओंके ऐसे आदेश दिया कि 'युद्धका अवसर आ गया है।' तब वे | वचन सुनकर पिनाक धनुषको धारण करनेवाले भगवान् देवता भी महान् हर्षके साथ शिवके निकट गये॥ ३॥ | महादेवने मन-ही-मन गणेशजीका ध्यानकर और युद्ध [उस समय] ब्रह्मा, कुबेर, इन्द्र, अग्नि, वायु, | करनेका निश्चय करके प्रसन्नतापूर्वक [वहाँसे] प्रस्थान चन्द्रमा, वरुण, अर्यमा* और गन्धर्वों, यक्षों, ग्रहों, | किया और देवताओं एवं गन्धर्वोंसहित अपने निवासस्थलपर

  • द्वादश आदित्योंमें-से एक।

१५८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

जा पहुँचे ॥ ६-७ ॥ उधर गुप्तचरोंने उस दैत्य त्रिपुरासुरसे सारा वृत्तान्त निवेदित किया कि देवताओंकी सेनाके साथ गिरिजापति महादेवजी युद्धके लिये आ गये हैं ॥ ८ ॥ तब उसकी भी सेना शस्त्रास्त्रों और कवचोंसे सुसज्जित हो गयी और उस दैत्यने भी युद्धके लिये आभूषणरूप [शस्त्रास्त्र एवं कवच आदि]-से विभूषित हो भयंकर गर्जन किया ॥ ९ ॥ उसने वस्त्र, माला आभूषण और धनसे वीरोंको आनन्दित किया। उसके योद्धागण अनेक प्रकारके वाहनोंमें सवार हो गये और वह महादैत्य त्रिपुरासुर दिशाओं और विदिशाओंको अपने नादसे पूरित करता हुआ स्वयं [सुवर्ण, रजत और लौहनिर्मित] त्रिपुरमें आरूढ़ हुआ। तदनन्तर दोनों सेनाओंके मध्य महान् युद्ध प्रारम्भ हो गया ॥ १०-११ ॥ अनेक प्रकारके शस्त्रों तथा मर्मवेधी लौहबाणोंके प्रहारसे [सैनिकोंके शरीरसे निकलनेवाले रुधिरसे] मार्गका अवरोधन करनेवाली रक्तकी नदी प्रवाहित होने लगी ॥ १२ ॥ [उस समय] शस्त्रोंसे घायल हुए योद्धा खिले हुए पलाश-पुष्पके वृक्षोंकी भाँति शोभित हो रहे थे। कुछ सैनिक शत्रुसैनिकोंको दृढ़ वैर होनेके कारण जीवित पकड़कर मार दे रहे थे ॥ १३ ॥ कुछ सैनिक शत्रुसैनिकोंके सिरके बाल बलपूर्वक पकड़कर उनके सिर काट दे रहे थे। दौड़ते हुए रथों, पैदल वीरों, घोड़ों और हाथियोंके पैरोंसे उठी हुई धूल क्षणभरमें पृथ्वीसे लेकर अन्तरिक्षतक व्याप्त हो गयी। उस समय घोर-से भी घोर अन्धकार हो जानेसे कुछ भी समझमें नहीं आ रहा था ॥ १४-१५ ॥ योद्धागण उस समय भी अनेक प्रकारसे भयंकर युद्ध कर रहे थे, उन्होंने जीवनकी आशा छोड़ दी थी और मरनेका निश्चय कर लिया था ॥ १६ ॥ वायुके द्वारा धूल उड़ा दिये जानेपर [युद्धभूमिमें] बहुत-से देवता मरे पड़े दिखायी दिये। [यह देखकर] देवताओंकी सेना पलायन कर गयी, जिससे दैत्यसेना अत्यन्त हर्षित हुई ॥ १७ ॥

उस समय हाथमें वज्र धारण किये, युद्धकी इच्छावाले देवराज इन्द्र वहाँ आये। [उनके हाथमें] तीक्ष्ण धारवाले वज्रको देखकर दैत्य और दानव भागने लगे। उन वज्रधारी इन्द्रने अपने वज्रके प्रहारसे असुरोंको चूर-चूर कर डाला। उस प्रचण्ड वज्रके प्रहारसे उन्होंने अपने प्राण छोड़ दिये ॥ १८-१९ ॥ उनमेंसे कुछके पैर टूट गये, कुछकी गर्दन टूट गयी, कुछके पेट फट गये और कुछ अन्य [असुरों]-की भुजाएँ कन्धोंसे कटकर अलग हो गयीं ॥ २० ॥ कुछ (दैत्य, दानवों और असुरों)-की जाँघें कट गयीं, कुछ अन्यका ऊरुभाग टूट गया। कुछ अन्य [दैत्यों]-के गुल्फ (टखने) कट गये और वे गिर पड़े तथा कुछ अन्य इस व्याजसे अर्थात् ऐसी दुर्दशाके कारण भयवश गिर पड़े ॥ २१ ॥ योद्धाओं, घोड़ों और हाथियोंके अंगोंके कटनेसे तथा मरे हुए सैनिकोंके शरीरसे बहनेवाले रक्तके कारण बहुत-सी नदियाँ उत्पन्न हो गयीं। वे विजयकी इच्छा रखनेवाले वीरोंका उत्साहवर्धन करनेवाली थीं ॥ २२१/२ ॥ तब इन्द्रद्वारा बहुत-सी सेना मारी गयी देखकर गर्जन करता हुआ त्रिपुरासुर धीरे-धीरे इन्द्रके पास युद्ध करनेके लिये आया ॥ २३१/२ ॥ उसने इन्द्रको देखकर कहा- क्यों मरनेकी इच्छा करते हो? हे वासव ! जीवित रहते हुए युद्धसे दूर हट जाओ, मैं पीठपर वार नहीं करता। हे शचीपते ! तुममें मुझसे युद्ध करनेकी क्या सामर्थ्य है ? मुझे बताओ कि क्या बकरा भी सिंहके साथ युद्ध कर सकेगा ! शक्ति हो तो [मुझसे] युद्ध करो, अन्यथा सुखपूर्वक [यहाँसे] चले जाओ ॥ २४-२६ ॥ इस प्रकार कहनेपर भी जब इन्द्र वहाँ स्थित रहे तो दैत्य [राज] त्रिपुरासुरने धनुषको सुसज्जितकर (प्रत्यंचा चढ़ाकर) बहुत-से बाणोंकी वर्षा की और देवताओंकी सेनापर प्रहार किया ॥ २७ ॥ मन्त्रसे अभिमन्त्रित उसके एक बाणसे असंख्य बाण निकलते थे। इस प्रकार उसने देवताओं और गन्धर्वोंका मर्दनकर पृथ्वी और अन्तरिक्षको बाणोंसे

उ०ख०-अ०४७ ] * त्रिपुरादाह एवं त्रिपुरासुरका वध * १५९

परिपूरित कर दिया ॥ २८ ॥ निरन्तर बाण-समूहोंकी वर्षासे पुनः अन्धकार हो गया। उन बाणोंसे वे देवता भी अंग-भंग होकर भूतलपर गिर पड़े ॥ २९ ॥ उन प्रचण्ड प्रहारोंसे पीड़ित होकर बलासुरका वध करनेवाले इन्द्र भी भूमिपर गिर पड़े। तब सभी श्रेष्ठ देवताओंके मूर्च्छित हो जानेपर महेश्वर शिव उस आत्मप्रशंसा, गर्जन और युद्ध कर रहे त्रिपुरासुरको सहन न कर सके, फिर भी उन्होंने मन-ही-मन उस दैत्यके पुरुषार्थकी प्रशंसा की ॥ ३०-३१ ॥ इसी बीच वहाँ नारदजी युद्ध देखनेकी इच्छासे आये और भगवान् शम्भुके द्वारा पूजित होनेपर बोले— हे नीललोहित! सुनो ॥ ३२ ॥ नारदजी बोले—हे महेश्वर! त्रिपुरासुरके वधके विषयमें आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये; मैं उसके वधका उपाय कहता हूँ, उसे कीजिये ॥ ३३ ॥ उसने (त्रिपुरासुरने) पूर्वकालमें ऐसा तप किया था, जो ब्रह्माजीके लिये भी दुष्कर है; उसने गणेशजीकी आराधना की थी और उन्होंने उसे सभी वांछित वर दिये थे। जो-जो वर उसने माँगे, भगवान् गणेशने उसे बिना विचार किये ही दे दिये। उन्होंने उसे एक बाणपर स्थित और इच्छानुसार गति करनेवाले तीन महान् पुर प्रदान किये, जो बिना वायुके गति करनेवाले और सम्पूर्ण देवताओंसे अभेद्य थे ॥ ३४-३५ १/२ ॥ उन्होंने उससे यह गुप्त बात भी कही थी कि जो एक ही बाणसे तुम्हारे तीनों पुरोंका भेदन कर देगा, उसके द्वारा ही तुम्हें मृत्यु प्राप्त होगी। प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाले शिवजीने मुनिश्रेष्ठ नारदजीके इस प्रकार कहकर चले जानेपर मूर्च्छित देवताओंको सचेत किया और नारदजीके द्वारा स्मरण कराये गये गजानन गणेशजीके कथनका स्मरण किया ॥ ३६-३८ ॥ वे प्रभु [यद्यपि] अपने संकल्पमात्रसे सबका नाश करनेमें समर्थ हैं, [तथापि] उन्होंने उस दैत्यराज त्रिपुरासुरके वधके लिये स्वेच्छानुरूप महान् प्रयत्न आरम्भ किया ॥ ३९ ॥ उन शिवजीने पृथ्वीको अपना रथ बनाया, चन्द्रमा और सूर्य उसके पहिये थे। उन्होंने पद्मयोनि ब्रह्माजीको अपना सारथि, गिरिराज हिमालयको धनुष, अपनी महिमासे च्युत (स्खलित) न होनेवाले भगवान् विष्णुको बाण बनाया और दोनों अश्विनीकुमारोंको [उस रथकी] दोनों धुरियोंके रूपमें संयोजित किया ॥ ४० ॥ तदनन्तर उन्होंने आचमन करके मन-ही-मन गणेशजीका चिन्तनकर उनके द्वारा उपदिष्ट सहस्र नामोंका जप किया और एकाक्षर मन्त्रसे प्रचण्ड पिनाक धनुषको अभिमन्त्रित किया ॥ ४१ ॥ जब शिवजीने विष्णुरूप महाबाणको अभिमन्त्रित किया तो उस समय शेषनाग, पृथ्वी, वन और पर्वत भी काँपने लगे। पक्षिसमूह [दिग्भ्रमित-से] भ्रमण करने और चीत्कार करते हुए महान् कोलाहल करने लगे। आजगव धनुषके शब्द (टंकार)-से देवता और मनुष्य भी व्याकुल हो गये ॥ ४२-४३ ॥ उन शिवजीने जब उस बाणको छोड़ा तो नभतल दग्ध हो उठा और तत्क्षण पातालसहित भूमण्डल ज्वाला-समूहोंसे व्याप्त हो गया ॥ ४४ ॥ उस बाणको देखकर पुरमें आश्रय लिया हुआ दैत्यराज वहाँसे सेनासहित भागा, परंतु वेगपूर्वक आये उस बाणने [स्वर्ण, रजत तथा लौहनिर्मित] उन तीनों

यहाँ प्रस्तुत पृष्ठ का सम्पूर्ण पाठ दिया गया है:

१६० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐

[बायाँ स्तम्भ] पुरोंसहित उस दैत्यको भी भस्म कर दिया॥ ४५॥ सम्पूर्ण सैनिकों, दैत्यों, दानवों तथा राक्षसोंके देखते-देखते दैत्यके शरीरमें स्थित तेज भगवान् शिवके शरीरमें लीन हो गया। तदनन्तर अन्तरिक्षमें आकाशवाणी हुई कि 'शिवके द्वारा मारा गया यह दैत्य मुक्त हो गया है।' तब देवताओं और मुनियोंने भी त्रिलोचन महादेवजीका स्तवन किया॥ ४६-४७॥ गन्धर्व-समूह और चारण [प्रशस्तियोंका] तथा वेदनिष्ठ जन [सामवेदीय मन्त्रोंका] गायन करने लगे। अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और किन्नर बाजे बजाने लगे। नारद आदि देवर्षि पुष्पोंकी वर्षा करने लगे। तत्पश्चात् चिन्तामुक्त हुए देवता शिवजीकी आज्ञासे अपने-अपने स्थानको चले गये॥ ४८-४९॥ उद्वेगरहित हुए मुनिगण भी त्रिपुरासुरका वध करनेवाले महेश्वरको नमस्कारकर अपने-अपने अनुष्ठानोंमें संलग्न हो गये॥ ५०॥ उस दैत्यके मारे जानेपर वेद-वेदांगके अध्ययन-

[दायाँ स्तम्भ] अध्यापनमें निरत रहनेवाले [मुनिगण] भूतलपर अग्निहोत्र, यज्ञ, दान और व्रतोंमें तत्पर हो गये और सभी लोग पुनः उत्साहसे परिपूर्ण हो गये। फिर [देवताओं आदिसे] अभिवन्दित भगवान् त्रिलोचनने उस [अलौकिक] महारथको भग्न कर दिया॥ ५१-५२॥ तदुपरान्त भगवान् शिव विजयसूचक जयघोष, तूर्यघोष तथा देवताओंके दुन्दुभिनातसे समादृत होकर प्रसन्नतापूर्वक शिलादपुत्र नन्दी, गणपति, कार्तिकेय और सभी पार्षदोंके साथ [मणि-रत्नादिसे] अलंकृत पर्वतराज कैलासकी ओर चल पड़े। उसी समयसे अर्थात् त्रिपुरदाहके उपरान्त उनका 'त्रिपुरारि' यह नाम लोकमें प्रसिद्ध हुआ॥ ५३-५४॥ इस प्रकार यह महागणपति-मन्त्रकी सामर्थ्य कही गयी है। [महागणपतिके] सहस्रनामके भी प्रभावका यह निरूपण किया गया है। मेरे अतिरिक्त अन्य किसीको भी यह ज्ञात नहीं है, इसे मैंने किसीको बताया भी नहीं है। इसके पढ़ने और सुननेसे सम्पूर्ण अभिलाषाओंका पूर्तिरूप फल प्राप्त होता है॥ ५५-५६॥


॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शिवकी विजय' नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४७॥

अड़तालीसवाँ अध्याय त्रिपुर-विजयके उपलक्ष्यमें देवताओंद्वारा त्रिपुरारि-महोत्सव (देव-दीपावली)-का आयोजन, हिमवान्का पार्वतीको गणेशजीकी महिमा बताना

[बायाँ स्तम्भ] व्यासजी बोले—हे पितामह! मैंने त्रिपुरासुरके वधसे सम्बन्धित महान् आख्यानका श्रवण किया, फिर भी मैं अब यह सुनना चाहता हूँ कि उस समय जगज्जननी पार्वतीजी कहाँ स्थित थीं? वे कैसे प्रकट हुईं? किस तिथिको दैत्यराज त्रिपुरासुर दग्ध हुआ था— यह सब आप विस्तारपूर्वक कहिये॥ १-२॥ ब्रह्माजी बोले—वह महान् असुर (त्रिपुरासुर) कार्तिकमासकी पूर्णिमाको सायंकाल दग्ध हुआ था। उस तिथिको दिनमें जो महाभयंकर युद्ध हुआ था, उसका मैंने पहले ही वर्णन कर दिया॥ ३॥ क्योंकि उस तिथिको देवशत्रु त्रिपुरासुरका वध करनेवाले विजयी भगवान् शिवका सम्पूर्ण देवताओंद्वारा

[दायाँ स्तम्भ] अर्चन किया गया था, इसलिये उस तिथिको पृथ्वीपर मनुष्य दीपदान करते हैं॥ ४॥ उस तिथिको जो स्नान, दान, जप, होम आदि किये जाते हैं, उनका बहुत अधिक पुण्यफल होता है, इसलिये उसे बाहुली [पूर्णिमा] कहते हैं॥ ५॥ उस तिथिको जो 'त्रिपुरारि-महोत्सव' का आयोजन नहीं करते हैं, वे कभी भी विजयी नहीं होते और उनके पुण्य भस्म हो जाते हैं॥ ६॥ अतः उस पूर्णिमाको जो लोग प्रातःकाल शिवार्चन करते हैं, उन्होंने रात्रिमें जो पाप किये होते हैं, वे विलीन हो जाते हैं॥ ७॥ हे मुने! उस तिथिको मध्याह्नमें शिवार्चन करनेसे

उ०ख०-अ०४८ ] * त्रिपुर-विजयके उपलक्ष्यमें देवताओंद्वारा त्रिपुरारि-महोत्सवका आयोजन * १६१ जन्मसे (जीवनभरमें) किया गया पाप और प्रदोषकालमें शिवार्चनसे सप्तजन्मार्जित पाप नष्ट हो जाता है॥ ८॥ [हे व्यासजी!] अब मेरे द्वारा कहे जानेवाले पार्वतीके प्राकट्यके विषयमें श्रवण करो। शिवपत्नी पार्वती उसकी (त्रिपुरासुरकी) मृत्यु [कालान्तरमें] शिवके द्वारा जानकर [उस समय] भयसे अन्तर्हित हो गयीं॥ ९॥ पुनः वे जगदम्बिका जब हिमालयपर्वतकी गुफाके द्वारसे बाहर निकलीं (प्रकट हुईं) तो उन्होंने सिंहों, व्याघ्रों और मृगोंसे परिपूर्ण उस भयंकर पर्वतको देखा। शिवको [वहाँ] न देखकर विरहाकुल मनः-स्थितिवाली वे शिवा अत्यन्त भयभीत होकर 'हा तात! हा शिव!' कहती हुई विलाप करने लगीं - ॥ १०-११ ॥ [वे कहने लगीं-] हे सदाशिव ! आप तो सर्वज्ञ हैं, फिर भी इस भयंकर जंगलमें कुररीकी भाँति क्रन्दन करती हुई मुझ एकाकिनीको आप क्यों नहीं जान पा रहे हैं? मुझे आपके दर्शन कब होंगे? क्या आप मुझे भूल गये हैं? हे हर (दुःखोंका हरण करनेवाले)! मैं आपका विरह सहने या [आपके विरहमें] जीवन धारण करनेमें सक्षम नहीं हूँ॥ १२-१३॥ [हे तात (पिताजी)!] आप भी कहाँ हैं? क्या आप मेरे शोकपूर्ण उद्गार नहीं श्रवण कर रहे हैं? आपके बिना मैं किसकी शरणमें जाऊँ अथवा मैं क्या करूँ? आप मुझे पुनः मंगलमय शिवसे संयुक्त कर दीजिये। इस समय आप मुझे पुनः [अपने घरमें] जननीके गर्भसे उत्पन्न हुआ जानिये ॥ १४-१५॥ उन सदाशिवरूपी वरका शीघ्र ही मेरे लिये अन्वेषण कीजिये। नहीं तो मैं इस शिखरसे [कूदकर] अपने शरीरका परित्याग कर दूँगी ॥ १६ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं-[हे व्यास !] इस प्रकार रुदन करती हुई उन पार्वतीकी उस उत्तम वाणीको सुनकर किसी मछुवारेने हिमवान्के पास आकर इस प्रकार निवेदन किया-॥ १७॥ मछुवारा बोला- [हे पर्वतराज!] मैंने किसी सुन्दर श्रोणिप्रदेशवाली तरुणीको देखा है, जो सम्पूर्ण आभूषणोंसे विभूषित है। उसने दोनों कानोंमें कुण्डल धारण कर रखे हैं, जो सूर्यमण्डलके समान प्रकाशित हो रहे हैं। अनेक रत्नोंसे जटिल अत्यन्त दीप्तिमान् मुकुट उसके मस्तकको अलंकृत कर रहा है, उसके ललाटपट्टमें सोलह मोतियोंसे जटिल चतुष्कोण शोभित है। उसकी सीमन्तसरणिमें मूल्यवान् मोतियोंसे निर्मित माँगचोटी लटक रही है, जिसमें बहुमूल्य रत्नयुक्त स्वर्णपुष्प संलग्न है। उसकी सुन्दर नासिकामें मोती जड़ी हुई सोनेकी कील है। उसकी भुजाओंमें सुन्दर बाजूबन्द और हाथोंमें सुन्दर कंगन हैं। उसकी प्रत्येक अँगुलीमें बहुमूल्य रत्नजटित स्वर्णमुद्रिकाएँ शोभा दे रही हैं। उसकी सुन्दर कंचुकीके ऊपर मोतियोंसे निर्मित माला आश्रय ले रही है। रत्नमयी सुन्दर स्वर्ण करधनी उसके रेशमी वस्त्रसे आवृत्त कटिप्रदेशपर विभूषित है। उसके गुल्फोंमें सोनेके पायल हैं, जिनमें सुन्दर घुँघरू झंकृत हो रहे हैं। उसके पैरोंकी पृथक्-पृथक् अंगुलियोंमें तदनुरूप उत्तम आभूषण विद्यमान हैं। इस प्रकारकी वह सर्वांगसुन्दरी [तरुणी] अत्यन्त व्याकुल होकर रो रही है, मेरे पूछनेपर भी वह कुछ नहीं बोली; वह केवल आपका ही नाम ले रही है॥ १८-२४॥ ब्रह्माजी बोले- [उस मछुवारेका] ऐसा वचन सुनकर बुद्धिमान् हिमवान् शीघ्र ही [अपनी] उस पुत्रीके पास गये और तर्कपूर्ण वचनोंसे उसे सान्त्वना देते हुए [अमृतमयी] वाणीमें बोले - ॥ २५ ॥ हिमवान् बोले- हे सुन्दर भौंहोंवाली! तुम क्यों शोक करती हो? हे [जगतके] सृजन, पालन और संहारकी हेतुभूता! हे सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे परिपूर्ण! हे सम्पूर्ण शक्तियोंसे युक्त! हे अघटनघटनापटीयसी! हे निष्पाप महेश्वरि! हे पूर्णकामे! हे सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित ! हे मंगलमयी ! तुम सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित रहनेवाली और उन्हें प्रेरणा देनेवाली तथा उनके मनकी बात जाननेवाली हो। [यद्यपि] तुम [वास्तविक रूपमें] शिवसे वियुक्त नहीं हो, फिर भी मैं उन मंगलकारी शिवसे तुम्हें संयुक्त करूँगा ॥ २६-२८॥ 'उठो' ऐसा कहकर हिमवान् पार्वतीको साथ लेकर अपने भवनको चले आये। वहाँ माता मेनाको उनके पुत्रके सहित देखकर पार्वती बहुत आनन्दित हुईं ॥ २९ ॥

१६२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- फिर भी शिवको देखनेके लिये समुत्सुक वे लम्बी-लम्बी साँसें लेती और छोड़ती रहती थीं। उन्होंने पिताके चरणोंमें विनीत होकर कहा-[हे पिता!] आप मुझे शिवकी प्राप्तिके लिये सम्यक् उपाय बतायें। व्रत, दान अथवा बहुत कठिनाईसे किया जानेवाला तप ही क्यों न हो, मैं उसे करूँगी। हे तात! मैं [इसके लिये] पहलेकी भाँति उत्तम तप करूँगी ॥ ३०-३१ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं-हे मुने! तब पिता हिमवान्‌ने मन-ही-मन बार-बार विचार करके उनसे कार्यकी शीघ्र सिद्धि करनेवाला उपाय कहा; उसे तुम [भी] श्रवण करो ॥ ३२ ॥ हिमवान् बोले-हे पार्वती! सुनो, मैं तुम्हें शिवप्राप्तिका समुचित उपाय बताता हूँ। विघ्नेश्वर गणेशजीकी उपासना धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देनेवाली है ॥ ३३ ॥ इस उपासनाका अनुष्ठान महेन्द्र आदि देवताओं तथा नारद आदिके द्वारा भी किया गया और उनके द्वारा इन्द्रपद आदि तत्-तत् सिद्धियाँ प्राप्त की गयी हैं ॥ ३४ ॥ उन महात्मा गणेशजीने ही ब्रह्माजीको [जगत्‌की] सृष्टि करनेकी सामर्थ्य प्रदान की थी, उन सर्वेश्वरने ही विष्णुको [जगत्‌की] रक्षा करनेकी सामर्थ्य प्रदान की ॥ ३५ ॥ उन्हीं सर्वविघ्नहर्ताने शिवजीको भी संहार करनेकी दृढ़ सामर्थ्य प्रदान की, उन्हीं सर्वेश्वरने शेषनागको भी पृथ्वीको धारण करनेकी सामर्थ्य प्रदान की है ॥ ३६ १/२ ॥ जिसके स्वरूपको ब्रह्मा आदि [देवता] तथा [नारदादि] मुनि भी नहीं जानते हैं, जो वाणी और मनसे भी अगोचर हैं अर्थात् इन्द्रियोंके विषय नहीं हैं, वे ही ईश्वर गजानन-स्वरूपसे दृष्टिगोचर होते हैं। अतः सभी कार्योंके आरम्भमें उनके उसी रूपकी पूजा होती है। तुम उन्हीं सर्वेश्वर गणेशजीकी मेरे द्वारा बतायी गयी विधिसे पूजा करो ॥ ३७-३९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'पार्वतीके प्राकट्यका वर्णन' नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४८ ॥ उनचासवाँ अध्याय श्रीगणेशजीकी पार्थिव-पूजाकी विधि पार्वतीजी बोलीं-हे दयानिधि! हे गिरिराज! हे पिता! सर्वेश्वर जगद्गुरु गणेशजीकी उपासनाके विषयमें शीघ्र कहिये ॥ १ ॥ जिसके द्वारा मैं सम्यक् रूपसे शिवकी समीपता प्राप्त करके शाश्वत कल्याणको प्राप्त करूँगी। इससे मर्त्यलोकमें भी लोगोंका महान् उपकार होगा ॥ २ ॥ हिमवान् बोले-हे देवि! तुम्हारे प्रति स्नेह होनेसे और लोकोंके उपकारकी इच्छासे मैं यह परम मंगलमय रहस्य कह रहा हूँ, इसे एकाग्र चित्तसे सुनो ॥ ३ ॥ [उपासक] प्रातःकाल उठकर नैर्ऋत्य (दक्षिण- पश्चिम) दिशामें जाय। शौच करनेसे पहले तृण, काष्ठ और पत्तोंसे भूमिको ढक दे। बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि उपजाऊ भूमिको छोड़कर मल-मूत्र-त्यागके लिये बैठे, किंतु उछल-उछलकर शौच न करे। मल-मूत्रका त्याग करनेके बाद यथोक्त [शास्त्र-निर्दिष्ट]-विधिसे शुद्धि करे ॥ ४-५ ॥ दाँत और जिह्वाकी शुद्धि करके स्नान करनेके लिये नदी, तालाब, वापी, सरोवर अथवा कुएँपर जाय ॥ ६ ॥ पहले मल-प्रक्षालनरूप स्नान करके तब मन्त्र-स्नान करे। तदनन्तर मिट्टी, चन्दन अथवा कुंकुमका तिलक भी लगाये। दो धुले हुए वस्त्र (उत्तरीय और धोती) धारण करके पवित्र आसनपर बैठ जाय और एकाग्रचित्त होकर सन्ध्यादि नित्यकर्म सम्पन्न कर ले ॥ ७-८ ॥ तत्पश्चात् सुन्दर-चिकनी, छोटे कंकड़-पत्थरसे रहित; जो बाँबीकी न हो-ऐसी अत्यन्त शुद्ध मिट्टीको जल छिड़ककर मर्दित करे। उससे पवित्र और अत्यन्त

उ०ख०-अ०४९ ] * श्रीगणेशजीकी पार्थिव-पूजाकी विधि * १६३ सुन्दर गणेशमूर्तिका स्वयं निर्माण करे, जो सम्पूर्ण अंगोंसे परिपूर्ण, चार भुजाओंसे शोभायमान हो ॥ ९-१०॥ वह मूर्ति परशु आदि अपने आयुधोंको धारण की हुई, सुन्दर और दृढ़ हो। तत्पश्चात् उसे पीठपर स्थापितकर बुद्धिमान् उपासक अपने दोनों हाथोंका प्रक्षालन करके सम्पूर्ण पूजा-द्रव्यों जल, अष्टगन्ध, अक्षत, लाल फूल, गुग्गुल आदिको यथास्थान रखे ॥ ११-१२ ॥ तीन, पाँच या सात पत्तियोंसे युक्त सुन्दर एवं पवित्र, हरी तथा सफेद दूबके एक सौ आठ अंकुर वहाँ लाकर रखे। घीका दीपक, तेलका दीपक, अनेक प्रकारके सुन्दर नैवेद्य, मोदक, अपूप (मालपुआ), लड्डू, शर्करायुक्त खीर, तण्डुलचूर्णसे बना खाद्य तथा अनेक प्रकारके व्यंजनोंको लाकर रखे। कपूर, सुपारी-चूर्ण, खैर, इलायची, लौंगसे युक्त तथा केसरयुक्त चर्वणयोग्य ताम्बूल लाकर रखे ॥ १३-१५१/२ ॥ हे ईश्वरि ! जामुन, आम, कटहल, अंगूर, केला तथा नारियल आदि ऋतुके अनुसार उत्पन्न होनेवाले फल भी वहाँ लाकर रखे। आरतीसे सम्बन्धित अनेक प्रकारकी सामग्री और स्वर्ण-दक्षिणा भी रखे। इस प्रकार एकत्र की गयी सम्पूर्ण सामग्रीको ले करके एकान्त स्थलमें जाकर वहाँ क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछाकर तथा उस आसनपर आसीन होकर भूतशुद्धि करके प्राण-प्रतिष्ठा करे। तत्पश्चात् दिग्बन्धन करके पहले गणेशादि देवताओंको नमस्कार करे। तदनन्तर आगमविधानसे अन्तर्मातृकान्यास और बहिर्मातृकान्यास करे तथा गुरुद्वारा बतायी गयी विधिसे सन्निधान आदि मुद्राएँ प्रदर्शित करे ॥ १६-२० ॥ उसके बाद मन्त्रन्यास और षडंगन्यास करके पूजा- सामग्रीका संशोधनकर गजानन गणेशजीका ध्यान करे ॥ २१ ॥ ध्यान-जो एक दाँतवाले हैं, जिनके कान सूपके समान [विशाल] हैं, जिनका मुख हाथीका है, जिनका स्वरूप चार भुजाओंवाला है, जो अपने हाथोंमें पाश- अंकुश-मोदक [और वरद मुद्रा] धारण किये हैं, जो लाल फूलोंकी श्रेष्ठ और सुन्दर माला कण्ठ तथा हाथ (या कि सूँड) -में धारण किये हैं, जो भक्तोंको वर प्रदान करनेवाले और सिद्धि-बुद्धिसे सदा सेवित हैं, जो मनुष्योंको कार्यसिद्धि एवं मेधा प्रदान करनेवाले तथा धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-पुरुषार्थचतुष्टय देनेवाले हैं, जो ब्रह्मा-शिव-विष्णु-इन्द्रादि देवताओं और श्रेष्ठ ऋषियोंद्वारा सम्यक् रूपसे स्तुत हैं, [उन भगवान् गजानन गणेशजीका मैं ध्यान करता हूँ] ॥ २२-२४॥ आवाहन-हे जगत्के आधार! हे श्रेष्ठ देवताओं एवं असुरोंसे अर्चित ! हे अनाथोंके नाथ ! हे सर्वज्ञ ! हे देवताओंद्वारा परिपूजित ! आप पधारिये ॥ २५ ॥ आसन-हे देव! अनेक रत्नोंसे युक्त दिव्य स्वर्ण-सिंहासन मेरे द्वारा आपको समर्पित है, आप उसपर विराजमान हों ॥ २६ ॥ पाद्य-हे देवदेवेश्वर ! हे सर्वेश्वर ! हे गणोंके अधिपति! गन्ध-पुष्प और अक्षतसहित सम्पूर्ण तीर्थोंका जल मैं ले आया हूँ, आप चरणोंका प्रक्षालन करनेहेतु इसे ग्रहण करें ॥ २७ ॥ अर्घ्य-हे अमोघशक्तिसम्पन्न गणेशजी ! मूँगा, मोती, पूगीफल, ताम्बूल, स्वर्ण, अष्टगन्ध, पुष्प तथा अक्षतसे युक्त मेरे द्वारा अर्पित किये गये अर्घ्यको स्वीकारकर सफल करें ॥ २८ ॥ आचमनीय-हे प्रभो ! गंगा आदि सभी तीर्थोंसे प्रार्थना करके मैं यह उत्तम जल लाया हूँ, यह कपूर, इलायची, लौंग आदिसे समन्वित है, इसे आचमनके लिये स्वीकार करें ॥ २९ ॥ तैलोद्वर्तन [तेल-उबटन ] - [ हे देव !] चम्पा, अशोक, मौलसिरी, मालती, मोगरा आदि [के पुष्पों]- से सुवासित, स्निग्धताके हेतुभूत इस सुन्दर तैलको आप ग्रहण करें ॥ ३० ॥ दुग्ध-स्नान-जो कामधेनुसे उत्पन्न है और सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये जीवनस्वरूप उत्तम पदार्थ है, जो पवित्र और यज्ञका हेतुभूत है, उस दुग्धको मैं आपके स्नानहेतु अर्पित करता हूँ॥ ३१॥ दधि-स्नान-जो गायके दुग्धसे उत्पन्न है, सभी

१६४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 लोगोंको प्रिय है; मेरे द्वारा लाये गये, उस श्रेष्ठ दधिको आप स्नानके लिये ग्रहण करें॥ ३२॥ घृत-स्नान—जो नवनीतसे सम्यक् रूपसे उत्पन्न है, सम्पूर्ण प्राणियोंको सन्तुष्टि देनेमें कारणस्वरूप है, यज्ञका अंग और देवताओंका आहार है; उस घृतको मैं आपके स्नानके लिये समर्पित करता हूँ॥ ३३॥ मधु-स्नान—जो पुष्पोंके सार (पराग)-से उत्पन्न है, सब प्रकारसे तेजकी वृद्धि करनेवाला है, सम्पूर्ण शरीरको पुष्टि प्रदान करनेवाला है; हे देव! वह मधु आपके स्नानके लिये समर्पित है॥ ३४॥ शर्करा-स्नान—ईखके सारतत्त्व (रस)-से उत्पन्न अत्यन्त मनोहर शर्करा, जो शरीरके मलको दूर करनेवाली है—वह मेरे द्वारा अर्पित है, आप उसे स्नानहेतु ग्रहण करें॥ ३५॥ गुड़-स्नान—जो सम्पूर्ण माधुर्यका हेतु, स्वादिष्ट, सबको प्रिय लगनेवाला और पुष्टिकारक है; वह इक्षुके सार (रस)-से निर्मित गुड़ मैं आपके स्नानके लिये लाया हूँ॥ ३६॥ मधुपर्क—[हे देव!] कांस्यपात्रमें रखे और कांस्यपात्रसे ढके हुए दधि, मधु और घृतसे पूरित मधुपर्क मेरे द्वारा लाया गया है। इसे आप अपनी पूजाके लिये ग्रहण करें॥ ३७॥ शुद्धोदक-स्नान—हे विभो! सम्पूर्ण तीर्थोंसे प्रार्थनापूर्वक यह जल मेरे द्वारा लाया तथा सुवासित किया गया है। हे सुरेश्वर! सम्यक् रूपसे स्नानहेतु इसे ग्रहण करें॥ ३८॥ वस्त्र—लोक-लज्जाका निवारण करनेवाले दो बहुमूल्य और अत्यन्त महीन लाल रंगके वस्त्र मेरे द्वारा अर्पित हैं, हे देव! इन्हें ग्रहण कीजिये॥ ३९॥ यज्ञोपवीत—हे देव! मैंने भक्तिपूर्वक रजत तथा सुवर्णसे ब्रह्मसूत्रका निर्माण कराके उसे रत्नोंसे अलंकृत किया है, हे परमेश्वर! आप इसे ग्रहण करें॥ ४०॥ आभूषण—[हे देव!] स्वर्णनिर्मित बहुत-से आभूषण, जो अनेक रत्नोंसे जटित हैं; आपकी आज्ञासे आपके भिन्न-भिन्न अंगोंमें धारण कराता हूँ॥ ४१॥ रक्तचन्दनानुलेपन—हे देव! अष्टगन्धसे युक्त उत्तम लाल चन्दनका आपके द्वादश अंगोंमें लेपन करता हूँ, आप मुझपर कृपा करें॥ ४२॥ अक्षत—हे जगदीश्वर! आपके [मस्तकपर लगे] तिलकके ऊपर शोभाके लिये मैं रक्त चन्दन-मिश्रित तण्डुलोंको अंकित करता हूँ, आप इसे ग्रहण (स्वीकार) करें॥ ४३॥ पुष्प—पाटल, कर्णिकार, गुलदुपहरिया, लाल कमल, मोगरा और मालतीके पुष्प [आपको समर्पित हैं], हे परमेश्वर! इन्हें ग्रहण करें॥ ४४॥ पुष्पमाला—अनेक प्रकारके कमल-पुष्पों और पल्लवोंसे गूँथकर बनायी गयी बिल्वपत्रोंसे युक्त अत्यन्त मनोहर इस मालाको आप ग्रहण करें॥ ४५॥ धूप—[हे देव!] दशांग गुग्गुल धूप, जो सम्पूर्ण सुगन्धियोंका कारक और सभी पापोंका नाश करनेवाला है; मेरे द्वारा समर्पित है, आप उसे ग्रहण करें॥ ४६॥ दीप—हे सर्वज्ञ! हे सर्वलोकेश्वर! अन्धकारका नाश करनेवाले इस उत्तम मंगलदीपको आप ग्रहण करें। हे देवाधिदेव! आपको नमस्कार है॥ ४७॥ नैवेद्य—[हे देव!] अनेक प्रकारके पक्वान्नोंसे संयुक्त, उत्तम शालि चावलसे निर्मित ओदन, अनेक प्रकारके व्यंजन, शर्करायुक्त पायस (खीर), दधि-दुग्ध- घृतसे युक्त [पेय], लौंग-इलायचीसे समन्वित तथा मरिचचूर्णसहित पकायी गयी बड़ी, राई-धनिया-मेथीसे युक्त तक्र, हींग-जीरा-कुम्हड़ा-मरिच-उड़दकी पिसी हुई दालसे बने और सुन्दर तले एवं पके हुए बड़े, मोदक-पुआ-लड्डू-पूड़ी-मलाई आदि [पदार्थ], हल्दी- हींग-लवण और सैन्धव लवण (सेंधा नमक)-से युक्त उत्तम दाल तथा पापड़से संयुक्त और अमृतीकरण मुद्राके माध्यमसे अमृतरूप हो चुका यह नैवेद्य भोजनके रूपमें उपस्थित है, इसे सादर ग्रहण करें॥ ४८–५२१/२॥ उत्तरापोशान—[हे प्रभो! अत्यन्त तृप्तिकारक सुगन्धित जलका इच्छानुसार आप पान करें। महान्

[उपासनाखण्ड अ० ३१] [उपासनाखण्ड अ० ४७]

उ०ख०-अ०४९ ] * श्रीगणेशपुराणके कतिपय लीला-प्रसंग-एक * १६५ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 महर्षि गौतमद्वारा इन्द्र और अहल्याको शाप देवादिद्वारा शिवजीसे त्रिपुरासुर-वधकी प्रार्थना [उपासनाखण्ड अ० ३१] [उपासनाखण्ड अ० ४७] श्रीगणेश-पूजन श्रीगणेश-कृपासे चन्द्रको पुनः अपने स्वरूपकी प्राप्ति [उपासनाखण्ड अ० ४९] [उपासनाखण्ड अ० ६१]

[उपासनाखण्ड अ० ८४]

१६६ * श्रीगणेशपुराणके कतिपय लीला-प्रसंग—दो * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 तपस्यारत श्रीशिवपर कामदेवका आक्रमण [उपासनाखण्ड अ० ८४] भगवान् शिवद्वारा कुमार कार्तिकेयको उपदेश [उपासनाखण्ड अ० ८६] मत्स्य-उदरसे प्रद्युम्नका निकलना [उपासनाखण्ड अ० ८९] प्रद्युम्नद्वारा शम्बरासुरका वध [उपासनाखण्ड अ० ८९]

उ०ख०-अ०४९ ] * श्रीगणेशजीकी पार्थिव-पूजाकी विधि * १६७ आत्मावाले तथा नित्यतृप्त आपके तृप्त हो जानेपर जगत् अथवा पाँच पत्तियोंसे युक्त इक्कीस दूर्वांकुर मेरे द्वारा तृप्त हो जाता है। उत्तरापोशनके लिये मैं आपको प्रदान किये गये। [इन्हें आप स्वीकार करें]॥ ६३१/२॥ सुगन्धित जल प्रदान करता हूँ, पुनः मुख और हाथकी प्रदक्षिणा—हे देव! गणपतिदेवकी इक्कीस प्रदक्षिणा विशुद्धिके लिये आपको जल देता हूँ॥ ५३–५४१/२॥ करनी चाहिये—इस विधिवाक्यके अनुसार [मैंने इक्कीसकी फल—हे देवेश! मीठे अनार, नींबू, जामुन, आम, संख्यामें आपकी प्रदक्षिणा की है।] हे देवेश! [प्रदक्षिणा कटहल, अंगूर, केला आदि पके फल, बेर, खजूर, करते हुए] प्रत्येक पदपर मेरे पाप नष्ट हों॥ ६४१/२॥ नारियल, नारंगी, अंजीर, जम्बीर नींबू, पकी ककड़ी आरती—हे परमेश्वर! ताँबे, चाँदी, काँसे अथवा आदि इन फलोंको आप ग्रहण करें॥ ५५–५६१/२॥ स्वर्णनिर्मित पात्रमें बनाये गये आँखोंको तृप्त करनेवाली मुख-हाथ-प्रक्षालन—[हे देव!] मुख-हाथकी पाँच वर्तिकाओंसे समन्वित दीपकोंकी इन पाँच आरतियोंको विशेष शुद्धिके लिये मैं पुनः आपको जल प्रदान ग्रहण करें॥ ६५-६६॥ करता हूँ॥ ५७॥ दीपदान—[हे प्रभो!] अन्धकारका निवारण करोद्वर्तन—[हे प्रभो!] अनेक प्रकारके सुगन्धित करनेवाले तथा कर्पूरके द्वारा परिकल्पित इस सुन्दर द्रव्योंसे निर्मित, पवित्र गन्धवाले अबीर नामक उत्तम शुभ दीपकको आप ग्रहण करें। जैसे इसमें भस्म नहीं चूर्ण तथा सुन्दर चन्दनको हाथोंमें उबटन (लेपन)-हेतु दिखायी देता अर्थात् पूर्णरूपसे दग्ध हो जाता है, वैसे ग्रहण करें॥ ५८१/२॥ ही आप मेरे पापोंका [समग्र रूपसे] नाश करें॥ ६७॥ सीमन्तभूषण (सिन्दूर)—शालूर [नामक सुगन्धित पुष्पांजलि—[भाँति-भाँतिके उत्तम] पुष्प तथा द्रव्य]-से उद्भूत एवं बाँसके सार भागसे उत्पन्न पल्लव, जिन्हें मैंने वैदिक मन्त्रों एवं सूक्तोंसे अभिमन्त्रित तथा लाक्षा (महावर)-से रंजित सीमन्त (माँग)-के किया है, उन्हें पुष्पांजलिके रूपमें आप ग्रहण लिये आभूषणरूप यह चूर्ण (सिन्दूर) आपके लिये कीजिये॥ ६८॥ प्रस्तुत है॥ ५९१/२॥ स्तुतिपाठ—तदनन्तर मनको स्थिरकर बैठ करके ताम्बूल—[हे देव!] कर्पूर और सुपारीके चूर्णसे अनेक प्रकारके स्तोत्रों, सूक्तों और सहस्रनामस्तोत्रसे उन युक्त, खानेयोग्य खैरेसे संयुक्त और इलायची-लौंग- [गणेशजी]-का स्तवन करे॥ ६९॥ मिश्रित तथा केसरयुक्त ताम्बूल [आपको समर्पित है, इसे हे दीनानाथ! हे दयानिधान! हे देवगणोंद्वारा सम्यक् कृपापूर्वक ग्रहण करें]॥ ६०१/२॥ रूपसे सेवित! हे द्विज* (द्विजन्मा)! हे ब्रह्मा, ईशान, दक्षिणा—हे देव! पूजनमें कुछ न्यून या अतिरिक्त महेन्द्र, शेष, गिरिराजनन्दिनी, गन्धर्वों और सिद्धोंद्वारा स्तुत! हो जानेपर भी सम्पूर्ण फलकी प्राप्तिके लिये मैं आपके हे सम्पूर्ण अरिष्टोंका निवारण करनेमें अद्वितीय रूपसे सम्मुख स्वर्णदक्षिणा रखता हूँ॥ ६११/२॥ निपुण! हे त्रिलोकीनाथ! हे प्रभो! मेरे अपराधोंको क्षमा माला—हे परमेश्वर! श्वेत, पीत और रक्त- करके मेरी भक्तिको पूर्ण रूपसे सफल कीजिये॥ ७०॥ वर्णके कमलों तथा शुभ पुष्पोंसे गूँथी गयी सुन्दर हे देवि! इस प्रकार गणेशजीकी मूर्तिका सम्यक् मालाको ग्रहण करें॥ ६२१/२॥ रूपसे अर्चन करके दण्डवत् प्रणाम करे, तदनन्तर उनके दूर्वा—[हे प्रभो!] हरित या श्वेत वर्णवाले, तीन सर्वसिद्धिप्रदायक मन्त्रका जप करे॥ ७१॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'गणेशपार्थिवपूजानिरूपण' नामक उनचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४९॥

  • गणेशजीका एक बार प्रादुर्भाव पार्वतीजीके मैलसे हुआ था, पुनः शिवजीके त्रिशूलसे उनका शिरश्छेद हो जानेपर हाथीका सिर लगाकर उन्हें जीवित किया गया, अतः उन्हें द्विज (द्विजन्मा) कहा गया।

पचासवाँ अध्याय

१६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पचासवाँ अध्याय श्रीगणेशजीके मन्त्रोंके अनुष्ठान एवं गणेशचतुर्थीव्रतकी विधि पार्वतीजी बोलीं- हे गिरिराज! मैं [गणेशजीका] मन्त्र नहीं जानती हूँ, अतः आप ही उसे स्वयं बतायें, जिससे मैं गणेशजीका अनुग्रह और कल्याणकारी शिवको प्राप्त कर सकूँ ॥ १ ॥ हिमवान् बोले- हे देवि! गणेशजीके अनेक प्रकारके मन्त्र हैं, जो अनेक प्रकारकी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाले हैं। गणेशजीके असंख्य मन्त्रोंमें-से कुछको मैं तुमसे कहता हूँ ॥ २ ॥ [पूजाके अनन्तर] सम्यक् रूपसे पद्मासनपर स्थित होकर और इन्द्रियोंका सब प्रकारसे नियमन (नियन्त्रण) करके [विभिन्न] न्यासोंको करनेके बाद अपनी इच्छाके अनुसार (यथेच्छ संख्यामें) जप करे ॥ ३ ॥ एकाक्षर मन्त्रका एक लाख पचास हजार, षडक्षर मन्त्रका एक लाख दस हजार और वैसे ही अर्थात् उतनी ही संख्यामें पंचाक्षर, दशाक्षर और अष्टाक्षर मन्त्रका तथा अट्ठाइस अक्षरोंवाले मन्त्रका अयुत संख्यामें (दस हजार) जप करे ॥ ४-५ ॥ हे पार्वती! इस प्रकार अपनी इष्टसिद्धिके लिये [साधक] अनेक प्रकारके मन्त्रोंका जप करते हैं। अब तुम मेरे वचनको एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ६ ॥ अब तुम एकाक्षर या षडक्षर उत्तम मन्त्रको ग्रहण करो। हे सुव्रते! श्रावण शुक्लपक्षकी चतुर्थीसे उसका जप आरम्भ करो। मात्र एक माहका अनुष्ठान करो, तुम्हारा कार्य सिद्ध होगा। तुम शिवको प्राप्त करोगी तथा अन्य भी तुम्हें जो कुछ वांछित होगा, वह भी प्राप्त करोगी, यह स्पष्ट है ॥ ७-८ ॥ मिट्टीकी बनी हुई गणेशजीकी एक मूर्तिका पूजन करनेसे भी वह स्त्री या पुरुषको उसके द्वारा अभिलषित धन, पुत्र, [गो आदि] पशु भी प्रदान करती है ॥ ९ ॥ दो मूर्तियोंका पूजन करनेसे मनुष्य असाध्यको भी साधित कर लेता है और तीन मूर्तियोंके पूजनसे राज्य, रत्न और सम्पूर्ण सम्पत्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥ १० ॥ जो चार मूर्तियोंका पूजन करता है; वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-पुरुषार्थचतुष्टयको प्राप्त करनेवाला होता है और पाँच मूर्तियोंके पूजनसे सार्वभौम राजा अर्थात् समस्त भूमण्डलका सम्राट् होता है ॥ ११ ॥ छः मूर्तियोंके पूजनसे सृजन, पालन एवं संहार करनेमें समर्थ हो जाता है। सात-आठ-नौ मूर्तियोंके पूजनसे सर्वविद् (सब कुछ जाननेवाला) हो जाता है ॥ १२ ॥ भगवान् गणेशकी कृपासे वह भूत, वर्तमान और भविष्यको जाननेवाला हो जाता है। तैंतीस करोड़ देवता, अग्नि, इन्द्र, शिव, विष्णु, सनकादि मुनि- गण-ये सभी दस गणेश-मूर्तियोंकी पूजा करनेसे उसकी सेवा करने लगते हैं। एकादश मूर्तियोंके अर्चनसे वह एकादश रुद्रोंका अधिपतित्व प्राप्त कर लेता है ॥ १३-१४ ॥ द्वादश मूर्तियोंके अर्चनसे [मनुष्य] द्वादश आदित्योंपर स्वामित्व प्राप्त कर लेता है। अत्यन्त संकटके समय मूर्तियोंका वृद्धिक्रमके अनुसार पूजन करे ॥ १५ ॥ एक सौ आठ मूर्तियोंके पूजनसे जो कुछ भी प्राप्तव्य होता है, वह सब कुछ प्राप्त हो जाता है तथा प्रतिदिन एक लाख मूर्तियोंका पूजन करनेसे [साधक] महामुक्तिको प्राप्त करता है ॥ १६ ॥ [ब्रह्माजी व्यासजीसे कहते हैं-] हे मुने! कारागृहसे मुक्तिकी इच्छावालेको पाँच मूर्तियोंका निर्माणकर [उनका पूजन करना चाहिये।] गणेशजीकी कृपासे वह इक्कीस दिनमें ही मुक्त हो जायगा ॥ १७ ॥ गणेशभक्तिपरायण मनुष्य प्रतिदिन सात मूर्तियोंका निर्माणकर पाँच वर्षोतक पूजन करनेसे महापापसे भी मुक्त हो जाता है। जन्मसे लेकर मृत्युक अर्थात् आजीवन जो मनुष्य गणेशजीकी एक पार्थिव मूर्तिका पूजन करता है, उसे साक्षात् गणेश ही जानना चाहिये, उसके दर्शनसे विघ्नोंका नाश होता है ॥ १८-१९ ॥ अतः सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिके लिये उस

उ०ख०-अ०५१ ] * गणेशचतुर्थीव्रतानुष्ठानविधिके वर्णनके प्रसंगमें राजा कर्दमके पूर्वजन्मकी कथा * १६९ 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 (गणेशभक्त)-को गणपतिस्वरूप मानकर उसीका पूजन | पूजन करे, तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको सन्तुष्टकर हवनके शेष करना चाहिये। उसके पूजनसे गणेशजीको जितनी | कार्य सम्पन्न करे ॥ २७ ॥ प्रसन्नता होती है, उतना स्वयंके पूजनसे नहीं ॥ २० ॥ | हवनकी आहुति-संख्याका दशांश तर्पण करे और सम्पूर्ण रोगोंसे होनेवाली पीड़ाओंसे मुक्तिके लिये | तर्पणके दशांशके रूपमें वेदके विद्वान् ब्राह्मणोंको सपत्नीक गणेशजीकी तीन उत्तम मूर्तियोंकी जो नौ दिनोंतक पूजा | तथा कुछ अन्यको भी भोजन कराये ॥ २८ ॥ करता है, उसकी सभी पीड़ाएँ दूर हो जाती हैं ॥ २१ ॥ | उन्हें आभूषण, वस्त्र तथा शक्तिके अनुसार दक्षिणा सोना, चाँदी, ताँबा, पीतल, काँसा, मोती या मूँगेसे | प्रदान करे तथा उनकी पत्नियों एवं अन्य स्त्रियोंको भी निर्मित मूर्ति भी यह सब प्रदान करती है ॥ २२ ॥ | वस्त्रसहित अलंकार प्रदान करे ॥ २९ ॥ हे देवि ! इस प्रकार व्रत करनेपर तुम सम्पूर्ण | सिद्धि-बुद्धिसहित गणेशजीकी प्रसन्नताके लिये कामनाओंको प्राप्त करोगी। जब भाद्रपदमासमें चतुर्थी | वित्तशाठ्य (धनसम्बन्धी कृपणता) न करते हुए अपने तिथि प्राप्त हो, तो उस तिथिको अपने वैभवके अनुसार | वैभवके अनुसार आचरण (गणेश-पूजन) करे ॥ ३० ॥ आदरपूर्वक महान् उत्सवका आयोजन करना चाहिये। | तत्पश्चात् अपने सुहृज्जनोंके साथ स्वयं भी वादन-गायनसहित गणेशजीकी कथाका श्रवण करते | आदरपूर्वक भोजन करे। दूसरे दिन मूर्तिको प्रसन्नतापूर्वक हुए रात्रि-जागरण करना चाहिये ॥ २३-२४ ॥ | पालकीमें स्थापित करे। उसे छत्र, ध्वज, पताकाओं और [अगले दिन] प्रभातकालमें निर्मल जलमें स्नानकर | चँवरोंसे सुशोभित करे। उसके आगे-आगे किशोर पूर्वकी भाँति वरदायक देव भगवान् गणेशका पूजन करे, | दण्ड-युद्ध करते चलें ॥ ३१-३२ ॥ तदनन्तर हवन-कार्य आरम्भ करे ॥ २५ ॥ | वाद्यवादकोंके द्वारा किये जाते हुए वेणु, वीणा, जपकी सांगताके लिये कुण्ड या स्थण्डिलमें | मृदंग, भेरी, पटह आदिके घोष, गायकोंके गायन और जपका दशांश हवन करे, तत्पश्चात् पहले [देव- | नृत्यांगनाओंके नृत्यके साथ उसे किसी विशाल सरोवरमें प्रीत्यर्थ] बलिदान करके फिर पूर्णाहुति करे ॥ २६ ॥ | ले जाकर जलमें विसर्जित करे, तत्पश्चात् वादन और तदनन्तर गौ, भूमि, वस्त्र, धन आदिसे आचार्यका | गायनके साथ अपने घरको वापस लौट आये ॥ ३३-३४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'हिमवान्-पार्वतीसंवादमें चतुर्थीव्रतविधिवर्णन' नामक पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५० ॥ ❖ ── ✦ ── ❖ इक्यावनवाँ अध्याय गणेशचतुर्थीव्रतानुष्ठानविधिके वर्णनके प्रसंगमें राजा कर्दमके पूर्वजन्मकी कथा पार्वतीजी बोलीं—हे पिताजी! आपने गणेश- | थी ? ॥ २ ॥ चतुर्थीकी महिमा [एवं उसके अनुष्ठानादिका] भलीभाँति | मेरे संशयका उच्छेदन करनेके लिये इसे मुझसे वर्णन किया, मैं अब आपके अमृततुल्य वचनों [-के | विस्तारपूर्वक कहिये। गजानन गणेशजीकी मंगलमयी श्रवण]-से प्रसन्न हो गयी हूँ; परंतु हे हिमालय! मुझे | कथाके विषयमें जो प्रश्न करता है, जो कथाको कहता कुछ संशय है, आप उसका निवारण करें ॥ १ ॥ | है और जो अन्य कोई भी श्रवण करता है—वे तीनों हे महीधर ! पूर्वकालमें इस व्रतको किस-किसने | मनुष्य पुण्यके भागी होते हैं। उनका जीवन, जन्म लेना, किया था और इस [व्रत-विधि]-को किसने किससे | ज्ञान और कर्म सफल हो जाते हैं ॥ ३-४ ॥ कहा था तथा किसने कौन-सी सिद्धि प्राप्त की | ब्रह्माजी कहते हैं—[हे व्यासजी !] इस प्रकार