श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 164, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१६२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- फिर भी शिवको देखनेके लिये समुत्सुक वे लम्बी-लम्बी साँसें लेती और छोड़ती रहती थीं। उन्होंने पिताके चरणोंमें विनीत होकर कहा-[हे पिता!] आप मुझे शिवकी प्राप्तिके लिये सम्यक् उपाय बतायें। व्रत, दान अथवा बहुत कठिनाईसे किया जानेवाला तप ही क्यों न हो, मैं उसे करूँगी। हे तात! मैं [इसके लिये] पहलेकी भाँति उत्तम तप करूँगी ॥ ३०-३१ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं-हे मुने! तब पिता हिमवान्ने मन-ही-मन बार-बार विचार करके उनसे कार्यकी शीघ्र सिद्धि करनेवाला उपाय कहा; उसे तुम [भी] श्रवण करो ॥ ३२ ॥ हिमवान् बोले-हे पार्वती! सुनो, मैं तुम्हें शिवप्राप्तिका समुचित उपाय बताता हूँ। विघ्नेश्वर गणेशजीकी उपासना धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष देनेवाली है ॥ ३३ ॥ इस उपासनाका अनुष्ठान महेन्द्र आदि देवताओं तथा नारद आदिके द्वारा भी किया गया और उनके द्वारा इन्द्रपद आदि तत्-तत् सिद्धियाँ प्राप्त की गयी हैं ॥ ३४ ॥ उन महात्मा गणेशजीने ही ब्रह्माजीको [जगत्की] सृष्टि करनेकी सामर्थ्य प्रदान की थी, उन सर्वेश्वरने ही विष्णुको [जगत्की] रक्षा करनेकी सामर्थ्य प्रदान की ॥ ३५ ॥ उन्हीं सर्वविघ्नहर्ताने शिवजीको भी संहार करनेकी दृढ़ सामर्थ्य प्रदान की, उन्हीं सर्वेश्वरने शेषनागको भी पृथ्वीको धारण करनेकी सामर्थ्य प्रदान की है ॥ ३६ १/२ ॥ जिसके स्वरूपको ब्रह्मा आदि [देवता] तथा [नारदादि] मुनि भी नहीं जानते हैं, जो वाणी और मनसे भी अगोचर हैं अर्थात् इन्द्रियोंके विषय नहीं हैं, वे ही ईश्वर गजानन-स्वरूपसे दृष्टिगोचर होते हैं। अतः सभी कार्योंके आरम्भमें उनके उसी रूपकी पूजा होती है। तुम उन्हीं सर्वेश्वर गणेशजीकी मेरे द्वारा बतायी गयी विधिसे पूजा करो ॥ ३७-३९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'पार्वतीके प्राकट्यका वर्णन' नामक अड़तालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४८ ॥ उनचासवाँ अध्याय श्रीगणेशजीकी पार्थिव-पूजाकी विधि पार्वतीजी बोलीं-हे दयानिधि! हे गिरिराज! हे पिता! सर्वेश्वर जगद्गुरु गणेशजीकी उपासनाके विषयमें शीघ्र कहिये ॥ १ ॥ जिसके द्वारा मैं सम्यक् रूपसे शिवकी समीपता प्राप्त करके शाश्वत कल्याणको प्राप्त करूँगी। इससे मर्त्यलोकमें भी लोगोंका महान् उपकार होगा ॥ २ ॥ हिमवान् बोले-हे देवि! तुम्हारे प्रति स्नेह होनेसे और लोकोंके उपकारकी इच्छासे मैं यह परम मंगलमय रहस्य कह रहा हूँ, इसे एकाग्र चित्तसे सुनो ॥ ३ ॥ [उपासक] प्रातःकाल उठकर नैर्ऋत्य (दक्षिण- पश्चिम) दिशामें जाय। शौच करनेसे पहले तृण, काष्ठ और पत्तोंसे भूमिको ढक दे। बुद्धिमान् व्यक्तिको चाहिये कि उपजाऊ भूमिको छोड़कर मल-मूत्र-त्यागके लिये बैठे, किंतु उछल-उछलकर शौच न करे। मल-मूत्रका त्याग करनेके बाद यथोक्त [शास्त्र-निर्दिष्ट]-विधिसे शुद्धि करे ॥ ४-५ ॥ दाँत और जिह्वाकी शुद्धि करके स्नान करनेके लिये नदी, तालाब, वापी, सरोवर अथवा कुएँपर जाय ॥ ६ ॥ पहले मल-प्रक्षालनरूप स्नान करके तब मन्त्र-स्नान करे। तदनन्तर मिट्टी, चन्दन अथवा कुंकुमका तिलक भी लगाये। दो धुले हुए वस्त्र (उत्तरीय और धोती) धारण करके पवित्र आसनपर बैठ जाय और एकाग्रचित्त होकर सन्ध्यादि नित्यकर्म सम्पन्न कर ले ॥ ७-८ ॥ तत्पश्चात् सुन्दर-चिकनी, छोटे कंकड़-पत्थरसे रहित; जो बाँबीकी न हो-ऐसी अत्यन्त शुद्ध मिट्टीको जल छिड़ककर मर्दित करे। उससे पवित्र और अत्यन्त