श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 165, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०४९ ] * श्रीगणेशजीकी पार्थिव-पूजाकी विधि * १६३ सुन्दर गणेशमूर्तिका स्वयं निर्माण करे, जो सम्पूर्ण अंगोंसे परिपूर्ण, चार भुजाओंसे शोभायमान हो ॥ ९-१०॥ वह मूर्ति परशु आदि अपने आयुधोंको धारण की हुई, सुन्दर और दृढ़ हो। तत्पश्चात् उसे पीठपर स्थापितकर बुद्धिमान् उपासक अपने दोनों हाथोंका प्रक्षालन करके सम्पूर्ण पूजा-द्रव्यों जल, अष्टगन्ध, अक्षत, लाल फूल, गुग्गुल आदिको यथास्थान रखे ॥ ११-१२ ॥ तीन, पाँच या सात पत्तियोंसे युक्त सुन्दर एवं पवित्र, हरी तथा सफेद दूबके एक सौ आठ अंकुर वहाँ लाकर रखे। घीका दीपक, तेलका दीपक, अनेक प्रकारके सुन्दर नैवेद्य, मोदक, अपूप (मालपुआ), लड्डू, शर्करायुक्त खीर, तण्डुलचूर्णसे बना खाद्य तथा अनेक प्रकारके व्यंजनोंको लाकर रखे। कपूर, सुपारी-चूर्ण, खैर, इलायची, लौंगसे युक्त तथा केसरयुक्त चर्वणयोग्य ताम्बूल लाकर रखे ॥ १३-१५१/२ ॥ हे ईश्वरि ! जामुन, आम, कटहल, अंगूर, केला तथा नारियल आदि ऋतुके अनुसार उत्पन्न होनेवाले फल भी वहाँ लाकर रखे। आरतीसे सम्बन्धित अनेक प्रकारकी सामग्री और स्वर्ण-दक्षिणा भी रखे। इस प्रकार एकत्र की गयी सम्पूर्ण सामग्रीको ले करके एकान्त स्थलमें जाकर वहाँ क्रमशः कुशा, मृगछाला और वस्त्र बिछाकर तथा उस आसनपर आसीन होकर भूतशुद्धि करके प्राण-प्रतिष्ठा करे। तत्पश्चात् दिग्बन्धन करके पहले गणेशादि देवताओंको नमस्कार करे। तदनन्तर आगमविधानसे अन्तर्मातृकान्यास और बहिर्मातृकान्यास करे तथा गुरुद्वारा बतायी गयी विधिसे सन्निधान आदि मुद्राएँ प्रदर्शित करे ॥ १६-२० ॥ उसके बाद मन्त्रन्यास और षडंगन्यास करके पूजा- सामग्रीका संशोधनकर गजानन गणेशजीका ध्यान करे ॥ २१ ॥ ध्यान-जो एक दाँतवाले हैं, जिनके कान सूपके समान [विशाल] हैं, जिनका मुख हाथीका है, जिनका स्वरूप चार भुजाओंवाला है, जो अपने हाथोंमें पाश- अंकुश-मोदक [और वरद मुद्रा] धारण किये हैं, जो लाल फूलोंकी श्रेष्ठ और सुन्दर माला कण्ठ तथा हाथ (या कि सूँड) -में धारण किये हैं, जो भक्तोंको वर प्रदान करनेवाले और सिद्धि-बुद्धिसे सदा सेवित हैं, जो मनुष्योंको कार्यसिद्धि एवं मेधा प्रदान करनेवाले तथा धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-पुरुषार्थचतुष्टय देनेवाले हैं, जो ब्रह्मा-शिव-विष्णु-इन्द्रादि देवताओं और श्रेष्ठ ऋषियोंद्वारा सम्यक् रूपसे स्तुत हैं, [उन भगवान् गजानन गणेशजीका मैं ध्यान करता हूँ] ॥ २२-२४॥ आवाहन-हे जगत्के आधार! हे श्रेष्ठ देवताओं एवं असुरोंसे अर्चित ! हे अनाथोंके नाथ ! हे सर्वज्ञ ! हे देवताओंद्वारा परिपूजित ! आप पधारिये ॥ २५ ॥ आसन-हे देव! अनेक रत्नोंसे युक्त दिव्य स्वर्ण-सिंहासन मेरे द्वारा आपको समर्पित है, आप उसपर विराजमान हों ॥ २६ ॥ पाद्य-हे देवदेवेश्वर ! हे सर्वेश्वर ! हे गणोंके अधिपति! गन्ध-पुष्प और अक्षतसहित सम्पूर्ण तीर्थोंका जल मैं ले आया हूँ, आप चरणोंका प्रक्षालन करनेहेतु इसे ग्रहण करें ॥ २७ ॥ अर्घ्य-हे अमोघशक्तिसम्पन्न गणेशजी ! मूँगा, मोती, पूगीफल, ताम्बूल, स्वर्ण, अष्टगन्ध, पुष्प तथा अक्षतसे युक्त मेरे द्वारा अर्पित किये गये अर्घ्यको स्वीकारकर सफल करें ॥ २८ ॥ आचमनीय-हे प्रभो ! गंगा आदि सभी तीर्थोंसे प्रार्थना करके मैं यह उत्तम जल लाया हूँ, यह कपूर, इलायची, लौंग आदिसे समन्वित है, इसे आचमनके लिये स्वीकार करें ॥ २९ ॥ तैलोद्वर्तन [तेल-उबटन ] - [ हे देव !] चम्पा, अशोक, मौलसिरी, मालती, मोगरा आदि [के पुष्पों]- से सुवासित, स्निग्धताके हेतुभूत इस सुन्दर तैलको आप ग्रहण करें ॥ ३० ॥ दुग्ध-स्नान-जो कामधेनुसे उत्पन्न है और सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये जीवनस्वरूप उत्तम पदार्थ है, जो पवित्र और यज्ञका हेतुभूत है, उस दुग्धको मैं आपके स्नानहेतु अर्पित करता हूँ॥ ३१॥ दधि-स्नान-जो गायके दुग्धसे उत्पन्न है, सभी