भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 166, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 166

१६४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 लोगोंको प्रिय है; मेरे द्वारा लाये गये, उस श्रेष्ठ दधिको आप स्नानके लिये ग्रहण करें॥ ३२॥ घृत-स्नान—जो नवनीतसे सम्यक् रूपसे उत्पन्न है, सम्पूर्ण प्राणियोंको सन्तुष्टि देनेमें कारणस्वरूप है, यज्ञका अंग और देवताओंका आहार है; उस घृतको मैं आपके स्नानके लिये समर्पित करता हूँ॥ ३३॥ मधु-स्नान—जो पुष्पोंके सार (पराग)-से उत्पन्न है, सब प्रकारसे तेजकी वृद्धि करनेवाला है, सम्पूर्ण शरीरको पुष्टि प्रदान करनेवाला है; हे देव! वह मधु आपके स्नानके लिये समर्पित है॥ ३४॥ शर्करा-स्नान—ईखके सारतत्त्व (रस)-से उत्पन्न अत्यन्त मनोहर शर्करा, जो शरीरके मलको दूर करनेवाली है—वह मेरे द्वारा अर्पित है, आप उसे स्नानहेतु ग्रहण करें॥ ३५॥ गुड़-स्नान—जो सम्पूर्ण माधुर्यका हेतु, स्वादिष्ट, सबको प्रिय लगनेवाला और पुष्टिकारक है; वह इक्षुके सार (रस)-से निर्मित गुड़ मैं आपके स्नानके लिये लाया हूँ॥ ३६॥ मधुपर्क—[हे देव!] कांस्यपात्रमें रखे और कांस्यपात्रसे ढके हुए दधि, मधु और घृतसे पूरित मधुपर्क मेरे द्वारा लाया गया है। इसे आप अपनी पूजाके लिये ग्रहण करें॥ ३७॥ शुद्धोदक-स्नान—हे विभो! सम्पूर्ण तीर्थोंसे प्रार्थनापूर्वक यह जल मेरे द्वारा लाया तथा सुवासित किया गया है। हे सुरेश्वर! सम्यक् रूपसे स्नानहेतु इसे ग्रहण करें॥ ३८॥ वस्त्र—लोक-लज्जाका निवारण करनेवाले दो बहुमूल्य और अत्यन्त महीन लाल रंगके वस्त्र मेरे द्वारा अर्पित हैं, हे देव! इन्हें ग्रहण कीजिये॥ ३९॥ यज्ञोपवीत—हे देव! मैंने भक्तिपूर्वक रजत तथा सुवर्णसे ब्रह्मसूत्रका निर्माण कराके उसे रत्नोंसे अलंकृत किया है, हे परमेश्वर! आप इसे ग्रहण करें॥ ४०॥ आभूषण—[हे देव!] स्वर्णनिर्मित बहुत-से आभूषण, जो अनेक रत्नोंसे जटित हैं; आपकी आज्ञासे आपके भिन्न-भिन्न अंगोंमें धारण कराता हूँ॥ ४१॥ रक्तचन्दनानुलेपन—हे देव! अष्टगन्धसे युक्त उत्तम लाल चन्दनका आपके द्वादश अंगोंमें लेपन करता हूँ, आप मुझपर कृपा करें॥ ४२॥ अक्षत—हे जगदीश्वर! आपके [मस्तकपर लगे] तिलकके ऊपर शोभाके लिये मैं रक्त चन्दन-मिश्रित तण्डुलोंको अंकित करता हूँ, आप इसे ग्रहण (स्वीकार) करें॥ ४३॥ पुष्प—पाटल, कर्णिकार, गुलदुपहरिया, लाल कमल, मोगरा और मालतीके पुष्प [आपको समर्पित हैं], हे परमेश्वर! इन्हें ग्रहण करें॥ ४४॥ पुष्पमाला—अनेक प्रकारके कमल-पुष्पों और पल्लवोंसे गूँथकर बनायी गयी बिल्वपत्रोंसे युक्त अत्यन्त मनोहर इस मालाको आप ग्रहण करें॥ ४५॥ धूप—[हे देव!] दशांग गुग्गुल धूप, जो सम्पूर्ण सुगन्धियोंका कारक और सभी पापोंका नाश करनेवाला है; मेरे द्वारा समर्पित है, आप उसे ग्रहण करें॥ ४६॥ दीप—हे सर्वज्ञ! हे सर्वलोकेश्वर! अन्धकारका नाश करनेवाले इस उत्तम मंगलदीपको आप ग्रहण करें। हे देवाधिदेव! आपको नमस्कार है॥ ४७॥ नैवेद्य—[हे देव!] अनेक प्रकारके पक्वान्नोंसे संयुक्त, उत्तम शालि चावलसे निर्मित ओदन, अनेक प्रकारके व्यंजन, शर्करायुक्त पायस (खीर), दधि-दुग्ध- घृतसे युक्त [पेय], लौंग-इलायचीसे समन्वित तथा मरिचचूर्णसहित पकायी गयी बड़ी, राई-धनिया-मेथीसे युक्त तक्र, हींग-जीरा-कुम्हड़ा-मरिच-उड़दकी पिसी हुई दालसे बने और सुन्दर तले एवं पके हुए बड़े, मोदक-पुआ-लड्डू-पूड़ी-मलाई आदि [पदार्थ], हल्दी- हींग-लवण और सैन्धव लवण (सेंधा नमक)-से युक्त उत्तम दाल तथा पापड़से संयुक्त और अमृतीकरण मुद्राके माध्यमसे अमृतरूप हो चुका यह नैवेद्य भोजनके रूपमें उपस्थित है, इसे सादर ग्रहण करें॥ ४८–५२१/२॥ उत्तरापोशान—[हे प्रभो! अत्यन्त तृप्तिकारक सुगन्धित जलका इच्छानुसार आप पान करें। महान्

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क) · पृष्ठ 166, कुल 656 में से · BharatKosha