भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 163, कुल 656 में से

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उ०ख०-अ०४८ ] * त्रिपुर-विजयके उपलक्ष्यमें देवताओंद्वारा त्रिपुरारि-महोत्सवका आयोजन * १६१ जन्मसे (जीवनभरमें) किया गया पाप और प्रदोषकालमें शिवार्चनसे सप्तजन्मार्जित पाप नष्ट हो जाता है॥ ८॥ [हे व्यासजी!] अब मेरे द्वारा कहे जानेवाले पार्वतीके प्राकट्यके विषयमें श्रवण करो। शिवपत्नी पार्वती उसकी (त्रिपुरासुरकी) मृत्यु [कालान्तरमें] शिवके द्वारा जानकर [उस समय] भयसे अन्तर्हित हो गयीं॥ ९॥ पुनः वे जगदम्बिका जब हिमालयपर्वतकी गुफाके द्वारसे बाहर निकलीं (प्रकट हुईं) तो उन्होंने सिंहों, व्याघ्रों और मृगोंसे परिपूर्ण उस भयंकर पर्वतको देखा। शिवको [वहाँ] न देखकर विरहाकुल मनः-स्थितिवाली वे शिवा अत्यन्त भयभीत होकर 'हा तात! हा शिव!' कहती हुई विलाप करने लगीं - ॥ १०-११ ॥ [वे कहने लगीं-] हे सदाशिव ! आप तो सर्वज्ञ हैं, फिर भी इस भयंकर जंगलमें कुररीकी भाँति क्रन्दन करती हुई मुझ एकाकिनीको आप क्यों नहीं जान पा रहे हैं? मुझे आपके दर्शन कब होंगे? क्या आप मुझे भूल गये हैं? हे हर (दुःखोंका हरण करनेवाले)! मैं आपका विरह सहने या [आपके विरहमें] जीवन धारण करनेमें सक्षम नहीं हूँ॥ १२-१३॥ [हे तात (पिताजी)!] आप भी कहाँ हैं? क्या आप मेरे शोकपूर्ण उद्गार नहीं श्रवण कर रहे हैं? आपके बिना मैं किसकी शरणमें जाऊँ अथवा मैं क्या करूँ? आप मुझे पुनः मंगलमय शिवसे संयुक्त कर दीजिये। इस समय आप मुझे पुनः [अपने घरमें] जननीके गर्भसे उत्पन्न हुआ जानिये ॥ १४-१५॥ उन सदाशिवरूपी वरका शीघ्र ही मेरे लिये अन्वेषण कीजिये। नहीं तो मैं इस शिखरसे [कूदकर] अपने शरीरका परित्याग कर दूँगी ॥ १६ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं-[हे व्यास !] इस प्रकार रुदन करती हुई उन पार्वतीकी उस उत्तम वाणीको सुनकर किसी मछुवारेने हिमवान्के पास आकर इस प्रकार निवेदन किया-॥ १७॥ मछुवारा बोला- [हे पर्वतराज!] मैंने किसी सुन्दर श्रोणिप्रदेशवाली तरुणीको देखा है, जो सम्पूर्ण आभूषणोंसे विभूषित है। उसने दोनों कानोंमें कुण्डल धारण कर रखे हैं, जो सूर्यमण्डलके समान प्रकाशित हो रहे हैं। अनेक रत्नोंसे जटिल अत्यन्त दीप्तिमान् मुकुट उसके मस्तकको अलंकृत कर रहा है, उसके ललाटपट्टमें सोलह मोतियोंसे जटिल चतुष्कोण शोभित है। उसकी सीमन्तसरणिमें मूल्यवान् मोतियोंसे निर्मित माँगचोटी लटक रही है, जिसमें बहुमूल्य रत्नयुक्त स्वर्णपुष्प संलग्न है। उसकी सुन्दर नासिकामें मोती जड़ी हुई सोनेकी कील है। उसकी भुजाओंमें सुन्दर बाजूबन्द और हाथोंमें सुन्दर कंगन हैं। उसकी प्रत्येक अँगुलीमें बहुमूल्य रत्नजटित स्वर्णमुद्रिकाएँ शोभा दे रही हैं। उसकी सुन्दर कंचुकीके ऊपर मोतियोंसे निर्मित माला आश्रय ले रही है। रत्नमयी सुन्दर स्वर्ण करधनी उसके रेशमी वस्त्रसे आवृत्त कटिप्रदेशपर विभूषित है। उसके गुल्फोंमें सोनेके पायल हैं, जिनमें सुन्दर घुँघरू झंकृत हो रहे हैं। उसके पैरोंकी पृथक्-पृथक् अंगुलियोंमें तदनुरूप उत्तम आभूषण विद्यमान हैं। इस प्रकारकी वह सर्वांगसुन्दरी [तरुणी] अत्यन्त व्याकुल होकर रो रही है, मेरे पूछनेपर भी वह कुछ नहीं बोली; वह केवल आपका ही नाम ले रही है॥ १८-२४॥ ब्रह्माजी बोले- [उस मछुवारेका] ऐसा वचन सुनकर बुद्धिमान् हिमवान् शीघ्र ही [अपनी] उस पुत्रीके पास गये और तर्कपूर्ण वचनोंसे उसे सान्त्वना देते हुए [अमृतमयी] वाणीमें बोले - ॥ २५ ॥ हिमवान् बोले- हे सुन्दर भौंहोंवाली! तुम क्यों शोक करती हो? हे [जगतके] सृजन, पालन और संहारकी हेतुभूता! हे सम्पूर्ण शुभ लक्षणोंसे परिपूर्ण! हे सम्पूर्ण शक्तियोंसे युक्त! हे अघटनघटनापटीयसी! हे निष्पाप महेश्वरि! हे पूर्णकामे! हे सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित ! हे मंगलमयी ! तुम सम्पूर्ण प्राणियोंके अन्तःकरणमें स्थित रहनेवाली और उन्हें प्रेरणा देनेवाली तथा उनके मनकी बात जाननेवाली हो। [यद्यपि] तुम [वास्तविक रूपमें] शिवसे वियुक्त नहीं हो, फिर भी मैं उन मंगलकारी शिवसे तुम्हें संयुक्त करूँगा ॥ २६-२८॥ 'उठो' ऐसा कहकर हिमवान् पार्वतीको साथ लेकर अपने भवनको चले आये। वहाँ माता मेनाको उनके पुत्रके सहित देखकर पार्वती बहुत आनन्दित हुईं ॥ २९ ॥