श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 162, कुल 656 में से
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१६० * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
[बायाँ स्तम्भ] पुरोंसहित उस दैत्यको भी भस्म कर दिया॥ ४५॥ सम्पूर्ण सैनिकों, दैत्यों, दानवों तथा राक्षसोंके देखते-देखते दैत्यके शरीरमें स्थित तेज भगवान् शिवके शरीरमें लीन हो गया। तदनन्तर अन्तरिक्षमें आकाशवाणी हुई कि 'शिवके द्वारा मारा गया यह दैत्य मुक्त हो गया है।' तब देवताओं और मुनियोंने भी त्रिलोचन महादेवजीका स्तवन किया॥ ४६-४७॥ गन्धर्व-समूह और चारण [प्रशस्तियोंका] तथा वेदनिष्ठ जन [सामवेदीय मन्त्रोंका] गायन करने लगे। अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और किन्नर बाजे बजाने लगे। नारद आदि देवर्षि पुष्पोंकी वर्षा करने लगे। तत्पश्चात् चिन्तामुक्त हुए देवता शिवजीकी आज्ञासे अपने-अपने स्थानको चले गये॥ ४८-४९॥ उद्वेगरहित हुए मुनिगण भी त्रिपुरासुरका वध करनेवाले महेश्वरको नमस्कारकर अपने-अपने अनुष्ठानोंमें संलग्न हो गये॥ ५०॥ उस दैत्यके मारे जानेपर वेद-वेदांगके अध्ययन-
[दायाँ स्तम्भ] अध्यापनमें निरत रहनेवाले [मुनिगण] भूतलपर अग्निहोत्र, यज्ञ, दान और व्रतोंमें तत्पर हो गये और सभी लोग पुनः उत्साहसे परिपूर्ण हो गये। फिर [देवताओं आदिसे] अभिवन्दित भगवान् त्रिलोचनने उस [अलौकिक] महारथको भग्न कर दिया॥ ५१-५२॥ तदुपरान्त भगवान् शिव विजयसूचक जयघोष, तूर्यघोष तथा देवताओंके दुन्दुभिनातसे समादृत होकर प्रसन्नतापूर्वक शिलादपुत्र नन्दी, गणपति, कार्तिकेय और सभी पार्षदोंके साथ [मणि-रत्नादिसे] अलंकृत पर्वतराज कैलासकी ओर चल पड़े। उसी समयसे अर्थात् त्रिपुरदाहके उपरान्त उनका 'त्रिपुरारि' यह नाम लोकमें प्रसिद्ध हुआ॥ ५३-५४॥ इस प्रकार यह महागणपति-मन्त्रकी सामर्थ्य कही गयी है। [महागणपतिके] सहस्रनामके भी प्रभावका यह निरूपण किया गया है। मेरे अतिरिक्त अन्य किसीको भी यह ज्ञात नहीं है, इसे मैंने किसीको बताया भी नहीं है। इसके पढ़ने और सुननेसे सम्पूर्ण अभिलाषाओंका पूर्तिरूप फल प्राप्त होता है॥ ५५-५६॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'शिवकी विजय' नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४७॥
अड़तालीसवाँ अध्याय त्रिपुर-विजयके उपलक्ष्यमें देवताओंद्वारा त्रिपुरारि-महोत्सव (देव-दीपावली)-का आयोजन, हिमवान्का पार्वतीको गणेशजीकी महिमा बताना
[बायाँ स्तम्भ] व्यासजी बोले—हे पितामह! मैंने त्रिपुरासुरके वधसे सम्बन्धित महान् आख्यानका श्रवण किया, फिर भी मैं अब यह सुनना चाहता हूँ कि उस समय जगज्जननी पार्वतीजी कहाँ स्थित थीं? वे कैसे प्रकट हुईं? किस तिथिको दैत्यराज त्रिपुरासुर दग्ध हुआ था— यह सब आप विस्तारपूर्वक कहिये॥ १-२॥ ब्रह्माजी बोले—वह महान् असुर (त्रिपुरासुर) कार्तिकमासकी पूर्णिमाको सायंकाल दग्ध हुआ था। उस तिथिको दिनमें जो महाभयंकर युद्ध हुआ था, उसका मैंने पहले ही वर्णन कर दिया॥ ३॥ क्योंकि उस तिथिको देवशत्रु त्रिपुरासुरका वध करनेवाले विजयी भगवान् शिवका सम्पूर्ण देवताओंद्वारा
[दायाँ स्तम्भ] अर्चन किया गया था, इसलिये उस तिथिको पृथ्वीपर मनुष्य दीपदान करते हैं॥ ४॥ उस तिथिको जो स्नान, दान, जप, होम आदि किये जाते हैं, उनका बहुत अधिक पुण्यफल होता है, इसलिये उसे बाहुली [पूर्णिमा] कहते हैं॥ ५॥ उस तिथिको जो 'त्रिपुरारि-महोत्सव' का आयोजन नहीं करते हैं, वे कभी भी विजयी नहीं होते और उनके पुण्य भस्म हो जाते हैं॥ ६॥ अतः उस पूर्णिमाको जो लोग प्रातःकाल शिवार्चन करते हैं, उन्होंने रात्रिमें जो पाप किये होते हैं, वे विलीन हो जाते हैं॥ ७॥ हे मुने! उस तिथिको मध्याह्नमें शिवार्चन करनेसे