श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 161, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ०४७ ] * त्रिपुरादाह एवं त्रिपुरासुरका वध * १५९
परिपूरित कर दिया ॥ २८ ॥ निरन्तर बाण-समूहोंकी वर्षासे पुनः अन्धकार हो गया। उन बाणोंसे वे देवता भी अंग-भंग होकर भूतलपर गिर पड़े ॥ २९ ॥ उन प्रचण्ड प्रहारोंसे पीड़ित होकर बलासुरका वध करनेवाले इन्द्र भी भूमिपर गिर पड़े। तब सभी श्रेष्ठ देवताओंके मूर्च्छित हो जानेपर महेश्वर शिव उस आत्मप्रशंसा, गर्जन और युद्ध कर रहे त्रिपुरासुरको सहन न कर सके, फिर भी उन्होंने मन-ही-मन उस दैत्यके पुरुषार्थकी प्रशंसा की ॥ ३०-३१ ॥ इसी बीच वहाँ नारदजी युद्ध देखनेकी इच्छासे आये और भगवान् शम्भुके द्वारा पूजित होनेपर बोले— हे नीललोहित! सुनो ॥ ३२ ॥ नारदजी बोले—हे महेश्वर! त्रिपुरासुरके वधके विषयमें आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये; मैं उसके वधका उपाय कहता हूँ, उसे कीजिये ॥ ३३ ॥ उसने (त्रिपुरासुरने) पूर्वकालमें ऐसा तप किया था, जो ब्रह्माजीके लिये भी दुष्कर है; उसने गणेशजीकी आराधना की थी और उन्होंने उसे सभी वांछित वर दिये थे। जो-जो वर उसने माँगे, भगवान् गणेशने उसे बिना विचार किये ही दे दिये। उन्होंने उसे एक बाणपर स्थित और इच्छानुसार गति करनेवाले तीन महान् पुर प्रदान किये, जो बिना वायुके गति करनेवाले और सम्पूर्ण देवताओंसे अभेद्य थे ॥ ३४-३५ १/२ ॥ उन्होंने उससे यह गुप्त बात भी कही थी कि जो एक ही बाणसे तुम्हारे तीनों पुरोंका भेदन कर देगा, उसके द्वारा ही तुम्हें मृत्यु प्राप्त होगी। प्रलयकालमें सबका संहार करनेवाले शिवजीने मुनिश्रेष्ठ नारदजीके इस प्रकार कहकर चले जानेपर मूर्च्छित देवताओंको सचेत किया और नारदजीके द्वारा स्मरण कराये गये गजानन गणेशजीके कथनका स्मरण किया ॥ ३६-३८ ॥ वे प्रभु [यद्यपि] अपने संकल्पमात्रसे सबका नाश करनेमें समर्थ हैं, [तथापि] उन्होंने उस दैत्यराज त्रिपुरासुरके वधके लिये स्वेच्छानुरूप महान् प्रयत्न आरम्भ किया ॥ ३९ ॥ उन शिवजीने पृथ्वीको अपना रथ बनाया, चन्द्रमा और सूर्य उसके पहिये थे। उन्होंने पद्मयोनि ब्रह्माजीको अपना सारथि, गिरिराज हिमालयको धनुष, अपनी महिमासे च्युत (स्खलित) न होनेवाले भगवान् विष्णुको बाण बनाया और दोनों अश्विनीकुमारोंको [उस रथकी] दोनों धुरियोंके रूपमें संयोजित किया ॥ ४० ॥ तदनन्तर उन्होंने आचमन करके मन-ही-मन गणेशजीका चिन्तनकर उनके द्वारा उपदिष्ट सहस्र नामोंका जप किया और एकाक्षर मन्त्रसे प्रचण्ड पिनाक धनुषको अभिमन्त्रित किया ॥ ४१ ॥ जब शिवजीने विष्णुरूप महाबाणको अभिमन्त्रित किया तो उस समय शेषनाग, पृथ्वी, वन और पर्वत भी काँपने लगे। पक्षिसमूह [दिग्भ्रमित-से] भ्रमण करने और चीत्कार करते हुए महान् कोलाहल करने लगे। आजगव धनुषके शब्द (टंकार)-से देवता और मनुष्य भी व्याकुल हो गये ॥ ४२-४३ ॥ उन शिवजीने जब उस बाणको छोड़ा तो नभतल दग्ध हो उठा और तत्क्षण पातालसहित भूमण्डल ज्वाला-समूहोंसे व्याप्त हो गया ॥ ४४ ॥ उस बाणको देखकर पुरमें आश्रय लिया हुआ दैत्यराज वहाँसे सेनासहित भागा, परंतु वेगपूर्वक आये उस बाणने [स्वर्ण, रजत तथा लौहनिर्मित] उन तीनों