श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 160, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१५८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐
जा पहुँचे ॥ ६-७ ॥ उधर गुप्तचरोंने उस दैत्य त्रिपुरासुरसे सारा वृत्तान्त निवेदित किया कि देवताओंकी सेनाके साथ गिरिजापति महादेवजी युद्धके लिये आ गये हैं ॥ ८ ॥ तब उसकी भी सेना शस्त्रास्त्रों और कवचोंसे सुसज्जित हो गयी और उस दैत्यने भी युद्धके लिये आभूषणरूप [शस्त्रास्त्र एवं कवच आदि]-से विभूषित हो भयंकर गर्जन किया ॥ ९ ॥ उसने वस्त्र, माला आभूषण और धनसे वीरोंको आनन्दित किया। उसके योद्धागण अनेक प्रकारके वाहनोंमें सवार हो गये और वह महादैत्य त्रिपुरासुर दिशाओं और विदिशाओंको अपने नादसे पूरित करता हुआ स्वयं [सुवर्ण, रजत और लौहनिर्मित] त्रिपुरमें आरूढ़ हुआ। तदनन्तर दोनों सेनाओंके मध्य महान् युद्ध प्रारम्भ हो गया ॥ १०-११ ॥ अनेक प्रकारके शस्त्रों तथा मर्मवेधी लौहबाणोंके प्रहारसे [सैनिकोंके शरीरसे निकलनेवाले रुधिरसे] मार्गका अवरोधन करनेवाली रक्तकी नदी प्रवाहित होने लगी ॥ १२ ॥ [उस समय] शस्त्रोंसे घायल हुए योद्धा खिले हुए पलाश-पुष्पके वृक्षोंकी भाँति शोभित हो रहे थे। कुछ सैनिक शत्रुसैनिकोंको दृढ़ वैर होनेके कारण जीवित पकड़कर मार दे रहे थे ॥ १३ ॥ कुछ सैनिक शत्रुसैनिकोंके सिरके बाल बलपूर्वक पकड़कर उनके सिर काट दे रहे थे। दौड़ते हुए रथों, पैदल वीरों, घोड़ों और हाथियोंके पैरोंसे उठी हुई धूल क्षणभरमें पृथ्वीसे लेकर अन्तरिक्षतक व्याप्त हो गयी। उस समय घोर-से भी घोर अन्धकार हो जानेसे कुछ भी समझमें नहीं आ रहा था ॥ १४-१५ ॥ योद्धागण उस समय भी अनेक प्रकारसे भयंकर युद्ध कर रहे थे, उन्होंने जीवनकी आशा छोड़ दी थी और मरनेका निश्चय कर लिया था ॥ १६ ॥ वायुके द्वारा धूल उड़ा दिये जानेपर [युद्धभूमिमें] बहुत-से देवता मरे पड़े दिखायी दिये। [यह देखकर] देवताओंकी सेना पलायन कर गयी, जिससे दैत्यसेना अत्यन्त हर्षित हुई ॥ १७ ॥
उस समय हाथमें वज्र धारण किये, युद्धकी इच्छावाले देवराज इन्द्र वहाँ आये। [उनके हाथमें] तीक्ष्ण धारवाले वज्रको देखकर दैत्य और दानव भागने लगे। उन वज्रधारी इन्द्रने अपने वज्रके प्रहारसे असुरोंको चूर-चूर कर डाला। उस प्रचण्ड वज्रके प्रहारसे उन्होंने अपने प्राण छोड़ दिये ॥ १८-१९ ॥ उनमेंसे कुछके पैर टूट गये, कुछकी गर्दन टूट गयी, कुछके पेट फट गये और कुछ अन्य [असुरों]-की भुजाएँ कन्धोंसे कटकर अलग हो गयीं ॥ २० ॥ कुछ (दैत्य, दानवों और असुरों)-की जाँघें कट गयीं, कुछ अन्यका ऊरुभाग टूट गया। कुछ अन्य [दैत्यों]-के गुल्फ (टखने) कट गये और वे गिर पड़े तथा कुछ अन्य इस व्याजसे अर्थात् ऐसी दुर्दशाके कारण भयवश गिर पड़े ॥ २१ ॥ योद्धाओं, घोड़ों और हाथियोंके अंगोंके कटनेसे तथा मरे हुए सैनिकोंके शरीरसे बहनेवाले रक्तके कारण बहुत-सी नदियाँ उत्पन्न हो गयीं। वे विजयकी इच्छा रखनेवाले वीरोंका उत्साहवर्धन करनेवाली थीं ॥ २२१/२ ॥ तब इन्द्रद्वारा बहुत-सी सेना मारी गयी देखकर गर्जन करता हुआ त्रिपुरासुर धीरे-धीरे इन्द्रके पास युद्ध करनेके लिये आया ॥ २३१/२ ॥ उसने इन्द्रको देखकर कहा- क्यों मरनेकी इच्छा करते हो? हे वासव ! जीवित रहते हुए युद्धसे दूर हट जाओ, मैं पीठपर वार नहीं करता। हे शचीपते ! तुममें मुझसे युद्ध करनेकी क्या सामर्थ्य है ? मुझे बताओ कि क्या बकरा भी सिंहके साथ युद्ध कर सकेगा ! शक्ति हो तो [मुझसे] युद्ध करो, अन्यथा सुखपूर्वक [यहाँसे] चले जाओ ॥ २४-२६ ॥ इस प्रकार कहनेपर भी जब इन्द्र वहाँ स्थित रहे तो दैत्य [राज] त्रिपुरासुरने धनुषको सुसज्जितकर (प्रत्यंचा चढ़ाकर) बहुत-से बाणोंकी वर्षा की और देवताओंकी सेनापर प्रहार किया ॥ २७ ॥ मन्त्रसे अभिमन्त्रित उसके एक बाणसे असंख्य बाण निकलते थे। इस प्रकार उसने देवताओं और गन्धर्वोंका मर्दनकर पृथ्वी और अन्तरिक्षको बाणोंसे