भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

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पृष्ठ 159

उ०ख०-अ०४७ ] * त्रिपुरदाह एवं त्रिपुरासुरका वध * १५७ है, उसके हाथमें आ जाती हैं॥ २०८-२१० ॥ | गणेशको नमस्कार है, नमस्कार है। अनुपम मंगलस्वरूप १. गणंजय, २. गणपति, ३. हेरम्ब, ४. धरणीधर, | गणपतिको बारम्बार नमस्कार है। एकमात्र जिनसे ५. महागणपति, ६. लक्षप्रद, ७. क्षिप्रप्रसादन, ८. | विपुलपद-परमधामकी सिद्धि होती है, उन गणाधीशको अमोघसिद्धि, ९. अमित, १०. मन्त्र, ११. चिन्तामणि, | बारम्बार नमस्कार है। हे प्रभो! गजशावकके समान १२. निधि, १३. सुमंगल, १४. बीज, १५. आशापूरक, | मुखवाले आपको बारम्बार नमस्कार है॥ २१५ ॥ १६. वरद, १७. शिव, १८. काश्यप, १९. नन्दन, | हे गणपति! हे अज! हे ईश! हे हेरम्ब! हे २०. वाचासिद्ध तथा २१. ढुंढिविनायक-ये इक्कीस | द्वैमातुर! हे गजानन! हे भालेन्दु! हे धूम्रकेतु! हे नाम-मोदक हैं। जो पुरुष इन मोदकस्वरूप इक्कीस | लम्बोदर! हे विनायक! हे ब्रह्मन्! हे एकदन्त! हे नामोंद्वारा (मुझे भक्तिपूर्वक उपहार अर्पित करता है; | विघ्नेश्वर! हे विष्णो! हे कपिल! हे निर्गुण! हे काल! मेरा प्रसाद चाहता है और अभीष्ट-सिद्धिके लिये | हे आद्य! हे सिद्धिदाता! हे अनन्त! इस संसारसागरसे एक वर्षतक मुझ विघ्नराजके इस यथार्थ स्तोत्रका | मेरा परित्राण कीजिये॥ २१६-२१७॥ पाठ करता है;) मुझमें मन लगाकर, मेरी आराधनामें | जिनके सुन्दर चरणोंमें बँधी हुई किंकिणियाँ ध्वनित तत्पर रहकर मेरा स्तवन करता है, उसके द्वारा | हो रही हैं, जिन्होंने अपने अमेया लीलाचरित्रोंको स्वयं सहस्रनामस्तोत्रसे मेरी स्तुति हो जाती है, इसमें संशय | प्रकट किया है, जिनका सुन्दर कपोल मदजलकी नहीं है॥ २११-२१४॥ | लहरोंसे युक्त है, वे गणोंके अधिपति गणेशजी मनुष्योंके ब्रह्माजी बोले- श्रेष्ठ देवताओंद्वारा पूजित चरणवाले | पापोंका शमन करें॥ २१८॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें 'ईश्वर-गणेश-संवादान्तर्गत गणेशसहस्रनाम- स्तोत्रकथन' नामक छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४६॥

सैंतालीसवाँ अध्याय त्रिपुरदाह एवं त्रिपुरासुरका वध व्यासजी बोले- हे ब्रह्मन्! गजानन गणेशजीके | किन्नरों आदि सभीने भगवान् शिवको नमस्कारकर प्रसन्न होने तथा उनसे सहस्र नामोंको प्राप्त कर लेनेके | उनकी स्तुति की- ॥ ४॥ अनन्तर शिवजीने क्या किया; यह सब मुझसे कहिये॥ १॥ | देवता बोले- हे महादेव! हे जगन्नाथ! हे ब्रह्माजी बोले-[हे व्यास!] गणेशजीके द्वारा | जगत्को आनन्द देनेवाले! [उस] महादैत्य (त्रिपुरासुर)- वरदान तथा सहस्रनामका उपदेश प्राप्तकर भगवान् | को आपके द्वारा मारा गया हम कब देखेंगे? उस शंकर अत्यन्त प्रसन्न होकर नाचने लगे और उन्होंने | विश्वविघातीने हम सबको स्थानभ्रष्ट (अपने अधिकारोंसे महान् ध्वनिके साथ गर्जना की॥ २॥ | वंचित) कर रखा है॥ ५ १/२ ॥ उन्होंने अपने गणोंको बुलाया और देवताओंको | ब्रह्माजी बोले- [हे व्यास!] देवताओंके ऐसे आदेश दिया कि 'युद्धका अवसर आ गया है।' तब वे | वचन सुनकर पिनाक धनुषको धारण करनेवाले भगवान् देवता भी महान् हर्षके साथ शिवके निकट गये॥ ३॥ | महादेवने मन-ही-मन गणेशजीका ध्यानकर और युद्ध [उस समय] ब्रह्मा, कुबेर, इन्द्र, अग्नि, वायु, | करनेका निश्चय करके प्रसन्नतापूर्वक [वहाँसे] प्रस्थान चन्द्रमा, वरुण, अर्यमा* और गन्धर्वों, यक्षों, ग्रहों, | किया और देवताओं एवं गन्धर्वोंसहित अपने निवासस्थलपर

  • द्वादश आदित्योंमें-से एक।