श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 158, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१५६ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण-
[बायाँ स्तम्भ] (गलसुआ), अरुचि, वात-पित्त-कफजनित द्वन्द्व, त्रिदोषजनित ज्वर, आगन्तुक ज्वर, विषमज्वर, शीतज्वर, उष्णज्वर, एकाहिक आदि ज्वर, यहाँ कथित या अकथित दोषादि-सम्भव रोग—इन सबका इस स्तोत्रके एक बार पाठसे शीघ्र शमन हो जाता है। यह सहस्रनाम एक बारके पाठसे ही सिद्ध हो जाता है। स्त्री, शूद्र और पतितोंको भी शुभकी प्राप्तिके लिये इस सहस्रनाम-स्तोत्रका जप (पाठ) करना चाहिये॥ १८५-१८९१/२॥ महागणपतिके इस स्तोत्रका सकामभावसे जप करनेवाला पुरुष इहलोकमें पृथ्वीपर सुलभ समस्त मनोवांछित भोगोंको भोगकर मनोरथ-फलोंकी प्राप्तिपूर्वक दिव्य एवं मनोरम व्योम-विमानोंपर बैठकर चन्द्र, इन्द्र, सूर्य, विष्णु, ब्रह्मा और शिव आदिके लोकोंमें इच्छानुसार रूप धारण करके विचरता है; जहाँ-जहाँ इच्छा होती है, वहाँ-वहाँ पहुँचता है; अपने बन्धुजनोंके साथ अभीष्ट भोगोंको भोगता है; महागणपतिका प्रिय अनुचर होता है और नन्दीश्वर आदिके साथ आनन्दित हो सकल शिवगणोंद्वारा अभिनन्दित होता है। पार्वती और शिव—ये दोनों पुत्रकी भाँति उसका लाड-प्यार करते हैं। वह शिवभक्त तथा पूर्णकाम होता है। फिर गणेशजीके वरदानसे इहलोकमें धर्मपरायण सार्वभौम सम्राट् होता है और उसे पूर्वजन्मकी बातें स्मरण रहती हैं॥ १९०-१९५॥ जो भक्तिभावसे गणेशजीके भजनमें तत्पर हो निष्काम भावसे इस स्तोत्रका नित्य पाठ करता है, वह योगजनित परम सिद्धिको पा लेता है और ज्ञान- वैराग्यनिष्ठ हो जहाँ निरन्तर आनन्दका उदय होता है, जो परमानन्द संवित्स्वरूप, लोकातीत, पुनरावृत्तिरहित तथा परम पाररूप है, उस गणपतिधाममें नित्यलीन एवं परमानन्दनिमग्न हो रमता रहता है॥ १९६-१९७१/२॥ जो मनुष्य इन सहस्रनामोंद्वारा हवन, अर्चन और पूजन करता है, राजालोग उसके वशमें होते हैं और शत्रु दासवत् हो जाते हैं। उसके सारे मन्त्र सिद्ध होते हैं और उसे सम्पूर्ण सिद्धियाँ सुलभ होती हैं॥ १९८-१९९॥ [गणेशजी कहते हैं— ] मूलमन्त्रकी अपेक्षा भी यह स्तोत्र मुझे अधिक प्रिय है। भाद्रपदमासके शुक्लपक्षकी
[दायाँ स्तम्भ] चतुर्थी-तिथिको मेरे जन्म-दिवसपर इन सहस्रनामोंद्वारा दूर्वार्पण करते हुए विधिवत् मेरा पूजन एवं तर्पण करे। विशेषतः अष्टगन्ध-द्रव्योंद्वारा भक्तिपूर्वक हवन करे। जो ऐसा करता है, उसके सम्पूर्ण अभीष्ट मनोरथ सिद्ध होते हैं; इसमें संशय नहीं है। इसके जप, पठन-पाठन, सुनना-सुनाना, व्याख्यान, चर्चा, ध्यान, विचार और अभिनन्दन—ये इहलोक और परलोकमें सबके लिये सम्पूर्ण ऐश्वर्यको देनेवाले हैं॥ २००-२०३॥ जो इस स्तोत्रको धारण करता है, वह स्वच्छन्दतापूर्वक कहीं भी क्यों न विचरता रहे, भगवान् शिवके करोड़ों गण उसकी रक्षा करते रहते हैं॥ २०४॥ जिस घरमें इस स्तोत्रको पुस्तकरूपमें लिखकर कोई इसका पूजन करता है, वहाँ सर्वोत्कृष्ट लक्ष्मी निरन्तर निवास करती हैं॥ २०५॥ श्रीगणेशसहस्रनामका स्मरण (जप) करके मनुष्य जिस फलको तत्काल प्राप्त कर लेता है, उसे सब प्रकारके दान, व्रत, तीर्थसेवन और यज्ञोंके अनुष्ठानद्वारा भी नहीं पा सकता। जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल सूर्योदयके समय, मध्याह्नकालमें या सायंकालमें अथवा तीनों समय या सदा ही इन सहस्र नामोंका पाठ करता है, वह सत्पुरुषोंमें ऐश्वर्यशाली होता है, अपनी कीर्तिका अतिशय विस्तार करता है, विघ्नोंको नष्ट कर देता है, संसारको वशमें कर लेता है तथा वह पुत्र-पौत्रोंके साथ सुदीर्घकालतक निरन्तर वृद्धिशील होता है॥ २०६-२०७॥ जिसके पास कुछ नहीं है, जो दरिद्र है, वह मेरी प्राप्तिके उद्देश्यसे नियमित (शास्त्रसम्मत) आहार करके मुझ गणेशके पूजनमें तत्पर रहकर चार मासतक इस स्तोत्रका जप करे। ऐसा करनेसे वह सात जन्मोंसे चली आनेवाली दरिद्रताका भी उन्मूलन करके महती लक्ष्मीको प्राप्त कर लेता है, यह मुझ परमेश्वरकी आज्ञा है। आयु, आरोग्य, निर्मल कुल, पीड़ितोंको दी जा सकनेवाली सम्पत्ति, नित्य उज्ज्वल कीर्ति, नयी- नयी सूक्ति, रोगहीनताके साथ भव्य कान्ति, सत्पुत्र, मनोऽनुकूल गुणवती स्त्री और सत्यसंकल्पता—ये सारी वस्तुएँ, जो गणपतिके इस स्तोत्रका नित्य पाठ करता