श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 157, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ेंउ०ख०-अ० ४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १५५ भी विध्वस्त कर देनेवाले; ९८६. दशसाहस्रफण- भृत्फणिराजकृतासनः — दस हजार फण धारण करनेवाले नागराजके ऊपर आसीन ॥ १६७ ॥ ९८७. अष्टाशीतिसहस्राद्यमहर्षिस्तोत्रयन्त्रितः — अट्ठासी हजारकी संख्यावाले आदि महर्षियोंके द्वारा किये गये स्तोत्रके द्वारा वशीभूत; ९८८. लक्षाधीश- प्रियाधारः — लखपतियोंके प्रिय आधार; ९८९. लक्षा- धारमनोमयः — लक्ष (लक्ष्य)-पर एकाग्र किये गये चित्तवाले; अथवा एकाग्रचित्त सत्पुरुषस्वरूप ॥ १६८ ॥ ९९०. चतुर्लक्षजपप्रीतः — चार लाख मन्त्रके जपसे प्रसन्न होनेवाले; ९९१. चतुर्लक्षप्रकाशितः — अठारह पुराणोंके चार लाख श्लोकोंद्वारा प्रकाशित रूपवाले; ९९२. चतुरशीतिलक्षाणां जीवानां देहसंस्थितः — चौरासी लाख जीवोंके शरीरमें विराजमान ॥ १६९ ॥ ९९३. कोटिसूर्यप्रतीकाशः — करोड़ों सूर्योंके समान तेजस्वी; ९९४. कोटिचन्द्रांशुनिर्मलः — करोड़ों चन्द्रमाओंकी किरणोंके समान निर्मल; ९९५. शिवा- भवाध्युष्टकोटिविनायकधुरन्धरः — पार्वती और शिवके अधीनस्थ करोड़ों विनायकोंके संचालनका भार ढोनेवाले ॥ १७० ॥ ९९६. सप्तकोटिमहामन्त्रमन्त्रितावयवद्युतिः — सात करोड़ महामन्त्रोंसे मन्त्रित अवयवोंकी कान्तिसे प्रकाशमान; ९९७. त्रयस्त्रिंशत्कोटिसुरश्रेणीप्रणत- पादुकः — जिनकी चरणपादुकाओंमें तैंतीस करोड़ देवताओंकी पंक्ति प्रणाम करती है, वे ॥ १७१ ॥ ९९८. अनन्तनामा — अनन्त नामवाले; ९९९. अनन्तश्रीः — अनन्त विद्या, सम्पत्ति और कीर्तिवाले; १०००. अनन्तानन्तसौख्यदः — अनन्तानन्त सौख्य प्रदान करनेवाले। इस प्रकार गणेशजीके ये सहस्र नाम बताये गये ॥ १७२॥ जो मनुष्य प्रतिदिन ब्राह्ममुहूर्तमें इन नामोंका पाठ करता है, उसके हाथमें लौकिक और पारलौकिक सारे सुख आ जाते हैं। इसके एक बार जप करनेसे आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, धैर्य, शौर्य, बल, यश, धारणावती बुद्धि, प्रज्ञा, धृति, कान्ति, सौभाग्य, अतिशय रूप-सौन्दर्य, सत्य, दया, क्षमा, शान्ति, दाक्षिण्य, धर्मशीलता, जगद्वशीकरण, सबकी अनुकूलता, शास्त्रार्थमें पटुता, सभापाण्डित्य, उदारता, गम्भीरता, ब्रह्मतेज, उन्नति, उत्तम कुल, शील, प्रताप, वीर्य, आर्यत्व, ज्ञान, विज्ञान, आस्तिक्य, स्थिरता, विश्वमें उत्कर्ष और धन-धान्यकी वृद्धि — ये सभी उत्तम फल प्राप्त होते हैं ॥ १७३-१७७ ॥ इस मन्त्रके जपसे मनुष्योंके लिये चार प्रकारका वशीकरण सिद्ध होता है — राजाका, राजाके अन्तःपुरका, राजकुमारका तथा राज्यमन्त्रीका। जिसको वशमें करनेके लिये इस सहस्रनामका जप किया जाता है, वह उस प्रयोग करनेवालेका दास हो जाता है। इस सहस्रनामके द्वारा बिना किसी प्रयासके धर्म, अर्थ, काम और मोक्षकी सिद्धि होती है ॥ १७८-१७९ ॥ यह स्तोत्र शाकिनी, डाकिनी, राक्षस, यक्ष और सर्पके भयका नाश करनेवाला है। यह साम्राज्यका सुख देनेवाला तथा समस्त शत्रुओंका मर्दन करनेवाला है ॥ १८० ॥ इस सहस्रनामसे सब प्रकारके कलह-क्लेशका नाश होता है, इससे जले हुए बीजमें भी अंकुर निकल आते हैं। यह बुरे स्वप्नोंके कुफलको मिटाता है और रोषमें भरे हुए स्वामीके चित्तको प्रसन्न करनेवाला है ॥ १८१ ॥ यह सहस्रनाम मोहन-आकर्षण आदि छः कर्म, आठ महासिद्धि तथा त्रिकालज्ञानका साधन करनेवाला है। शत्रुओंद्वारा अपने ऊपर प्रेरित कृत्याको शान्त करनेवाला तथा शत्रु-मण्डलका मर्दन करनेवाला है। संग्रामकी रंगभूमिमें यह अकेला ही सबको विजय दिलानेवाला, वन्ध्यापन- सम्बन्धी सम्पूर्ण दोषोंका नाशक और गर्भकी रक्षाका मुख्य साधन है ॥ १८२-१८३ ॥ जहाँ प्रतिदिन गणपतिके इस स्तोत्रका पाठ किया जाता है, उस देशमें दुर्भिक्ष, ईतिभय और दुराचार नहीं होते ॥ १८४ ॥ जहाँ इस स्तोत्रका पाठ होता है, उस घरको लक्ष्मी कभी नहीं छोड़ती हैं। क्षय, कोढ़, प्रमेह, बवासीर, भगंदर, विषूचिका (हैजा), गुल्म, प्लीहा, पथरी, अतिसार, उदर-वृद्धि, खाँसी, दमा, ऊपरकी डकार उठना, शूल, शोथ आदि, शिरोरोग, वमन, हिचकी, गण्डमाला