श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)
Ganesha Purana Gita Press Special Edition
महर्षि व्यास द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 156, कुल 656 में से
संदर्भ में पढ़ें१५४ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 अहंकार, ग्यारह इन्द्रियाँ, पाँच विषय और पाँच भूत— | निर्णायक; ९६८. चतुःषष्टिकलानिधिः—चौंसठ कलाओंके इस प्रकार चौबीस तत्त्व हैं; चौबीस तत्त्वस्वरूप; ९५३. | आधार; ९६९. चतुःषष्टिमहासिद्धियोगिनीवृन्दवन्दितः— पञ्चविंशाख्यपूरुषः—चौबीस तत्त्वोंसे परे विद्यमान, | अक्षोभ्य आदि चौंसठ महासिद्धों और उतनी ही योगिनियोंके पचीसवें तत्त्वस्वरूप पुरुष; ९५४. सप्तविंशतितारेशः— | समुदायसे वन्दित ॥ १६३ ॥ अश्विनी आदि सत्ताईस नक्षत्रोंके स्वामी; ९५५. | ९७०. अष्टषष्टिमहातीर्थक्षेत्रभैरवभावनः— सप्तविंशतियोगकृत्—सत्ताईस योगोंके कर्ता ॥ १५९ ॥ | काशीखण्ड और पद्मपुराणमें शिव-सम्बन्धी अड़सठ ९५६. द्वात्रिंशद्भैरवाधीशः—बत्तीस भैरवोंके स्वामी | महातीर्थ बताये गये हैं। उन सभी तीर्थक्षेत्रोंमें भैरव (असितांग आदि चार भैरव हैं, जो आठ-आठके | शिवकी भावना करनेवाले; ९७१. चतुर्नवतिमन्त्रात्मा— समुदाय हैं। इस तरह कुल बत्तीस भैरव हैं); ९५७. | अड़तीस कलामन्त्र और पचास मातृका कलाएँ—ये चतुस्त्रिंशन्महाह्रदः—पुष्कर आदि जो देवताओंद्वारा | अठासी मन्त्र हुए। इनके अतिरिक्त हंस, शुचि, प्रतद्विष्णु, खोदे गये विशाल सरोवर हैं, वे पवित्र 'महाह्रद' | विष्णु, योनि और त्र्यम्बक—ये छः विष्णुकी मूलविद्याएँ कहलाते हैं। उनकी संख्या चौंतीस बतलायी गयी है। ये | हैं। इन सबका योग चौरानबे हुआ। इस प्रकार चौरानबे चौंतीस महाह्रद जिनके स्वरूप हैं, वे; ९५८. | मन्त्रस्वरूप; ९७२. षण्णवत्यधिकप्रभुः—तन्त्रराजमें षट्त्रिंशत्तत्त्वसम्भूतिः—शैव-तन्त्रोक्त जो शिव आदि | श्रीचक्रके छियानबे देवता बताये गये हैं। विद्या और पृथ्वीपर्यन्त छत्तीस तत्त्व हैं, उनकी उत्पत्तिके कारण; | गणेशके योगसे अधिक देवता हो जाते हैं। इस प्रकार ९५९. अष्टात्रिंशत्कलातनुः—अग्निकी दस, सूर्यकी | छियानबेसे अधिक देवताओंके अधिपति ॥ १६४ ॥ बारह और चन्द्रमाकी सोलह कलाएँ—कुल अड़तीस | ९७३. शतानन्दः—मानुषादि शतगुणोत्तर आनन्द- कलाएँ होती हैं। ये सब जिनके शरीर हैं, वे गणपति ॥ १६० ॥ | स्वरूप; ९७४. शतधृतिः—अनन्त ब्रह्माण्डोंको धारण ९६०. नमदेकोनपञ्चाशन्मरुद्गणनिरर्गलः— | करनेवाले; ९७५. शतपत्रायतेक्षणः—प्रफुल्ल कमलके उनचास मरुद्गणोंसे नमस्कृत एवं अप्रतिहत गतिवाले; | समान विशाल नेत्रवाले; ९७६. शतानीकः—बहुसंख्यक ९६१. पञ्चाशदक्षरश्रेणी—पचास अक्षरोंके मालारूप; | सैन्यशक्तिसे सम्पन्न; ९७७. शतमखः—सौ यज्ञोंका ९६२. पञ्चाशद्रुद्रविग्रहः—श्रीकण्ठ आदि पचास शिव- | अनुष्ठान करनेवाले इन्द्रस्वरूप; ९७८. शतधारावरायुधः— स्वरूप ॥ १६१ ॥ | सौ धारों अथवा अरोंसे युक्त 'वज्र' नामक श्रेष्ठ आयुध ९६३. पञ्चाशद्विष्णुशक्तीशः—केशव आदि | धारण करनेवाले ॥ १६५ ॥ विष्णुरूप और कीर्ति आदि उनकी शक्तियाँ—ये सब पचासकी | ९७९. सहस्रपत्रनिलयः—ब्रह्मरन्ध्रगत सहस्र- संख्यामें हैं; इन सबके स्वामी; ९६४. पञ्चाशत्- | दलकमलमें विराजमान; ९८०. सहस्रफणभूषणः— मातृकालयः—पचास मातृका-वर्णोंके आलय अथवा | सहस्रफणधारी सर्पोंसे विभूषित; ९८१. सहस्रशीर्षा लयस्थान नादस्वरूप; ९६५. द्विपञ्चाशद्वपुःश्रेणी— | पुरुषः—असंख्य मस्तकवाले परमात्मा; ९८२. लिंगपुराणमें वर्णित जो बावन पाश हैं, वे नूतन शरीर प्रदान | सहस्राक्षः—सहस्रों नेत्रोंवाले ९८३. सहस्रपात्—सहस्रों करनेवाले हैं, अतः बावन शरीरपङ्क्तिस्वरूप; ९६६. | पैरोंवाले ॥ १६६ ॥ त्रिषष्ट्यक्षरसंश्रयः—तिरसठ अक्षरोंके आधार* ॥ १६२ ॥ | ९८४. सहस्रनामसंस्तुत्यः—सहस्रनामोंद्वारा ९६७. चतुःषष्ट्यर्णनिर्णोता—चौंसठ अक्षरोंके | स्तवनीय; ९८५. सहस्राक्षबलापहः—इन्द्रके बलको
- वर्णोंकी संख्या तिरसठ अथवा चौंसठ मानी गयी है। इनमें इक्कीस स्वर, पचीस स्पर्श, आठ यादि एवं चार यम कहे गये हैं। अनुस्वार, विसर्ग, दो पराश्रित वर्ण—जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय (क और प) और दुःस्पृष्ट लकार—ये तिरसठ वर्ण हैं। इनमें प्लुत लकारको और गिन लिया जाय तो वर्णोंकी संख्या चौंसठ हो जाती है।