भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 155, कुल 656 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 155

उ०ख०-अ०४६ ] * श्रीगणेशसहस्रनामस्तोत्र * १५३ नौ नाथोंके महानाथ; ९१६. नवनागविभूषणः-कर्कोटक आदि नौ नागोंको आभूषणके रूपमें धारण करनेवाले; ९१७. नवरत्नविचित्राङ्गः-हीरा, मोती आदि नौ रत्नोंकी शोभासे विचित्र अंगोंवाले; ९१८. नवशक्तिशिरोधृतः- तीव्रा आदि नौ शक्तियोंद्वारा सिरपर धारित अर्थात् वन्दित ॥ १५० ॥ ९१९. दशात्मकः-दसों दिशाओंमें व्यापक; ९२०. दशभुजः-दस भुजाओंसे युक्त; ९२१. दशदिक्पति- वन्दितः-इन्द्र आदि दस दिक्पालोंसे स्तुत्य; ९२२. दशाध्यायः-चार वेद और छः अंगोंके अध्येता; ९२३. दशप्राणः- प्राण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय-इन दस प्राणोंसे युक्त; ९२४. दशेन्द्रियनियामकः-पाँच ज्ञानेन्द्रियों और पाँच कर्मेन्द्रियोंको वशमें रखनेवाले ॥ १५१ ॥ ९२५. दशाक्षरमहामन्त्रः-दस अक्षरवाले महा- मन्त्रस्वरूप; ९२६. दशाशाव्यापिविग्रहः-दसों दिशाओंमें व्याप्त शरीरवाले; ९२७. एकादशादिभी रुद्रैः स्तुतः- ग्यारहसे लेकर एक सहस्रतक रुद्र होते हैं, उन सबके द्वारा स्तुत; ९२८. एकादशाक्षरः-एकादश अक्षरवाले मन्त्रस्वरूप ॥ १५२ ॥ ९२९. द्वादशोद्दण्डदोर्दण्डः-बारह उद्दण्ड (ऊपर उठे हुए) बाहुदण्डोंसे युक्त; ९३०. द्वादशान्तनिकेतनः- ललाटसे ऊपर ब्रह्मरन्ध्रतकके स्थानको 'द्वादशान्त' कहते हैं, उसमें निवास करनेवाले; ९३१. त्रयोदशभिदाभिन्नविश्वे- देवाधिदैवतम्-तेरह विश्वेदेवोंके अधिदेवता ॥ १५३ ॥ ९३२. चतुर्दशेन्द्रवरदः- चौदह इन्द्रोंको वर देनेवाले; ९३३. चतुर्दशमनुप्रभुः- चौदह मनुओंके अधिपति; ९३४. चतुर्दशादिविद्याढ्यः - चार (आन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दण्डनीति), दस (चार वेद और छः वेदांग) आदि विद्याओंसे सम्पन्न; ९३५. चतुर्दशजगत्प्रभुः- चौदह भुवनोंके स्वामी ॥ १५४ ॥ ९३६. सामपञ्चदशः-पन्द्रह स्तोममन्त्रोंके साथ, जो चार आज्यस्तोत्र-सम्बन्धी मन्त्र हैं, वे सामयुक्त होकर गणपति के स्वरूप हैं, अतः वे उक्त नामसे प्रसिद्ध हैं; ९३७. पञ्चदशीशीतांशुनिर्मलः - पूर्णिमाके चन्द्रमाके समान स्वच्छ; ९३८. षोडशाधारनिलयः- षड्दल, नवदल एवं षोडशदल आदि चक्रोंमें निवास करनेवाले; ९३९. षोडशस्वरमातृकः-सोलह स्वर-अक्षररूप ॥ १५५॥ ९४०. षोडशान्तपदावासः - ब्रह्मरन्ध्रके अन्तर्गत कमलकी कर्णिकासे लेकर ऊपरके भागको 'षोडशान्त' कहते हैं। उसमें निवास करनेवाले अर्थात् उन्मनीसे परे विराजमान; ९४१. षोडशेन्दुकलात्मकः- अमृता और मानिनी आदि षोडशचन्द्रकलास्वरूप; ९४२. कला- सप्तदशी- 'त्रिपुरागम' में प्रसिद्ध 'सप्तदशी' नामक कलास्वरूप; ९४३. सप्तदशः- सामयुक्त सप्तदशस्तोम- स्वरूप; ९४४. सप्तदशाक्षरः - वषट् (२), ओश्रावय (४), यज (२), अस्तु श्रौषट् (४), ये यजामहे (५) - इस प्रकार सत्रह अक्षरोंवाले मन्त्रोंसे यज्ञमें आहुति ग्रहण करनेवाले ॥ १५६ ॥ ९४५. अष्टादशद्वीपपतिः- 'जम्बू' आदि सात द्वीपों और 'सिंहल' आदि ग्यारह उपद्वीपोंके अधीश्वर; ९४६. अष्टादशपुराणकृत्- अठारह पुराणोंके कर्ता व्यासरूप; ९४७. अष्टादशौषधीसृष्टिः- बारह मुख्य धान्य और छः उपधान्य- इन अठारह ओषधियों (अन्नों)- की सृष्टि करनेवाले; ९४८. अष्टादशविधिः- अठारह विधिस্বরূপ; (अपूर्व विधि, नियम-विधि और परिसंख्या- विधि-ये प्रयोग और विनियोग आदिके भेदसे नौ प्रकारकी होती हैं। फिर गौणी और मुख्य भेदसे इनके अठारह प्रकार होते हैं।) ॥ १५७॥ ९४९. अष्टादशलिपिव्यष्टिसमष्टिज्ञानकोविदः -नागरी, द्राविड़ी और आन्ध्री आदिके भेदसे भूतलपर विभिन्न अठारह लिपियाँ हैं। उन भाषाओंको तथा उनके अवान्तर-भेदोंको भी पृथक्-पृथक् एवं समष्टिरूपसे जाननेमें कुशल; ९५०. एकविंशः पुमान् - पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच विषय और पाँच भूत-इन बीस तत्त्वोंसे परे इक्कीसवाँ तत्त्व आत्मा; ९५१. एकविंशत्यङ्गुलिपल्लवः- दस हाथकी अंगुलियाँ, दस पैरोंकी अंगुलियाँ और एक शुण्डदण्ड- इस प्रकार इक्कीस अंगुलिपल्लवोंसे युक्त ॥ १५८ ॥ ९५२. चतुर्विंशतितत्त्वात्मा- प्रकृति, महत्तत्त्व,