भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 154, कुल 656 में से

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१५२ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 ८८०. षड्‌तर्कदूरः—छः दर्शनोंमें कथित तर्कोंके | आठ अंगोंसे युक्त योगके चित्तवृत्तिनिरोधरूप फल अगोचर—वाणीसे अतीत; ८८१. षट्कर्मनिरतः—यजन, | देनेवाले; ८९९. अष्टपत्राम्बुजासनः—अष्टदलकमलपर याजन, अध्ययन, अध्यापन, दान और प्रतिग्रह—इन छः | आसीन होनेके कारण उक्त नामसे प्रसिद्ध; ९००. कर्मोंमें तत्पर रहनेवाले; ८८२. षड्रसाश्रयः—मधुर, | अष्टशक्तिसमृद्धश्रीः—आठ दलोंमें निवास करनेवाली अम्ल, लवण, कटु, कषाय और तिक्त—इन छः रसोंके | तीव्रा आदि आठ शक्तियोंसे सेवित होनेके कारण बढ़ी आधार; ८८३. सप्तपातालचरणः—तल, अतल, वितल, | हुई श्रीसे सम्पन्न; ९०१. अष्टैश्वर्यप्रदायकः—अणिमा सुतल, रसातल, महातल और पाताल—ये नीचेके सात | आदि आठ सिद्धियोंके दाता ॥ १४६ ॥ लोक जिनके चरणोंके आश्रित हैं, वे; ८८४. | ९०२. अष्टपीठोपपीठश्रीः—आठ महापीठ और सप्तद्वीपोरुमण्डलः—जम्बू आदि सात द्वीप जिनके | उपपीठोंकी श्री—सम्पत्तिसे युक्त; ९०३. अष्टमातृ- ऊरुमण्डलके आश्रित हैं, वे ॥ १४२ ॥ | समावृतः—ब्राह्मी आदि सात मातृकाओंके साथ जो ८८५. सप्तस्वर्लोकमुकुटः—भुवर्लोकसे लेकर | आठवीं महालक्ष्मी हैं, वे आठों आवरणदेवताके रूपमें गोलोकपर्यन्त सात स्वर्लोक जिनके मुकुट हैं, वे; ८८६. | जिन्हें घेरे रहती हैं, वे; ९०४. अष्टभैरवसेव्यः—बटुक सप्तसप्तिवरप्रदः—सूर्यको वर देनेवाले; ८८७. | आदि आठ भैरवोंसे सेव्य; ९०५. अष्टवसुवन्द्यः— सप्ताङ्गराज्यसुखदः—स्वामी, अमात्य, राष्ट्र, दुर्ग, कोष, | धरसे लेकर प्रभासतक आठ वसुओंसे वन्दनीय; ९०६. सेना और सुहृद्—इन सातों अंगोंसे युक्त राज्यका सुख | अष्टमूर्तिभृत्—अष्टमूर्तिधारी ॥ १४७ ॥ देनेवाले; ८८८. सप्तर्षिगणमण्डितः—कश्यप आदि सात | ९०७. अष्टचक्रस्फुरन्मूर्तिः—अष्टचक्रवाले यन्त्रमें ऋषियों तथा गण-देवताओंसे सेवित एवं सुशोभित ॥ १४३ ॥ | प्रकाशमान मूर्तिवाले; ९०८. अष्टद्रव्यहविःप्रियः— ८८९. सप्तच्छन्दोनिधिः—गायत्रीसे लेकर जगती- | ईख, सत्तू, चिउड़ा, कदली, मोदक, तिल, नारियल और पर्यन्त सात छन्दोंके आश्रय; ८९०. सप्तहोता—होतासे | घृतपक्व आदि पदार्थ—इन आठ द्रव्योंके हविष्यसे लेकर उद्गाता-पर्यन्त सात होता जिनके स्वरूप हैं, वे; | प्रसन्न होनेवाले; ९०९. नवनागासनाध्यासी—कर्कौटक ८९१. सप्तस्वराश्रयः—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, | आदि नौ नागोंके आसनपर बैठनेवाले; ९१०. नवनिध्यनु- पंचम, धैवत और निषाद—इन सात स्वरोंके आश्रय; | शासिता—नौ निधियोंपर अनुशासन रखनेवाले ॥ १४८ ॥ ८९२. सप्ताब्धिकेलिकासारः—सातों समुद्र जिनके | ९११. नवद्वारपुराधारः—नौ द्वारोंवाले पुर—शरीरको क्रीड़ा-सरोवर हैं, वे; ८९३. सप्तमातृनिषेवितः— | जीवात्मारूपसे धारण करनेवाले; ९१२. नवाधार- ब्राह्मी, माहेश्वरी आदि सात मातृकाओंसे सेवित ॥ १४४ ॥ | निकेतनः—कुलाकुल, सहस्रार, मूलाधार, स्वाधिष्ठान, ८९४. सप्तच्छन्दोमोदमदः—पथ्यसंज्ञक सात | मणिपूर, अनाहत, विशुद्धि, आज्ञा और लम्बिका—इन छन्दोंके मोदजनक मदसे युक्त; ८९५. सप्तच्छन्दो- | नौ आधारोंमें निवास करनेवाले; ९१३. नवनारायण- मखप्रभुः—सप्त छन्दोंके यज्ञके स्वामी; ८९६. | स्तुत्यः—धर्मनारायण, आदिनारायण, अनन्तनारायण, अष्टमूर्तिध्येयमूर्तिः—अष्टमूर्ति-शिवसे ध्येय मूर्तिवाले; | बदरीनारायण, रूपनारायण, शंकरनारायण, सुन्दरनारायण, अर्थात् भगवान् शिव भी अपने हृदयमें जिनके स्वरूपका | लक्ष्मीनारायण और साध्यनारायण—इन नौ नारायणोंसे चिन्तन करते हैं, वे; ८९७. अष्टप्रकृतिकारणम्— | स्तुत्य; ९१४. नवदुर्गांनिषेवितः—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, मन, बुद्धि और | चन्द्रघण्टा, कूष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, अहंकार—इन आठ प्रकृतियोंकी उत्पत्तिके कारण ॥ १४५ ॥ | महागौरी और सिद्धिदात्री—इन नौ दुर्गाओंसे सेवित ॥ १४९ ॥ ८९८. अष्टाङ्गयोगफलभूः—यम, नियम, आसन, | ९१५. नवनाथमहानाथः—ज्ञान, प्रकाश, सत्य, प्राणायाम, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा और समाधि—इन | आनन्द, विमर्श, स्वभाव, सुभग, प्रतिभ और पूर्ण—इन