भारतकोश
श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

श्रीगणेश पुराण (उपासना व क्रीडा खण्ड - गीताप्रेस विशेषाङ्क)

Ganesha Purana Gita Press Special Edition

महर्षि व्यास द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished656 पृष्ठ

पृष्ठ 170, कुल 656 में से

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पृष्ठ 170

१६८ * पुराणं हि गणेशस्य काममोक्षप्रदं नृणाम् * [ श्रीगणेशपुराण- 卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐卐 पचासवाँ अध्याय श्रीगणेशजीके मन्त्रोंके अनुष्ठान एवं गणेशचतुर्थीव्रतकी विधि पार्वतीजी बोलीं- हे गिरिराज! मैं [गणेशजीका] मन्त्र नहीं जानती हूँ, अतः आप ही उसे स्वयं बतायें, जिससे मैं गणेशजीका अनुग्रह और कल्याणकारी शिवको प्राप्त कर सकूँ ॥ १ ॥ हिमवान् बोले- हे देवि! गणेशजीके अनेक प्रकारके मन्त्र हैं, जो अनेक प्रकारकी सिद्धियाँ प्रदान करनेवाले हैं। गणेशजीके असंख्य मन्त्रोंमें-से कुछको मैं तुमसे कहता हूँ ॥ २ ॥ [पूजाके अनन्तर] सम्यक् रूपसे पद्मासनपर स्थित होकर और इन्द्रियोंका सब प्रकारसे नियमन (नियन्त्रण) करके [विभिन्न] न्यासोंको करनेके बाद अपनी इच्छाके अनुसार (यथेच्छ संख्यामें) जप करे ॥ ३ ॥ एकाक्षर मन्त्रका एक लाख पचास हजार, षडक्षर मन्त्रका एक लाख दस हजार और वैसे ही अर्थात् उतनी ही संख्यामें पंचाक्षर, दशाक्षर और अष्टाक्षर मन्त्रका तथा अट्ठाइस अक्षरोंवाले मन्त्रका अयुत संख्यामें (दस हजार) जप करे ॥ ४-५ ॥ हे पार्वती! इस प्रकार अपनी इष्टसिद्धिके लिये [साधक] अनेक प्रकारके मन्त्रोंका जप करते हैं। अब तुम मेरे वचनको एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ६ ॥ अब तुम एकाक्षर या षडक्षर उत्तम मन्त्रको ग्रहण करो। हे सुव्रते! श्रावण शुक्लपक्षकी चतुर्थीसे उसका जप आरम्भ करो। मात्र एक माहका अनुष्ठान करो, तुम्हारा कार्य सिद्ध होगा। तुम शिवको प्राप्त करोगी तथा अन्य भी तुम्हें जो कुछ वांछित होगा, वह भी प्राप्त करोगी, यह स्पष्ट है ॥ ७-८ ॥ मिट्टीकी बनी हुई गणेशजीकी एक मूर्तिका पूजन करनेसे भी वह स्त्री या पुरुषको उसके द्वारा अभिलषित धन, पुत्र, [गो आदि] पशु भी प्रदान करती है ॥ ९ ॥ दो मूर्तियोंका पूजन करनेसे मनुष्य असाध्यको भी साधित कर लेता है और तीन मूर्तियोंके पूजनसे राज्य, रत्न और सम्पूर्ण सम्पत्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥ १० ॥ जो चार मूर्तियोंका पूजन करता है; वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-पुरुषार्थचतुष्टयको प्राप्त करनेवाला होता है और पाँच मूर्तियोंके पूजनसे सार्वभौम राजा अर्थात् समस्त भूमण्डलका सम्राट् होता है ॥ ११ ॥ छः मूर्तियोंके पूजनसे सृजन, पालन एवं संहार करनेमें समर्थ हो जाता है। सात-आठ-नौ मूर्तियोंके पूजनसे सर्वविद् (सब कुछ जाननेवाला) हो जाता है ॥ १२ ॥ भगवान् गणेशकी कृपासे वह भूत, वर्तमान और भविष्यको जाननेवाला हो जाता है। तैंतीस करोड़ देवता, अग्नि, इन्द्र, शिव, विष्णु, सनकादि मुनि- गण-ये सभी दस गणेश-मूर्तियोंकी पूजा करनेसे उसकी सेवा करने लगते हैं। एकादश मूर्तियोंके अर्चनसे वह एकादश रुद्रोंका अधिपतित्व प्राप्त कर लेता है ॥ १३-१४ ॥ द्वादश मूर्तियोंके अर्चनसे [मनुष्य] द्वादश आदित्योंपर स्वामित्व प्राप्त कर लेता है। अत्यन्त संकटके समय मूर्तियोंका वृद्धिक्रमके अनुसार पूजन करे ॥ १५ ॥ एक सौ आठ मूर्तियोंके पूजनसे जो कुछ भी प्राप्तव्य होता है, वह सब कुछ प्राप्त हो जाता है तथा प्रतिदिन एक लाख मूर्तियोंका पूजन करनेसे [साधक] महामुक्तिको प्राप्त करता है ॥ १६ ॥ [ब्रह्माजी व्यासजीसे कहते हैं-] हे मुने! कारागृहसे मुक्तिकी इच्छावालेको पाँच मूर्तियोंका निर्माणकर [उनका पूजन करना चाहिये।] गणेशजीकी कृपासे वह इक्कीस दिनमें ही मुक्त हो जायगा ॥ १७ ॥ गणेशभक्तिपरायण मनुष्य प्रतिदिन सात मूर्तियोंका निर्माणकर पाँच वर्षोतक पूजन करनेसे महापापसे भी मुक्त हो जाता है। जन्मसे लेकर मृत्युक अर्थात् आजीवन जो मनुष्य गणेशजीकी एक पार्थिव मूर्तिका पूजन करता है, उसे साक्षात् गणेश ही जानना चाहिये, उसके दर्शनसे विघ्नोंका नाश होता है ॥ १८-१९ ॥ अतः सम्पूर्ण कामनाओंकी प्राप्तिके लिये उस